Thursday, December 1, 2022

कृपया हमारे बच्चों को ऐसी ‘देशभक्ति’ का पाठ मत पढ़ाएं!

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प्रतिस्पर्धी अति-राष्ट्रवाद और प्रदर्शनकारी देशभक्ति के इस युग में, किसी न किसी प्रकार का “देशभक्त” होने से बच पाना बहुत मुश्किल है। फिर भी, एक शिक्षक और सतत घुमक्कड़ के रूप में, मैं अपने छात्रों से किसी भी देवता-विशेष का भक्त न बनने का आग्रह करता हूं, चाहे वह राष्ट्र हो, कोई राजनीतिक सिद्धांत हो या कोई संगठित धर्म हो। मेरा डर यह है कि एक भक्त अक्सर अपने दिमाग की साफ-सफाई करने, अपने सोच-समझ के क्षितिज को विस्तार देने और यहां तक कि “पवित्र” प्रतीत होने वाली चीजों की आलोचना करने की क्षमता खो देता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि नाज़ीवाद, अधिनायकवादी समाजवाद, लालची पूंजीवाद, धार्मिक कट्टरवाद और सैन्यवादी राष्ट्रवाद के भक्तों ने ही हमें परमाणु हथियारों, निगरानी की तकनीकों और पराभौतिक-आध्यात्मिक मूर्खताओं से भरी दुनिया दी है।

दूसरे शब्दों में, एक भक्त वास्तव में एक ऐसा छात्र नहीं होता है जो अस्तित्व में व्याप्त संगीत को सीखने के लिए स्वयं को लगातार विकसित करता है, आगे बढ़ता है, खोजता है और सीखता है। इसलिए, मेरा तर्क है कि “देशभक्ति पाठ्यक्रम” का विचार (भले ही दिल्ली सरकार इसे वास्तविक देशभक्ति के रूप में पेश करना चाहती है), जीवन का पोषण करने वाले ऐसे शिक्षाशास्त्र के अनुरूप नहीं हो सकता है जो जागृत मेधा, मौलिक चिंतन, प्रेम की नैतिकता और आलोचनात्मक जागरूकता को प्रोत्साहित करता हो।

मेरी आलोचना का मतलब यह नहीं है कि मैं आपके क्षेत्रीय-भौगोलिक और सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश के साथ आपके घनिष्ठ रागात्मक संबंध के महत्व का अवमूल्यन कर रहा हूं। हाँ, आप उस नदी से प्यार करते हैं जो आपके गाँव से होकर बहती है; हिमालय की चोटियाँ आपको बुलाती हैं; भगत सिंह और मोहनदास करमचंद गांधी की कहानियां आपको रोमांचित करती हैं; चेन्नई से कोलकाता तक एक लय के साथ चल रही ट्रेन में यात्रा के माध्यम से आप जिस शानदार विविधता का अनुभव करते हैं, उसके प्रति आपके मन में एक विशेष आकर्षण हो सकता है, और संभवतः गौतम बुद्ध की ध्यानमग्न मुद्रा और करुणामयी आंखें आपकी आत्मा को छूती हैं। इसके अलावा, इस प्राचीन सभ्यता में कभी फला-फूला ज्ञान और प्रबुद्धता का विशाल भंडार- उपनिषदों की पारलौकिक जिज्ञासा और खोज से लेकर तर्क-पद्धति और तर्कशास्त्र के सिद्धांतों तक- आपको अपनी रचनात्मक विरासत को विनम्रता पूर्वक देखने को बाध्य करता है। आप अपने देश से प्यार करते हैं; और यह स्वाभाविक है कि आप चाहेंगे कि आपके बच्चे इसे जानें और पसंद करें। इससे कौन इनकार करेगा?

फिर भी, क्या आप चाहते हैं कि आपका बच्चा स्कूल असेंबली में यांत्रिक रूप से “सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा” गाये? या इसकी बयाय आप यह चाहेंगे कि आपका बच्चा अपनी आंखें खोले, और यह स्वीकार करने का साहस दिखाये कि आज जो हालत बन गयी है, हमारा देश सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और राजनीतिक रूप से बीमार हो चुका है! एक युवा आईएएस अधिकारी, जो भारतीय मध्यवर्ग का चहेता आदर्श प्रतीक है, अपने यांत्रिक ढंग से तय किये गये विवाह में दहेज लेता है; हमारे बच्चे को अपने इस देश पर बिल्कुल गर्व नहीं करना चाहिए। एक राजनेता जो आत्ममुग्धता और संकीर्णता के पंथ का पोषण करता है, और चापलूसों से घिरा रहना पसंद करता है; हमारे बच्चे को उससे नफरत होनी चाहिए। एक “भक्त” जो अपनी “पूजा” के माध्यम से हरिद्वार में नदी को प्रदूषित करता है, और फिर भी खुद को “आध्यात्मिक” कहता है, हमारे बच्चे को उसके पूजा-पाठ और कर्मकांड के खोखलेपन पर सवाल उठाना चाहिए।

एक “राष्ट्रवादी” जो अपने “दुश्मन” निर्मित करता रहता है, और सैन्यवाद और इसी जैसे सभी युद्ध रूपकों में विचित्र आनंद पाता है, ऐसे लोगों से हमारे बच्चे को भयभीत होना चाहिए। पितृसत्ता, धार्मिक कट्टरता और अश्लील उपभोक्तावाद के गठजोड़ से हमारे बच्चे को विचलित होना चाहिए। हृदय को झकझोर देने वाली असमानता और ऊंच-नीच की व्यवस्था, मानव चेतना में भरी जा रही क्रूरता और सर्वव्यापी भ्रष्टाचार ही जिस देश की विशेषताएं हों, उस देश में देशभक्ति के उपदेशों की बौछार को मेरी बच्ची भला कैसे सहजतापूर्वक स्वीकार करे? मैं कल्पना करता हूं कि एक चिंतित शिक्षक या माता-पिता के रूप में आप चाहते हैं कि आपका बच्चा प्रतिरोध की कला को धार दे (क्योंकि देश से सच्चा प्यार करने का मतलब है उन सभी चीजों को “ना” कहना जो हमारी भूमि और हमारे लोगों को नीचा दिखाती हैं), और साथ ही आपके बच्चे में खोखली और दिखावटी देशभक्ति तथा उत्तेजना और शोर-शराबे से भरे हुए राष्ट्रवाद की बजाय कुछ उच्चतर मूल्यों की भूख हो।

एक शिक्षक के रूप में, मुझे लगता है कि हमें “देशभक्ति पाठ्यक्रम” की आवश्यकता नहीं है, और वह भी ऐसे समय में जब अति-राष्ट्रवाद की भारी खुराक ने हमारी सामूहिक चेतना में जहर भर दिया है। इसके बजाय, हमें गुणात्मक रूप से कुछ अलग चाहिए; हमें सीखने के एक ऐसे माहौल की जरूरत है जो लोगों के प्रति सहानुभूति, उनकी बातों को करुणा के साथ सुनने की कला और उनकी देखभाल करने वाली नैतिकता जैसे गुणों को विकसित करने वाला हो। कल्पना कीजिए कि एक स्कूल प्रिंसिपल सुबह की प्रार्थना-सभा को एक बिल्कुल नया अर्थ दे रही है, और अपने छात्रों से यह महसूस करने का आग्रह कर रही है कि हमारे समय में फादर स्टेन स्वामी होने का क्या मतलब है।

कल्पना कीजिए कि एक भौतिकी शिक्षक अपने छात्रों से यह महसूस करने के लिए आग्रह कर रही है कि विज्ञान महज तकनीकी-कॉर्पोरेट दुनिया में जगह बनाने और सफल होने का “मंत्र” नहीं है, बल्कि दरअसल वह आलोचनात्मक चिंतन के माध्यम से सत्य की खोज है। एक इतिहास शिक्षक के बारे में सोचें जो अपने छात्रों को यह कल्पना करने के लिए प्रेरित कर रही है कि वे भी 1946 में नोआखाली में गांधी के साथ थे, और सद्भाव और अंतरधार्मिक संवाद बनाने की कोशिश कर रहे थे। गणतंत्र दिवस समारोह की कल्पना करें, जहां कोई वंदे मातरम नहीं गाया जा रहा, बल्कि छात्र और शिक्षक एक साथ बैठे हैं और एम. एस. सथ्यू की फिल्म ‘गरम हवा’ या सत्यजीत रे की ‘सद्गति’ देख रहे हैं, और इस खंडित स्वतंत्रता की जांच-पड़ताल कर रहे हैं। एक ऐसे स्कूल की कल्पना करें जो आलोचनात्मक चिंतन को सक्रिय करता है, मानवतावादी स्वभाव को जगाता है और आत्मा को कोमल बनाता है।

यकीन मानिए, शिक्षा का प्रचलित वर्तमान तरीक़ा इस तरह की कल्पना से रहित है। रट्टामार पढ़ाई, ऊंचे से ऊंचे प्राप्तांकों की होड़, कोचिंग सेंटरों की चूहा-दौड़ के साथ, यह “टॉपरों” का निर्माण करता है, जिनमें से ज्यादातर बेहद महत्वाकांक्षी होते हैं और आईआईटी-आईआईएम-अमेरिका के एक्सप्रेसवे से परे कुछ भी कल्पना करने में असमर्थ होते हैं। शिक्षा का यह तरीक़ा उन लोगों को कलंक की तरह प्रस्तुत करता है जो “असफल” हो गए हैं। पढ़ाई का यह तरीक़ा एक मोहभंग पीढ़ी का निर्माण कर रहा है। यह और कुछ नहीं बल्कि शारीरिक, सांस्कृतिक और मानसिक हिंसा है। इसलिए, इस अवस्था से हमारे सामूहिक उद्धार के लिए, हमें बंधन-मुक्त करने वाले एक ऐसे शिक्षाशास्त्र की तलाश होनी चाहिए है जो आलोचनात्मक हो और प्रेम और समझदारी से भरपूर हो।

हमारे बच्चे इसके लायक हैं। जलवायु संकट, विनाशकारी युद्धों और आतंकवादी हिंसा के खतरों से भरे इस “जोखिम वाले समाज” में, उन्हें तकलीफों से निजात दिलाने वाले स्पर्श की आवश्यकता है; उन्हें सीखने को उत्सुक एक ऐसे समुदाय की जरूरत है जो उन्हें ज्ञान के सुकूनदायी प्रकाश और बुद्धिमत्ता को झूठ और कुत्सा प्रचार की चकाचौंध से अलग करने में सक्षम बनाता हो; जो एक सच्चे पर्यावरणविद् के समर्पित कार्य और राष्ट्र के “मसीहा” के नाटकीय प्रदर्शन में फर्क करना सिखा सके; जो रवींद्रनाथ टैगोर के गोरा की यात्रा और “जय श्री राम” के नारे लगाने वाले उग्र राष्ट्रवादी में अंतर बता सके; जो सआदत हसन मंटो की कहानी को हमारे “देशभक्त” टेलीविजन चैनलों द्वारा हर शाम परोसे जा रहे कचरे से अलग करने में सक्षम बनाता हो। क्या दिल्ली सरकार को सलाह देने वाले शिक्षाविद और नीति निर्माता अपने नये “देशभक्ति” मंत्र के बजाय शिक्षा के आमूल-चूल पुनर्गठन के विचार के साथ आगे आएंगे? वैसी देशभक्ति से तो हम पहले से ही अघाये हुए हैं।

(अविजित पाठक का ये लेख इंडियन एक्सप्रेस में 27 अक्तूबर को प्रकाशित हुआ था। वहां से साभार लिए गए इस लेख का हिंदी अनुवाद शैलेश ने किया है।)

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