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निर्मला जी! पकौड़े और दुकान से नहीं संभलेगी भारत की बिगड़ी हुयी भीमकाय अर्थव्यवस्था

भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ मजाक हो रहा है। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन ने तो सचमुच में देश को बहीखाते के युग में पहुंचा दिया।  अर्थव्यवस्था के तमाम मोर्चे पर नाकाम जेएनयू की इन मोहतरमा को तो कम से कम इसका श्रेय दिया ही जाना चाहिए। लेकिन भाजपा के इन घुटनाबुद्धिधारकों के साहस की दाद देनी पड़ेगी। जब एक के बाद दूसरे सेक्टर की जीडीपी औंधे मुंह गिर चुकी है और हर मोर्चे पर पस्तहिम्मती है तब उन्होंने चार जगहों पर दुकानें खोलकर उसे ठीक करने का जो संकल्प जाहिर किया है वह काबिले तारीफ है। शायद ही कोई बहस या फिर बातचीत का मौका हो जिसमें छोटे से लेकर बीजेपी का बड़ा नेता अलादीनी मोदी के 5 ट्रिलियन इकोनामी का जिक्र न करता हो। भले ही उसे इस बात का ज्ञान न हो कि ट्रिलियन गणित का कोई पैमाना है या फिर सामान ढोने वाली कोई गाड़ी।

और जो बीजेपी नेता सब कुछ समझते हुए भी इस जुमले को दोहरा रहे हैं उनके हौसले को और भी ज्यादा सलाम किया जाना चाहिए। यह कुछ उसी तरह की तस्वीर है जब कब्र में पैर लटकाए एक बूढ़े बैल से पथरीली जमीन को जोत कर रवां कर देने का कोई किसान सपना देखे। खैर किसान इतना मूर्ख नहीं होता है। उसे पता होता है कि उसकी खेती कैसी है और उसमें हल चलाने के लिए किस तरह के बैल और उसकी ताकत की जरूरत पड़ेगी। लेकिन अगर किसान सीतारमन जैसा निकला फिर तो उसके खेत का खुदा ही मालिक।

दरअसल भारतीय अर्थव्यवस्था एक ऐसे नाजुक मोड़ पर पहुंच गयी है जब सरकार से जुड़े अर्थशास्त्र के सभी जानकार एक-एक कर उसे छोड़कर जा चुके हैं। और इस भीमकाय अर्थव्यवस्था को सीतारमन और क्रिकेट के खिलाड़ी भी नहीं बल्कि उसके मैनेजर अनुराग ठाकुर और न्यूटन तथा आइंस्टीन में फर्क न समझने वाले पीयूष गोयल के जिम्मे छोड़ दिया गया है। मोदी जी सोचे थे कि अगर कोई नहीं मिल रहा है तो जेएनयू का तमगा ही सही। और फिर सीतारमन की पतवार के सहारे अर्थव्यवस्था की वैतरणी पार कर ली जाएगी। उन्हें क्या पता था कि इकोनामी में तबाही की बाढ़ आने वाली है। और कमांडर की हालत यह है कि पत्रकारों के सवाल सुनकर उसके हाथ पांव फूलने लगे हैं लिहाजा डरकर वह जवाब की गेंद सचिवों के पास फेंक दे रहा है।

जिस जीडीपी को पांच फीसदी बताया जा रहा है उसकी वास्तविक सच्चाई यह है कि वह महज 2 से ढाई फीसद है। जमीन से जुड़े और जनता से सरोकार रखने वाले अरुण कुमार सरीखे अर्थशास्त्रियों की मानें तो वह शून्य पर चली गयी है। यानी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ठप पड़ गयी है। फैक्ट्रियों में अक्सर लॉकडाउन हो रहा है। क्योंकि बाजार में सामानों की खपत निल है। डॉलर के सामने रुपया औंधे मुंह गिर चुका है। जिस डॉलर की कीमत मोदी के शासन में आने के समय 60 हुआ करती थी वह 72 के आंकड़े को पार कर चुका है। अपने शासन के छह सालों में मोदी का देश को दिया गया यह सबसे बड़ा तोहफा है!

बांग्लादेशियों को देखने का भारत का हेय नजरिया अभी गया नहीं है। देश में आज भी उनको घुसपैठिया से लेकर न जाने क्या-क्या कहने वालों की कमी नहीं है। लेकिन उन्हें नहीं पता कि सच्चाई बिल्कुल बदल चुकी है। आज उसके टके की कीमत तकरीबन रुपये के बराबर हो गयी है। भारत और पाकिस्तान की मुर्गा लड़ाई के बीच उसने खुद को बहुत आगे खड़ा कर लिया है। दरअसल एशिया में बांग्लादेश मैनुफैक्चरिंग का नया हब बन चुका है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि आज जब भारत का टेक्सटाइल उद्योग हाफ रहा है तो बांग्लादेशी टेक्सटाइल जगत नई कुलांचे भर रहा है।

इसलिए निर्मला सीतारमन और पीएम मोदी को अपने अहंकार को छोड़कर अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। क्योंकि यह किसी एक सरकार से जुड़ा मसला नहीं है बल्कि एक राष्ट्रीय संकट है जो एक अरब तीस करोड़ जानों से जुड़ा है। और इसको अगर समय पर संभाला नहीं गया और यह मंदी कुछ औऱ दिनों तक बनी रही तो फिर आने वाले दिनों में जो तबाही होगी उसका किसी के लिए आकलन भी कर पाना मुश्किल होगा।

2008 में जब दुनिया में मंदी आयी थी तो कहा गया कि भारत पर इसलिए असर नहीं हुआ क्योंकि इसका घरेलू बाजार बेहद मजबूत था। और बैंक से लेकर हर सेक्टर में लिक्विडिटी थी और उसने अपने पैरों पर खड़ा होकर अर्थव्यवस्था को संभाल लिया। लेकिन पिछले पांच सालों में मोदी सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था को जो कबाड़ा निकाला है उससे कोई उम्मीद करना दिन में सपने देखने जैसा है। सरकार ने केवल रिजर्व बैंक को ही नहीं लूटा है। बल्कि तमाम बैंकों, सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों और वित्तीय संस्थाओं के जरिये घाटे में चलने वाली निजी कंपनियों में निवेश कराकर इन सबको बिल्कुल खोखला कर दिया है।

नतीजा यह है कि एनटीपीसी से लेकर एलआईसी तक सभी दिवालिया होने की कगार पर हैं। ऐसे में यह संकट गहराता है तो फिर सरकार के पास इसको उबारने का कोई दूसरा रास्ता नहीं बचेगा। लिहाजा उसे सबसे पहले संकट की गंभीरता को स्वीकार करना चाहिए और उसके बाद उसके हल के लिए सामूहिक प्रयास की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। और हमें यह बात अच्छी तरीके से समझ लेनी चाहिए कि निर्मला सीरारमन की इन कास्मेटिक घोषणाओं से कुछ नहीं होने वाला है।

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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