Tuesday, October 19, 2021

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बेंगलुरू हिंसा: सभ्य समाज में नहीं है धार्मिक कट्टरता का कोई स्थान

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धर्मान्धता न केवल उस व्यक्ति और समाज की उनके धर्म के प्रति समझ को बताती है बल्कि वह व्यक्ति की उसके धर्मशास्त्रों की अज्ञानता और उसकी धार्मिक आस्था के भुरभुरेपन को भी उजागर कर देती है। जब धर्म का राजनीति के साथ घालमेल होने लगता है तो बेहद खतरनाक आसव बन जाता है, जो मन, मस्तिष्क, समाज सबको प्रदूषित करता चला जाता है। 

बेंगलुरू में जो हुआ है वह धर्म का सबसे विकृत चेहरा है। ऐसा पहले भी दुनिया भर में कई जगह हो चुका है, जब पैगम्बर के चित्र, कार्टून या किसी आपत्तिजनक टिप्पणी पर लोग उबल पड़े हैं और हिंसक दंगे फैल गए हैं। फ्रांस में कुछ साल पहले चार्ली हेब्दो अखबार के एक कार्टून के संबंध में ऐसा हो चुका है। इन दंगों के बाद भले ही इस्लामी धर्मगुरु यह कहते नज़र आयें कि पैगम्बर के संदेश का यह उद्देश्य नहीं था, बल्कि वे शांति और भाईचारे की बात कहते थे। लेकिन तब तक जो अशांति फैलनी थी वह फैल चुकी होती है, और जो भाईचारे पर खरोच आनी थी, वह आ चुकी होती है। 

बेंगलुरू कोई गांव जवार का छोटा मोटा शहर नहीं है। एक आधुनिक, खूबसूरत, पढ़ा-लिखा, आईटी उद्योग का हब, सुव्यवस्थित औद्योगिक नगर और भारत के परंपरागत चार महानगरों के बाद सबसे प्रमुख उदीयमान महानगर है। पर वहां जो हुआ, वह बेहद निंदनीय और शर्मनाक दोनों है। सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के रूप में कुछ आपत्तिजनक कहा जाता है और फिर उस पर हिंसात्मक प्रतिक्रिया होने लगती है। आगजनी होती है। हत्याएं होती हैं और पुलिस को गोली चलानी पड़ती है। 

यह सब यह भी बताता है कि किसी भी समाज को कब कैसे और कितनी आसानी से बरगलाया जा सकता है और भरमाया जा सकता है। किसी समाज और भीड़ की यही प्रज्वलनशीलता, राजनीतिक लोगों और असामाजिक तत्वों के लिये एक हथियार बन जाती है और जनता को रोटी, कपड़ा, मकान के मौलिक मुद्दों से भटका देने का एक एलीबाई भी।

ये घटनाएं जनता को उसके जीवन से जुड़े मुद्दों से अलग कर के एक स्मोक स्क्रीन के पीछे कर देती हैं। सरकार और राजनीतिक दल, सोशल मीडिया के एक आपत्तिजनक स्टेटस और उसकी व्यापक हिंसक प्रतिक्रिया की आड़ में अपना निकम्मापन छुपा लेते हैं। इससे बेहतर स्मोक स्क्रीन सियासी बिरादरी के लिये और क्या होगा ? 

कभी यह स्वत: स्फूर्त उबाल महंगाई, गिरते औद्योगिक उत्पादन, बदहाल होती आर्थिक स्थिति, बंद होते कल कारखाने, बढ़ता हुआ बेरोजगारों के हुजूम पर सड़कों पर नहीं उमड़ता है। पर धर्म के उन्माद पर तुरन्त ही लोग पैजामे से बाहर आ जाता है। जबकि धर्म कुछ विशिष्ट वर्गों के लोगों को छोड़ कर न तो आम जनता का पेट भर सकता है और न ही सम्मानजनक जीवन दे सकता है।

राजनीतिक दलों के लिये इससे बेहतर मसाला और क्या हो सकता है कि सब कुछ वे धर्म और धर्मान्धता के ही इर्दगिर्द सोचें और जाल बुनें। अपनी जवाबदेही से बचते रहें और जब ज्यादा पूछताछ शुरू हो तो धर्मांधता का जिन्न बोतल से बाहर निकाल दें । इससे बेहतर निवेश उनके लिये है भी नहीं जो दीर्घ अवधि तक उन्हें नियमित लाभांश देकर उनकी सियासी पूंजी बढ़ाता रहता है। वे यह मर्म जान चुके हैं। 

धर्म और ईश्वर जिनकी अवधारणा ही इसलिए की गयी है कि वह समाज और व्यक्ति को निखारे तमाम नैतिक मूल्यों से प्रक्षालित करे कठिन समय मे अवलंब दे आदि आदि लेकिन यह सब तमाशे देख कर तो  लगता है कि धर्म और ईश्वर तो खुद ही इन हिंसक और अराजक समूह के भरोसे हैं। यह बात धार्मिक लोगों को बुरी लग सकती है और उन्हें भी प्रतिक्रिया के लिये बाध्य कर सकती है पर धर्म और ईश्वर के इन बन्धकपने पर यह भी उन्हीं को सोचना होगा कि उनके धर्म और ईश्वर का इस तरह से तमाशा तो न बने जैसा कि अक्सर बनता रहता है। 

बेंगलुरू के दंगे में सामाजिक समरसता की कुछ अच्छी खबरें भी आयी हैं। ऐसा हर साम्प्रदायिक दंगे में होता है। उनका स्वागत किया जाना चाहिए। सच तो यह है कि न तो हर धर्मिक आस्थावान व्यक्ति हिंसक होता है और जो हिंसा फैला रहा हो कोई ज़रूरी नहीं कि वह भी आस्थावान हो ही। समाज मे हर तरह के लोग हैं। पर समाज के इन विभाजनकारी तत्वों का जो सोशल मीडिया पर या सड़कों पर चाहे वे किसी भी धर्म, पंथ या सम्प्रदाय के हों का खुल कर विरोध करना होगा और उन्हें हतोत्साहित कीजिए। 

यह जो आप धर्मांधता की धूल भरी आंधी कभी कभी फेसबुक पर अचानक बढ़ते हुए देखते हैं वह एक स्मोक स्क्रीन है। उस स्मोक स्क्रीन के पीछे दो महत्वपूर्ण किरदार हैं एक सरकार जो गिरोही पूंजीपतियों के लिये गिरोही पूंजीपतियों के गुप्त दान से फंडेड होती है पर जनता के वोटों से चुनी जाती है और फिर सत्ता में आ कर गिरोही पूंजीपतियों के लिये ही काम करती है।

गिरोहबंद पूंजीवाद मैं क्रोनी कैपिटलिज्म को कहता हूं। स्मोक स्क्रीन का कैंडल जलाने वाले ज़मीनी लोग भी पाते कुछ नहीं है। वे भी खोते हैं, वे भी दुःखी होते हैं, वे भी अभावग्रस्त रहते हैं, पर स्मोक की कैंडल या धूल की आंधी उड़ाते उड़ाते खुद की ही आंखों में इतने धूल और धुंए के अंश समेट लेते हैं कि वे बस उतना ही दूर तक देख तक पाते हैं, जितना स्मोक कैंडल जलाने का आदेश देने वाला कमांडर कहता है। 

सरकार और गिरोही पूंजीपति अपने लक्ष्य और एजेंडे पर अटल हैं। वह है देश को धीरे-धीरे बेच देना। हर उस सरकारी प्रतिष्ठान का निजीकरण कर देना जिसे बनाने में जनता के करों के अरबों रुपये टैक्स के रूप में लगे हैं। अगर सरकार या सत्तारूढ़ दल का एजेंडा और लक्ष्य स्पष्ट न होता तो, आज 80 हजार बीएसएनएल कर्मियों को एक एमपी देशद्रोही नहीं कहता।

जब किसी भी बहाने से धर्मांधता की धूल भरी आंधी चलने लगे तो सतर्क हो जाइए। उस स्मोक स्क्रीन के पीछे कुछ न कुछ ऐसा घट रहा है जो केवल सरकार में बैठे चंद लोगों और गिरोही पूंजीपतियों के एजेंडे के अनुसार ही हो रहा है और उनके हित में है। यह एक ऐसी ठगी है जिसमें ठगने वाला लोकप्रिय भी है और शातिर भी। वह धार्मिक भी नहीं है और आध्यात्मिक तो बिल्कुल भी नहीं। झूठ और फरेब तो ठगी का स्थायी भाव होता ही है। 

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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