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खाई बनने को तैयार है मोदी की दरकती जमीन

कल एक और चीज पहली बार के तौर पर देश के प्रधानमंत्री पीएम मोदी के साथ जुड़ गयी। वह यह कि मोदी देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हो गए जिसके जन्मदिन पर इतने बड़े पैमाने पर लोगों का रोष दिखा। वह सड़क हो या कि सोशल मीडिया। हर जगह साफ-साफ देखा और महसूस किया गया। जमीन पर सड़क जाम, गिरफ्तारियों तथा मशाल जुलूसों और आभासी दुनिया में हैशटैग और ट्रेंडिंग के तौर पर सामने आया। कहते हैं झूठ की उम्र बहुत छोटी होती है।

और कृत्रिम तरीके से तैयार की गयीं चीजें तो वैसे भी बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं टिकतीं। कॉरपोरेट की ताकत, मीडिया पर मालिकाना और आई टी सेल की पूरी फौज देश के नौजवानों की अंगड़ाई के आगे धरी की धरी रह गयी। मोदी जी को यह नहीं भूलना चाहिए कि यही नौजवान थे जिन्होंने दिन-रात मोदी-मोदी करके उन्हें अपने कंधों पर बैठाकर लोक कल्याण मार्ग के उस घर में पहुंचाया था जो देश के किसी भी खद्दरधारी शख्स का आखिरी सपना होता है। लेकिन वह सपना इतना अधूरा होगा और उसको मटियामेट करने में वही युवा शामिल होगा जो उसका साधन बना था यह किसी ने नहीं सोचा था।

कल सुबह से जो छात्रों के सड़कों पर आने का सिलसिला शुरू हुआ तो वह रात तक जारी रहा। यह पहली बार है जब छात्रों के दिमाग में पुलिस के डंडों और उसके बूटों का कोई खौफ नहीं रहा। इलाहाबाद की सड़कें सुबह से नौजवानों के कदमों से गर्म होने लगी थीं। बालसन चौराहे पर हजारों पुलिसकर्मियों के बीच प्रतियोगी छात्रों का जमावड़ा देश में युद्ध का नया आगाज था। तो राजधानी लखनऊ में इस ताप को मुख्यमंत्री योगी सुबह ही महसूस करने लगे थे। इसकी झलक उस समय दिखी जब उन्होंने बर्लिंगटन चौराहे से लेकर आस-पास के इलाकों में पुलिस की बैरिकेडिंग करवाई। लेकिन यह बैरिकेडिंग भी युवाओं के हौसलों की उड़ान के आगे तिनका साबित हुई।

सड़कों पर निकले छात्र-छात्राओं के जत्थों ने अपने सत्ता विरोधी मंसूबों का देश के हुक्मरानों के सामने अलग-अलग तरीके से इजहार कर दिया। गिरफ्तारियां हुईं , लाठियां भी चलीं और तरह-तरह से उत्पीड़न भी हुआ। लेकिन यहां एक ऐसी घटना घटी जिसकी न तो किसी खाकी वर्दीधारी से उम्मीद की जाती है और न ही किसी सभ्य समाज के लिए यह उचित है। यह जितनी ही शर्मनाक है उतनी ही क्रूर दिखती है।

पुलिस ने सारी शर्म, हया और यहां तक कि नागरिक होने की न्यूनतम शर्त भी बेच खायी। सोशल मीडिया पर तस्वीर के जरिये सामने आयी इस घटना में देखा जा सकता है कि एक लड़की को एक पुरुष पुलिसकर्मी बेहद गलत अंदाज में पकड़े हुए है और बाकी पुलिसकर्मी उसको ऐसी घिनौनी हरकत करने से रोकने की जगह बिल्कुल बेफिक्र बने हुए हैं। अमूमन इस तरह के किसी भी आंदोलन में महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती प्रशासनिक व्यवस्था का जरूरी हिस्सा होती है और किन्हीं अपरिहार्य स्थितियों में न होने पर भी पुरुष पुलिसकर्मियों से महिलाओं के साथ शालीन और सम्मानजनक व्यवहार की अपेक्षा की जाती है।

लेकिन यहां शायद पुलिसकर्मियों को महिलाओं को सबक सिखाने के लिए ही भेजा गया था। और शीर्ष सत्ता प्रतिष्ठान की इसमें खुली सहमति थी। वरना बीच राजधानी में पूरे मीडिया के कैमरों के सामने भला कोई पुलिसकर्मी कैसे इतनी हिम्मत कर सकता था। यह बताता है कि पुलिसकर्मियों को कुछ निश्चित निर्देश दिए गए थे जिनका वे पालन कर रहे थे। और यह घटना उसी का नतीजा थी। लेकिन सत्ता में बैठे इन भगवाधारियों को यह नहीं भूलना चाहिए कि जिसकी इज्जत और आबरू से वे खेल रहे हैं उनको यह ताकत भी उसी जनता ने दी है। और कल की घटना ने यह बता दिया है कि अगर सत्ताधीशों का यही रवैया रहा तो उनकी असली जगह भी वह कुछ दिनों के भीतर ही दिखा देगी।

फिर शाम हुई और शुरू हो गया मशालों के जलाने का दौर। सत्तरह बज कर, सत्तरह मिनट पर पूरे देश और खासकर यूपी-बिहार का आसमान जलती मशालों से लाल हो गया। क्या इलाहाबाद और क्या भोजपुर, क्या पटना और क्या चंडीगढ़ सारी जगहों पर छात्रों ने अपने-अपने तरीके से मोदी सरकार के खिलाफ अपने गुस्सों का इजहार किया। इसका नतीजा यह रहा कि मोदी के जन्मदिन का हैसटैग आईटी सेल की लाख कोशिशों के बावजूद पिछड़ता गया और शाम के वक्त जब आम तौर पर किसी के बर्थडे पार्टी का समय होता है तो वह ट्रेंडिंग की सूची वाले हैशटैग में 25 वें नंबर पर था।

और उसकी संख्या हजार का आंकड़ा पार नहीं कर सकी। जबकि बेरोजगार दिवस से जुड़े हैशटैग मिलियन यानी 10 लाख के आंकड़े को बहुत पहले पार कर गए थे। हालांकि पीएम मोदी ने व्यक्तिगत तौर पर हरचंद कोशिश की कि कैसे इसकी संख्या को बढ़ाया जाए। इस कड़ी में उन्होंने बधाई देने वालों में हर ऐरे-गैरे नत्थू खैरे को भी धन्यवाद देना शुरू कर दिया कि शायद उससे कुछ फर्क पड़े। लेकिन उनकी हर कोशिश बेकार गयी।

आईटी सेल को जब कोई तरकीब नहीं सूझी तब उसने शाम को एक रास्ता निकाला। यूरोप के कुछ देशों के युवाओं के पीएम मोदी के पक्ष में दिए गए बयानों की क्लिप बनायी और उसे सोशल मीडिया पर डाल दिया। सुबह से सन्निपात की स्थिति में पड़े भक्तों के लिए यह किसी संजीवनी से कम नहीं थी। फिर क्या था भक्त लोग उसको लेकर उड़ पड़े। पता चला भक्तों के एक ह्वाट्सएप ग्रुप में हर कोई वही क्लिप फारवर्ड किए जा रहा है। इससे आईटी सेल औपनिवेशिक मानसिकता के शिकार अपने भक्तों के दिमाग को संतुष्ट करने की पूरी कोशिश की।

इसके साथ ही आम लोगों में भी अपने भगवान के इस गुणगान को दिखाने के जरिये देश में हो रही उनकी तौहीन के घाटे को पूरा करने का प्रयास किया। बहरहाल उसका देश के मानस पर कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ने जा रहा। क्योंकि देश की जनता आईटी सेल के इन हथकंडों से परिचित हो गयी है साथ ही औपनिवेशिक गुलामी की पुरानी मानसिकता भी अब जाती रही। ऐसे में किसी ऊपरी कृत्रिम कोशिश के जरिये युवाओं के सामने आए रोजी-रोटी के सवालों को दरकिनार करना अब मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है।

कल नौजवानों का जमीन पर दिखा यह रंग मोदी के नूरानी चेहरे को फीका करने के लिए काफी है। उन्हें इस बात का पहली बार आभास हुआ होगा कि जमीन दरक रही है और समय का सिलसिला इसी तरह से आगे बढ़ा तो वह उनकी सत्ता के लिए बड़ी खाईं बन सकती है। यह बात किसी को नहीं भूलनी चाहिए कि 71 में दुर्गा बनकर जो इंदिरा गांधी आयी थीं तो 74 आते-आते उन्हें इमरजेंसी लगानी पड़ गयी थी। इसलिए लोकप्रियता की कितनी भी बड़ी लहर पर सवार होकर कोई आए अगर वह आकांक्षाओं को पूरा करने में नाकाम रहता है तो जनता उसकी दुगुनी ताकत से पलटने की हैसियत रखती है। यह बात आजादी की लड़ाई से लेकर 70 सालों के लोकतंत्र में बार-बार साबित हुई है।

पीएम मोदी को ज़रूर इस बात का एहसास होगा कि नौजवानों के आंदोलन के इस गंगा की धारा का अगर किसानों की लड़ाई की जमुना से मिलन हो गया तो उससे जो संगम बनेगा वह मोदी सरकार के लिए किसी बरमूडा से कम साबित नहीं होगा। और शायद घटक दलों ने इसकी आहट भी महसूस करनी शुरू कर दी है। दशकों से बीजेपी का साथ देता रहा और उसके हर अच्छे-बुरे मौके पर खड़े होने वाले अकाली दल की हरसिमरत कौर को अगर मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ रहा है तो संकट कितना गहरा है किसी के लिए उसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं होना चाहिए।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।) 

This post was last modified on September 18, 2020 9:56 am

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