सुप्रीम कोर्ट ने प्रबीर पुरकायस्थ की गिरफ्तारी और रिमांड को अवैध बताते हुए UAPA मामले में दिया रिहाई का आदेश

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आतंकवाद विरोधी कानून यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम) के तहत एक मामले के संबंध में न्यूज़क्लिक के संस्थापक और प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ की गिरफ्तारी और रिमांड को अवैध ठहराया है।

पुरकायस्थ और समाचार पोर्टल के प्रशासनिक प्रमुख अमित चक्रवर्ती को दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने 3 अक्टूबर, 2023 को सुबह-सुबह करीब 80 पत्रकारों, कंट्रिब्यूटर्स, फ्रीलांर्स और कर्मचारियों के घरों पर छापा मारकर गिरफ्तार कर लिया था। इस साल जनवरी में सरकारी गवाह बनने के बाद चक्रवर्ती को हाल ही में रिहा कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अपनी पहली प्रतिक्रिया में न्यूजक्लिक ने एक्स पर पोस्ट किया, “स्वतंत्र मीडिया के लिए एक अच्छा दिन है।”

न्यूयॉर्क टाइम्स में छपे एक लेख में बिना किसी सबूत के लगाए गए आरोपों के बाद ये छापे मारे गए थे। ये आरोप लगाए गए थे कि पोर्टल को चीनी सरकार द्वारा ‘प्रोपगेंडा फैलाने’ के लिए फंडिंग किया जा रहा था।

बार एंड बेंच की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि बुधवार को शीर्ष अदालत के न्यायाधीश बीआर गवई और संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि 77 वर्षीय पुरकायस्थ को जमानत बांड जमा करने की शर्त पर रिहा किया जाए।

अदालत ने कहा कि पुरकायस्थ को बिना किसी जमानतदार के रिहा किया जा सकता था, लेकिन चूंकि मामले में आरोपपत्र दाखिल हो चुका है, इसलिए उन्हें जमानत देनी होगी। मामले में 8,000 पन्नों का आरोप पत्र अप्रैल के अंत में दायर किया गया था, जिसे न्यूज़क्लिक ने “मनगढ़ंत” और “आधारहीन” करार दिया था। दिल्ली की एक अदालत आरोप तय करने को लेकर 31 मई को मामले की सुनवाई करेगी।

अदालत ने कहा कि 4 अक्टूबर, 2023 को रिमांड आदेश पारित करने से पहले पुरकायस्थ या उनके वकील को रिमांड आवेदन की प्रति नहीं दी गई थी, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ।

एक बयान में न्यूज़क्लिक ने कहा कि दिल्ली पुलिस और अन्य एजेंसियों द्वारा की गई जांच “हमारी स्वतंत्र पत्रकारिता” को निशाना बनाने का प्रयास था और हमारे खिलाफ लगाए गए सभी “आरोप मनगढ़ंत और निराधार हैं।” ये आरोप ‘संरक्षित गवाहों’ के बयानों पर आधारित हैं जिन्हें अदालत में साबित किया जाना है। इन बयानों का समर्थन करने के लिए कोई पुष्टिकारक सामग्री नहीं है…।”

असहमति की कवरेज करने वाले स्वतंत्र मीडिया संगठनों और पत्रकारों को निशाना बनाना भारत में एक चिंताजनक प्रवृत्ति बन गई है। इसकी पुष्टि देश के गिरते प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक से होती है, जो विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक-2024 में गिरकर 159 पर आ गया है।

(जनचौक की रिपोर्ट)

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