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भितरघातों का अड्डा बना बिहार में एनडीए! गठबंधन जेडीयू से लेकिन बीजेपी के कई नेता एलजेपी से लड़ने के लिए तैयार

बिहार में जिस एनडीए को सबसे ज्यादा संगठित माना जा रहा था वह अब उससे भी ज्यादा बिखराव के कगार पर है। संशय, अविश्वास और भितरघात समेत हर तरह के  राजनीतिक और चुनावी रोगों से यह गठबंधन ग्रसित हो गया है। जो नीतीश कल तक गठबंधन के सर्वमान्य नेता थे आज उनके लिए अपने सम्मान की रक्षा करना भी मुश्किल पड़ रहा है। वैसे तो कहने के लिए बीजेपी और जेडीयू का गठबंधन बना हुआ है और दोनों के बीच सीटों को लेकर आधे-आधे का समझौता हो गया है।

लेकिन विश्वास का जहां तक रिश्ता है तो माना जा रहा है कि बीजेपी जेडीयू से ज्यादा अब राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पर भरोसा कर रही है। जो गठबंधन से इतर जा कर चुनाव लड़ रही है। और उसने खुलेआम नीतीश की आलोचना तथा मोदी का पक्ष लेना शुरू कर दिया है। दरअसल बताया जा रहा है कि यह पूरा खेल बीजेपी नेतृत्व के इशारे पर खेला जा रहा है। जिसका मूल मकसद नीतीश को नेतृत्व की हैसियत से बेदखल करना है और नतीजे के बाद अगर सरकार बनने की कोई संभावना बनती है तो उसको खुद हासिल कर लेना है।

इसी कड़ी में लोजपा ने उम्मीदवारों से जुड़ी कुछ ऐसी घोषणाएं की हैं जिनको लेकर राजनीतिक विश्लेषकों का गणित भी जवाब देने लगा है। मसलन उसने तीन ऐसे नेताओं को अलग-अलग सीटों पर अपना उम्मीदवार बनाया है जो बीजेपी के कद्दावर नेता हैं। और दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने अभी बीजेपी के अपने पुराने पदों से इस्तीफा भी नहीं दिया है और मौजूदा समय में उनकी वहां क्या स्थिति है वह भी स्पष्ट नहीं है।

इनमें सबसे बड़ा नाम और चेहरा राजेंद्र सिंह का है जो बिहार बीजेपी के उपाध्यक्ष हैं उन्होंने 6 अक्तूबर को एलजेपी में शामिल होने की घोषणा की। वह झारखंड के पूर्व महासचिव (संगठन) रह चुके हैं इसके अलावा वह झारखंड और बनारस में चुनाव के प्रभारी का भी काम कर चुके हैं। राजेंद्र सिंह के बारे में बताया जा रहा है कि वह बक्सर जिले में दिनारा से एलजेपी के प्रत्याशी हो सकते हैं। जैसा कि बताया जा रहा है कि यह सीट जेडीयू की है और यहां से उसका विधायक था। और बीजेपी के साथ होने वाले समझौते में इसके एक बार फिर उसी के खाते में जाने की संभावना है।

और उससे भी दिलचस्प बात राजेंद्र सिंह की पृष्ठभूमि को लेकर है। वह 50 के दशक से ही आरएसएस से जुड़े हुए हैं। और बीजेपी में अलग-अलग पदों पर काम कर चुके हैं। जिसमें 2014 का झारखंड का वह चुनाव भी शामिल है जिसमें वह चुनाव के प्रभारी थे।

उनके बारे में तो यहां तक कहा जा रहा है कि 2015 का बिहार चुनाव अगर बीजेपी जीत लेती तो वह शायद मुख्यमंत्री भी बन सकते थे। क्योंकि मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदारों में उनका नाम शामिल था। राजेंद्र सिंह आरएसएस के बेहद चहेते माने जाते हैं। लिहाजा उनकी संघी पृष्ठभूमि और बीजेपी में उनकी भूमिका को देखते हुए किसी के लिए भी यह सोच पाना कठिन है कि उन्होंने यह फैसला बगैर पार्टी की सहमति से ली होगी।

इसके अलावा इस कतार में दो और नाम हैं जो बीजेपी से बहुत पुराने समय से जुड़े हुए हैं। इसमें पहला नाम रामेश्वर चौरसिया का है जो बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं। ऐसा माना जा रहा है कि वह एलजेपी के टिकट पर रोहतास जिले में स्थित नोखा विधानसभा से लड़ेंगे। वह इस सीट पर 2000 से 2010 के बीच चार बार जीत दर्ज कर चुके हैं लेकिन 2015 में वह आरजेडी प्रत्याशी से हार गए थे।

इसके अलावा तीसरे शख्स जवाहर प्रसाद हैं जो सासाराम से पांच बार बीजेपी के विधायक रह चुके हैं। उनके भी एलजेपी में शामिल होने की संभावना जतायी जा रही है क्योंकि समझौते में उनकी सीट जेडीयू के खाते में चली गयी है।

प्रसाद आरएसएस के पुराने आदमी हैं। और बीजेपी के पुराने नेताओं में शामिल हैं। वह 1990, 1995, फरवरी 2005, अक्तूबर 2005 और 2010 में इस सीट से चुनाव जीत चुके हैं। इस सीट पर उनके प्रतिद्वंदी आरजेडी के अशोक कुमार रहे हैं जो प्रसाद से 1995 में हार गए थे। लेकिन 2000 और 2015 में उन्होंने उन्हें पटखनी दे दी।

अब ऊपर बतायी गयी स्थितियों को देखकर भला कौन बीजेपी और लोजपा के बीच डील की बात से इंकार कर सकता है? जानकारों का भी कहना है कि बीजेपी के ये कद्दावर नेता पार्टी से बगावत कर कोई दूसरी पार्टी में कत्तई शामिल नहीं होने जा रहे हैं। लिहाजा जो कुछ भी हो रहा है उसमें बीजेपी और उसके नेतृत्व की सहमति है।

हालांकि इस तरह की डील को आधिकारिक तौर पर साबित कर पाना मुश्किल होता है। जेडीयू के भीतर के सूत्रों का कहना है कि पार्टी बीजेपी को इनके खिलाफ कड़ा रुख अपनाने के लिए दबाव बनाएगी। और लोगों का कहना है कि इससे शायद एकबारगी वह उनके खिलाफ सार्वजनिक बयान तक देने के लिए मजबूर हो जाए।

लेकिन एक बात जरूर सामने आयी है कि इन सीटों को जेडीयू को दिए जाने पर बीजेपी के कार्यकर्ताओं में विक्षोभ था। और यह गु्स्सा उन कुछ दूसरी सीटों पर भी है जहां बीजेपी के दावे को खारिज किया गया है।

लिहाजा इससे तो एक बात पक्की हो गयी है कि इन सीटों पर बीजेपी के कार्यकर्ता जेडीयू प्रत्याशी के साथ खड़े होने की जगह एलजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे अपने नेता का चुनाव प्रचार करना पसंद करेंगे। और इससे जेडीयू की कम से कम इन सीटों पर स्थिति कमजोर होना तय है।

दोनों पार्टियां तकरीबन बराबर-बराबर की सीटों पर लड़ रही हैं। जिसमें जेडीयू के खाते में 122 सीट गयी है जबकि बीजेपी को 121 सीटें मिली हैं। जिसमें हिंदुस्तान अवाम मोर्चा और विकासशील इंसान पार्टी की भी सीटें शामिल हैं। इस तरह से यह बात अब बिल्कुल स्पष्ट हो गयी है कि अगर इन सीटों पर बीजेपी के कार्यकर्ता एलजेपी के प्रत्याशियों का समर्थन करने जा रहे हैं तो उससे जेडीयू का कमजोर होना बिल्कुल तय है। और इसका नतीजा बीजेपी के गठबंधन में सबसे बड़े घटक दल बनने के तौर पर सामने आ सकता है। जो अंतत: नीतीश को कमजोर करेगा। और बीजेपी इस बार यही चाहती है।

(ब्यूरो की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on October 7, 2020 12:36 pm

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