Subscribe for notification

लीपापोती कार्यक्रम था कोरोना पर सु्प्रीम कोर्ट का स्वत:संज्ञान

कहते हैं जो गरजते हैं वो बरसते नहीं। कोरोना संबंधी स्वत: संज्ञान का भी सुप्रीम कोर्ट में यही हाल हुआ। इतना हो हल्ला के बाद नतीजा सिफर रहा। माननीय ने संज्ञान तो इस तरह से लिया था मानो केंद्र सरकार समेत जिम्मेदार दूसरे लोगों की अब खैर नहीं। सुप्रीम कोर्ट में सरकार के ऊपर आसमान गिरेगा और कोरोना को बंगाल की खाड़ी में फेंक दिया जाएगा। अब तक जो न हुआ वह कोर्ट रूम में देखने को मिलेगा। दरअसल जब स्वत:संज्ञान की बात कही गयी तभी लोगों को संदेह होने लगा था। माननीय के लिए इसमें स्वत:संज्ञान जैसी क्या बात थी। इस पर कितनी याचिकाएं पहले से ही कोर्ट में पड़ी हुई हैं। और कई बार यह बात भी कोर्ट में और कोर्ट के बाहर दोहरायी जा चुकी है कि वह उनको प्राथमिकता नहीं दे रहा है। उसके लिए अर्णब गोस्वामी को जेल में जाने से रोकना ज्यादा जरूरी लगता है बनिस्बत सड़क पर मरती, तड़पती, जहालत झेलती जिंदगियों को बचाने के।

कई बार जब सुनवाई हुई तो यह कह कर कि सरकार इसमें अपना काम कर रही है और कोर्ट क्या कर सकता है। और कई बार तो ऐसा हुआ जब एसजी ने अपने झूठ से कोर्ट को संतुष्ट कर दिया या फिर कहें उसे संतुष्ट होने का बहाना मिल गया। और जब सॉलिसीटर जनरल के उस महा झूठ पर भी कोर्ट ने कोई एतराज नहीं जताया जिसमें उन्होंने कहा था कि सड़क पर एक भी प्रवासी मजदूर नहीं है और सबको उनके गंतव्यों तक पहुंचा दिया गया है, तब लोगों की देश की इस सर्वोच्च अदालत से रही-सही उम्मीद भी जाती रही। फिर किसी ने उस तरफ मुह करना भी जरूरी नहीं समझा। और यह मान लिया गया कि केंद्र को बचाने में यह उससे भी दो कदम आगे है। और न न्याय उसके लिए प्राथमिकता में है और न संविधान और न ही जनता की बेइंतहा परेशानियां।

लेकिन इस बीच हाईकोर्टों ने जब मामलों में राज्य सरकारों की ऐसी-तैसी करनी शुरू कर दी। और जगह-जगह सुनवाइयों में उनकी खिंचाई शुरू हो गयी। वह गुजरात हाईकोर्ट हो या कि तेलंगाना या फिर इलाहाबाद जगह-जगह सरकारों को शर्मिंदा होना पड़ रहा था। तब सुप्रीम कोर्ट को अपने अस्तित्व का एहसास हुआ। लिहाजा उसने मामले का स्वत: संज्ञान लिया जिसकी कोई जरूरत नहीं थी। संज्ञान लेने के लिए उसके पास बोरा भर याचिकाएं पहले से मौजूद थीं। जिसमें जगदीप छोकर से लेकर स्वामी अग्निवेश तक तमाम नाम गिनाए जा सकते हैं।

लेकिन यह संज्ञान भी ईमानदारी या फिर लोगों को न्याय दिलाने के मकसद से कम केंद्र को बचाने और सारी जिम्मेदारी राज्यों के मत्थे मढ़ने तौर पर ज्यादा दिख रहा है। यह अपनी तरह का एक लीपापोती कार्यक्रम था। कल की सुनवाई में भले ही एसजी तुषार मेहता पर कोर्ट कुछ सख्त दिखा हो और उनसे कुछ तीखे सवाल भी पूछे हों। लेकिन उनकी दलीलों के तौर पर सामने आये तमाम झूठ को जिस तरह से नजरंदाज कर दिया गया उससे कोर्ट की मंशा को समझना किसी के लिए मुश्किल नहीं है। यह बात उस समय और स्पष्ट हो गयी जब तुषार मेहता ने कहा कि अभी वह पूरी विस्तृत रिपोर्ट कोर्ट को सौंपेंगे और उस पर कोर्ट ने कहा कि आदेश केंद्र के लिए नहीं बल्कि राज्यों के लिए दिए जा रहे हैं। इस एक वाक्य में और उसके बाद सामने आए निर्देशों में देखा जा सकता है कि कहीं भी केंद्र को जिम्मेदार नहीं ठहराया गया है। यहां तक कि उस पर विपरीत टिप्पणी करने तक से कोर्ट बचा है।

सारे के सारे आदेश राज्यों के लिए हैं। जिसमें उसने खास तौर पर टिकट का किराया न लेने और यात्रियों को भोजन-पानी मुहैया कराने की बात पर जोर दिया है। अब कोर्ट से कोई यह पूछ सकता है कि जनाब इसके पहले के यात्रियों ने आखिर क्या गुनाह किया था? उन्हें क्यों नहीं- बगैर टिकट के उनके गंतव्यों तक भेजा गया? राह चलते भूखे-प्यासे निरीह नागरिकों पर लाठियां भाजने की जगह उनके खाने और पानी का इंतजाम किया गया। सड़क पर बच्चे जनती महिलाओं के लिए एंबुलेंस मुहैया करायी गयी। वो भारत के नागरिक नहीं थे या फिर किसी दूसरी दुनिया से आए थे? आखिर क्या वजह थी? क्या आपको एसजी तुषार मेहता से एक बार नहीं पूछना चाहिए था कि दूसरे देशों में बसे अपने नागरिकों को प्लेन से मुफ्त में लाया जा सकता है। कोटा में तैयारी कर रहे मध्यम वर्गीय तबकों के बच्चों को बगैर किराया लिए उनके घरों तक पहुंचाया जा सकता है तो भला इन गरीबों ने आखिर क्या गुनाह किया है? क्या इनका इस देश के संसाधनों पर कोई हक नहीं है? सच्चाई यह है कि जिसको सबसे ज्यादा जरूरत थी उसको सरकार ने ठेंगा दिखा दिया।

और अब जब आपको गलती का एहसास हुआ है तो सारी जिम्मेदारी राज्यों के कंधों पर छोड़ दी है जिनके पास संसाधनों का टोटा है। खजाना खाली पड़ा है। और रोजाना का खर्च चलाने के लिए उनमें से कितनों को अपने कर्मचारियों के वेतन से कटौतियां करनी पड़ रही हैं। जिसने इस लॉकडाउन का फैसला लिया और जो सारी परेशानियों के लिए जिम्मेदार है और संसाधनों के मामले में भी किसी राज्य से कई गुना ज्यादा क्षमता रखता है। यह सारा बोझ उस पर क्यों नहीं डाला गया? और कुछ नहीं तो कम से कम केंद्र को यह निर्देश तो दिया ही जा सकता था कि वह राज्यों के चार महीने के बकाया जीएसटी का उनको भुगतान कर दे।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट की पूरी कवायद केंद्र सरकार की कोरोना से निपटने की उसकी रणनीति की ही दिशा में संचालित थी। केंद्र ने अब पूरे मामले से पल्ला झाड़ लिया है। उसने अपनी सारी जिम्मेदारियों को राज्यों के ऊपर छोड़ दिया है। क्योंकि उसको लग रहा है कि उसके बस की अब बात नहीं है। लिहाजा चीजें और बदतर हों उससे पहले उनसे दूरी बना ली जाए। लिहाजा बलि के बकरों के तौर पर तमाम राज्यों को तैयार कर लिया गया है। जबकि सच्चाई यह है कि इस पूरे मामले में अगर किसी एक संस्था की जिम्मेदारी सबसे ज्यादा बनती है तो वह केंद्र सरकार है। अभी तक सारे फैसले उसने ही आगे बढ़कर लिए और उन फैसलों का नतीजा यह रहा कि महामारी रुकने की जगह और वह फैलती गयी। और आखिर में यह बात अब दिन के आईने की तरह साफ हो गयी है कि गांव-गांव तक कोरोना पहुंचाने के लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो वह केंद्र और उसके द्वारा लिए गए तमाम फैसले।

एक बार फिर मैं यहां दोहराना चाहूंगा कि सरकार की प्राथमिकता कोरोना नहीं है बल्कि उसकी अपनी राजनीति है। अगर कोरोना होता तो उसके लिए जो जरूरी उपाय हैं वो किए जाते। उदाहरण स्वरूप अहमदाबाद में कोरोना का कहर किसी भी राज्य के मुकाबले बहुत ज्यादा है। क्योंकि यहां मौतों की संख्या राष्ट्रीय औसत की दोगुनी है। और अब यह मान लिया गया है कि वहां अस्पताल में जाने का मतलब मौत है। इस बात की पुष्टि गुजरात हाईकोर्ट ने सिविल अस्पताल से जुड़ी कालकोठरी की अपनी टिप्पणी में कर दी है। लेकिन चूंकि देश और दुनिया के सामने आंकड़ों को दुरुस्त रखना है लिहाजा कोरोना को रोकने के एक मात्र उपाय टेस्टिंग और फिर संक्रमितों को क्वारंटाइन करने की जो सलाह है उसको लागू ही नहीं किया जा रहा है। इस बात को सरकार ने कोर्ट में भी स्वीकार कर लिया है। उसका नतीजा यह है कि कोरोना बढ़ता जा रहा है और सरकार बेबस खड़ी है।

लेकिन इन मौतों और जनता की अथाह परेशानियों से बेफिक्र बीजेपी के आलाकमान को अभी भी अपनी सत्ता और उसका खेल सबसे प्राथमिक लग रहा है। उस समय जबकि पानी नाक के ऊपर चढ़ गया है और चारों तरफ त्राहिमाम मचा है। बीजेपी महाराष्ट्र में सरकार बदलने की कवायद में जुट गयी है। ऐसे समय में जबकि वहां के मुख्यमंत्री के बगल में पूरी मजबूती के साथ खड़ा होकर केंद्र को कोरोना के खिलाफ छेड़ी गयी जंग को जीतना चाहिए तब उसकी कुर्सी पकड़ कर हिलाने के जरिये आखिर आप क्या संदेश देना चाहते हैं? क्या ये सब चीजें सुप्रीम कोर्ट को नहीं दिख रही हैं? इशारे में ही सही उसे क्या कोर्ट को इन सारी चीजों से बाज आने की चेतावनी नहीं देनी चाहिए थी। किसी राज्य के अस्तित्व की पहली शर्त ही नागरिकों के जीवन की रक्षा है। और अगर सरकार उसमें फेल हो रही है तो क्या संविधान की रक्षा की जिम्मेदारी उठाने वाले सुप्रीम कोर्ट को उससे यह बात नहीं पूछनी चाहिए कि आखिर तुम्हारी मंशा क्या है?

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

This post was last modified on May 29, 2020 1:49 pm

Leave a Comment
Disqus Comments Loading...
Share

Recent Posts

बिहार की सियासत में ओवैसी बना रहे हैं नया ‘माय’ समीकरण

बिहार में एक नया समीकरण जन्म ले रहा है। लालू यादव के ‘माय’ यानी मुस्लिम-यादव…

9 hours ago

जनता से ज्यादा सरकारों के करीब रहे हैं हरिवंश

मौजूदा वक्त में जब देश के तमाम संवैधानिक संस्थान और उनमें शीर्ष पदों पर बैठे…

11 hours ago

भुखमरी से लड़ने के लिए बने कानून को मटियामेट करने की तैयारी

मोदी सरकार द्वारा कल रविवार को राज्यसभा में पास करवाए गए किसान विधेयकों के एक…

11 hours ago

दक्खिन की तरफ बढ़ते हरिवंश!

हिंदी पत्रकारिता में हरिवंश उत्तर से चले थे। अब दक्खिन पहुंच गए हैं। पर इस…

12 hours ago

अब की दशहरे पर किसान किसका पुतला जलायेंगे?

देश को शर्मसार करती कई तस्वीरें सामने हैं।  एक तस्वीर उस अन्नदाता प्रीतम सिंह की…

13 hours ago

प्रियंका गांधी से मिले डॉ. कफ़ील

जेल से छूटने के बाद डॉक्टर कफ़ील खान ने आज सोमवार को कांग्रेस महासचिव प्रियंका…

15 hours ago