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राष्ट्रव्यापी हड़ताल: छात्रों और किसानों समेत लाखों मजदूर होंगे सड़कों पर

नई दिल्ली। कल ट्रेड यूनियनों की राष्ट्रीय हड़ताल है। दस राष्ट्रीय यूनियनों की ओर से बुलाई गयी इस हड़ताल में 25 करोड़ से ज्यादा मजदूरों के शामिल होने के आसार हैं। ऐसा ट्रेड यूनियनों ने दावा किया है। बैंक और औद्योगिक क्षेत्र के सबसे ज्यादा प्रभावित होने की आशंका है। ट्रेड यूनियनों की तरफ से जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया है कि मजदूर संगठनों द्वारा लगातार दी जा रही चेतावनियों के बावजूद मौजूदा सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। वह सार्वजनिक क्षेत्रों के निजीकरण और मजदूरों के अधिकारों में कटौती के अपने रास्ते पर आगे बढ़ती रही। संगठनों ने बताया कि 2 जनवरी को श्रम मंत्री ने ट्रेड यूनियन के प्रतिनिधियों के साथ बैठक जरूर की लेकिन उसमें मजदूरों की सुविधाओं और उनके अधिकारों की रक्षा से जुड़े किसी भी मसले पर कोई भरोसा दिला पाने में वह नाकाम रहे। विज्ञप्ति में कहा गया है कि चार साल पहले 2015 में सरकार ने इसी तरह की एक वार्ता की थी। और उस समय मजदूरों से उनके मुद्दों पर बातचीत करने के लिए मंत्रियों का एक समूह भी गठित किया गया था।

और उसी साल अगस्त में उसकी एक बैठक भी हुई थी। लेकिन उसके बाद आज चार साल बीत गए हैं लेकिन समूह भी काम कर रहा है या फिर खत्म हो गया है उसकी कोई जानकारी तक नहीं है। बैठक की तो बात दूर है। क्योंकि उसके बाद नया चुनाव हुआ और एक बार फिर मोदी सरकार का गठन हुआ। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में मंत्री समूह का क्या हुआ उसकी कोई जानकारी नहीं है। हां यह बात जरूर साफ हो गयी कि सरकार श्रम कानूनों में व्यापक स्तर पर बदलाव चाहती है और उसको ज्यादा से ज्यादा मालिक के पक्ष में झुका हुआ देखना चाहती है। जिसमें मजदूर कहें या फिर ट्रेड यूनियन के अधिकारों के नाम पर महज कुछ औपचारिकताएं होंगी। और दूसरे तरीके से कहें तो उसके बाद स्थिति कुछ ऐसी हो सकती है कि ट्रेड यूनियन किस चिड़िया का नाम है उसका पता कर पाना भी किसी के लिए मुश्किल होगा।

इन्हीं हालातों में 30 सितंबर, 2019 को श्रमिकों का राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित हुआ था और उसी में कल के आम हड़ताल का फैसला लिया गया था। मजदूर संगठनों की इन तमाम कवायदों के बाद भी सरकार अपने रास्ते से पीछे नहीं हट रही है। इस बीच एयरपोर्ट को निजी हाथों में देने का मसला हो या फिर रेलवे के निजीकरण की बात सरकार धड़ल्ले से फैसले ले रही है। बैंकों का विलयीकरण उसका सबसे बड़ा एजेंडा बना हुआ है। मुनाफा देने वाली एलआईसी से लेकर एनटीपीसी और तेल कंपनियों से लेकर बीएचईएल तक सरकार बेचने पर उतारू है। यहां तक कि रक्षा जैसे संवेदनशील सेक्टर को न केवल निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया गया है बल्कि उसमें 100 फीसदी विदेशी निवेश की छूट दे दी गयी है। दूसरे शब्दों में कहें तो पूरी सरकार कॉरपोरेट की जेब में चली गयी है। और देश के चंद पूंजीपतियों की इच्छा ही अब सरकार का कानून है।

ट्रेड यूनियनों की इस हड़ताल को दो महत्वपूर्ण तबकों से समर्थन हासिल हुआ है। जो न केवल संख्या के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है बल्कि जोश, ऊर्जा और तेवर के मामले में भी उसका कोई मुकाबला नहीं है। वे हैं किसान और छात्र। ट्रेड यूनियन के नेताओं का कहना है कि देश में किसानों और खेत मजदूरों के तकरीबन 175 संगठनों ने हड़ताल को न केवल समर्थन दिया है बल्कि वे इसमें सक्रिय भागीदारी करेंगे। इसके अलावा उनका कहना है कि जिस तरह से देश के पैमाने पर शिक्षा के बजट में कटौती हो रही है और परिसरों को दुश्मन घोषित कर उन पर सरकार ने हमले शुरू कर दिए हैं उससे छात्रों और नौजवानों की भूमिका इस हड़ताल में बेहद बढ़ गयी है। तकरीबन 60 छात्र संगठनों का हड़ताल को खुला समर्थन है। इसके अलावा तमाम क्षेत्रीय दलों के छात्र और युवा संगठन इस हड़ताल में हिस्सा लेंगे।

हड़ताल में सबसे ज्यादा बैंकिंग सेक्टर के प्रभावित होने की आशंका है। बताया जा रहा है कि सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बैंक कर्मी हड़ताल पर होंगे। वे अफसर हों या कि कर्मचारी। दरअसल निजीकरण की सबसे बड़ी तलवार बैंककर्मियों पर लटक रही है। और जितनी तेजी से सरकार ने उनका विलयन शुरू किया है उससे लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब सरकारी बैंकों के नाम पर गिनती के कुछ बैंक बचेंगे।

इसके अलावा ट्रांसपोर्ट सेक्टर भी सबसे ज्यादा प्रभावित होने जा रहा है। सरकार ने और खासकर राज्य सरकारों ने इस सेक्टर को लगभग बैठा ही दिया है। और अगर कुछ जगहों पर चल भी रहा है तो अपने जीवन के आखिरी पड़ाव पर है।

हड़ताल में सीटू, इंटक, एटक, एचएमएस, एआईटीयूसी, टीयूसीसी, सेवा, एक्टू, एलपीएफ, यूटीयूसी ट्रेड यूनियन शामिल हैं। इसके अलावा इनसे जुड़े या फिर स्वतंत्र रूप से काम कर रहे सैकड़ों फेडरेशन और एसोसिएशन भी इस हड़ताल में पूरी मजबूती के साथ हिस्सा लेंगे। इनकी तरफ से जारी संयुक्त विज्ञप्ति में कहा गया है कि ‘8 जनवरी, 2020 को होने वाली इस राष्ट्रीय हड़ताल में हम 25 करोड़ श्रमिकों के शामिल होने की उम्मीद करते हैं। इन सब की बस एक ही मांग है कि सरकार अपनी जन विरोधी, मजदूर विरोधी और देश विरोधी नीतियों को वापस ले।’

नेताओं ने कहा कि 2 जनवरी, 2020 को ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधियों के साथ हुई बैठक में श्रम मंत्री मजदूरों को किसी भी तरह का भरोसा दिला पाने में नाकाम रहे। लिहाजा मजबूरन श्रमिकों को हड़ताल पर जाना पड़ रहा है।

पश्चिम बंगाल और केरल में हड़ताल के सबसे ज्यादा सफल होने की उम्मीद है। हालांकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने हड़ताल को समर्थन नहीं दिया है। लेकिन परंपरागत रूप से कहा जाए या फिर वामपंथी दलों की उपस्थिति हड़ताल को सफल बनाने में मददगार साबित होगी। इसके अलावा केरल में वामपंथी सरकार की मौजूदगी और उसका हड़ताल को समर्थन इसको निश्चित तौर पर सफल बनाने में कारगर साबित होगा। हालांकि यहां भी हड़तालियों ने पर्यटन को इससे मुक्त रखा है।

बहरहाल जिस तरह की तैयारी ट्रेड यूनियनों ने की है। उससे ऐसा लग रहा है कि इसका असर राष्ट्रव्यापी होगा।

This post was last modified on January 7, 2020 11:31 pm

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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