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दिनदहाड़े सत्ता पक्ष ने हड़प लिया संसद

आज दिनदहाड़े संसद को हड़प लिया गया। उसकी अगुआई राज्य सभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने की। जिस कुर्सी को न्याय की पीठ मानी जाती है। वह आज सदन के भीतर अन्याय की सबसे बड़ी किरदार बन गयी। इसके जरिये न केवल सत्तर सालों के लोकतंत्र के इतिहास, परंपरा और संवैधानिक नियमों का उल्लंघन किया गया बल्कि जनता समेत पूरे विपक्ष को यह बता दिया गया कि संसद अब उनकी नहीं रही। जर्मनी में जिस काम के लिए हिटलर को रीचस्टैग में आग लगवानी पड़ी थी मोदी ने बगैर वैसा किए ही उसको हासिल कर लिया। और जनता की संसद को उससे छीन लिया।

राज्य सभा में आज जिस तरीके से कृषि विधेयक ‘पारित’ हुआ है उसने इस बात को साबित कर दिया कि अब सरकार को न तो विपक्ष की जरूरत है और न ही किसी संसद की और उससे आगे बढ़कर न किसी चुनाव की। लेकिन चूंकि देश के भीतर लोकतंत्र के भ्रम को बनाए रखना है और कारपोरेट की सत्ता की बैधता के लिए वह जरूरी शर्त बन जाती है इसलिए कहने के लिए संसद भी होगी, चुनाव भी होगा, प्रतिनिधि भी चुने जाएंगे। लेकिन उनकी भूमिका जैसी सरकार चाहेगी वैसी ही होगी। यानि वे सदन के भीतर जनता के प्रतिनिधि नहीं बल्कि श्रोता का काम करेंगे।

उनको सैलरी मिलेगी और सारी सुख-सुविधाएं भी मुहैया करायी जाएंगी। लेकिन न तो वो सवाल पूछ सकेंगे और न ही अपनी राय रख सकेंगे। यानि संसद के नाम पर महज एक फसाड होगा। और सदन संचालन की महज औपचारिकता निभायी जाएगी। केवल एक आदमी होगा और उसके मन की बात होगी। बाकी लोग उसके लिए काम कर रहे होंगे।

पूंजीवादी लोकतंत्र अपने संकट के दौर में किस तरह से नंगा हो सकता है यह उसकी खुली नज़ीर है। क्या लोकतंत्र इसी को कहते हैं? जिस देश की 65 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर हो और जिसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ किसान हों उसके लिए सरकार कोई कानून बनाए लेकिन उसके किसी नुमाइंदे से पूछा तक न जाए। क्या यह किसी जिंदा लोकतंत्र में संभव है? संविधान में किसी बिल के लिए साफ-साफ लिखा है कि उसको पारित कराने से पहले उसके तमाम हित धारकों से बातचीत करनी होगी।

उनके साथ संबंधित मंत्रालय के अधिकारी बैठेंगे और उनसे विचार-विमर्श करेंगे। और फिर उनकी राय के मुताबिक सदन में जन प्रतिनिधियों के बीच बहस करवाकर उसे पारित कराने की कोशिश की जाएगी। इसमें किसी किसान या फिर उसके नेता से राय-मशविरे की बात तो दूर सदन में कानून निर्माताओं तक को अपना पक्ष नहीं रखने दिया गया। आखिर क्या जल्दबाजी थी इस विधेयक को पारित कराने की? कोरोना महामारी के दौर में आप अध्यादेश लाते हैं। और फिर उस अध्यादेश को ऐन-केन प्रकारेण संसद से पास कराना चाहते हैं। किस बात का दबाव है आपके ऊपर?

अगर विधेयक इसी तरह से पास कराना था तो उससे अच्छा बगैर सदन की बैठक को बुलाए ही उसके पारित होने की घोषणा कर देते। लेकिन आपको तो देश को अपनी ताकत भी दिखानी थी। चंबल के डाकुओं की तरह विधेयक को लूट ले जाना था। दरअसल राज्य सभा में सरकार अल्पमत में थी। और उसे किसी भी तरीके से इस विधेयक को पारित होते देखना था। लिहाजा उसने हर उस काम को किया जो सामान्य स्थितियों में नहीं किया जा सकता था। मसलन उप सभापति किसी सुल्ताना डाकू की भूमिका में आ गए। और फिर उन्हें न तो संविधान से कुछ लेना देना था। न सदन संचालन के नियमों से। और न ही विपक्षी सदस्यों के अधिकारों से उनको कोई मतलब था। बस उनके ऊपर मोदी द्वारा दिए गए विधेयक को पारित कराने का भूत सवार था।

लिहाजा पहले उन्होंने सदन की कार्यवाही को आगे बढ़ाने की विपक्ष की मांग को खारिज कर दिया। फिर विपक्ष के जिन कुछ सदस्यों को अभी अपनी बात रखनी थी उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। और विपक्षी सदस्यों ने जब विधेयक पर मतदान की मांग उठायी और टीएमसी के डेरेक ओ ब्रायन और डीएमके के त्रिची शिवा सदन के कुएं के पास पहुंच कर उपसभापति को सदन का आर्डर दिखाने की कोशिश की तो मार्शल के बल पर उन्हें दरकिनार कर दिया गया। और फिर इस बीच राज्य सभा टीवी पर न केवल पहले विपक्षी सदस्यों के भाषण को म्यूट किया गया बल्कि कुछ देर बाद पूरी कार्यवाही को ब्लैक आउट कर दिया गया। और इस तरह से सदन में विपक्ष के वोट के विभाजन की मांग को दरकिनार कर विधेयक के ध्वनि मत से पारित होने की घोषणा कर दी गयी। न तो लोगों के संशोधन लिए गए और न ही उस पर कोई चर्चा हुई और न ही कृषि मंत्री ने उनका कोई जवाब दिया।

सारी चीजों को ताक पर रखकर विधेयक को पारित मान लिया गया। जबकि नियम यह है कि किसी भी विधेयक पर अगर सदन का एक भी सदस्य मतदान की मांग करता है तो सभापति/ उप सभापति की यह जिम्मेदारी बन जाती है कि वह उस पर वोटिंग कराएं। इसी सरकार के कार्यकाल में ट्रांसजेंडरों से जुड़े मसले पर एक विधेयक आया था जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों सहमत थे और विधेयक पारित होने के रास्ते में कोई अड़चन नहीं थी लेकिन एक सदस्य ने वोटिंग की मांग कर दी। सत्ता पक्ष के यही रविशंकर प्रसाद थे जिन्होंने पीठासीन अधिकारी से उस सदस्य की मांग को पूरा करने की गुजारिश की। और फिर वोटिंग के बाद ही वह विधेयक पारित हो सका।

लेकिन यहां एक नहीं, दो नहीं दस नहीं बल्कि पूरा विपक्ष मतदान की मांग कर रहा था लेकिन कुर्सी पर बैठे उपसभापति ने उसको सिरे से खारिज कर दिया। संसद के 70 सालों के इतिहास में शायद ही कभी ऐसा देखा गया हो। हां कुछ प्रदेशों की विधानसभाओं में ज़रूर सत्तारूढ़ दलों से जुड़े स्पीकर कभी-कभी इन हरकतों को अंजाम देते रहे हैं। लेकिन उसे कभी भी सही नहीं माना गया। लेकिन देश के सर्वोच्च सदन में और जिसकी अपनी एक ऐतिहासिक विरासत है उसे एक म्युनिसिपलिटी और विधानसभा की कचहरी में बदल देना न केवल लोकतंत्र और संविधान का बल्कि इस देश की जनता का खुला अपमान है।

और यह काम उस शख्स द्वारा किया गया जिसका पत्रकारिता में कभी अच्छे संपादकों में नाम शुमार किया जाता था। लेकिन बुराई एक दिन में नहीं आती है। और पतित होने का भी सिलसिला होता है। संपादक की कुर्सी पर रहते हुए भी हरिवंश सुपारियां लेने का काम करते थे। हालांकि यह बात बहुत कम लोग जानते हैं। और जो जानते भी हैं अभी तक उसे बाहर नहीं लाना चाहते थे। कभी वह सत्ता की सुपारी लेते थे तो कभी अपने मालिक ऊषा मार्टिन की। वह कभी अखबार ‘प्रभात खबर’ के लिए विज्ञापन लाने के तौर पर होती थी और कभी उन्हें कोयला खनन का पट्टा दिलाने के जरिये। ऐसे में हरिवंश की सत्ता और कारपोरेट की यह दलाली पीएम मोदी को भी भा गयी।

लिहाजा उन्होंने उनके जरिये एक तीर से कई शिकार किए। एक तरफ मंत्रिमंडल से हटाए गए कुछ ठाकुर मंत्रियों के चलते ठाकुर बिरादरी की नाराजगी को दूर करने की कोशिश की तो दूसरी तरफ एक उदारवादी जमात के शख्स को अपने खेमे में करके एक बड़ा संदेश देने का काम किया। और यह शख्स अगर सीधे कारपोरेट के लिए काम करना शुरू कर दे फिर तो सोने पर सुहागा है। और वही हुआ। इनके बारे में बताया तो यहां तक जा रहा है कि ऊषा मार्टिन में इनका शेयर है। जिसमें ये कुछ परसेंट के हिस्सेदार हैं। लिहाजा अगर किसानों के खिलाफ जाकर कॉरपोरेट के पक्ष में उन्होंने कुछ किया है तो वे अपनी बिरादरी का ही साथ दिए हैं। ऐसे में उनसे भला किसी को क्यों शिकायत होनी चाहिए?

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

This post was last modified on September 21, 2020 11:48 am

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