अडानी मामले में सुप्रीम कोर्ट में दायर नये हलफनामे में सेबी की जांच पर गंभीर सवाल

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अडानी-हिंडनबर्ग मामले में अडानी समूह की कंपनियों के खिलाफ अदालत की निगरानी में जांच की मांग करने वाले एक याचिकाकर्ता ने अडानी समूह के बारे में कुछ मीडिया घरानों द्वारा प्रकाशित कतिपय जांच रिपोर्टों के आलोक में, सुप्रीम कोर्ट में एक नया हलफनामा दायर किया है। मीडिया रिपोर्ट्स में बराबर यह खबर आ रही थी, कि सेबी को जांच में कुछ प्रमाणिक तथ्य नहीं मिल रहे है, और सेबी के जांचकर्ता गौतम अडानी के समधी है। इसके अतिरिक्त और भी तरह तरह की खबरें अखबारों तथा विभिन्न मीडिया समूहों में आ रही हैं।

दरअसल, अडानी से जुड़े टैक्स हेवेन समझे जाने वाले देशों से संदिग्ध निवेश की खबरें तो आ ही रही हैं, साथ ही प्रधानमंत्री मोदी जी के अडानी समूह से रिश्ते को लेकर विपक्ष विशेषकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी काफी मुखर हैं। संसद में अडानी समूह के 20 हजार करोड़ रुपये के संदिग्ध निवेश और नरेंद्र मोदी तथा गौतम अडानी के निजी रिश्तों को लेकर राहुल गांधी ने लोकसभा में एक बेहद तार्किक और तथ्यात्मक भाषण दिया था। इस भाषण से न केवल प्रधानमंत्री बल्कि पूरा सत्तापक्ष बौखला गया था। हालांकि, अडानी समूह के इस संदिग्ध निवेश से जुड़े राहुल गांधी के भाषण को सदन की कार्यवाही से निकाल दिया गया, लेकिन अब भी प्रधानमंत्री की असहजता कम नहीं हुई है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दायर याचिकाओं पर सेबी को जांच करने और एक तथ्यात्मक रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। सेबी ने जांच की और अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंपी है। लेकिन, इसी बीच, जब अखबारों में इस जांच को लेकर तरह तरह की खबरें मीडिया में आईं तो, एक याचिकाकर्ता अनामिका जायसवाल ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर यह आरोप लगाया है कि, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) सेबी, द्वारा की गई इस मामले की जांच में स्पष्ट रूप से ‘हितों का टकराव’ (Conflict of interest) दिख रहा है।

हलफनामे में यह भी आरोप लगाया गया है कि, “बाजार नियामक (सेबी) ने अडानी समूह द्वारा किए गए नियामक उल्लंघनों और मूल्य हेरफेर का बचाव हो सके, इसलिए ‘ढाल’ के रूप में (अडानी समूह को परोक्ष रूप से लाभ पहुंचाने के लिए) कई संशोधन किये हैं।” हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सेबी द्वारा तथ्यों को कथित रूप से दबाने और साक्ष्यों को दरकिनार करने तथा अडानी परिवार द्वारा अपनी ही कंपनियों में जानबूझकर स्टॉक हासिल करने के दोष का सुबूतों सहित विवरण भी दिया गया है।

सेबी ने अडानी के पैसे निकालने के बारे में 2014 डीआरआई अलर्ट को छुपाया

अनामिका जायसवाल के हलफनामे में कहा गया है कि, “2014 में राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) संयुक्त अरब अमीरात स्थित एक सहायक कंपनी से अडानी समूह की विभिन्न संस्थाओं द्वारा उपकरण और मशीनरी के आयात के अधिक मूल्यांकन (over valuation) के मामले की जांच कर रहा था। उस समय डीआरआई ने तत्कालीन सेबी SEBI अध्यक्ष को एक पत्र भेजकर सचेत (alert) किया था कि अडानी समूह की कंपनियों द्वारा बिजली उपकरणों के आयात में ओवर वैल्यूएशन के तौर-तरीकों का उपयोग करके शेयर बाजार में हेरफेर किया जा सकता है और अडानी समूह पैसे भी निकाल सकता हैं।”

पत्र के साथ एक सीडी भी संलग्न की गई थी, जिसमें 2323 करोड़ रुपये की हेराफेरी के सबूत थे। डीआरआई द्वारा इस मामले की जांच की जा रही थी। हलफनामे में आरोप लगाया गया है कि, “सेबी ने इस जानकारी (डीआरआई द्वारा भेजी गई जानकारी) को दबाया और छुपाया तथा डीआरआई के उक्त अलर्ट पत्र के आधार पर कभी कोई जांच नहीं की।”

यहीं यह सवाल उठता है कि आखिर सेबी ने डीआरआई के इस अलर्ट पत्र पर कोई भी कार्यवाही या जांच करने के बजाय इसे ठंडे बस्ते में क्यों डाल दिया? याद कीजिए तब तक सरकार बदल चुकी थी, और अडानी समूह से नजदीकी संबंधों की चर्चा वाले नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बन चुके थे। तब तक अडानी समूह से मोदी जी की निकटता की बात सार्वजनिक भी होने लगी थी।

हलफनामे में आगे कहा गया है कि, “यह चौंकाने वाली बात है कि सेबी ने माननीय न्यायालय के समक्ष आज तक उक्त पत्र (डीआरआई पत्र) की प्राप्ति और डीआरआई से साक्ष्य का खुलासा नहीं किया है।”

हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सेबी द्वारा अपनाए गए इस आश्चर्यजनक रुख की ओर इशारा करते हुए कहा गया है कि, “सेबी ने अदालत में कहा है कि उसने जून-जुलाई 2020 में ही अडानी समूह के खिलाफ जांच शुरू कर दी थी।”

हलफनामे में दावा किया गया है कि, “सेबी का अदालत में दिया गया यह बयान, जानबूझकर तथ्यों को छिपाना और अदालत को  झूठी जानकारी प्रदान करना है, जो झूठी गवाही (perjury) का अपराध है।”

हलफनामे में यह भी बताया गया है कि, “उस समय, साल 2014 में यूके सिन्हा सेबी निदेशक थे और अब वह एनडीटीवी जिसे 2022 में अडानी समूह द्वारा अधिग्रहित किया गया है, के गैर-कार्यकारी निदेशक हैं।”

स्पष्ट रूप से यह हितों का टकराव है, क्योंकि जब डीआरआई ने सेबी को अडानी समूह के संदिग्ध लेनदेन की जांच करने के एक अलर्ट पत्र भेजा तो तत्कालीन सेबी निदेशक ने उसकी जांच में कोई रुचि नहीं ली और जब वे रिटायर हुए तो अडानी समूह ने उन्हें उपकृत करते हुए अपने यहां एनडीटीवी में गैर कार्यकारी निदेशक बना दिया।

सेबी ने किसी भी जांच के निष्कर्ष का खुलासा नहीं किया

अनामिका जायसवाल के हलफनामे के अनुसार सेबी ने (अदालत में) अपनी जो स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत की है, उसमें कहा गया है कि, “अडानी समूह के खिलाफ हिंडनबर्ग रिपोर्ट से उत्पन्न 24 जांचों में से 22 जांचें, पूरी हो चुकी हैं और 2 जांचे अभी अंतरिम हैं।”

हालांकि, हलफनामे में कहा गया है कि, “सेबी ने इनमें से, किसी भी जांच के निष्कर्ष का खुलासा नहीं किया है।”

इसे और स्पष्ट करते हुए, हलफनामे में कहा गया है कि, “प्रतिभूति अनुबंध (विनियमन) नियम, 1957 के नियम 19 ए के उल्लंघन से संबंधित पहली जांच की समयावधि साल 2016 से साल 2020 के बीच बताई गई थी। इसका तात्पर्य यह है कि, अक्टूबर 2020 से हिंडनबर्ग रिपोर्ट के प्रकाशन की तिथि, यानी जनवरी 2023 तक के समय को, इस मामले में जांच के दायरे से बाहर रखा गया।”

इसके अलावा, यह भी कहा गया है कि, “सेबी की जांच के दायरे में 13 विदेशी संस्थाएं शामिल थीं, जिसमें उसकी (सेबी की) रिपोर्ट के अनुसार 12 एफपीआई (फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट) शामिल थे। हालांकि, सेबी इन 12 एफपीआई के आर्थिक हित वाले शेयरधारकों का अडानी समूह से क्या संबंध रहा है, यह स्थापित करने में असमर्थ रहा क्योंकि यह संस्थाएं टैक्स हेवन देशों के क्षेत्राधिकार में स्थित थीं।

सेबी द्वारा अडानी की जांच में स्पष्ट ‘हितों का टकराव’

हलफनामे में यह भी प्रस्तुत किया गया है कि, “सेबी द्वारा इस मामले में जांच करने में हितों का टकराव (Conflict of interest) स्पष्ट है। क्योंकि, सेबी के अधिकारी सिरिल श्रॉफ, लॉ फर्म अमरचंद मंगलदास (सीएएम) के प्रबंध भागीदार हैं, जो कॉर्पोरेट प्रशासन में सेबी की उस समिति के सदस्य रहे हैं, जो अंदरूनी व्यापार जैसे अपराधों पर निगरानी रखती है।”

हलफनामे के अनुसार, “श्री श्रॉफ की बेटी की शादी गौतम अडानी के बेटे करण अडानी से हुई है, इसलिए हितों का टकराव हो रहा है।”

हलफनामे में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है कि, “सेबी की 24 जांच रिपोर्टों में से 5 अडानी समूह की कंपनियों के खिलाफ अंदरूनी व्यापार के आरोपों पर हैं।”

मॉरीशस स्थित अपारदर्शी निवेश फंड का अडानी शेयरों में निवेश

हलफनामे के अनुसार, “संगठित अपराध और भ्रष्टाचार रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट (ओसीसीआरपी) के जो नए दस्तावेज सामने आए हैं, वह यह बताते हैं कि मॉरीशस स्थित दो कंपनियों, इमर्जिंग इंडिया फोकस फंड (ईआईएफएफ) और ईएम रिसर्जेंट फंड (ईएमआरएफ) ने साल 2013 और 2018 के बीच अडानी कंपनियों के शेयरों की बड़ी मात्रा में निवेश और कारोबार किया था। इन दोनों कंपनियों के नाम सेबी की 13 संदिग्ध एफपीआई की सूची में हैं, हालांकि सेबी उनके अंतिम लाभकारी मालिकों या आर्थिक हित वाले शेयरधारकों का पता लगाने में असमर्थ रही है।”

हलफनामे में आगे कहा गया है कि, इस क्रम में निवेश किया गया पैसा, बरमूडा-आधारित निवेश फंड जिसे ग्लोबल अपॉर्चुनिटीज फंड (जीओएफ) कहा जाता है, के माध्यम से भेजा गया था।”

इसे और स्पष्ट करते हुए हलफनामे में कहा गया है, “ओसीसीआरपी जांच से पता चला है कि विनोद अडानी (गौतम अडानी के भाई) और अडानी प्रमोटर समूह के सदस्य के स्वामित्व वाली एक्सेल इन्वेस्टमेंट एंड एडवाइजरी सर्विसेज लिमिटेड नामक यूएई स्थित एक पोशीदा फर्म (secretive firm) को साल 2012 से 2014 के बीच ईआईएफएफ, ईएमआरएफ और जीओएफ कंपनियों के प्रबंधन से सलाहकार शुल्क के रूप में 1.4 मिलियन डॉलर से अधिक की धनराशि प्राप्त हुई थी।

ओसीसीआरपी ने उन आंतरिक ईमेल का भी खुलासा किया, जिससे यह पता चलता है कि ईआईएफएफ, ईएमआरएफ और जीओएफ कंपनियां, विनोद अडानी के आदेश पर अडानी समूह के शेयरों में धन निवेश कर रहे थे।”

अन्य आपत्तिजनक तथ्य

अनामिका जायसवाल के हलफनामे में इसके अतिरिक्त अन्य अपराधिक कृत्यों का भी उल्लेख किया गया है, जैसा कि गार्डियन जैसे अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्रों द्वारा प्रकाशित किये गये खुलासे हैं। जैसे कि ‘मोदी से जुड़े अडानी परिवार ने गुप्त रूप से अपने शेयरों में निवेश किया था’ शीर्षक से प्रकाशित एक लेख और कुछ दस्तावेजों का संदर्भ दिया गया है।

जिसके अनुसार ओसीसीआरपी द्वारा प्राप्त नए दस्तावेजों से पता चलता है कि “मॉरीशस में एक अज्ञात और जटिल अपतटीय (offshore) ऑपरेशन” का विवरण, जो अडानी समूह के सहयोगियों द्वारा नियंत्रित लगता है, और जिसका उपयोग साल 2013 से 2018 तक अपने समूह की कंपनियों के शेयर की कीमतों का समर्थन करने के लिए किया गया था, के बारे में यह अनुमान लगाया गया है कि वे अडानी परिवार के सहयोगी हो सकते हैं। हलफनामे में रॉयटर्स द्वारा प्रकाशित इस विषय पर एक लेख का भी हवाला दिया गया है।

सेबी ने अडानी को फायदा पहुंचाने के लिए कई संशोधन किए

हलफनामे में कहा गया है कि “सेबी ने न केवल आंखें मूंद लीं, बल्कि अडानी समूह के नियामक उल्लंघनों और मूल्य हेरफेर को बचाने और माफ करने के लिए नियमों और परिभाषाओं में लगातार संशोधन भी किए।”

इनका विवरण देते हुए कहा गया है,

1. एफपीआई नियमों में संशोधन

नियमों में निर्दिष्ट किया गया था कि शेयर बाजार में नामित डिपॉजिटरी प्रतिभागी यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य हैं कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक के पास अपारदर्शी संरचनाएं न हों।

इस प्राविधान को 2018 में सेबी द्वारा संशोधित किया गया था, जिसके तहत ‘अंतिम लाभकारी मालिकों’ को पीएमएलए 2002 के तहत परिभाषित ‘लाभकारी मालिक’ के समान अर्थ के लिए फिर से परिभाषित किया गया था। इसके बाद 2019 में एफपीआई नियमों में ‘अपारदर्शी संरचना’ खंड को पूरी तरह से ख़त्म कर दिया गया और इसकी जगह ‘पीएमएलए के तहत सभी आवश्यकताओं का अनुपालन’ कर दिया गया।

 2. एलओडीआर में संशोधन

सेबी एलओडीआर (सूचीबद्धता दायित्व और प्रकटीकरण आवश्यकता) ने ‘संबंधित पक्ष’ को कंपनी अधिनियम की धारा 2(76) के तहत वही अर्थ के रूप में परिभाषित किया गया था। 2018 में सेबी द्वारा ‘संबंधित पार्टी’ की परिभाषा में संशोधन किया गया, जिसमें एक अलग प्रावधान जोड़ा गया था, जो किसी सूचीबद्ध कंपनी के प्रमोटर समूह के किसी सदस्य या इकाई को, संबंधित पार्टी के रूप में तभी समझा जा सकता है, जब उस व्यक्ति की शेयरधारिता कम से कम 20% हो।

इस प्रकार अदालत में दाखिल अनामिका जायसवाल का हलफनामा न केवल सेबी की लचर जांच का उल्लेख कर रहा है बल्कि यह भी तथ्यों और सबूतों सहित स्पष्ट कर रहा है कि,

सेबी ने साल 2014 में डीआरआई के अलर्ट पत्र पर कोई कार्यवाही नहीं की और जिस समय सेबी डीआरआई के पत्र पर मौन बना बैठा रहा, उस समय सेबी के निदेशक यूके सिन्हा थे, जो बाद में अडानी समूह के ही मीडिया संस्थान एनडीटीवी के निदेशक बने।

सेबी के नियमों में बदलाव किया गया और पारदर्शिता की शर्त हटा दी गई।

सेबी के कॉर्पोरेट प्रशासन का काम देखने वाले सिरिल श्रॉफ, गौतम अडानी के समधी हैं।

सुप्रीम कोर्ट में अनामिका जायसवाल का यह हलफनामा, न सिर्फ नए आरोप को स्पष्ट करता है बल्कि सेबी के अंदर व्याप्त उन अनियमितताओं को भी उजागर करता है, जिनका लाभ प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अडानी समूह को मिलता रहा है। अब देखना है, शीर्ष अदालत में इस हलफनामे के जवाब में सेबी अपना क्या पक्ष रखती है।

(विजय शंकर सिंह पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं।)

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