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जम्मू-कश्मीर: प्रधानमंत्री की बातों-दावों से परे

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अंदाज निराला है। वह सब कुछ समय के हिसाब से करते हैं। एक उदाहरण उनके द्वारा कल कश्मीरियों के नाम राष्ट्र को संबोधन था। कल यानी 8 अगस्त को रात 8 बजे। है न खास बात!
वैसे खास बात यह है कि कल उन्होंने पूरे देश को जम्मू-कश्मीर के बारे में बताया या कहिए सफाई दी कि अनुच्छेद 370 हटाया जाना क्यों जरूरी था। और यह भी कि अब वहां किस तरह के बदलाव होंगे। जम्मू-कश्मीर जाकर लोग जमीन खरीदें, इमारतें बनाएं, फैक्ट्रियां लगाएं, इन सबके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के हर नागरिक से सहयोग मांगा। पता नहीं उनके इस देश की परिभाषा में कल जम्मू-कश्मीर के लोग शामिल रहे या नहीं।

खैर, जम्मू-कश्मीर के लोगों को बंदूक के बल पर अब तक खामोश रखने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सफाई दिया जाना एक तरह से भरपाई करने के जैसा है। संसद में जब अनुच्छेद-370 हटाया जा रहा था तब उनके संबोधन से न सिर्फ संसद बल्कि देश और दुनिया के लोग वंचित रह गए थे। उनके बदले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जलवा बिखेरा था।
बहरहाल, अब बात उन मुद्दों की जिनकी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल अपने संबोधन में इशारा किया। आगे कोई अस्पष्टता न हो, इसलिए पहले यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने और केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद जम्मू-कश्मीर में भी 106 कानून प्रभावी हो गए हैं, जो कमोबेश सभी राज्यों पर लागू हैं। इन्हें अलग से उद्दृत करने की आवश्यकता नहीं है।

आवश्यकता इस बात की है कि प्रधानमंत्री ने भूमि सुधार के सवाल को क्यों छोड़ दिया? कल जब वह अपने खास अंदाज में बता रहे थे कि जम्मू-कश्मीर में न्यूनतम मजदूरी अधिनियम भी नहीं लागू है, अल्पसंख्यक एक्ट नहीं लागू है, दलितों और आदिवासियों के लिए आरक्षण नहीं है,  एससी-एसटी एट्रोसिटी एक्ट नहीं लागू है तब यह उम्मीद की जा रही थी कि वे जम्मू-कश्मीर में हुए भूमि सुधार की भी बात करेंगे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

खैर, हम अपने पाठकों को बता दें कि जम्मू-कश्मीर में भी भारत के अन्य प्रांतों के जैसे ही भूमि सुधार के कानून लागू हुए। मसलन बिग लैंडेड इस्टेट्स एबोलिशन एक्ट – 1950, इस कानून के जरिए वहां के बड़े जमींदारों/राजाओं की जमीन छीनी गयी। व्यापक स्तर पर चकबंदी आदि के लिए 1962 में कॉन्सोलिडेशन ऑफ होल्डिंग्स एक्ट-1962 बनाया गया। भूमि सुधार की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कानून 1976 में बनाया गया जब वहां के मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला थे। उन्होंने एग्रेरियन रिफार्म्स एक्ट-1976 बनाकर पूरे जम्मू-कश्मीर में भूमिहीनों का कायाकल्प कर दिया। हालांकि इससे पहले ही 1953 में यानी तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा जेल में बंद किए जाने से पहले शेख अब्दुल्ला ने वहां व्यापक भूमि सुधार को साकार किया था। इस संबंध में पेनीसिलिविया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डेनियल थार्नर का एक लेख पढ़ा जा सकता है जो 12 सितंबर 1953 को ईपीडब्ल्यू में प्रकाशित किया गया था। ।https://www.epw.in/system/files/pdf/1953_5/37/the_kashmir_land_reforms.pdf)

काश कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह सब पहले पढ़ लिया होता तो कम से कम वह आने वाले समय में जम्मू-कश्मीर के लोगों को कुछ राह दिखा पाते।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि जम्मू-कश्मीर में दलितों के हक-हुकूक के लिए कोई कानून नहीं था। लेकिन उनके अधिकारियों ने उन्हें इसकी जानकारी नहीं दी कि वहां दी कंस्टीच्यूशन (जम्मू एंड कश्मीर) शेड्यूल्ड कास्ट आर्डर, 1956 पहले से प्रभावी है जो वहां के दलितों के अधिकारों को सुनिश्चित करता है। उनके अधिकारियों ने तो उन्हें यह भी नहीं बताया कि एससी-एसटी एट्रोसिटी एक्ट के बिना भी जम्मू-कश्मीर में दलितों और आदिवासियों पर अत्याचार के मामले नहीं हुए। इसकी गवाही तो खुद भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अधीनस्थ नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो द्वारा वर्ष 2016 में जारी क्राइम इन इंडिया रिपोर्ट है। इसके मुताबिक जम्मू-कश्मीर में वर्ष 2014 में दलितों के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं किया गया। वर्ष 2015 में भी यह संख्या शून्य रही। वर्ष 2016 में केवल एक मामला दर्ज किया गया।

आदिवासियों यानी अनुसूचित जनजातियों के ऊपर अत्याचार के मामले में भी जम्मू-कश्मीर सबसे बेहतर राज्य था। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2014 से लेकर 2016 तक जम्मू-कश्मीर में किसी भी अनुसूचित जनजाति के सदस्य के खिलाफ कोई अत्याचार नहीं हुआ। जबकि वहां मुसलमान बहुसंख्यक हैं।

आरक्षण के मामले में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को यह नहीं बताया कि जम्मू-कश्मीर में जब अनुच्छेद 370 प्रभावी था तब भी वहां अनुसूचित जाति को 8 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति को 10 प्रतिशत, ओबीसी को 2 प्रतिशत आरक्षण था। हालांकि बेशक इसमें खामियां थीं और सुधार की गुंजाइश थी लेकिन यह कहना कि वहां आरक्षण था ही नहीं, बेबुनियाद है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कल जम्मू-कश्मीर के मजदूरों की बहुत याद आयी। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 के कारण वहां न्यूनतम मजदूरी अधिनियम लागू नहीं था, अब होगा। जबकि सच्चाई यह है कि जम्मू कश्मीर न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948 पहले से लागू था। अभी हाल ही में इसी अधिनियम के तहत एक अधिसूचना 28 अक्टूबर 2017 को जारी किया गया। इसके मुताबिक अनस्किल्ड मजदूरों को प्रतिदिन 225 रुपए, स्किल्ड मजदूरों को  350 रुपए,  हाइली स्किल्ड मजदूरों को 400 रुपए प्रतिदिन और प्रशासनिक या लिपिकीय कार्य करने वाले मजदूरों को 325 रुपए प्रतिदिन दिया जाना तय किया गया।

बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक बात सही है कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा में एससी और एसटी के लिए आरक्षण नहीं था। लेकिन वहां आरक्षण भौगोलिक स्थितियों के अनुसार था। जम्मू-कश्मीर संविधान संशोधन, 1988 के बाद वहां कुल 111 सीटें थीं। इनमें से 24 सीटें रिक्त रहती थीं।  इनके रिक्त होने की वजह यह थी कि ये सीटें पाक अधिकृत कश्मीर के हिस्से की थीं। यह सांकेतिक था कि पाक अधिकृत कश्मीर भी जम्मू-कश्मीर का हिस्सा है और दावेदारी है। अब प्रधानमंत्री से यह सवाल तो बनता ही है कि केंद्र शासित राज्य बनने के बाद विधानसभा का जो स्वरूप होगा उसमें ये 24 सीटें रहेंगी या नहीं रहेंगी।

खैर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल देश को यह भी नहीं बताया कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा (अनुच्छेद 370 के हिसाब से) देश की इकलौती विधानसभा रही जहां महिलाओं की समुचित भागीदारी के लिए विशेष प्रावधान राज्यपाल के पास होते थे। इसके मुताबिक राज्यपाल विधानसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी कम होने पर अपने स्तर से दो महिलाओं को विधानसभा में मनोनीत कर सकते थे।

प्रधानमंत्री जी, काश कभी आपने सोचा होता कि आप क्या करने जा रहे हैं। कम से कम आपने मुजफ्फर रज्मी का यह शेर ही पढ़ लिया होता –

ये जब्र भी देखा है तारीख की नजरों ने

लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई

(लेखक फारवर्ड प्रेस, दिल्ली के हिंदी संपादक हैं)

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This post was last modified on August 9, 2019 4:10 pm

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