Tuesday, October 19, 2021

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ढांचे के तौर पर प्रणब कांग्रेसी थे! दिल संघ के लिए धड़कता था और सांस अंबानियों के लिए चलती थी

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जानबूझकर ऐतिहासिक तथ्यों और स्मृतियों का लोप करने वाले और फायदे-नुकसान के लिहाज से इन या उन नेताओं व कारोबारियों पर दर्प और महानता का तिलक लगाने वाले मीडिया घरानों के लिए दिवंगत प्रणब मुखर्जी भले ही अमरत्व को प्राप्त कर गए हों, मगर वे इतने भी पाक-साफ नहीं थे। हां, इतना सच है कि अंबानी घराना समेत अनेक काॅरपोरेट घरानों और संघ का ब्राह्मणवादी नागपुर प्रतिष्ठान और यहां तक कि कांग्रेस कभी भी उनकी कृतज्ञता नहीं भूल पाएगा।

अपने पिता धीरूभाई अंबानी की तरह मुकेश और अनिल भी प्रणब बाबू के एहसान को ताउम्र याद रखेंगे। जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया की तरह दिवंगत प्रणब बाबू भी उन शख्सियतों में शुमार रहेंगे, जिन्होंने आरएसएस को ‘डाॅग-हाऊस’ से निकालकर भारत के राष्ट्रीय सांस्कृतिक-राजनीतिक मानस को कलंकित करने के लिए अपने-अपने स्तर से हर तरह के प्रयास किए। 

आरएसएस के इशारे पर मुकेश-अनिल की जोड़ी ने 2012 में हर एक तरह की व्यूह रचना की ताकि प्रणब बाबू राष्ट्रपति बन जायें और उस मोर-नाच में क्या भाजपा, क्या शिव सेना, क्या जद (यू), क्या माकपा का एक बड़ा हिस्सा…. सबके सब शामिल हो गए। यह वही प्रणब बाबू थे जिन्होंने 1973 से लेकर अपनी मौत के पहले तक अंबानियों को न केवल आशीर्वाद देते रहे, बल्कि संसदीय कानूनों, प्रावधानों तथा शासन-प्रशासन की तमाम संस्थाओं व एजेंसियों को अंबानी परिवार की हित रक्षा और समृद्धि के काम में लगा दिया। ऐसे थे, संविधान, संसद और नैतिकता-मर्यादा, के राम-तुल्य ‘युग पुरुष’ प्रणब मुखर्जी, खैर, इसकी चर्चा बाद में…

अभी जानिए कि गुजर चुके 84 वर्षीय प्रणब मुखर्जी की अपनी सामाजिक-राजनीतिक यात्रा क्या रही और उनका मानस कैसे समय-समय पर किन-किन अलग तंतुओं व नसों में विकसित होता रहा।

कहते हैं कि श्री मुखर्जी के पिता स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही थे और उस समय की कांग्रेस कमेटी में थे। यह भी कहते हैं कि कांग्रेस में रहते हुए उनका वैचारिक जुड़ाव अपने जमाने के महत्वाकांक्षी विद्वान आशुतोष मुखर्जी के ‘अति महत्वाकांक्षी’ पुत्र व हिंदूवादी नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी से था। श्यामा प्रसाद बंगाल के भीषण अकाल के दौर में काफी बदनाम हुए थे। इसके अनेक साक्ष्य उपलब्ध हैं। 1953 में श्यामा प्रसाद की अकाल मौत हो गई।

उस समय बंगाल में विधान चंद्र राय जैसे कांग्रेस के अधिकतर राजनेता वामपंथी व लोक कल्याणकारी सरोकारों के थे। प्रणब मुखर्जी जैसे-जैसे जवान होते गए, उन्होंने ऐसे सरोकारों के नेताओं से वितृष्णा रखना शुरू किया। 1960 का दशक बंगाल के लिए उथल-पुथल भरा था। खाद्य सुरक्षा और न्यूनतम लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग पर जनजीवन उबाल पर था, मगर तीस साल से ज्यादा हो चुके प्रणब बाबू औपनिवेशिक-सामंती तथा मुसलमान विरोधी विचारधारा व राजनीति के साये में ही सुकून महसूस करते थे।

इसी वक्त वे इंदिरा गांधी की गोद में आए और आते ही उन्हें राज्य सभा का सदस्य बना दिया गया। श्रीमती गांधी की नजर में वे जमीनी स्तर के नेता नहीं थे, मगर थे बड़े काम के, खासकर आपदा प्रबंधन व अवसर-दोहन तथा वफादारी के मामले में। इंदिरा गांधी की कृपा से और कांग्रेसी नेता कमलनाथ की मेहनत से वे संजय गांधी के गिरोह में चार्टर मेंबर बन गए। बंगाल के मुसलमानों का एक बड़ तबका, यहां तक कि श्रीमती गांधी के कानूनी आंख और हाथ सिद्वार्थ शंकर राॅय और कद्दावर नेता अब्दुल गनी खां चौधरी भी इस 35-37 साल के ‘दुस्साहसी नौजवान’ की तरक्की से आहत थे।

उस समय के कम्युनिस्ट भी इसे फूटी आंख नहीं सुहाते थे। मगर संजय गांधी की कृपा से इस नौजवान के पंख फैलने लगे। इमरजेंसी के दौरान इस दिवंगत व्यक्ति ने तरह-तरह के कारनामे किए और कारोबारियों, घरानों और माफियाओं के लिए काम करना शुरू किया। ‘पाॅलिएस्टर किंग’ माने जाने वाले धीरूभाई अंबानी इनके जिगरी यार बने और ‘आफिशियल फाइल्स रीडिंग’ और ‘अनऑफिशियल माइंड रीडिंग’ के इस राजनीतिक नेटवर्कर ने तमाम कायदे-कानूनों को धता बताकर धीरूभाई के सपनों के साथ अपने सपने को जोड़ा। आपातकाल के दौरान संजय गांधी के इशारे पर जगह-जगह विरोधियों पर ‘रेड’ कराए, ट्रेड-यूनियनों के नेताओं को तबाह किया, कम्युनिस्टों को सबक सिखाया और जब जनता पार्टी की सरकार के शाह-कमीशन ने इनके काले-कारनामों का भंडाफोड़ किया, तो भी इनके माथे पर शिकन नहीं आयी और इंदिरा-संजय का आशीर्वाद हासिल होता रहा।

1980 के बाद तो इनके पंख ही लग गए। अंबानी घराना ताकतवर होता गया, भारतीय गणतंत्र की संवैधानिक संस्थाएं बौनी होती गयीं और कानून का राज मुनाफे के राज के रूप में बदलता गया। ज्यादा विस्तार ठीक नहीं, 1980 के दशक के मध्य में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के रहस्योद्घाटनों पर नजर डालिए – सब कुछ पता चल जायेगा। बॉम्बे डाइंग मरता गया, रिलायंस-विमल चमकता गया। जैन-ब्रदर्स के हवाले के कारनामे सामने आते गए, स्टाॅक मार्केट पर गिद्धों का कब्जा होता गया।

कांग्रेस में होते हुए भी प्रणब बाबू प्रच्छन्न तौर पर उस कांग्रेस के विरोधी बने रहे जो पूंजी व बाजार के शातिर मगरमच्छों से बच रही थी। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। प्रणब बाबू प्रधानमंत्री बनना चाह रहे थे (हालांकि उन्होंने इस बात को अपनी किताब में बकवास बताया है), मगर दांव सफल नहीं हुआ। इसी दौर में भोपाल में यूनियन कार्बाइड के कारखाने में जानलेवा गैस रिसाव हुआ जिसमें हजारों हजार लोग मारे गये और दसियों हजार विकलांग हो गए। जब यूनियन कार्बाइड के राष्ट्रीयकरण की बात उठी, तो उन्होंने यह कहकर विरोध किया कि इससे विदेशी निवेश पर असर पड़ेगा। इन्हें कांग्रेस से हटा दिया गया। यह रुदाली का दौर था। इन्हें बंगाल भेज दिया गया।

इन्होंने ‘राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस’ बनायी, जो अपने शिशुकाल को भी प्राप्त नहीं कर पाई। इन्होंने फिर से कांग्रेस में आने की जुगत लगायी और कामयाब हो गए। 1989 का अयोध्या मामला और शाहबानो प्रसंग आया, फिर बाद में बोफोर्स घोटाले ने राजीव गांधी की राजनीतिक जमीन को भेदना शुरू किया। प्रणब मुखर्जी मन-ही-मन खुश होते रहे। काल की आग किसी को छोड़ती है कहां! 1991 में राजीव गांधी मारे गए। और क्या था राजनीतिक मौसम बदलने लगा और आसमान में काली भगवा धुंध छाने लगी। 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ढाह दिया गया और काल-कवलित नरसिम्हा राव की तरह ये भी मरणासन्न बने रहे। इन्होंने नए दौर का स्वागत किया।

लाखों-लाख लोग डंकल प्रस्ताव और देश की कृषि की बर्बादी के खिलाफ दिल्ली समेत देश के विभिन्न क्षेत्रों में लाठी-गोली खाते रहे, श्रीमान मुखर्जी विश्व व्यापार संगठन की स्थापना और डंकल प्रस्ताव के समर्थन में खड़े रहे। 1996 के बाद इनका मानस तेजी से बदलने लगा और वे वैश्विक पूंजी के प्रवाह वाले घातक उदारीकरण और उसकी आड़ में फलने-फूलने वाली कट्टर हिंदूवादी विचारधारा व राजनीति के ‘हाई टेक’ मंदिर में मत्था टेकने लगे। वर्ष 2004 में विवादास्पद शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को बचाने में इनकी अहम भूमिका रही।

बाद का इतिहास, जिसमें अमेरिका के साथ एटमी समझौते, 2012 में राष्ट्रपति बनना, 2018 में नागपुर में जाकर मस्तक नवाना और 2019 में ‘भारत रत्न’ जैसा ‘कुल गौरव’ का प्रसाद शामिल है, जो हर पढ़ा-लिखा इंसान जानता है।

जहां तक प्रणब मुखर्जी के ‘राजनेता’ और ‘एलिफैंटाइन मेमोरी’  वाले ‘बुद्धिजीवी’ होने की बात है, यह सब मीडिया प्रपंचित है। न तो वे कभी जनाधार वाले नेता रहे और न ही विश्व-दृष्टि संपन्न दूरदर्शी नेता। सही अर्थों में बुद्धिजीवी तो कत्तई नहीं, सिर्फ पढ़ाकू, किस्सेबाज और घटनाओं व प्रक्रियाओं के सारसंग्रहवादी स्मरणकर्ता। जब 2019 में इन्हें ‘भारत रत्न’ मिला, तब बताया गया कि श्री मुखर्जी छठे ऐसे बंगाली हैं जिन्हें इस अलंकरण से नवाजा गया है। पहले पांच थे – बिधान चन्द्र राय, अरुणा आसफ़ अली, सत्यजीत रे, रविशंकर और अमर्त्य सेन। मगर श्री मुखर्जी इनमें से किसी के भी पसंगे के बराबर भी नहीं थे।

खेद सहित!

(रंजीत अभिज्ञान सामाजिक कार्यकर्ता हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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