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कश्मीर पर कहर(पार्ट-2): डल झील और “दलाल स्ट्रीट” के बीच की समाजवादी व्यवस्था!

श्रीनगर। नौहट्टा स्थित जामा मस्जिद के सामने मोटरसाइकिल पर खड़ा शख्स जो अपने बच्चे के आजादी का नारा लगाने की बात कर रहा था दूसरे ही पल घर चलकर चाय पीने की पेशकश करने लगा। उसके व्यवहार को देखकर मुझे एक दूसरे कश्मीरी सज्जन की बात याद आ गयी जिसमें उन्होंने कश्मीरियों के रूई से भी ज्यादा मुलायम होने की बात कही थी। लेकिन साथ ही उनका कहना था कि 70 सालों के संघर्ष ने उन सभी को कड़ा बना दिया है।

आगे बढ़ने से पहले इस इलाके के बारे में कुछ और बता दें। पूर्व गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण के बदले जिन पांच आतंकियों को छोड़ा गया था उनमें से एक मुस्ताक जरगर नौहट्टा का ही रहने वाला था। वैसे भी अगर स्थानीय लोगों की मानें तो डाउनटाउन इलाके में सुरक्षा बलों से लड़ते हुए अब तक तकरीबन 10 हजार लोगों की मौतें हो चुकी हैं। हालांकि यह कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है।

पत्थरबाजी के बाद अब हम लोगों के लिए वहां देर तक रुकना उचित नहीं था। लिहाजा उन सज्जन से इजाजत लेकर हम साथ गए पत्रकार मित्र की गाड़ी के साथ अपने ठिकाने की ओर वापस हो लिए। रास्ते में वह राजौरी कदल भी पड़ा जहां आतंकियों को 13 दिसंबर, 1990 की शाम को रुबैया सईद के बदले रिहा किया गया था। यहीं पर मीरवायज मोहम्मद उमर फारूक की सीट है जो हुर्रियत कांफ्रेंस के एक धड़े का नेतृत्व करते हैं और जिनके पिता मीरवायज फारूक की 1990 में हत्या कर दी गयी थी। इस घटना के बाद यहां एक बंकर बना दिया गया था। लेकिन नफरत और घृणा का प्रतीक बन जाने से 2010 में सरकार ने उसे हटा दिया। और अब यह कुल्फी वाला चौराहा के नाम से जाना जाता है।

डाउनटाउन से गुजरते हुए।

इस बीच एक और चीज को समझ लेना जरूरी है। कश्मीर से बाहर भारत के दूसरे हिस्सों में घाटी को कुछ इस रूप में देखा जाता है जैसे वह महज श्रीनगर तक ही सीमित हो। जबकि ऊधमपुर से आगे बढ़ने के साथ ही दक्षिण कश्मीर शुरू हो जाता है जिसमें अनंतनाग, पुलवामा, शोपियां आदि जिले आते हैं और जो आतंकवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। उधर श्रीनगर और फिर उत्तर कश्मीर के बारामुला और कुपवाड़ा को मिलाकर एक बड़ा हिस्सा बन जाता है। और इसमें राजौरी और पुंछ के साथ लद्दाख से सटे कारगिल को अगर जोड़ दिया जाए तो मुस्लिम आबादी वाला इलाका बहुत बड़ा हो जाता है। शायद इसी बात को ध्यान में रखते हुए जब किसी ने जम्मू-कश्मीर की बात की तो एक स्थानीय शख्स ने पलट कर कहा कि “अब जे एंड के नहीं बल्कि केवल के यानी कश्मीर। और अब वही हमें चाहिए। सरकार ने उसे अलग कर हमारा रास्ता आसान कर दिया है”।

इस बीच, हम लोगों को घूमते करीब 3 बज चुके थे लिहाजा कुछ देर आराम करने के बाद शाम को स्थानीय पत्रकार मित्रों के साथ चर्चित डल झील की ओर जाने की योजना बनी।

आगे बढ़ने से पहले एक चीज बतानी जरूरी है। झेलम नदी श्रीनगर से होकर गुजरती है। लेकिन आबादी बढ़ने के साथ ही झेलम पर पुलों की जरूरत बढ़ती गयी। और उसके साथ ही पुलों का निर्माण भी होता चला गया। वैसे तो श्रीगनर में झेलम पर कुल आठ पुल हैं। लेकिन एक पुल का नाम जीरो पुल होने के चलते उसे गिना ही नहीं जाता है। लिहाजा श्रीनगर को सात पुलों वाला शहर कहा जाता है। यहां पुल को कदल कहते हैं। वैसे तमिल में कदल का मतलब प्यार होता है। जीरो कदल, अमीरा कदल, हबा कदल, फतेह कदल, जीन कदल, आइल कदल, नवा कदल, सफा कदल आदि नामों से ये पुल मशहूर हैं। खास बात यह है कि झेलम नदी के होने के चलते डल झील में कभी भी पानी कम नहीं होने पाता है।

डल झील के आस-पास की स्थिति।

देर शाम हम लोगों के डल झील के किनारे पहुंचने पर नजारा बेहद मायूस करने वाला था। शाम के वक्त सैलानियों के मेले से सजी रहने वाली झील के किनारे की सड़क बिल्कुल खाली-खाली थी। आस-पास केवल स्थानीय लोग दिख रहे थे। उनमें ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा थी जो घर पर बैठे-बैठे ऊब गए थे और फिर कुछ ताजी हवा लेने के मकसद से यहां आए थे। न केवल झील की सड़क वीरान थी बल्कि उसमें दूर-दूर तक कहीं कोई शिकारा चलते नहीं दिख रहा था।

हालांकि सुरक्षा बलों के जवानों की यहां उतनी तैनाती नहीं थी। लेकिन दो होटलों पर कब्जे, झील से सटी पहाड़ी के ऊपर सैनिकों के कैंप और पास स्थित शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम में स्थाई रिहाइश उनकी हर वक्त मौजूदगी को दर्ज कर रहे होते हैं। यह शायद देश का पहला शहर हो जिसकी पहाड़ी के ऊपर सैनिकों ने कैंप बना रखा हो। कभी देश और दुनिया के अलग-अलग इलाकों से आए पर्यटकों की हर तरीके से सेवा करने वाला झील के एक किनारे बना सैंटूर होटल आजकल एक दूसरी वजह से चर्चे में है।

पहाड़ी के ऊपर आर्मी कैंप।

दरअसल इसे प्रशासन ने अस्थाई जेल में तब्दील कर दिया है। और शहर समेत सूबे के दूसरे राजनीतिक कैदियों को यहां रखा गया है। हालांकि पिछले 50 दिनों तक इनसे किसी को मिलने की इजाजत नहीं थी। यहां से लौटने के बाद अगली सुबह जब हमने पेपर देखा तो यह बात सामने आयी कि जेल में बंद लोगों को उनके रिश्तेदारों से मिलने की छूट दे दी गयी है।

अभी हम सेंटूर होटल और निशात गार्डेन की तरफ आगे बढ़ते उससे पहले सोचा कि शिकारे चलाने वालों से मौजूदा हालात और उनके जीवन पर कुछ बात कर ली जाए। पहले तो कोई बात करने के लिए तैयार ही नहीं हो रहा था। लेकिन जब हमारे पत्रकार साथियों ने मान-मनौव्वल की तो ना-ना करते वे सब कुछ बता डाले। शिकारों के अलग-अलग घाट बने हुए हैं। जहां एक-एक घाट से तकरीबन 25 से लेकर 30 शिकारों का संचालन होता है। उस घाट पर मौजूद तीन शिकारा चालकों में से एक ने बताया कि सामान्य दिनों में जहां उनकी रोजाना 800 से लेकर 12-15 सौ तक की कमाई हो जाती थी आज वह 50-60 रुपये भी नहीं है।

निशात गार्डेन।

कश्मीर कैसे जिंदा है और कश्मीरी दूसरी कौमों से कैसे अलग हैं उसकी एक बानगी उस समय यहां देखने को मिली जब इन शिकारा वालों ने पेशे से होने वाली आय और उसके वितरण की व्यवस्था के बारे में बताया। उनका कहना था कि शिकारों से होने वाली आमदनी को एक जगह एकत्रित कर लिया जाता है और फिर उसे वहां कार्यरत सभी लोगों में बराबर-बराबर बांट दिया जाता है। वितरण की यह समाजवादी व्यवस्था शायद शेख अब्दुल्ला के जमीन वितरण की विरासत से ही जुड़ी हुई है। और आज भी कश्मीरियों के जीवन का अभिन्न हिस्सा है।

इस दौर में भी जब पिछले 53 दिनों से सब कुछ ठप है। बावजूद इसके लोगों का जीवन चल रहा है तो इसके पीछे सहयोग और वितरण की शायद यही भावना है। एक स्थानीय शख्स ने बताया कि कश्मीर की सामुदायिकता अभी जिंदा है। इसके पीछे कोई धार्मिक वजह है या फिर कश्मीर की अपनी खासियत। कुछ बता पाना मुश्किल है। लेकिन अगर कहीं 20 लोग हैं और उनमें एक शख्स सक्षम नहीं है तो बाकी 19 लोग मिलकर उसको संभाल लेते हैं। कश्मीरियों की इस संगठित एकता का ही नतीजा है कि 53 दिनों बाद भी वो अभी भी तनकर खड़े हैं।

बंद और वीरान पड़ी शॉप।

इसके अलावा एक और चीज है जिसने इतने दिनों बाद भी लोगों के हौसले को बरकरार रखा है। दरअसल बनिहाल से श्रीनगर के बीच का मार्ग बेहद अनिश्चितताओं से घिरा होता है। श्रीनगर समेत घाटी के दूसरे इलाकों को इसी रास्ते से रसद सप्लाई होती है। सर्दी के मौसम में यह रास्ता अक्सर बर्फ से ढंक जाता है या फिर कहीं भूस्खलन हो जाने पर उसका सीधा असर खाद्यान्नों की सप्लाई पर पड़ता है। ऐसे में सर्दी के लिए अनाज का भंडारण घाटी के लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है। और शायद इस संकट के दौर में वही काम कर रहा है।

आगे निशात गार्डेन और मुगल गार्डेन बिल्कुल वीरान था। जिस सड़क पर हजारों लोगों का रेला लगा रहता था वह बिल्कुल सूनी पड़ी थी। बहरहाल यह इलाका केवल डल झील के लिए ही नहीं जाना जाता है। बल्कि इससे सटा ही वह क्षेत्र है जहां से पूरी कश्मीर संचालित होती है। यानि राजनीतिक प्रभुओं का रिहाइशी ठिकाना। हालांकि अलगाववाद से सहानुभूति रखने वाले इसे “दलाल स्ट्रीट” कह कर पुकारते हैं। उनका कहना है कि ये सब दिल्ली के दलाल हैं। उस रोड पर राज्यपाल का रेजिडेंस है तो महबूबा मुफ्ती भी वहीं पायी जाती हैं। इसके अलावा फारूख अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला के रिहाइशी ठिकाने भी अलग-अलग यहीं स्थित हैं।

महबूबा और उमर को हरि निवास पैलेस में रखा गया है। जबकि पीएसए लगाकर फारूख अब्दुल्ला को उनके ही घर में कैद कर दिया गया है। फारूख अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती के दरवाजों के सामने कारों को खड़ाकर उन्हें जाम कर दिया गया है। इन्हें कब छोड़ा जाएगा और अगर छूट भी गए तो फिर इनकी क्या भूमिका होगी। यह सब कुछ अंधेरे में है।

(कश्मीर से लौटकर जनचौक के संस्थापक संपादक महेंद्र मिश्र की रिपोर्ट।)

This post was last modified on September 27, 2019 8:00 pm

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