पाण्डु नरोटे हमारा-आपका कुछ नहीं लगता, फिर भी उसकी कहानी सुन लीजिए

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पाण्डु नरोटे 35 वर्ष की उम्र में मर गया, मर नहीं गया मार दिया गया। वैसे ही मार दिया गया, जैसे स्टेन स्वामी मार दिए गए थे। फिर भी स्टेन स्वामी भरपूर जीवन जीए थे, लेकिन नरोटे भरी जवानी में मार दिया गया, सिर्फ और सिर्फ पैंतीस साल की उम्र में। मैं साफ शब्दों में कहूं तो भारतीय राजसत्ता ने उसे निर्मम तरीके से मार डाला।

वह खून की उल्टियां करते मरा। जब वह मरा तो उसके पेशाब से इतना खून बह रहा था कि यूरीन बैग भर जाता था। उसकी आंखों से भी खून रिसता था। वह आम भारतीय की तरह जनरल वार्ड में भारतीय राज्य की एजेंसियों की हिकारत, उपेक्षा और क्रूरता का शिकार होकर मरा। उसने कई सारे ‘अपराध’ किए थे। उसका पहला ‘अपराध’ यह था कि वह आदिवासी था। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार आदिम जनजाति का था। उसका दूसरा ‘अपराध’ यह था कि वह आदिवासी बहुल गढ़ चिरौली में रहता था। जिसे भारत सरकार ने नक्सली-माओवादी इलाका घोषित कर रखा है। उसका गांव अहेरी इसी इलाके में पड़ता है।

मैं भी आप सब की तरह 8 मार्च 2024 से पहले उसके बारे में पूरी तरह अनजान था। हालांकि वह 25 अगस्त 2022 को ही नागपुर के जेल प्रशासन और महराष्ट्र पुलिस के हाथों मार दिया गया था। वैसे भी इस देश में दिल्ली से बहुत-बहुत दूर एक अदना से आदिवासी की हत्या कोई मायने नहीं रखती है।

पहली बार उसके बारे में जीएन साईबाबा के मुंह से प्रेस कांफ्रेंस में सुना। जीएन साईबाबा के मुंह से उसकी दर्दनाक मौत की कहानी सुनकर मैं भीतर से कांप उठा। उसके बाद वह मेरे भीतर गहरे में प्रवेश कर गया। मेरे आस-पास मौजूद सा लगने लगा। जैसे वह मुझसे दर्द से कराहता मौत के मुंह में जाता कह रहा हो, मरने के बाद तो कम से कम मेरी कहानी लोगों को बता तो। तब से मैं उसकी कहानी कहने के लिए बेचैन हूं, खुद की सुख-शान्ति के लिए।

8 मार्च की प्रेस कांफ्रेंस में अपने जेल जीवन के साथी नरोटे के बारे में बताते हुए जीनएन साईबाबा ने कहा, ‘एक और बात बताना चाह रहा हूं। इस मुकदमे में मेरे सह-अभियुक्तों में एक ऐसा इंसान था (पाण्डु नरोटे), जिसे इससे पहले न मैं जानता था, न वह मुझे जानता था। हम एक-दूसरे को तभी जान पाये, जब हमें दोषी ठहरा कर एक ही कोठरी में ठूंस दिया गया। लेकिन पाण्डु नरोटे नाम के उस इंसान की हिरासत के दौरान महज एक साधारण बुखार से मौत हो गयी’।

साईबाबा कहते हैं, ऐसा कैसे हो सकता है? उसकी मौत की दर्दनाक कहानी बयान करते हुए साईबाबा ने कहा, “मेरी आंखों के सामने ही उसकी मौत हो गयी। जेल अधिकारियों से बार-बार कहने के बावजूद उसे तब तक अस्पताल नहीं ले जाया गया, जब तक कि उसकी आंखों से और पेशाब से भारी मात्रा में खून नहीं निकलने लगा, जब तक कि तय नहीं हो गया कि कुछ ही मिनटों में उसकी मौत हो जाएगी। जब साथी क़ैदियों ने शोर-शराबा शुरू कर दिया, तब जाकर उसे अस्पताल पहुंचाया गया।

उसे मार दिया गया, यह एक राजकीय हत्या थी, आप यह नहीं कह सकते कि स्वाइन फ्लू या बुखार से उसकी मौत हुई थी। हमें नहीं पता क्योंकि अंतिम समय तक उसकी स्वाइन फ्लू की कोई ब्लड रिपोर्ट नहीं थी। मौत के बाद ही घोषित कर दिया गया कि उसकी मौत स्वाइन फ्लू से हुई है। हमें नहीं पता कि उसकी मृत्यु किस कारण से हुई।”

वह किस कदर मासूम था, भारतीय राजसत्ता के जटिल तंत्र से अनजान था, इसका अंदाज साईबाबा के इस कथन से लगाया जा सकता है, “हमारे साथ क्या किया जा रहा है, उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। उसे कानून क्या है, मुकदमा क्या है, अदालत क्या होती है, कुछ भी पता नहीं था। संयुक्त राष्ट्र संघ ने हर देश की सबसे आदिम जनजाति की पहचान की है। वह हमारे देश की सबसे आदिम जनजाति का था। वह किसी भी शहर जैसी चीज को नहीं जानता था, वह गढ़चिरौली के अपने गांव से बाहर कभी नहीं गया था।”

उसे 2013 में अन्य दो साथियों के साथ गढ़चिरौली के अहेरी गांव से गिरफ्तार किया गया था। उसे दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जीएन साईबाबा, पूर्व पत्रकार प्रशांत राही, जेएनयू के पूर्व छात्र हेम मिश्रा तथा अन्य लोगों के साथ माओवादियों के साथ संबंध रखने के आरोप में गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम – यूएपीए – के तहत दोषी ठहराया गया था।

हम सभी जानते हैं कि महाराष्ट्र हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने सभी लोगों को 6 मार्च 2024 को पूरी तरह निर्दोष करार दिया। हाईकोर्ट ने पाण्डु नरोटे सहित सभी लोगों को पूरी तरह निर्दोष ठहराते हुए कहा कि पुलिस और जांच एजेंसियों ने कोई भी ऐसा सबूत पेश नहीं किया जिससे यह साबित हो कि पांडु नरोटे या अन्य आरोपी किसी गैर-कानूनी गतिविधि में शामिल हों, किसी तरह की हिंसा किए हों या कोई अपराध किए हों या किसी आतंकवादी कृत में शामिल रहे हों। कोर्ट ने कहा “अभियोजन पक्ष द्वारा किसी भी घटना, हमले, हिंसा के कार्य के किसी भी गवाह द्वारा या यहां तक कि अपराध के किसी पूर्व दृश्य से एकत्र किए गए साक्ष्य जहां आतंकवादी कृत्य हुआ हो, अभियुक्तों को ऐसे कृत्य से जोड़ने के लिए कोई सबूत नहीं दिया गया है।”

लेकिन पाण्डु परोटे निर्दोष साबित होकर जेल से रिहा होने से बहुत पहले ही मार दिया गया। पाण्डु के वकील ने बताया कि उसका छोटा भाई (अजीत) उसकी मौत के एक महीने पहले उससे मिला था, वह पूरी तरह ठीक था।

पाण्डु नरोटे को 20 अगस्त 2022 को अस्पताल ( GMCH-Nagpur’s Government Medical College and Hospital) में गंभीर हालात में भर्ती किया गया।अजीत ने बताया कि उन्हें 21 अगस्त (2022) को स्थानीय पुलिस स्टेशन से एक पत्र मिला, जिसमें बताया गया कि पांडु को जीएमसीएच में भर्ती कराया गया है। “लेकिन जब हम अस्पताल पहुंचे तो हमने उसे बहुत गंभीर हालत में पाया। उसने हमें बताया कि वह उससे पहले पांच या छह दिन से बीमार था।”

उसके वकील सोरटे के अनुसार, इससे पहले, न तो परिवार और न ही सोरटे को जेल अधिकारियों द्वारा सूचित किया गया था कि पांडु बीमार थे। सोरटे को एक अन्य कैदी के परिवार से पता चला कि पांडु का इलाज नागपुर जेल अस्पताल में किया जा रहा है। जब एडवोकेट सोरटे जीएमसीएच में अपने मुवक्किल (नरोटे) से मिले, तो उसने उन्हें बताया कि पिछले पांच दिनों से उन्हें खून की उल्टी हो रही है और पेशाब में भी खून आ रहा है।

जब उसके वकील उससे मिलने गए तो, उन्होंने देखा, “उसे सामान्य वार्ड में रखा गया था। मैं देख सकता था कि उसका यूरीन बैग खून से भरा हुआ था, लेकिन डॉक्टरों ने मुझे बताया कि यह इन्फ्लूएंजा था और वायरस उनके शरीर में फैल गया था।”

इसी मामले में जेल की सजा काट रहे, प्रशांत राही की बेटी की तरह पाण्डु की 15 वर्षीय बेटी भी उसका बेसब्री से इंतजार कर रही थी, लेकिन उसकी बेटी को प्रशांत राही की बेटी की तरह जिंदा पिता नहीं मिला। उसकी लाश मिली।

पाण्डु नरोटे की यह कहानी पूरी तरह अधूरी है, अधूरी क्या सिर्फ अखबारों-वेब साइटों में छपी एक कॉलम की सूचना है।

कौन था, पाण्डु नरोटे, कहां रहता था, क्या करता था, क्या चाहता था, कैसे जीवन-यापन करता था, कितना पढ़ा था, यदि निरक्षर था, तो क्यों, उसका गांव कैसा है, उसका परिवार कैसा, उसके मां-बाप, भाई-बहन कौन हैं, क्या करते हैं, उसकी जीवन-साथी कौन थी, कहां है, क्या करती है, उसकी हत्या के बाद उसके परिवार की क्या हालत है, उन पर क्या बीत रही है, भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने उस निर्दोष को क्यों जेल में डाला, उसे क्यों मार डाला, आखिर भारतीय राजसत्ता को उससे क्या खतरा था, वह एक आदिम जनजाति के मासूम-भोले नौजवान से इतनी भयभीत क्यों थी, उसकी हत्या के लिए कौन जिम्मेदार है, हत्यारों को कोई दंड मिलेगा या नहीं, उसकी हत्या भारतीय मीडिया के लिए, बौद्धिक वर्ग के लिए और जनमानस के लिए कोई सरोकार या चर्चा का विषय क्यों नहीं बनी?

पाण्डु नरोटे की पूरी कहानी एक लेखक-पत्रकार का इंतजार कर रही, यह कहानी भारतीय समाज और भारतीय राजसत्ता के चरित्र को उजागर कर सकती है, इस कहानी को कहने में रिस्क है, गढ़ चिरौली जाना पडे़गा, भारतीय एजेंसियों की नजर में संदिग्ध होना पड़ सकता है, आप पर माओवादी समर्थक होने का ठप्पा लग सकता है, आप भारतीय एजेंसियों के रडार पर आ सकते हैं, आप से एनआईए-एटीएस पूछ-ताछ कर सकती है, आपको झूठे मुकदमे में जेल भेजा जा सकता है, आप पर यूएपीए लगाया जा सकता है। आपको पाण्डु की तरह जेल में मारा जा सकता है, आपको जीवन का बड़ा हिस्सा जेल में बिताना पड़ सकता है, बाद में हो सकता है, आप निर्दोष साबित हो जाएं। जब तक आप जीवन का बड़ा हिस्सा जेल की अंधेरी काल कोठरी में खो चुके होंगे।

कुछ कहानियां कहना आसान नहीं होता, वैसी ही कहानी पाण्डु की भी है, मैंने यह पाण्डु के बारे में सुनी-सुनायी कहानी सिर्फ इसलिए दुहरा दिया ताकि कोई उसकी पूरी कहानी कहने के बारे में सोचे, थोड़ी हिम्मत जुटाए और उसकी पूरी कहानी कहे। हो सकता है कि वह भी कहानी बन जाए। जीएन साईबाब के वकील सुरेंद्र गाडलिंग की तरह। जो जेल में जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने जीएन साईबाबा के पक्ष में वकील के रूप में पैरवी करने का निर्णय लिया। पाण्डु की कहानी कहने में कहानी बनने का खतरा मोल लेकर ही, उसकी कहानी कही जा सकती है।

(इस अधूरी कहानी का स्रोत जीनएन साईबाबा की 8 मार्च की प्रेस काफ्रेंस, हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट, द वायर की रिपोर्ट, द क्वींट की रिपोर्ट और  Rediff.com. की थोड़ी विस्तृत रिपोर्ट हैं।)

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