Subscribe for notification

सुप्रीमकोर्ट का स्वत:संज्ञान: ताक पर रख दिया गया है आपदा प्रबंधन कानून

वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने उच्चतम न्यायालय में कहा कि आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 12 के तहत प्रदान की गई राहत के न्यूनतम मानकों का अनुपालन नहीं किया गया है और कि अधिनियम के अंतर्गत प्रावधानित कोई राष्ट्रीय/राज्य योजना नहीं है। कपिल सिब्बल ने यह भी कहा कि श्रमिकों के आवागमन में तेजी लाने के लिए और अधिक रेलगाड़ियां चलानी होंगी। केवल तीन फीसद ट्रेनें चल रही हैं जिससे कामगारों को जाने में कई महीने लगेंगे। लॉकडाउन के बीच प्रवासी कामगारों के देशव्यापी दुर्दशा के मुद्दे पर आज उच्चतम न्यायालय में हुई दलीलों के तीखे आदान-प्रदान के बाद उच्चतम न्यायालय ने कई उल्लेखनीय निर्देश पारित किए।

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि वह यहां किसी राजनीतिक उद्देश्य के लिए नहीं हैं बल्कि इच्छुक संगठनों की ओर पेश होकर आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत प्रासंगिक सांविधिक प्रावधानों की ओर कोर्ट का ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं। उन्होंने दलील दी कि कुछ कानूनी पेचीदगियां ऐसी हैं जिन्हें  प्रवासी कामगारों के संकट के प्रकाश में देखा जाना चाहिए। इसे सिद्ध करने के लिए सिब्बल ने बताया कि जब भी आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 (डीएमए) की तुलना में कोई आपदा आती है तब राष्ट्रीय कार्यकारी समिति (एनईसी) द्वारा अपनाई जाने वाली अपेक्षित कार्य योजना पर प्रकाश डाला जाता है। उन्होंने कहा कि इस योजना को तब राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा अनुमोदित किया जाता है, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं।

सिब्बल ने कहा कि डीएमए के तहत, जब भी कोई आपदा आती है, एनईसी द्वारा एक राष्ट्रीय योजना तैयार की जानी चाहिए जिसे प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले डीएम प्राधिकरण द्वारा अनुमोदित किया जाता है । न्यूनतम मानकों में आश्रय, भोजन, पीने का पानी, चिकित्सा कवर और स्वच्छता शामिल है। एनईसी द्वारा एक राष्ट्रीय योजना तैयार करना डीएमए, 2005 की धारा 11 में स्पष्ट है, जिसे राष्ट्रीय प्राधिकरण द्वारा अनुमोदित किए जाने वाले आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में राज्य सरकारों और संगठनों के विशेषज्ञ निकायों के परामर्श से बनाया जाना है।

डीएमए की धारा 11, 2005 में कहा गया है कि पूरे देश को राष्ट्रीय योजना कहलाने के लिए आपदा प्रबंधन के लिए एक योजना तैयार की जाएगी । राष्ट्रीय कार्यकारी समिति द्वारा राष्ट्रीय योजना तैयार की जाएगी जिसमें राष्ट्रीय नीति के संबंध में और आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में राज्य सरकारों और विशेषज्ञ निकायों या संगठनों के परामर्श से राष्ट्रीय प्राधिकरण द्वारा अनुमोदित किया जाएगा। राष्ट्रीय योजना में आपदाओं की रोकथाम के लिए किए जाने वाले उपायों, या उनके प्रभावों को कम करने के लिए किए जाने वाले उपाय शामिल होंगे, विकास योजनाओं में शमन उपायों के एकीकरण के लिए किए जाने वाले उपाय, किसी भी धमकी वाली आपदा स्थितियों या आपदा का प्रभावी ढंग से जवाब देने के लिए तैयारी और क्षमता निर्माण के लिए किए जाने वाले उपाय, शामिल होंगे।

भूमिकाओं और भारत सरकार के विभागों की जिम्मेदारियों में निर्दिष्ट खंड (निर्दिष्ट खंड) के संबंध में भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों या विभागों की भूमिकाएं और जिम्मेदारियां, राष्ट्रीय योजना की प्रतिवर्ष समीक्षा और अद्यतन किया जाएगा, राष्ट्रीय योजना के तहत किए जाने वाले उपायों के वित्तपोषण के लिए केन्द्र सरकार द्वारा उचित प्रावधान किए जाएंगे। संदर्भित राष्ट्रीय योजना की प्रतियां भारत सरकार के मंत्रालयों या विभागों को उपलब्ध कराई जाएंगी और ऐसे मंत्रालय या विभाग राष्ट्रीय योजना के अनुसार अपनी योजनाएं तैयार करेंगे ।

इसके अलावा, आपदाओं के दौरान डीएमए, 2005 की धारा 12 लागू करने की पूर्व-अपेक्षित आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए सिब्बल ने कहा कि इस धारा में प्रभावित जनता को बुनियादी सुविधाओं के न्यूनतम मानकों को अपनाने की आवश्यकता है।

आपदा प्रबंधन अधिनियम राज्यों की धारा 12 में कहा गया है कि राहत के न्यूनतम मानकों के लिए दिशा-निर्देश दिए जाएंगे। – नेशनल अथॉरिटी आपदा से प्रभावित लोगों को दी जाने वाली राहत के न्यूनतम मानकों के लिए दिशा निर्देशों की सिफारिश करेगी, जिसमें आश्रय, भोजन, पेयजल, चिकित्सा कवर और स्वच्छता के संबंध में राहत शिविरों में प्रदान की जाने वाली न्यूनतम आवश्यकताएं, विधवाओं और अनाथों के लिए किए जाने वाले विशेष प्रावधान, जीवन की हानि के कारण अनुग्रह सहायता के साथ-साथ घरों को नुकसान पहुंचाने के कारण सहायता और आजीविका के साधनों की बहाली के लिए और जो अन्य राहत के रूप में आवश्यक हो सकता है शामिल होंगे। इसमें ऐसे दिशा-निर्देश हैं जो न्यूनतम मानकों का रेखांकित करते हैं । सिब्बल ने दलील दी कि ऐसा नहीं किया गया है । इसके अलावा सिब्बल ने इस बात पर जोर दिया कि केंद्र का हलफनामा राज्य और जिला स्तर पर अस्पष्ट और अपर्याप्त है।

इसके साथ, उन्होंने केंद्र के उस रुख को ख़ारिज किया  जिसके अनुसार हैं जो डीएमए के तहत परिकल्पित कानून के विरुद्ध प्रवासी मजदूर स्थानीय स्तर पर भड़काये जाने के कारण पलायन कर रहे हैं। न्यूनतम मानकों का कार्यान्वयन न करना और समन्वय की कमी के कारण लोग पलायन करने पर विवश हैं। इसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। लोग आश्रयों से दूर चल रहे हैं क्योंकि आश्रय गृह मानक तक नहीं हैं।

इसके अलावा सिब्बल ने इस बात पर जोर दिया कि केंद्र का हलफनामा राज्य और जिला स्तर पर अस्पष्ट और अपर्याप्त है।सिब्बल ने यह भी कहा कि अगर बाकी लोगों के जाने में 3 महीने लग रहे हैं, तो क्या व्यवस्थाएं हैं? 3 फीसद क्षमता पर ट्रेनें चल रही हैं । ऐसी स्थिति में, लोगों को जाने में 3 महीने लगेंगे । इस पर सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सभी प्रवासियों की वास्तव में अपने पैतृक स्थानों पर वापस जाने की इच्छा नहीं है। एसजी ने कहा कि वे जाना नहीं चाहते। आप यह नहीं समझते? सिब्बल ने कहा आप ऐसा कैसे कह सकते हैं? एसजीने जवाब दिया कि मैंने कहा कि वे स्थानीय भड़कावे  की वजह से पैदल जा रहे थे!

पीठ ने सिब्बल के तर्कों को पत्रावली पर दर्ज़ किया। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने यह दलील दिया कि आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 12 के तहत प्रदान की गई राहत के न्यूनतम मानकों का प्रावधान नहीं किया गया है। उन्होंने यह भी निवेदन किया है कि अधिनियम के अंतर्गत प्रावधानित कोई राष्ट्रीय/राज्य योजना नहीं है, जैसा कि सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने दावा किया है। कपिल सिब्बल ने बताया कि श्रमिकों के आवागमन में तेजी लाने के लिए और अधिक रेलगाड़ियां चलानी होंगी। उन्होंने यह भी कहा कि कामगारों के पंजीकरण में कठिनाइयां हैं ।

जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस एस के कौल और जस्टिस एम आर शाह की पीठ ने केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया और 5 जून को इस मामले को सूचीबद्ध किया। 26 मई को उच्चतम न्यायालय ने प्रवासियों के संकट का स्वतः संज्ञान लिया था, जो 24 मार्च को देश व्यापी लॉकडाउन की घोषणा के बाद से चल रहा है। अदालत ने कहा कि प्रवासियों के कल्याण के लिए सरकारों द्वारा किए गए उपायों में अपर्याप्तता और कुछ खामियां थीं ।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

Donate to Janchowk!
Independent journalism that speaks truth to power and is free of corporate and political control is possible only when people contribute towards the same. Please consider donating in support of this endeavour to fight misinformation and disinformation.

Donate Now

To make an instant donation, click on the "Donate Now" button above. For information regarding donation via Bank Transfer/Cheque/DD, click here.

This post was last modified on May 29, 2020 9:47 am

Share