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प्रशांत का माफी मांगने से इंकार, सुप्रीम कोर्ट से कहा- माफी मांगना अपनी चेतना की अवमानना के बराबर होगा

वरिष्ठ वकील और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने अवमानना मामले में उच्चतम न्यायालय से बिना शर्त माफी मांगने से इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि उनके बयान सद्भावनापूर्ण थे और अगर वे माफी मांगेंगे तो ये उनकी अंतरात्मा और उस संस्थान की अवमानना होगी जिसमें वो सर्वोच्च विश्वास रखते हैं।

गौरतलब है कि 20 अगस्त को प्रशांत भूषण अवमानना मामले में जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ ने सजा पर सुनवाई टाल दी थी। कोर्ट ने उनको अपने लिखित बयान पर फिर से विचार करने को कहा था और उन्हें इसके लिए दो दिन समय भी दिया था। प्रशांत भूषण के जवाब के बाद 25 अगस्त को उच्चतम न्यायालय इस मामले में सजा का एलान कर सकता है।इस मामले में अधिकतम छह महीने की सजा या जुर्माना या फिर दोनों ही हो सकती है।इसके अलावा उच्चतम न्यायालय सांकेतिक सजा भी दे सकता है।

प्रशांत भूषण ने अपने विवादित ट्वीट को लेकर अवमानना मामले में जवाब दाखिल किया। उच्चतम न्यायालय पहले ही फैसला सुरक्षित रख चुका है। उच्चतम न्यायालय  ने प्रशांत भूषण को आज तक (24अगस्त ) का मौका दिया था कि वो बिना शर्त माफ़ी मांग लें। प्रशांत भूषण ने जवाब में कहा है कि मेरे ट्वीट्स सद्भावनापूर्वक विश्वास  के तहत थे, जिस पर मैं आगे भी कायम रहना चाहता हूं। इन मान्यताओं पर अभिव्यक्ति के लिए सशर्त या बिना शर्त की माफी निष्ठाहीन होगी।

उन्होंने कहा कि मैंने पूरे सत्य और विवरण के साथ सद्भावना में इन बयानों को दिया है जो अदालत द्वारा निपटे नहीं गए हैं। अगर मैं इस अदालत के समक्ष बयान से मुकर जाऊं, तो मेरा मानना है कि अगर मैं एक ईमानदार माफी की पेशकश करता हूं, तो मेरी नजर में मेरे अंतकरण की अवमानना होगी और मैं उस संस्थान की जिसका मैं सर्वोच्च सम्मान करता हूं।

भूषण ने कहा है कि मेरे मन में संस्थान के लिए सर्वोच्च सम्मान है। मैंने उच्चतम न्यायालय या किसी विशेष चीफ जस्टिस को बदनाम करने के लिए नहीं, बल्कि रचनात्मक आलोचना की पेशकश करने के लिए ये किया था जो मेरा कर्तव्य है।मेरी टिप्पणी रचनात्मक है और संविधान के संरक्षक और लोगों के अधिकारों के संरक्षक के रूप में अपनी दीर्घकालिक भूमिका से उच्चतम न्यायालय को भटकने से रोकने के लिए हैं। प्रशांत भूषण को न्यायपालिका और चीफ जस्टिस के खिलाफ अपने दो ट्वीट्स के लिए अदालत की अवमानना का दोषी पाया गया था।

27 जून को किए गए एक ट्वीट में प्रशांत भूषण ने 4 पूर्व चीफ जस्टिस को लोकतंत्र के हत्या में हिस्सेदार बताया था। 29 जून को उन्होंने बाइक पर बैठे वर्तमान चीफ जस्टिस एस ए बोबड़े की तस्वीर पर ट्वीट किया था कि उन्होंने उच्चतम न्यायालय  के दरवाजे आम लोगों के लिए बंद कर दिए हैं। खुद भाजपा नेता की 50 लाख की बाइक की सवारी कर रहे हैं।

बाद में इस ट्वीट पर कोर्ट में सफाई देते हुए प्रशांत भूषण ने माना था कि तथ्यों की पूरी तरह से पुष्टि किए बिना उन्होंने तस्वीर पर टिप्पणी की। लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उनकी भावना सही थी। वह आम लोगों को न्याय दिलाने को लेकर चिंतित हैं। चार पूर्व चीफ जस्टिस पर किए गए ट्वीट के बारे में उन्होंने सफाई दी थी कि पिछले कुछ सालों में उच्चतम न्यायालय  कई मौकों पर वैसी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहा है, जिसकी उम्मीद की जाती है। कोर्ट ने प्रशांत भूषण के स्पष्टीकरण को नामंजूर करते हुए 14 अगस्त को उन्हें अवमानना का दोषी करार दिया था।

इसके बाद पिछली सुनवाई में कोर्ट ने भूषण को इसकी सजा देने से पहले अपने बयान पर फिर से विचार करने को कहा था। भूषण ने उस वक्त भी अपने बयान को बदलने से इंकार कर दिया था और कोर्ट को कहा था कि वह माफी नहीं मांगेंगे। इसके बावजूद कोर्ट ने सजा पर अपना आदेश सुरक्षित रख दिया था और उन्हें अपने बयान पर विचार करने का समय दिया था।

केस का नतीजा जो भी हो, प्रशांत भूषण के मामले में यह सवाल साथ पर आ गया है कि आख़िर भारत के शीर्ष न्यायाधीश आलोचनाओं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर कितने सहनशील हैं?’भूषण के केस पर अब तक राय बँटी हुई रही है। कई बड़े वकील, उच्चतम न्यायालय  के पूर्व जस्टिस और संपादकीय लिखने वाले नामी पत्रकार यह मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में ज़रूरत से ज़्यादा कठोर रहा है।

2400 से ज़्यादा भारतीय वकीलों ने प्रशांत भूषण के पक्ष में ऑनलाइन याचिका लिखी है जिसमें कहा गया है कि वकीलों के मुँह पर ताला डालने का मतलब है कोर्ट की स्वतंत्रता और शक्ति को कम कर देना.एक वर्ग प्रशांत भूषण के ख़िलाफ़ भी है जिसकी राय है कि कोई भी वकील क़ानून से ऊपर नहीं है और भूषण के ख़िलाफ़ उच्चतम न्यायालय ने सही कार्रवाई की है।

इसके पहले उच्चतम न्यायालय  कई वकीलों को अवमानना  के लिए कठोर दंड दे चुका है।पिछले तीन वर्षों में वकील मोहित चौधरी और वकील मैथ्यू नेदुमपारा को अवमानना के मामले में स्वतः संज्ञान लेने की शक्ति के जरिए उच्चतम न्यायालय  से दंडित किया है । अप्रैल 2017 में चौधरी ने तत्कालीन चीफ जस्टिस जे एस खेहर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस संजय किशन कौल की बेंच से शिकायत की और कहा कि उच्चतम न्यायालय रजिस्ट्री में कुछ गड़बड़झाला तो जरूर है जिसने डिलीट किए जा चुके मामले को सुनवाई के लिए लिस्ट कर दिया। उन्होंने इस बात का भी संकेत दिया कि कैसे याचिकाकर्ता और रजिस्ट्री के गठबंधन ने पसंदीदा पीठ (बेंच हंटिंग) ढूंढने पर जोर दिया, लेकिन तब किसी ने कोई ध्यान नहीं दिया।

आपराधिक अवमानना का दोषी पाए जाने के बाद चौधरी ने उच्चतम न्यायालय  से माफी भी मांगी। उच्चतम न्यायालय उनके माफी नामे को सशर्त मानते हुए उन्हें माफी देने से इनकार कर दिया। तब चौधरी ने दोबारा माफी मांगी और बिना शर्त माफीनामा दिया। चौधरी के लिए दया की मांग करने वालों में केके वेणुगोपाल, सलमान खुर्शीद, आरएस सुरी, सिद्धार्थ लूथरा, कोलिन गॉन्जल्वेस और अजित सिन्हा थे। चौधरी को सजा के तौर पर बकौल ऐडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड सुप्रीम कोर्ट में बहस करने से रोक दिया गया।

नेदुमपारा ने पिछले साल उच्चतम न्यायालय  की तरफ से किसी वकील को वरिष्ठ वकील का दर्जा देने दिए जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाया था। उन्होंने आरोप लगाया कि सीनियर एडवोकेट और जजों के रिश्तेदारों को ही सीनियर एडवोकेट के दर्जे से नवाजा जाता है। जस्टिस आरएफ नरीमन की अध्यक्षता वाली पीठ  के सामने अपनी दलील पेश करते हुए उन्होंने वरिष्ठ वकील फली एस नरीमन का नाम लिया। इस पर पीठ ने उन्हें चेतावनी दी, फिर भी वो अपने बयान दोहराते रहे।

उन्हें अदालत की अवमानना का दोषी ठहरा दिया गया।पिछले साल 27 मार्च को नेदुमपारा को तीन महीने की जेल की सजा सुना दी गयी जबकि उन्होंने यह गलती फिर कभी नहीं करने की कसम खाई। पीठ ने कहा कि हम नेदुमपारा को तीन महीने की जेल की सजा देते हैं जिसे नेदुमपारा की तरफ से आज हमें दिए गए उस शपथ पत्र के आधार पर निलंबित किया जाता है जिसमें उन्होंने ऐसी गलती दोबारा नहीं करने का भरोसा दिलाया है। इसके अतिरिक्त नेदुमपारा को आज से एक साल के लिए उच्चतम न्यायालय में वकालत करने से प्रतिबंधित किया जाता है।

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This post was last modified on August 24, 2020 4:46 pm

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