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मोदी की माफ़ी : ग़लती ने राहत की साँस ली

`उन्होंने झटपट कहा
हम अपनी ग़लती मानते हैं


ग़लती मनवाने वाले ख़ुश हुए
कि आख़िर उन्होंने ग़लती मनवाकर ही छोड़ी

उधर ग़लती ने राहत की साँस ली
कि अभी उसे पहचाना नहीं गया`

(वरिष्ठ कवि मनमोहन के संग्रह `ज़िल्लत की रोटी` से)

फेसबुक पर बहुत से दोस्तों ने लिखा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने `मन की बात` के प्रसारण में ग़रीबों को हुई तक़लीफ़ों के लिए माफ़ी मांगी है। पिछले तीन दिनों से भाजपा के नेता और समर्थक जिस तरह ग़रीबों को गालियां दे रहे थे, उसके मद्देनज़र यह बड़ी बात थी। हालांकि `मन की बात` की रिकॉर्डिंग सुनने के बाद यह साफ़ नहीं होता है कि उन्होंने किस ग़लती के लिए माफ़ी मांग ली। प्रधानमंत्री ने कोई ऐसी बात नहीं की जिसमें किसी ग़लती का ज़िक्र हो जिसके लिए माफ़ी मांगी गई। उन्होंने मन की बात में अपनी आत्मा के इस यक़ीन का हवाला दिया कि देशवासी उन्हें ज़रूर माफ़ करेंगे। इस बात के लिए कि उन्हें कई तरह की कठिनाइयां उठानी पड़ीं। ग़रीबों का ख़ासतौर से ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, “…मेरे ग़रीब भाई-बहनों को देखता हूँ तो ज़रूर लगता है कि उनको लगता होगा कि ऐसा कैसा प्रधानमंत्री है, हमें मुसीबत में डाल दिया। उनसे भी मैं विशेष रूप से क्षमा मांगता हूँ। ऐसा लगता है, बहुत से लोग मुझसे नाराज़ भी होंगे कि ऐसे कैसे सब को घर में बंद कर दिया। मैं आपकी दिक़्क़तें समझता हूँ। आपकी परेशानी भी समझता हूँ लेकिन…“।

लेकिन यह कि “भारत जैसे 130 करोड़ आबादी वाले देश को कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई के लिए ये क़दम उठाए बिना कोई रास्ता नहीं था“। मतलब जीवन और मृत्यु के बीच की लड़ाई में लोगों की जान बचाने के लिए लॉक डाउन ज़रूरी था। लेकिन, सवाल यह है कि क्या ये क़दम उठाने का यह तरीक़ा सही था। परदेस में फंसे ग़रीबों के लिए ठोस प्रबंध सुनिश्चित किए बिना रात 8 बजे टीवी के परदे पर आकर अचानक 21 दिनों के लॉक डाउन की घोषणा इन ग़रीबों के लिए सांस गले में फंस जाने जैसी थी। उस रात प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में जैसे ही कहा था कि आधी रात से 21 दिन का लॉक डाउन शुरू हो जाएगा, समर्थ-संपन्न तबका पूरा भाषण सुनने का सुख छोड़ दुकानों की तरफ़ दौड़ पड़ा था। लेकिन, रोज़ कुआं खोदकर, पानी पीने वाले तो सन्न रह गए होंगे? कोरोना से ज़्यादा इस चिंता में कि आने वाले दिन कैसे गुज़रेंगे।

प्रधानमंत्री आज जिस तरह की भी सुविधाओं से लैस हों पर यह कैसे हो सकता है कि वे इस देश के ग़रीबों की हालत से नावाकिफ़ हों? यह कैसे हो सकता है कि उन्हें पता नहीं होगा कि परदेस में छोटे-बड़े कारख़ानों में ठेकेदारों के शिकंजे में काम करने वाले लोग लॉक डाउन होते ही लतिया नहीं दिए जाएंगे और उनका काम बंद हो जाएगा तो किराये के उनके दड़बों के मालिक अपने `मकान मालिक चरित्र` के मुताबिक उनसे एडवांस की मांग नहीं करेंगे?

कौन नहीं जानता कि लॉक डाउन के बाद सैकड़ों और हज़ार-हज़ार किलोमीटर दूर अपने गाँवों की तरफ़ पैदल निकल पड़े बेबस लोग वही थे जो अचानक बेकाम-बेछत हो गए थे? अगर इस स्थिति का अनुमान नहीं था तो बतौर एक नेता क्या यह नाकामी नहीं है? और अगर इन लोगों के लिए तुरंत इंतज़ाम करने में बेपरवाही की गई तो क्या यह संवेदनहीनता नहीं है? बेशक़, भारत एक बड़ा देश है और जैसा कि पीएम ने ज़िक़्र किया, इसकी आबादी 130 करोड़ है लेकिन पूरे देश में एक पुख़्ता प्रशासनिक ढांचा काम करता है। राजनीतिक कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवकों वगैराह की बात छोड़ दें, अकेला जिलाधिकारी चाह ले तो जिले के तमाम छोटे-बड़े कारखानों और असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के लिए मिनीमम इंतज़ामात कोई बड़ी बात नहीं थी।

लॉक डाउन का इस तरह अचानक ऐलान किसी अचानक छिड़ गए युद्ध की वजह से नहीं था। कोरोना दस्तक दे चुका था और सरकार को इस बारे में जानकारी मिलने से लेकर इस घोषणा तक लगभग तीन महीने का समय मिल चुका था। लॉक डाउन से पहले प्रधानमंत्री राष्ट्र के नाम एक संबोधन पहले भी कर चुके थे और जनता कर्फ्यू व ताली-थाली का आयोजन हो चुका था। इतने बड़े फ़ैसले से पहले केंद्रीय मंत्रीमंडल की बैठक से लेकर मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक कर व्यापक कार्ययोजना क्यों नहीं बनाई जानी चाहिए थी? बेहतर यह होता कि प्रधानमंत्री और सरकार बहादुर ग़रीबों की तक़लीफ़ों के लिए क्षमा मांगते हुए स्वीकार करते कि उनसे ज़रूरी इंतज़ाम न करने की ग़लती न हुई होती तो इन तक़लीफ़ों को टाला जा सकता था।

लॉक डाउन के बाद पैदल अपने गाँवों-क़स्बों की ओर लौट पड़े बेबस लोगों की जो हृदय-विदारक तस्वीरें आ रही थीं, वे 1947 के देश के बंटवारे की तस्वीरों की याद दिला रही थीं। रास्ते में कई लोगों की मौत की ख़बरें भी आती रहीं। अफ़सोस यह है कि सोशल मीडिया पर इन उत्पीड़ितों को ही क़सूरवार बताया जा रहा था। एक ही तरीक़े से, एक ही भाषा में। भाजपा के एक पूर्व सांसद के ट्वीट से शुरू हुआ यह सिलसिला इसी पार्टी के एक विधायक के उस बयान तक पहुंच गया था जिसमें सड़कों पर निकले लोगों को गोली मारने का पुलिस का आह्वान किया गया था। विधायक ने ऐसा करने वाले हर पुलिस वाले के लिए 5100 रुपये का ऐलान भी कर दिया था। प्रधानमंत्री तक क्या ये ख़बरें न पहुंची होंगी? काश, वे इस सिलसिले में कड़े क़दम उठाते जो माफ़ी से भी ठोस बात होती।   

जाहिर है कि नया क़दम पहले क़दम से आगे उठाया जाता है। जिस तरह की स्थितियों का संदेश प्रधानमंत्री ने दिया है, उसमें ग़रीबों को अभी और कड़े इम्तिहानों से गुज़रना पड़ सकता है। बेहतर, यही हो सकता है कि सरकार अब इन नागरिकों के लिए विशेष और पुख़्ता प्रबंध करे। आपदा प्रबंधन व राहत के लिए केंद्र और राज्य सरकारों में बेहतर तालमेल हो। इस तरह की स्थिति न पैदा हो जाएं जैसी दिल्ली-यूपी बॉर्डर के आनंद विहार बस अड्डे पर भीड़ उमड़ने से पैदा हुई। लॉक डाउन के शुरुआती दिन ग़रीबों के लिए भी मुसीबत भरे रहे और कोरोना से निपटने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग भी इस तरह फेल हो गई। उम्मीद करनी चाहिए कि इस बड़ी विफलता के बाद होम मिनिस्ट्री की ओर से जिस एडवाइजरी के जारी होने की ख़बर आ रही है, उसमें ग़रीबों के लिए ज़्यादा संवेदनशील और कारगर तरीक़ा अपनाया जाएगा। इस महीन बात का ध्यान रखते हुए कि लोकतंत्र किसी पुलिस स्टेट में भी तब्दील न दिखे।

प्रधानमंत्री ने दुनियाभर का उदाहरण सामने रखते हुए कहा कि कोरोना वायरस ने दुनिया को क़ैद कर दिया है। यह न राष्ट्र की सीमाएं देखता है और न क्षेत्र। इसकी चुनौती ज्ञान-विज्ञान, ग़रीब-संपन्न, कमज़ोर-ताक़तवर हर किसी के सामने है। प्रधानमंत्री की इस बात से सहमति के बावजूद यह भी सच है कि ग़रीब के सामने चुनौती ज़्यादा है। कोरोना वायरस से पहले भूख की चुनौती। सोशल डिस्टेंसिंग के लिए ज़रूरी घर और हाथ धोने के लिए पानी की उपलब्धता जैसे प्रिविलेज तो दूर की बात है। कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए लाए गए लॉक डाउन से उपजी स्थिति ने अचानक देश की उस तस्वीर को धुंधला कर दिया जिसे सरकार ऊंची जीडीपी, सुपर पावर, विश्वगुरू वगैराह के विज्ञापनी प्रचार के जरिये बार-बार सामने रख रही थी। इतने बड़े पैमाने पर ग़रीबों के बेबस-बेहाल रेले के रेले दुनिया ने देखे।

कोरोना का संकट बढ़ते ही देश में जन स्वास्थ्य की हालत भी सामने आई। इन ग़रीबों और इनसे कुछ बेहतर स्थिति वाले लोगों के लिए सरकारी अस्पतालों की संख्या, डॉक्टरों और दूसरे स्टाफ से लेकर ज़रूरी सुविधाओं के अभाव, शिक्षा व स्वास्थ्य के बजट आदि को लेकर एक के बाद एक ख़बरें आती चली गईं। प्रधानमंत्री ने ख़ुद कोरोना को लेकर अपने पहले संबोधन में कहा कि इटली और अमेरिका जैसे देश जहाँ स्वास्थ्य सुविधाएं और इलाज़ की मशीनें बेहतर हैं, वहाँ भी स्थिति ख़राब है। ख़ुद को विश्वगुरू कहने वाले और विकास के सर्वश्रेष्ठ दावे करने वाले देश के प्रधानमंत्री का यह कथन यह सवाल भी उठाता है कि अगर हम निरीह नागरिक सुविधाओं में इतने पीछे हैं तो विकास के उन दावों का अर्थ क्या था।

क्या यह माना जा सकता है कि ग़रीबों की तक़लीफ़ों की चिंता समझते हुए सरकार अब विकास के उस छलावा मॉडल पर चलने की ग़लती को छोड़कर एक ऐसे वास्तविक मॉडल को अपनाएगी जिसमें ग़रीबों के जीवन स्तर, उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य के पुख़्ता और मुफ़्त प्रबंध हों। दुनियाभर में वही देश कोरोना से जूझने में ज़्यादा कारगर साबित हो रहे हैं जहाँ जन-स्वास्थ्य पर खर्च करने में कॉरपोरेट लॉबी बाधा पैदा नहीं कर रही है। बेहतर हो कि देरी से ही सही, अब सरकार प्राइवेट अस्पतालों का अधिग्रहण कर ले और बैंकों में सेंध लगाकर एक ग़रीब देश में अंतरराष्ट्रीय स्तर के अमीर बने लोगों की संपत्ति का बड़ा हिस्सा ज़ब्त कर इस बीमारी से निपटने और जनता को राहत पैकेज देने में इस्तेमाल करे। क़ायदे से तो एक बड़े देश का प्रधानमंत्री होने के नाते उन्हें दुनिया पर ही इस तरह के इंतज़ामात पर बल देने की पहल करनी चाहिए। कोरोना के वैश्विक संकट से निपटने के लिए पूरी मानव जाति के एकजुट होकर संकल्प लेने की उन्होंने जो ज़रूरत जताई, यह उस दिशा में सबसे गंभीर क़दम होगा।

प्रधानमंत्री ने `मन की बात` करते हुए बीमारी के प्रकोप से शुरुआत में ही निपटने में ज़ोर दिया और कहा कि बाद में रोग असाध्य हो जाते हैं। उन्होंने लॉक डाउन तोड़ने वालों को आगाह करते हुए कहा कि वे स्थिति की गंभीरता नहीं समझ रहे हैं। दुनिया में जिन देशों को ख़ुशफ़हमी थी, आज वे सब पछता रहे हैं। प्रधानमंत्री के इस कथन को देखें तो ख़ुशफ़हमी में वक़्त गुज़ार देने और फिर पछताने की स्थिति में फंसे देशों में अमेरिका भी शामिल है। चीन इस प्रकोप से जूझ रहा था और दूसरे देशों में इसकी दस्तक शुरू हो गई थी तो अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भारी जनसमूह के जरिये की गई मेज़बानी का लुत्फ़ उठा रहे थे।

हमारे यहाँ भी कोरोना को लेकर ग़ैर-गंभीर दावे किए जाते रहे, मंत्री तक हास्यास्पद टोटके करते रहे और टीवी चैनल तो इस ओर ध्यान दिलाने वाले विपक्ष के नेता राहुल गाँधी को ट्रोल करने से लेकर चीन और पाकिस्तान की मज़ाक उड़ाने में व्यस्त रहे। इस दौरान सरकार के ज़िम्मेदार बहुत सारी दूसरी प्राथमिकताओं के बीच मध्य प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के खेल में भी व्यस्त दिखाई दिए। देर से ही सही, प्रधानमंत्री कोरोना के लेकर `एक्शन` में आए तो `जनता कर्फ्यू` के बाद सड़कों पर जुलूस निकल पड़े। ज़रूरी है कि प्रधानमंत्री की आज की `माफ़ी` के बाद पुरानी ग़लतियां न दोहराई जाएं और इवेंट मोड के बजाय गंभीरता से ज़रूरी क़दम उठाए जाएं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना की चपेट में आकर ठीक हुए एक उद्योगपति और एक आईटी प्रफेशनल से बातचीत भी की ताकि लोगों में यह विश्वास व हौसला बढ़े कि बीमारी लाइलाज़ नहीं है। उन्होंने संकट की इस घड़ी में ज़रूरी नागरिक सुविधाओं को सुचारु बनाए रखने के लिए फ्रंटलाइन सोल्जर्स की तरह काम कर रहे लोगों का आभार जताया। पीएम ने कोरोना के मरीज़ों को उपचार दे रहे दो डॉक्टरों से भी बात की और डॉक्टरों, नर्सिंग व पैरामेडिकल स्टाफ का 50 लाख रुपये का बीमा करने के फ़ैसले की भी जानकारी दी। प्रधानमंत्री ने चिकित्सा सेवा में जुटे इन प्रफेशनल्स की इस बात के लिए भी तारीफ़ की कि वे भौतिक कामना के बिना यह काम करते हैं।

उम्मीद है कि प्रधानमंत्री के पास वे ख़बरें भी पहुंची होंगी जिनमें डॉक्टरों और नर्सेज की तरफ़ से कोरोना मरीजों के इलाज के लिए जीवनरक्षक ज़रूरी मास्क व स्पेशल ड्रेसेस न होने की शिकायतें की गई थीं। यहां तक कि नर्सेज को वेतन न मिल पाने तक की भी। भौतिक कामना न रखते हुए भी इलाज़ के लिए ज़रूरी इन भौतिक चीज़ों की उपलब्धता की स्थिति के बारे में प्रधानमंत्री ने ख़ुद कोई बात नहीं की लेकिन डॉक्टरों-मरीजों की बातों में इस उपलब्धता के संकेत शामिल थे। उम्मीद है कि ज़रूरी बीमा से पहले बेहद ज़रूरी इन इंतज़ामात की तरफ़ सरकार सजग रहेगी।

प्रधानमंत्री ने क्वारांटीन से गुज़रने वाले मरीज़ों के साथ दुर्व्यवहार की ख़बरों पर चिंता जताई। उन्होंने ऐसा न करने की नसीहत देते हुए कहा कि सोशल डिस्टेंसिंग घटाने पर इमोशनल बॉन्डिंग बढ़ाने की ज़रूरत है। उन्होंने सोशल मीडिया के हवाले से लॉक डाउन के दौरान घरों में रहकर कुकिंग, बाग़वानी, रियाज़, रीडिंग वगैराह विभिन्न शौक़ पूरा कर रहे समर्थ लोगों के उदाहरण भी दिए। साथ ही उन्होंने कहा कि ग़रीबों के प्रति हमारी संवेदनाएं और तीव्र होनी चाहिए। हमारी मानवता का वास इस बात में है कि कहीं भी कोई ग़रीब-भूखा नज़र आता है तो पहले हम उसका पेट भरें।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉक डाउन की वजह से घरों में ही रहने का उपयोग अपने आप से जुड़ने, अपने भीतर झांकने, अपने अंदर प्रवेश करने और अपने आप को जानने के अवसर के तौर पर करने की सलाह भी दी।

भीतर झांकने की पीएम की सलाह के साथ यह अपेक्षा कैसी रहेगी कि लॉक डाउन में अपनी हॉबीज़ पूरा करने में सक्षम सत्ता वर्ग ख़ुद से सवाल करे कि वह अपने ही देश के मेहनतकश अवाम के साथ इतना निष्ठुर क्यों है? क्या इस तरह उसे यह बोध होगा कि दुनिया में ज़्यादातर संकटों की वजह वह है और उसे कुछ हया की ज़रूरत है?

(धीरेश सैनी जनचौक के रोविंग एडिटर हैं।)

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This post was last modified on March 29, 2020 10:50 pm

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