दिमागों का सैन्यीकरण और राष्ट्र का हिन्दुत्वकरण: भविष्य के सैन्य अधिकारियों को हिन्दू वर्चस्ववाद का प्रशिक्षण!

Estimated read time 16 min read

(एक बेहद विवादास्पद निर्णय के तहत प्रधानमंत्री के अगुआई वाली केन्द्र सरकार ने सैनिक स्कूलों को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल के तहत चलाने का निर्णय लिया और जिसके तहत ‘‘67 फीसदी स्कूल संघ परिवार/तथा उससे जुडे़ संगठनों को- जो खुद बहुसंख्यकवादी विचारों के हिमायती है – तथा भाजपा नेताओं और सहयोगियों को सौंपे गए।’ रिपोर्टर्स कलेक्टिव (Reporter’s Collective) ने इसकी बेहद गहराई में जाकर पड़ताल की और 3 अप्रैल, 2014 को उसको सार्वजनिक किया। प्रस्तुत आलेख इस कदम की गहरी विवेचना करता है।)

‘‘आज पुनर्जन्म का दिन है ..’

स्वामी अवधेशानंद गिरी, अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा के समारोह के बाद /1/

1.एक सुप्रीमो के लिए स्मारक

‘‘रज्जू भैया सैनिक विद्या मंदिर’ शिकारपुर तहसील, बुलंदशहर:

अक्तूबर, 2020 का प्रसंग है जब लड़कों के लिए एक सैनिक स्कूल का उद्घाटन उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले की शिकारपुर तहसील में किया गया। /2/ इंद्रेश कुमार से लेकर राम लाल तक – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तमाम अग्रणी; अवधेशानंद गिरी, जो जूनागढ़ के महंत हैं, तथा हिन्दुत्व के हिमायतियों के करीबी समझे जाते हैं- के अलावा तमाम लोग, जो संघ परिवार से जुड़े आनुषंगिक संगठन में सक्रिय रहे हैं उन्होंने इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया।

यह घटना कई कारणों से सुर्खियां बनी।

एक, तो उसे ‘‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ का पहला सैनिक स्कूल कहा गया।

दो, केन्द्र (मोदी) सरकार की नज़र ए इनायत का कमाल था कि लगभग 40 करोड़ रुपये की सहायता उसे मिलने वाली थी।

तीसरे, वह एक ऐसा दुर्लभ अवसर था जब स्मारकों के निर्माण के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने संस्थापक सदस्य डॉ. हेडगेवार के आगे बढ़ रहा था। याद रहे राजेन्द्र सिंह उर्फ रज्जू भैया /1922-2003/ वह राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ के पहले गैरब्राह्मण और गैर मराठी सुप्रीमो थे। सैनिक स्कूल वही बना हुआ है जहां रज्जू भैया का जन्म हुआ था।

आम तौर पर स्कूल के उद्घाटन का विचार उत्साहित करने वाला होता है। लेकिन इस खबर की बिल्कुल विपरीत प्रतिक्रिया हुई। शिक्षा शास्त्रियों से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं तक तथा राजनीतिक दलों के अग्रणियों ने भी चिंता का इजहार किया। अतिरिक्त चिन्ता इस बात को लेकर भी थी कि इसे संभालने का जिम्मा विद्या भारती – जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अपनी शिक्षा शाखा है – उसे इस स्कूल के संचालन की जिम्मेदारी सौंपी जा रही थी, हालांकि साथ-साथ यह सफाई भी दी जा रही थी कि स्कूल सीबीएसई पाठ्यक्रम का अनुसरण करेगा और वहां कक्षा 6 से कक्षा 12 तक शिक्षा दी जाएगी।

यह वही विद्या भारती है जिसका घोषित लक्ष्य है: 

To develop a National System of Education which would help building a generation of young men and women that is committed to Hindutva and infused with patriotic fervour”. [3] 

(‘एक ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली विकसित की जानी है जो ऐसे युवा और युवतियों का निर्माण कर सके जो हिन्दुत्व के लिए प्रतिबद्ध हो और देशभक्ति की भावना से परिपूर्ण हो।’’)

इस स्कूल पर 40 करोड़ रुपये की रकम के खर्च पर सवाल उठाते हुए समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने – जो उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री भी हैं – सवाल किया कि ऐसे तमाम संस्थान जब पहले से मौजूद हैं जो सरकार द्वारा संचालित है तो आखिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपना ही सैनिक स्कूल संचालित करे, इसकी जरूरत कहां से आ पड़ी’’ /4/

स्कूल में क्या पढ़ाया जाएगा, इसके बारे में अपनी शंकाओं को उन्होंने  छिपाया नहीं

‘‘सैनिक स्कूल खोल कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करना चाह रहा है जहां छात्रों को शायद ‘‘मॉब लिंचिंग और सामाजिक सद्भाव को तार-तार करने की शिक्षा दी जाएगी।’’ /5/

“RSS apparently wanted to serve its political purpose by opening the army school where the students will “probably be taught lessons in mob lynching and disrupting social harmony”.[5],

इस स्कूल को लेकर तमाम लोगों ने जो चिन्ता प्रगट की थी, उसे यूं ही खारिज नहीं किया जा सकता। यह अलग मसला है कि आज की मीडियाकृत  दुनिया में चीजें इतनी तेजी से बदलती रहती हैं कि संघ द्वारा संचालित इस सैन्य स्कूल की ख़बर और उससे जुड़े विवाद की ख़बर भी विलुप्त सी हो गयी। 

2.स्वयंसेवकों के लिए सैनिक स्कूल ?

‘‘ केन्द्र सरकार ने 62 फीसदी नए सैनिक स्कूलों को संघ परिवार / तथा उससे जुडे़ संगठनों को और भाजपा नेताओं को सौंपा।’ 

– रिपोर्टर्स कलेक्टिव /6/

गौरतलब था कि रज्जू भैया सैनिक विद्या मंदिर के ऐलान के वक़्त किसी को इस बात का गुमान नहीं था कि प्रस्तुत स्कूल की स्थापना आने वाले दिनों में ऐसे स्कूलों के देश के पैमाने पर बनने का संकेत है। रिपोर्टर्स कलेक्टिव (https://www.reporters-collective.in/) की तरफ से जारी खोजी रिपोर्ट से इस मामले में आंखें खोलने वाली थीं।

मालूम हो रिपोर्टर्स कलेक्टिव समर्पित पत्रकारों और रिसर्चर्स की ऐसी टीम है – जिसने इससे पहले भी ऐसी कई खोजी रिपोर्टें की हैं, जिनके चलते सार्वजनिक बहसें खड़ी हुई हैं। टीम ने इस काम को इस वजह से हाथ में लिया है क्योंकि विगत कुछ सालों से मुख्यधारा के मीडिया ने ऐसे काम लगभग बंद कर दिए हैं, शक्तिशालियों को उनके गलत का जवाब मांगने का काम लगभग छोड़ दिया है।

आस्था सव्यसाची द्वारा तैयार यह रिपोर्ट रिपोर्टर्स कलेक्टिव के अन्य रिपोर्टों की तरह ही काफी मेहनत से तैयार की गयी है। इस रिपोर्ट का निचोड़ यही है कि आने वाले दिनों में रज्जू भैया सैनिक विद्या मंदिर जैसे स्कूल – जिसका संचालन संघ से जुड़े या संघ की विचारधारा से प्रेरित संगठनों / व्यक्तियों के हाथों में होगा – ही मॉडल बनेंगे। ऐसे ही सैनिक स्कूल बन रहे हैं या बनेंगे जो सारतः ‘‘विचारधारात्मक तौर पर संकीर्ण संगठनों पर निर्भर रहेंगे भविष्य के कैडेट तैयार करने के लिए’’ जो बाद में भारत की सेना में शामिल होंगे।

ऐसे पीपीपी मॉडल (प्राइवेट पब्लिक पार्टनरशिप ) पर आधारित सैनिक स्कूलों के निर्माण का रास्ता रक्षा मंत्रालय के तहत बनी स्वायत्त संस्था ‘सैनिक स्कूल सोसायटी’ के जरिए सुगम हो गया है। अब सरकार की तरफ से ऐसे मॉडल पर सैनिक स्कूल चलाए जाएंगे और उन्हें ही बढ़ावा दिया जाएगा। /2021/

किसी भी तटस्थ प्रेक्षक के लिए यह बात हैरान करने वाली हो सकती है कि एक तरफ पीपीपी मॉडल पर सैनिक स्कूल चलाने के लिए सरकार बढ़ावा दे रही है, जिसके जरिए सेना तथा अन्य सुरक्षा बलों में योग्य छात्र पहुंच सकेंगे और वहीं दूसरी तरफ ऐसे स्कूल संचालन के लिए एकमात्र योग्यता अवरचना अर्थात इन्फ्रास्ट्रक्चर से सम्बधित हैं। अर्थात कोई भी व्यक्ति या संस्था – जिसके पास इतनी जमीन उपलब्ध है, उतने संसाधन उपलब्ध हैं कि वहां ऐसा स्कूल खोला जा सकता है तो फिर वह इसके लिए अर्जी दे सकता है। वह किस विचार का है, वह किस पृष्ठभूमि का है, क्या उसे स्कूल चलाने का कोई अनुभव है या नहीं इस पर कोई गौर नहीं किया जाएगा:

’अगर हम स्कूल की मंजूरी के लिए आवश्यक दस्तावेजों को देखें तो पता चलता कि एकमात्र पैमाना है कि आप के पास अवरचना अर्थात इन्फ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध है। ‘इस तरह कोई भी स्कूल जिसके पास सैनिक स्कूल सोसाइटी द्वारा रेखांकित अवरचना उपलब्ध है – फिर जमीन, भौतिक और आईटी इन्फ्रास्ट्रक्चर, वित्तीय संसाधन और कर्मचारी आदि तो वह ऐसे स्कूल के संचालन के लिए अर्जी दे सकता है। ’ /7/

केन्द्र सरकार की ‘‘योजना’’ में यह बात साफ है कि उसने, 

‘‘संघ परिवार और उससे संबंधित संगठनों , जो समान विचारधारा के हैं, से सम्बधित स्कूलों को इसके लिए अर्जी देने के लिए सक्षम बनाया है।’’ /8/

आज की तारीख तक चालीस स्कूलों ने सैनिक स्कूल सोसायटी के साथ मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग पर दस्तख़त किए हैं, रिपोर्ट इस पर और प्रकाश डालती है:

‘‘सूचना के अधिकार के तहत डाली गयी याचिकाओं के अनुसार, 5 मई 2022 से 27 दिसम्बर 2023 के दरमियान कम से कम चालीस स्कूलों ने सैनिक स्कूल सोसायटी के साथ मेमोरेण्डम आफ अंडरस्टैण्डिंग करार पर हस्ताक्षर किए हैं। रिपोर्टर्स कलेक्टिव द्वारा बारीकी से की गयी पड़ताल उजागर करती है कि इनमें से 11 भाजपा नेताओं के ही मिल्कियत के हैं या उनके द्वारा प्रबंधित ट्रस्ट के हैं या भाजपा के मित्रों या राजनीतिक सहयोगियों के हैं।

इनमें से आठ का प्रबंधन सीधे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके सहयोगी संगठनों द्वारा किया जाता है। इसके अतिरिक्त, छह संगठनों का ताल्लुक हिन्दुत्ववादी संगठनों या अति दक्षिणपंथी नेताओं से या हिन्दू धार्मिक संगठनों से है। इनमें से कोई भी स्कूल ईसाई या मुस्लिम संगठनों या भारत के किन्ही अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित किया जाता है।’’

ऐसे स्कूलों का संचालन करने के लिए किस तरह के लोगों को अनुमति दी जा रही है इसे जानना हो तो हम उन व्यक्तियों के नामों को देख सकते हैं, जिनका उल्लेख इस रिपोर्ट में किया गया है। यह बेहद समीचीन होगा कि हम उनमें से दो नामों को साझा करें जिनका संघ परिवार के व्यापक नेटवर्क में न केवल पहले से प्रभाव है बल्कि समय-समय पर उनके भाषण और उनकी सक्रियताएं व्यापक चिन्ता का भी सबब बनती रही हैं।

इनमें से एक हैं महंत बालकनाथ योगी, जो राजस्थान के तिजारा से वर्तमान में विधायक हैं। /9/ जिस किसी ने भी राजस्थान के विधानसभा चुनावों की खबरों को देखा होगा, वह जान सकता है कि उन्हें उनके अनुयायियों द्वारा ‘राजस्थान का योगी’ कहा जाता था और चुनावों के दौरान यह भी कहा जाता था कि अगर भाजपा को सत्ता मिलती है तो वह मुख्यमंत्री पद के दावेदार भी हो सकते हैं।

यह अलग बात है कि भाजपा के नेतृत्व ने अपने कारणों से अलग निर्णय लिया।

महंत बालकनाथ योगी के अलावा, स्कूल के संचालक के तौर पर साध्वी ऋतम्भरा – जिन्हें हिन्दुत्व दायरों में दीदी मां कहा जाता है – दूसरी बड़ी शख्सियत के तौर पर देखी जा सकती हैं।

विश्व हिन्दू परिषद की महिला शाखा दुर्गा वाहिनी की संस्थापक साध्वी ऋतम्भरा, राममंदिर आंदोलन की चर्चित नेत्री रही हैं। बाबरी मस्जिद के स्थान पर राम मंदिर बनाने के लिए अस्सी एवं नब्बे के दशक में जो जनान्दोलन हिन्दुत्व ब्रिगेड की पहल पर खड़ा हुआ था, उस दौरान उनके कथित भड़काऊ भाषणों के चलते वह सुर्खियों में आयी थीं।

दिसम्बर 1992 बाबरी मस्जिद के विध्वंस की घटना को लेकर लिखे अपने आलेख में प्रोफेसर तनिका सरकार ने लिखा था कि किस तरह साध्वी ऋतम्भरा और उनके व्याख्यान ‘‘मुस्लिम विरोधी हिंसा को भड़काने का एक प्रभावी उपकरण बने थे।’

लिबरहांस कमीशन जिसने अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना पर अपनी रिपोर्ट पेश की, उसने जिन 68 लोगों को इस कारनामे के लिए जिम्मेदार ठहराया उनमें साध्वी ऋतम्भरा का भी नाम था जिन्होंने देश को ‘‘साम्प्रदायिक विवाद के मुहाने पर ला खड़ा किया था।’ /10/

बाबरी मस्जिद विध्वंस की निंदनीय घटना के तीस दशक पूरे होने के बाद भी संघ परिवार में उनकी आज भी अहमियत है, कई भाजपा नेताओं के साथ उनके करीबी संबंध हैं। दिसंबर 2023 को उनके सालगिरह के अवसर पर खुद अमित शाह ने भी उनसे मुलाकात की थी।

फिलवक्त इस योजना के तहत वह दो स्कूलों का संचालन कर रही हैं ‘‘‘सम्विद गुरूकुलम गर्ल्स सैनिक स्कूल’ और दूसरा ‘राजलक्ष्मी सम्विद गुरूकुलम, सोलन, हिमाचल प्रदेश। रिपोर्ट में स्कूल के फेसबुक पेज से एक वीडियो लिकं भी साझा किया गया है जिसमें वह छात्राओं के साथ ‘इज्जत/ सम्मान’ विषय पर बात कर रही हैं। व्यक्तिगत विकास के लिए संचालित शिविर में वह कहती दिख रही हैं कि लड़कियां किस तरह कालेजों और सोशल मीडिया के चलते ‘‘नियंत्रण के बाहर’’ जाती दिख रही हैं।

हम आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं कि किस तरह की बातें वहां छात्राओं को पढ़ायी जा रही होंगी या किन बातों पर खामोश किया जाता होगा।

निस्सन्देह इन स्कूलों के पाठ्यक्रम की अन्तर्वस्तु जानने के लिए प्रचंड विवेक की आवश्यकता नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा संचालित या उसके आनुषंगिक संगठनों द्वारा संचालित स्कूलों से किस तरह अलग हो सकता है ?

3.हिन्दुओं के सैनिक उत्थान के लिए ! वाकई !!

ऐसा हर कोई व्यक्ति जो भारत के संविधान पर यकीन रखता है और सैनिक स्कूलों की भूमिका को जानता है कि वह किस तरह सेना तथा उसके विभिन्न अंगों में योग्य छात्रों को तैयार करते हैं और ऐसे स्कूलों से फौज में 25 फीसदी भर्ती होती है – उन्हें सैनिक स्कूलों के संचालन में पीपीपी मॉडल को लेकर बेहद चिंतित होने की आवश्यकता है।

गौरतलब है कि कई वजहें हैं कि इस पॉलिसी को खारिज किया जाना चाहिए।

– एक, अग्रणी शिक्षाविदों ने ऐसे स्कूलों के संचालन पर सवाल उठाए हैं

– दो, सेना के पूर्व अधिकारियों ने निजी हाथों में ऐसे स्कूलों के संचालन पर ऐतराज जताया है

– तीन, हिन्दुत्व वर्चस्ववादी जमातें और उनके सहयोगी संगठन इन स्कूलों के संचालन में केन्द्रीय भूमिका में होंगे, यह ऐसे संगठन हैं जिनका विश्व दृष्टिकोण भारत के संविधान के सिद्धांतों और मूल्यों के प्रतिकूल पड़ता है

– चार, दुर्भाग्य की बात है कि भारत के पास निजी संस्थानों के तहत या किसी खास विचारधारा के तहत संचालित ऐसे निजी सैनिक स्कूलों का लम्बा अनुभव है – आज़ादी के पहले से ही ऐसे स्कूल संचालित हो रहे हैं, जिनका निर्माण और संचालन हिन्दुत्ववादी संगठन करते रहे हैं। और नब्बे साल का अनुभव यही बताता है कि इसके नतीजे चिन्ताजनक रहे हैं।

– पांच, 21वीं सदी की शुरुआत में हम लोगों ने भारत की ही सरजमीं पर हिन्दुत्व आतंकी समूहों के उभार को देखा, जिन्होंने भारत के अंदर आतंकी कार्रवाइयां की – और यह भी कोशिश की कि इसके लिए मुसलमानों को जिम्मेदार ठहराया जा सके। नांदेड़ बम धमाके /2006/ से लेकर मालेगांव बम धमाके तक, ऐसे कई उदाहरण हमारे सामने है कि अतिवादी हिन्दुत्व समूह आतंकी घटनाओं में संलिप्त रहे हैं।

अदालतों में इन आतंकियों पर अभी भी मुकदमे चल रहे हैं, लेकिन अनुभव यही बताता है कि इन सभी अतिवादियों को ऐसे विचारों के प्रति पहला परिचय और उसके लिए प्रशिक्षण ऐसे ‘सैनिक स्कूलों’ में मिल सका।

आइए, हम एक-एक करके इनकी आपत्तियों पर गौर करें:

इस मामले में सबसे पहले प्रोफेसर अनिता रामपाल – जो अग्रणी शिक्षाविद हैं – उनकी आपत्तियों पर, उन्होंने उठाए सवालों पर गौर करना समीचीन होगा, जब उन्होंने शिकारपुर में आरएसएस की पहल पर बन रहे ‘रज्जू भैया सैनिक स्कूल’ के बारे में सुना था। उन्होंने एक पैनल चर्चा में भाग लेते हुए तीन मुद्दे उठाए: /11/

– ऐसा कोई विशेष स्कूल हमारी उस बुनियादी मांग के खिलाफ पड़ता है कि कम से कम दस साल की उम्र तक सभी के लिए कॉमन स्कूल प्रणाली उपलब्ध होनी चाहिए !

– अध्ययन यही बताते हैं कि ऐसे सभी ‘‘सैनिक स्कूल’ – जहां पर लड़कों की बहुतायत होती है – एक किस्म की मर्दवादी व्यक्तित्व के विकास को बढ़ावा देते हैं

-इस बात को ध्यान में रखते हुए कि नयी शिक्षा नीति को लेकर कस्तूरीरंगन कमेटी ने जो मसविदा पेश किया है, इसमें शिक्षा में रिटायर्ड अध्यापकों और सेवानिवृत्त फौजियों की भूमिका की भी बात की है, जो बात अपने आप में चिंताजनक है।

दूसरे, जैसा कि हम पहले ही उल्लेख कर चुके हैं कि वह वर्ष 2021 था जब भाजपा सरकार ने एनजीओ, निजी स्कूलों आदि की मदद से 100 सैनिक स्कूलों के निर्माण की दिशा में कदम बढ़ा थे, उसी वक्त तमाम रिटायर्ड फौजी अधिकारियों ने और सुरक्षा विशेषज्ञों ने उस पर सवाल उठाए थे।

अपने एक विस्तृत आलेख में लेफ्टिनेंट जनरल प्रकाश मेनन ने आगाह किया था ‘पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत सैनिक स्कूल के निर्माण की दिशा में आगे न बढ़े। वह ऐसी शिक्षा को कमजोर कर सकता है और भ्रष्ट बना सकता है। /12/ उन्होंने जोर दिया कि ‘सैनिक स्कूल की भावना की रक्षा का काम रक्षा मंत्रालय के नियंत्रण के बिना नहीं किया जा सकता /13/ उनकी आपत्ति इस बात को लेकर थी कि ऐसे स्कूलों मे कौन छात्र प्रवेश लेंगे, किस तरह उनमें बहुसांस्कृतिक पक्ष का अभाव होगा और वह सीमित दायरे से ही आएंगे और अधिकतर का नज़रिया भी बेहद संकीर्ण होगा।

‘‘ निजी/एनजीओ स्कूल में आम तौर पर स्थानीय/क्षेत्रीय छात्र प्रवेश लेंगे और उनमें विविधता का अभाव होगा। पहले से चले आ रहे बोर्डिंग स्कूल – जो इस योजना से जुड़ेंगे – वह भी निजी तौर पर संचालित होंगे तथा वहां पर भी बेहद सीमित दायरे के छात्र पहुंचते होंगे। उन छात्रों का बहुलांश बेहद संकीर्ण धार्मिक/पारिवारिक/सामाजिक/सांस्कृतिक मान्यताओं से लैस होगा जो एक तरह से सैनिक स्कूल की बुनियादी भावना के विपरीत होगा, जो एक तरह से संकीर्ण पहचानों को लांघने का काम करती है और उपस्थित सभी को एक व्यापक राष्ट्रीय पहचान में तब्दील कर देती है इस प्रस्ताव की सबसे बड़ी खामी यही है और यह प्रस्तावित पार्टनरशिप मॉडल से अनिवार्य रूप से निकलता है। /14/

वह इस बात से भी चिंतित थे कि इसके चलते केन्द्र सरकार और प्राइवेट समूहों / संगठनों में एक अलग किस्म का गठजोड़ बन सकता है जो संविधान के सिद्धांतों एवं मूल्यों से हट कर एकांगी किस्म की विचारधारा से शिक्षा को बढ़ावा देगा और जिसके दूरगामी परिणाम होंगे क्योंकि भविष्य के हमारे सैनिक अधिकारी हिन्दुत्व / सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विचारों / मूल्यों से लैस होंगे।

‘‘अगर हम विद्या भारती को देखते हैं, जो सबसे पुरानी और सबसे बड़ी संस्था है तथा जिसका नेटवर्क समूचे देश में फैला है, तो उसका मिशन है: एक ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली का निर्माण करना जो ऐसे युवक और युवतियों को तैयार करेगी जो हिन्दुत्व के प्रति समर्पित होंगे और देशभक्ति की भावना से लैस होंगे’’.. 

…क्या ऐसा नज़रिया सैनिक स्कूल की भावना के संरक्षण और विकास के साथ सामंजस्यपूर्ण होगा? हमारे भविष्य के सैनिक अग्रणी हिन्दुत्व/सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से लैस होंगे, इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे, यह हमारे राजनीतिक बहस का मुद्दा बना रह सकता है। लेकिन एक राष्ट्रीय सुरक्षा परिप्रेक्ष्य से देखें तो इस मसले पर निर्णय प्रक्रिया को संवैधानिक मूल्यों से प्राप्त राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी होगी। इसके लिए जरूरी होगा कि राजकीय नेतृत्व अपनी पार्टी विचारधारा से आगे राष्ट्र को रखें। /15/

तीन, यह हक़ीकत कि हिन्दुत्व वर्चस्ववादी संगठन ऐसे स्कूलों के संचालन में अहम किरदार होंगे, यह बात निश्चित ही चिन्ताजनक है।

कोई भी इस मुद्दे को अचानक भूल नहीं सकता है कि हिन्दुत्व वर्चस्ववादी संगठन- जिनमें से कुछ आज़ादी के पहले भी सक्रिय थे – उनका विवादास्पद अतीत रहा है, जिनके बारे में उन्हें या उनके वैचारिक वारिसों को बहुत कुछ सफाई देनी है। इस मसले पर तमाम किताबें, लेख लिखे गए हैं कि किस तरह उन्होंने आज़ादी के आंदोलन से दूरी बनाए रखी, इतना ही नहीं जब भारत की व्यापक जनता उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष मे एकजुट हुई, तब अपनी सक्रियताओं से उन्होंने इस एकता को कमजोर करने की कोशिश की। /16/ इनके अग्रणियों को हिटलर द्वारा यहूदियों को लेकर पेश की जाती रही ‘फाइनल सोल्यूशन की बातों के प्रति सम्मोहन है और वह यहां पर भी इसे ‘गैरों’ के खिलाफ अमल में लाना चाहते हैं।

यहां तक कि नवस्वाधीन भारत ने अपने लिए एक नए संविधान की रूपरेखा बनाने का प्रस्ताव रखा – जो एक व्यक्ति और एक वोट पर आधारित थी – जिसने संकल्प लिया कि वह जाति, जेण्डर, नस्ल / रेस, नस्लीयता/एथनिसिटी आदि पर आधारित पुराने विशेषाधिकार को समाप्त कर देगी, तब उन्होंने इस संकल्पना का विरोध किया और संविधान के स्थान पर ‘मनुस्मृति ’ लागू करने की हिमायत की थी।

ऐसी तंजीमों के आकाओं ने  हाल के समयों में – जिस तरह अपने अतीत को साफसुथरा पेश करने की और अपने आप को अधिक आकर्षक अंदाज़ में पेश करने की जो कोशिशें चल रही है, वह उन प्रश्न को छिपा नहीं सकती कि ऐसे सैनिक स्कूलो में जहां भारत के भविष्य के सैनिकों को तैयार किया जा रहा है, उन्हें कौन से विश्व नज़रिये से अवगत किया जाएगा, क्या वह संविधान की बातों को आगे बढ़ाने वाला होगा या इन संकीर्ण मना संगठनों की नफरत पर टिकी विचारधारा पर आधारित होगा /17/

यह सोचना मासूमियत की पराकाष्ठा होगी कि यह नज़रिया उनके पितृसंगठनों की ‘हम’ और ‘वे’ पर आधारित दृष्टिकोण से संचालित नहीं होगा, यही वह चिन्तन है जिसके तहत उन्हें अपने संगठन में महिलाओं को समान रूप से शामिल करने की जरूरत नहीं महसूस होती रही है, जबकि 21 वीं सदी के इस दौर में सभी लिंगों की समानता अब स्थापित हो गयी है।

शायद, यह जानना अधिक महत्वपूर्ण है कि इन संगठनों ने देश के लिए खतरे की बात करते हुए हमेशा ही सैन्य शिक्षा की हिमायत की है। /18/ हालांकि उनके उस चिन्तन में कोई अनोखी बात नहीं है क्योंकि अन्य तमाम असमावेशी संगठन, संकीर्ण विचारों वाले संगठन इसी तरह सैन्य शिक्षा की या आम लोगों को हथियारबंद करने की बात करते रहते हैं।

चार, हर असमावेशी विचारधारा / संगठन / तंज़ीम की तरह जो खास धर्म के इर्दगिर्द केंद्रित होने की बात करता है – फिर चाहे इस्लामिजम हो, जियनवाद हो या अतिवादी बौद्धवाद हो – हिन्दुत्व ने भी हमेशा यह सपना पाला है कि अपने अनुयायियों को ‘अन्य’ के खिलाफ हथियारबंद किया जाए / उन्हें ‘तैयार’ रखा जाए ताकि रफता रफता हिन्दू राष्ट्र के निर्माण की तरफ बढ़ा जा सके। उसके विचारक / नेता इस बात को अपने अनुयायियों को बताते रहते आए हैं कि उनके ‘आंतरिक दुश्मन’ कौन है और उनसे कैसे निपटा जाए। / हम याद कर सकते हैं गोलवलकर की किताब ‘बंच आफ थॉट्स अर्थात विचारसुमन – जिसमें मुसलमानों, ईसाइयों और कम्युनिस्टों को आंतरिक दुश्मन की श्रेणी में रखा गया है / यह सभी तैयारियां तथा नियमित चलने वाली कवायद, खेल तथा अन्य लड़ाकू किस्म के अभ्यास आदि इस बात का जवाब होते हैं कि जो दरअसल उन्हीं लोगों द्वारा फैलाए होते है कि ‘हिन्दू डरपोक होते हैं’ /19/ या यह गपबाजी कि ‘इस्लाम तलवारबाजी के आधार पर फैला’ – जो बात हिन्दुत्व बुनियादपरस्तों के लिए गोया सूत्रा बनी है।

तीस के दशक के मध्य में – जब भारत पर ब्रिटिश राज था – बाकायदा एक सैनिक स्कूल की स्थापना डॉ. बीएस मुंजे ने की, जो डॉ. हेडगेवार के संरक्षक थे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापकों में शुमार थे। इसका मकसद था ‘‘हिन्दुओं का सैनिक नवीनीकरण करना’’। “…to bring about military regeneration of the Hindus” इस बात को संघ के अपने इतिहास में बार-बार भुला दिया जाता है कि विजया दशमी के दिन हुई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना बैठक में पांच लोग शामिल थे: डॉ. हेडगेवार, डॉ. बीएस मुंजे, डॉ. एलवी परांजपे, डॉ. बीबी थालकर और बाबुराव सावरकर – जो विनायक दामोदर सावरकर के भाई थे। /20/ अब जहां तक इस सैनिक स्कूल के निर्माण की बात थी उसे मुसोलिनी द्वारा ‘बलिल्ला संस्थानों’The Balilla institutions के तर्ज पर बनाना था, जिनका निर्माण मुसोलिनी ने ‘‘इटली के सैनिक उत्थान’ ‘military regeneration of Italy’. के लिए किया था।’ पहले ही दिन से हम देख सकते हैं कि उसके दरवाजे गैर हिन्दुओं के लिए बंद थे। /21/

अपने एक अहम आलेख “”Hindutva’s foreign tie-up in the 1930s: Archival evidence” in Economic & Political Weekly, January 22, 2000 में इटली की विदुषी मार्जिया कासोलारी ने /22/ डॉ. मुंजे की इटली की यात्रा का विस्तृत विवरण पेश किया था, मुसोलिनी से उनकी मुलाकात था बलिल्ला संस्थानों के बारे में उनकी राय की चर्चा की थी और ‘हमारे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के लिए ऐसी ही संस्थाओं के निर्माण की जरूरत पर जोर दिया था।

‘‘भारत खासकर हिन्दू भारत के लिए ऐसी किसी संस्था की आवश्यकता है ताकि हिन्दुओं सैनिक उत्थान को मुमकिन बनाया जा सके: ताकि ब्रिटिशों द्वारा हिन्दुओं के बीच जिस कृत्रिम  विभाजन पर जोर दिया जाता है कि उनके बीच कुछ लड़ाकू तबके होते हैं और कुछ गैर लड़ाकू तबके होते हैं, उसे खारिज किया जाए। डॉ. हेडगेवार के तहत हमारा संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसी किस्म का है, हालांकि उन्होंने उसकी कल्पना स्वतंत्र रूप से की है, लेकिन मैं अपनी बाकी बची जिन्दगी महाराष्ट्र तथा अन्य प्रांतों में इसी संगठन के विकास और विस्तार के लिए न्यौछावर कर दूंगा। .. /23/

वहां इस बात का भी जिक्र है कि गांधी हत्या के महज छह महीने बाद डॉ मुंजे  की मृत्यु के बाद इस संस्था को / जिसका नामकरण भोंसला मिलिटरी स्कूल के नाम से किया गया था / काफी गंभीर संकट का सामना करना पड़ा और राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ के ही कार्यकर्ता ही उसे पटरी पर ले आए।

‘‘भोंसला सैनिक स्कूल को पुनर्जीवन मिला। लेकिन इस पुनर्जीवन की उसे कीमत चुकानी पड़ी। स्कूल को संकट से उबारने की समूची कवायद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के घटाटे नागपुर की तरफ से / अर्थात संघ के मुख्यालय की तरफ से / अहम भूमिका अदा कर रहे थे और इसलिए रफता रफता समूचे स्कूल पर राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ ने ही कब्जा जमा लिया। ‘‘यह बदलाव 1953 से 1956 के दरमियान हुआ।’’ मेजर /रिटायर्ड/ प्रभाकर बलवंत कुलकर्णी ने नासिक में हुए लम्बे साक्षात्कार में बताया था – जिन्होंने इस संक्रमण को करीब से देखा था और जो विभिन्न स्तरों पर 1956 से 2003 के दरमियान स्कूल से जुड़े रहे।’’ /24/

पांच, आज की तारीख में जबकि खुद आज़ाद भारत में सरकार के तहत सैनिक स्कूल का संचालन हो रहा है, पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप /पीपीपी/ मॉडल के नाम पर निजी हाथों में सैनिक स्कूलों का संचालन सौंपना, इस मामले में बेहद चिन्ताजनक है क्योंकि हिन्दुत्व कार्यकर्ताओं के हस्तक्षेप और उनकी सक्रियता के आधार पर चले ऐसे प्रयोगों के विपरीत अनुभव सामने आए हैं।

उदाहरण के तौर पर एक दशक से अधिक वक्त पहले जब मालेगांव बम धमाके की जांच के तहत नए नए खुलासे हो रहे थे और हिन्दुत्व जमातों के तहत सक्रिय आतंकी मॉड्यूल का पर्दाफाश हो रहा था – जिसमें एटीएस के तत्कालीन प्रमुख हेमंत करकरे ने अहम भूमिका अदा की थी – उन दिनों पुणे में स्थापित एक संस्था महाराष्ट्र मिलिटरी फाउंडेशन /एमएमएफ/सुर्खियों में आया था, जिसका संचालन कोई लेफ्टिनेंट कर्नल जयंत चितले कर रहे थे। जनाब जयंत चितले ने उन दिनों ‘अंग्रेजी की पत्रिका ‘आउटलुक’ को साक्षात्कार दिया था /25/ जिसमें उन्होंने गर्व के साथ बताया था कि

‘‘आज की तारीख में उन्होंने तैयार किए एक हजार से अधिक युवा सेना की तीनों शाखाओं में काम कर रहे हैं। हरेक का दिमाग को मैंने ‘ब्रेनवॉश’ किया है। वह बहुत प्रेरित हैं, निर्धारित हैं और देश के लिए कुछ भी कर सकते हैं।’’

लेफ्टिनेंट कर्नल चितले ने अपने विजिटर्स बुक को भी बेहद संभाल कर रखा है, जिसमें उन सभी युवाओं के नाम दर्ज है, जिन्होंने उनके यहां प्रशिक्षण पाया। 20 फरवरी 1993 की तारीख के आगे दर्ज है कि पुणे के लॉ कॉलेज में पढ़ने वाले श्रीकांत प्रसाद पुरोहित ने भी यहां एडमिशन लिया था। यह वही पुरोहित है जो बाद मे सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल बना और मालेगांव बम धमाके में जिन लोगों पर आरोप लगे, उनमें भी वह शामिल था – जब यूएपीए तथा भारतीय दंड संहिता की तमाम अन्य धाराओं के तहत उसे भी गिरफ्तार किया गया था।

अगर हम ‘रज्जू भैया सैनिक स्कूल’ के प्रसंग की ओर फिर लौंटे तो यह सुनने को मिलता है कि वह संघ द्वारा संचालित पहला सैनिक स्कूल है। यह दावा तथ्यों से परे है।

भोसला सैनिक स्कूल, जिसकी स्थापना मुंजे ने की थी – जो हिन्दू महासभा के नेता थे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक सदस्य थे – इस बात का जीता जागता उदाहरण है कि संघ और उसके कार्यकर्ता इस सैनिक स्कूल का संचालन कर रहे हैं।

गौरतलब है कि अग्रणी राजनीतिक पत्रकार धीरेन्द्र कुमार झा अपनी किताब ‘शैडो आर्मीज’’ में भोंसला मिलिटरी स्कूल पर बाकायदा एक पूरा अध्याय समर्पित किया है। अपनी किताब में वह श्रीराम सेने, हिन्दू युवा वाहिनी, सनातन संस्था और हिन्दू ऐक्य वेदी – जैसी अन्य छोटे मोटे संगठनों पर भी निगाह डालते हैं जो लेखक के मुताबिक ‘ /‘stir up trouble, polarize communities, incite violence in the name of Hindutva.झगड़ा पैदा करते हैं, समुदायों का ध्रुवीकरण करते हैं और हिन्दुत्व के नाम पर हिंसा को बढ़ावा देते हैं। यह बात सर्वज्ञात है कि ‘भाजपा और इन सभी संस्थाओं के बीच /इन ‘शैडो आर्मीज’ के बीच / बेहद करीबी/ सहजीवी सम्बन्ध है। विगत तीन दशकों में भाजपा जो 1984 के दो सीटों से 2014 के 282 सीटों पर पहुंची है, उसकी यात्रा में वह सहभागी रहे हैं।’

 21 वीं सदी की पहली दहाई में भोंसला सैनिक स्कूल सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर हमेशा रहा

‘‘ इस स्कूल का सम्बन्ध हाल के अतीत में हिन्दू अतिवादियों द्वारा अंजाम दी गयी तमाम घटनाओं से रहा है। हेमंत करकरे की अगुआई में महाराष्ट्र एंटी टेरर स्क्वाड को 2008 के मालेगांव बम धमाके की जांच में यही देखने को मिला कि इस घटना में संलिप्त कई अभियुक्त इसी भोंसला सैनिक स्कूल से प्रशिक्षित थे। एटीएस के अधिकारियों को तमाम गवाहों और सह अभियुक्तों  ने बताया था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ नेताओं और उनके सहयोगियों के साथ इस बम धमाके की योजना बनाने के दौरान हुई बैठकें भोंसला सैनिक स्कूल के प्रांगण में हुई थी।’’ /26/

न केवल मालेगांव बम धमाके, बल्कि नांदेड़ बम धमाके – जिसमें  हिन्दुत्ववादी संगठनों से जुड़े दो कार्यकर्ता मारे गए थे – की जांच में सक्रिय एटीएस ने यह भी पाया था कि इस धमाके में मारा गया हिमांशु ने भी नागपुर के इसी भोंसला सैनिक स्कूल में बाकायदा एक शिविर का आयोजन किया था और कई कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया था। नांदेड़ बम धमाके के अभियुक्तों पर दायर आरोपपत्र और उनके नार्को विश्लेषण से यही बात साफ की थी कि मई 2000 में नागपुर के भोंसला मिलिटरी स्कूल में एक प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया था जिसमें समूचे देश से लगभग 100 से 115 लोग हिस्सा लिए थे। /27/

4. निष्कर्ष के एवज में 

राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ से सम्बधित स्कूलों और उनके शिक्षा विज्ञान सम्बन्धी कार्यक्रम के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। /28/

इनकी आलोचनाओं की एक झलक हम कम से कम दो दशक पहले प्रकाशित इस रिपोर्ट में देख सकते हैं :Teaching to Hate: RSS’ Pedagogical Programme, Nandini Sundar, Economic and Political Weekly, Vol. 39, No. 16 (Apr. 17-23, 2004), pp. 1605-1612 (8 pages) Published By: Economic and Political Weekly, https://www.jstor.org/stable/4414900/

उपरोक्त रिपोर्ट के आधार पर कहा जा सकता है कि ‘‘अगर स्कूल वह प्रणाली है जिसके माध्यम से राष्ट्र अपनी कल्पना प्रस्तुत करता है और उनका पुर्नउत्पादन करता है, तो स्कूल की व्यवस्था को लेकर चलने वाली बहसें, सारतः  इस कल्पना की शैली और उसकी अन्तर्वस्तु के इर्दगिर्द होती है। if schools are the modes in which nations imagine and reproduce themselves, debates over schooling system are, at heart, debates over style and content of this imagining

इस बात को मद्देनज़र रखते हुए कि मौजूदा भारत में जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके आनुषंगिक संगठनों का विश्व नज़रिया उभार पर है और नागरिकता, देशभक्ति और राष्ट्रीयत्व की उनकी धारणाओं के लिए एक व्यापक आधार मौजूद है, इस बात की आसानी से कल्पना की जा सकती है कि ऐसे सैनिक स्कूल – जो पीपीपी मॉडल के तहत चलेंगे – क्या गंभीरता के साथ छात्रों के बीच संवैधानिक सिद्धांतों और मूल्यों का प्रचार करेंगे जबकि इन्हें शुरू करने की एकमात्र  शर्त है कि ऐसे स्कूल संचालन के लिए आप के पास अवरचना अर्थात इन्फ्रास्ट्रक्चर मौजूद हो ?

निश्चित ही नहीं !

चुनाव हो रहे हैं और नयी सरकार जल्द ही अपना कार्यभार संभालेगी। सरोकार सम्पन्न नागरिकों, नागरिक आज़ादी के लिए समर्पित संगठनों, शिक्षा शास्त्रियों तथा राजनीतिक संगठनों की यह जिम्मेदारी बनेगी कि वह नयी सरकार पर इस बात के लिए दबाव डाले कि वह पीपीपी मॉडल के आधार पर सैनिक स्कूल चलाने की योजना की समीक्षा करे और उसे समाप्त कर दे। 

0 0 0 

टिप्पणियां :

[1] https://www.aninews.in/news/national/general-news/its-the-day-of-resurrection-swami-avdheshanand-giri-after-pran-pratishtha-ceremony-in-ayodhya20240122225147/

[2] https://www.amarujala.com/delhi-ncr/up-bulandshahr-rajju-bahiya-sainik-school-inaugurated-by-avdheshanand-giri-maharaj?pageId=1

[3] https://theprint.in/opinion/dont-rush-sainik-schools-public-private-partnership-can-dilute-and-corrupt/673499/

[4] https://www.thehansindia.com/news/national/rss-to-open-army-school-in-name-of-rajju-bhaiya-551122

[5] https://www.ndtv.com/india-news/rss-to-open-army-school-dedicated-to-former-chief-rajju-bhaiyya-2078110

[6] https://www.reporters-collective.in/trc/centre-hands-sainik-schools-to-sangh-parivar-bjp-politicians

[7] https://www.reporters-collective.in/trc/centre-hands-sainik-schools-to-sangh-parivar-bjp-politicians

[8] https://www.reporters-collective.in/trc/centre-hands-sainik-schools-to-sangh-parivar-bjp-politicians

[9] . https://timesofindia.indiatimes.com/city/jaipur/rajasthan-assembly-election-2023-result-who-is-mahant-balak-nath-yogi-all-you-need-to-know-about-bjp-candidate-from-tijara-constituency/articleshow/105693829.cms ; https://hindi.theprint.in/elections/yogi-of-rajasthan-who-is-mahant-balaknath-who-is-in-the-news-with-the-rise-of-bjp-in-rajasthan/635496/

[10] . https://www.reporters-collective.in/trc/centre-hands-sainik-schools-to-sangh-parivar-bjp-politicians

[11] .https://khabar.ndtv.com/video/show/prime-time/rss-is-opening-its-military-school-in-bulandshahar-523031

[12] https://theprint.in/opinion/dont-rush-sainik-schools-public-private-partnership-can-dilute-and-corrupt/673499/

[13] https://theprint.in/opinion/dont-rush-sainik-schools-public-private-partnership-can-dilute-and-corrupt/673499/

[14] https://theprint.in/opinion/dont-rush-sainik-schools-public-private-partnership-can-dilute-and-corrupt/673499/

[15] https://theprint.in/opinion/dont-rush-sainik-schools-public-private-partnership-can-dilute-and-corrupt/673499/

[16] https://www.telegraphindia.com/india/bharatiya-janata-partys-ideological-ancestors-supported-british-muslim-league-against-indians-mallikarjun-kharge/cid/2011944 ; https://sabrangindia.in/why-is-the-bjp-calling-the-congress-manifesto-2024-to-be-an-imprint-of-the-muslim-league/

[17] https://www.newsclick.in/many-silences-mohan-bhagwat

[18] https://timesofindia.indiatimes.com/city/nashik/india-was-better-off-under-british-rule-mohan-bhagwat/articleshow/11984492.cms

[19] https://francoisgautier.me/2013/02/10/are-hindus-cowards

[20] Page 16, Khaki Shorts and Saffron Flags, Tapan Basu, Pradip Datta, Sumit Sarkar, Tanika Sarkar, Sambuddha Sen, Orient Longman

[21] https://kafila.online/2012/03/09/75-years-of-bhonsala-military-school-militarising-minds-hindutvaising-the-nation/

[22] http://www.epw.in/journal/2000/04/special-articles/hindutvas-foreign-tie-1930s.html

[23] From Munje Diary, http://www.frontline.in/cover-story/moonje-mussolini/article6756630.ece

[24] https://caravanmagazine.in/vantage/the-rss-bhonsala-military-school-dhirendra-k-jha

[25] ‘Godse’s War, Nov 17, 2008

[26] https://caravanmagazine.in/vantage/the-rss-bhonsala-military-school-dhirendra-k-jha

[27] https://www.countercurrents.org/gatade100312.htm

[28] http://www.sacw.net/HateEducation/Ramak101198.html ; http://scroll.in/article/815049/indianise-nationalise-spiritualise-the-rss-education-project-is-in-for-the-long-haulhttps://caravanmagazine.in/politics/ekal-vidyalaya-abhiyan-rss-fts-vhp-

 [ First Published here : https://sabrangindia.in/militarising-minds-hindutvaising-the-nation-training-future-military-leaders-imbued-in-hindutva-supremacism]

(लेखक और टिप्पणीकार सुभाष गाताडे का लेख।)

You May Also Like

More From Author

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments