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Monday, September 20, 2021

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सालों से जारी है हिंडाल्को और बाल्को में हजारों करोड़ का घोटाला!

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(कारवां ने एक जुलाई को प्रकाशित अपनी एक रिपोर्ट में एक बड़े भ्रष्टाचार का खुलासा किया है। जिसमें उसने आदित्य बिड़ला ग्रुप की हिंडाल्को और वेदांता समूह की बाल्को में होने वाली अनियमितता के बारे में विस्तार से बताया है। उसकी रिपोर्ट के मुताबिक इन दोनों कंपनियों ने अपनी फैक्ट्रियों में होने वाले उत्पादन को बहुत कम कर के दिखाया है और इससे उन्होंने सरकार को होने वाली आय से हजारों करोड़ रुपये की चोरी की है। कारवां में अंग्रेजी में प्रकाशित इस रिपोर्ट को साभार लेकर उसे यहां हिंदी में पेश किया जा रहा है-संपादक)

कोविड के खिलाफ भारत के संघर्ष की शुरुआत के साथ ही आदित्य बिड़ला ग्रुप और वेदांता लिमिटेड उन पहले कारपोरेट दानदाताओं में शामिल थे जिन्होंने पीएम केयर्स फंड में दान किया था। आपातकालीन सहायता के लिए बनाए गए इस फंड को किसी भी तरह की सार्वजनिक जांच से दूर रखा गया है। इसके साथ इसके खर्चे और प्रबंधन पर भी कोई सवाल नहीं पूछा जा सकता है। मार्च, 2020 में फंड के निर्माण के एक हफ्ते के भीतर आदित्य बिड़ला ग्रुप ने 400 करोड़ रुपये और वेदांता ने 200 करोड़ दिए थे। दोनों कॉरपोरेशनों की इस उदारता के लिए मीडिया में जमकर सराहना हुई थी।

लोगों को शायद पता न हो एक आरटीआई एक्टिविस्ट जेएन सिंह ने दिसंबर 2019 में ही सरकारी एजेंसियों को एल्युमिनियम का उत्पादन करने वाले बिड़ला ग्रुप के हिंडाल्को उद्योग और वेदांता की सहायक भारत एल्युमिनियम कंपनी या बाल्को में एल्युमिनियम उत्पादन को बड़े स्तर पर छुपाये जाने का संकेत दिया था। सिंह ने प्रमाणों के साथ इस बात का सुझाव दिया था कि दोनों भीमकाय एल्युमिनियम उत्पादकों ने सैकड़ों-हजारों टन उत्पादन की एक लंबे समय तक रिपोर्ट ही नहीं किया। जिसके चलते सरकार के खजाने को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। सार्वजनिक तौर पर मौजूद सिंह द्वारा तैयार किए गए दस्तावेजों का विश्लेषण और दूसरे सूत्रों के मुताबिक दोनों कंपनियों ने तकरीबन 24 हजार करोड़ रुपये का उत्पादन छुपाया है।

उत्तर प्रदेश के रेनूकूट में स्थित हिंडाल्को इंडस्ट्रीज के एल्युमिनियम कंपनी में रोजाना के उत्पादन की रिपोर्टिंग में लगातार आंकड़ों में हेर-फेर इस बात का इशारा करती है कि 197-98 और 2016-17 के बीच कंपनी के कम उत्पादन की बड़े स्तर पर व्यवस्थित तरीके से रिपोर्टिंग की गयी है। पिछले दो दशकों के बीच तकरीबन 100 प्रोडेक्शन की रिपोर्ट कारवां के पास है जिसमें अंडरकाउंटिग के पूरे संकेत मिलते हैं और यह बड़े हिस्से में फैला हुआ है। स्थानीय सेंट्रल एक्साइज एंड सर्विस टैक्स डिवीजन, इंडियन ब्यूरो ऑफ मानंस और हिंडाल्को द्वारा पेश किए गए रेनूकूट में उत्पादन के आंकड़ों में विसंगतियों की रिपोर्टिंग खुद जिम्मेदार सरकारी एजेंसियों द्वारा देखने और निगरानी में लापरवाही की तरफ इशारा करती है। दो दशकों के बीच रेनूकूट के कुल उत्पादन की रिपोर्ट और कंपनी की 1997 में घोषित सार्वजनिक रूप से उत्पादन की क्षमता के बीच अंतर दो मिलियन टन एल्युमिनियम के उत्पदान को छुपाने का सीधा-सीधा इशारा करती है जिसकी कुल कीमत 15231 करोड़ रुपये बनती है। उपलब्ध दस्तावेजों ने हिन्डाल्को के वनाडियम और गैलियम के उत्पादन की रिपोर्टिंग में भी विसंगतियों की तरफ इशारा किया है जिनकी कीमत एल्युमिनियम से भी ज्यादा है।

छत्तीसगढ़ के कोरबा में स्थित बाल्को के प्लांट में स्थानीय सेंट्रल एक्साइज एंड सर्विस टैक्स डिवीजन, छत्तीसगढ़ एन्वायरोंनमेंट कंजर्वेशन बोर्ड और इंडियन ब्यूरो आफ माइन्स की रिपोर्ट में इस बात की विसंगति की तरफ इशारा किया गया है कि 2006-07 और 2012-12 के बीच निर्धारित क्षमता से उत्पादन अच्छी खासी मात्रा में बढ़ा है। और आधिकारिक उत्पादन के पुनरीक्षण में एक बार फिर सरकार की निगरानी में लापरवाही दिखती है। इस तरह की विसंगतियों का विश्लेषण बताता है कि पांच से सात सालों के बीच जो 2009-2026-17 तक फैला हुआ है, में कुल 8674 करोड़ रुपये के उत्पादन की अंडररिपोर्टिंग हुई है।

दोनों ही मामलों में अभी तक जितनी सूचनाएं मिली हैं उससे वास्तविक रूप से कुल छुपाए गए हिस्से को तय कर पाना मुश्किल है और उसके कुल माप के लिए वृहद स्तर पर सरकारी जांच एजेंसियों की जांच जरूरी है। हिंडाल्को और बाल्को को एक्साइज अथारिटीज के पास उत्पादन रिटर्न फाइल करने की जरूरत पड़ती है। और इन दस्तावेजों में मुहैया कराए गए आंकड़ों के आधार पर उत्पादन के स्रोत पर ही एक्साइड ड्यूटी लगा दी जाती है। कच्चे एल्युमिनियम पर एक्साइज रेट पिछले सालों में बदलता रहा है लेकिन औसत रुप से यह 10 फीसदी रहा है। यहां तक कि उत्पादन के स्थानों पर अनुमानित गैरसूचित उत्पादन वाले एल्युनियम की कमतों पर अगर 10 फीसदी की एक्साइज ड्यूटी लगायी जाए तो हिंडाल्को पर यह 1500 करोड़ और बाल्को पर 860 करोड़ रुपये बैठता है। इन अनुमानित आयों में उन सेसेज को नहीं शामिल किया गया है जिन्हें उत्पादन पर लगाया जाता है या फिर इनसे होने वाली आय पर कोई टैक्स लगाया जाता है।

वित्त मंत्रालय में पहले कभी वरिष्ठ सलाहकार रहे और पब्लिक फाइनेंस के एक विशेषज्ञ ने बताया कि सरकारी बकायों से बचने के लिए उत्पादन की कम रिपोर्टिंग भारत की मिनरल इंडस्ट्रीज में एक कभी न खत्म होने वाली और लगातार जारी प्रक्रिया है। सरकार की विभिन्न एजेंसियों द्वारा इन दोनों बड़ी एल्युनियम कंपनियों के उत्पादन रिकार्ड में बरती गयी अतारतम्यता इस बात को बताती है कि निगरानी और जवाबदेही की पूरे उद्योग में ही समस्या है। वो इस बात की संभावना को भी बढ़ा देती हैं जिसमें ढेर सारी एजेंसियां हैं, और बहुत सारी जगहों पर सरकारों में बदलाव होता है जिससे जानबूझ कर गलत रिपोर्टिंग को दरकिनार कर दिया जाता है और फिर बगैर किसी नतीजे के उत्पादन के आंकड़ों में हेर-फेर करने की इजाजत मिल जाती है। आदित्य बिड़ला ग्रुप और वेदांता लिमिटेड दोनों के पिछली और मौजूदा सरकार और दलों की सीमाओं के पार नेताओं के साथ घनिष्ठ रिश्ते रहे हैं।

विंध्य रेंज में बसा रेनूकूट दक्षिण-पूर्वी उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में स्थित है और यह झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की सीमा से सटता है। यह हिंडाल्को उद्योग की ऐतिहासिक रिहाइश है जिसने उद्योगपति जीडी बिड़ला के नेतृत्व में 1960 के दशक में अपना पहला एल्युमुनियम प्लांट यहां स्थापित किया। इसकी उत्पादन क्षमता कुल 20 हजार टन सालाना थी। मौजूदा समय में हिंडाल्को खुद को 18 बिलियन डालर की कंपनी बताती है और जिसकी सालाना उत्पादन क्षमता 1.3 मिलियन टन एल्युमिनियम की है। रेनूकूट का हिंडाल्को कॉम्पलेक्स हजारों एकड़ के इलाके को कवर करता है और उसकी पूरी एक टाउनशिप है जिसमें हजारों कर्मचारी रहते हैं।

रेनूकूट 69 वर्षीय जेएन सिंह का गृह जिला भी है जिन्होंने 1990 के दशक में हिंडाल्को कॉम्पलेक्स में काम किया था। पहले कंपनी ने उनके साथ इंजीनियरिंग से जुड़ी सेवाएं ली उसके बाद वह एक स्वतंत्र ठेकेदार के तौर पर काम किए। सिंह ने मुझे बाताया कि उन्होंने हिंडाल्को को तकरीबन 50 पॉट सेल्स सप्लाई किए जिसका उत्पादन की प्रक्रिया के एक हिस्से के तौर पर एल्युमिनियम पिघलाने के लिए इस्तेमाल होता है। अपने समय में कंपनी में उन्होंने देखा कि कंपनी अपने घोषित क्षमता से ज्यादा एल्युमिनियम पैदा कर रही है। 1997 में सिंह अलग हो गए और फिर कंपनी की गलत हरकतों का पर्दाफाश करने के लिए सूचनाएं इकट्ठा करना शुरू कर दिए।

2002 में सिंह ने पीआईएल के जरिये सुप्रीम कोर्ट का रुख किया जिसमें कंपनी में अनियमितता और उसकी जांच की मांग की गयी थी। विभिन्न बेंचों में घूमने के बाद पीआईएल की तत्कालीन चीफ जस्टिस बीएन किरपाल के नेतृत्व वाली बेंच ने सुनवाई की। जिसके दो अन्य सदस्यों में जस्टिस अरिजीत पसायत और जस्टिस केजी बालाकृष्णन शामिल थे। बेंच ने याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह पक्षपातपूर्ण होने के साथ दुर्भावना से प्रेरित है। साथ ही यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट कोई केस रजिस्टर करने वाली एजेंसी नहीं है। जजों ने यहां तक कहा कि सिंह किसी और की लड़ाई कोर्ट में लड़ रहे हैं। जिसमें उसने जिंदल एल्युमिनियम का हवाला दिया। जिसने उसी तरह की अनियमितता की हिंडाल्को पर आरोप लगाया था। जिसे उसने एक विज्ञापन के जरिये यह बात कही थी।

सिंह का कहना था कि जिंदल के एडवरटाइजिंग अभियान से पीआईएल का कोई रिश्ता नहीं था। यह महज एक संयोग था कि जब मैं सुप्रीम कोर्ट के लिए पीआईएल की तैयारी कर रहा था तभी वह एडवरटीजमेंट सामने आया। उन्होंने मुझे बेहद नाराजगी भरे लहजे में कहा कि “संविधान के सबसे बड़े संरक्षक को केस की मेरिट पर गौर करना चाहिए था।” पीआईएल को खारिज किया जाना हिंडाल्को को अपनी गलत गतिविधियों को बेखौफ जारी रखने का सर्टिफिकेट था।

2000 की शुरुआत में हिंडाल्को इँडस्ट्रीज की सालाना रिपोर्ट में रेनूकूट में कुल होने वाले एल्युमिनियम के उत्पादन का आंकड़ा शामिल होता था। सुप्रीम कोर्ट से पीआईएल खारिज होने के बाद 2003-04 से यह प्रथा भी बंद हो गयी। उसके बाद कंपनी की सालाना रिपोर्ट में केवल एल्युमिनियम के साझा उत्पादन का आंकड़ा दिखाया जाता था। जो ढेर सारे ऑपरेशन की जगहों से इकट्ठे किए जाते थे।

हिंडाल्को का रेनूकूट ऑपरेशन रेनूकूट रेंज के सेंट्रल जीएसटी एंड सेंट्रल एक्साइज डिवीजन मिर्जापुर के तहत आता था। जिसे 2017 तक सेंट्रल एक्साइज एंड सर्विस टैक्स डिवीजन, मिर्जापुर के तौर पर जाना जाता था। कंपनी की खुद की सालाना रिपोर्ट में उत्पादन के आंकड़ों में बेहद अलगाव रहता था। और यह अंतर प्राय: आरटीआई 2026-17 के जवाब से सीईएसटी डिवीजन के जरिये हासिल आंकड़ों में दिखता था। 1999-2000 के लिए सीईएसटी डिवीजन का आंकड़ा 12000 टन के ज्यादा उत्पादन की तरफ इशारा करता है। और उसके ठीक विपरीत 2000-01 का सीईएसटी का आंकड़ा 20000 टन कम उत्पादन का इशारा करता है।

 खनन मंत्रालय के तहत काम करने वाले इंडियन ब्यूरो आफ माइंस को भी अपनी कंपनी के उत्पादन के आउटपुट को रिपोर्ट करना रहता है। इसे आईबीएम द्वारा सालाना तौर पर प्रकाशित की जाने वाली इंडियन मिनरल ईयरबुक में प्रकाशित किया जाता है। आईबीएम के नंबर भी रेनूकूट के मामले में सीईएसटी डिवीजन के आंकड़ों से बहुत भिन्न हैं। यह अंतर उसकी सालाना रिपोर्ट के मुकाबले भी दिखता है। और यह बहुत सालों तक दसियों हजार का अंतर दिखाता है।

जहां तक रेनूकूट के वास्तविक उत्पदान की बात है तो ये लगातार आने वाले आंकड़े जवाब देने की जगह सवाल ज्यादा उठाते हैं। इसके साथ ही रेनूकूट स्थित हिंडाल्को के उत्पादन क्षमता में असमानता लगातार रिपोर्टों में आती रहीं। उदाहरण के लिए इंडियन मिनरल बुक 2013 में रेनूकूट स्थित फैक्ट्री में सालाना उत्पादन 345000 टन बताया गया। फिर भी 2011 में हिंडाल्को ने रेनूकूट यूनिट के आधुनिकीकरण और विस्तार के वास्ते पर्यावरण क्लीयरेंस के लिए डाले गए एक आवेदन में कहा था कि यह इसके सालाना 356000 टन के उत्पादन को 472000 टन तक ले जाएगा। 2018 में जब कंपनी ने उसकी वैधता क्लीरेंस् को विस्तारित करने के लिए आवेदन डाला तो उसमें उसने अपना सालाना उत्पादन 420000 टन बताया। हालांकि अपनी वेबसाइट पर कंपनी लगातार अपने सालाना उत्पादन के आंकड़े को 345000 बता रही है। हिंडाल्को की सालाना रिपोर्ट अलग से रेनूकूट के उत्पादन की क्षमता नहीं बताती है। कंपनी एल्युमिनियम आपरेशन के संयुक्त आंकड़े को मुहैया कराती है।

इस लिए इस विश्वास के पुख्ता कारण हैं कि दिए गए सभी आंकड़े बेकार हैं और बड़े स्तर पर उन्हें घटा कर दिखाया गया है। 1998 में एक विज्ञापन में जो इंडिया टुडे में प्रकाशित हुआ था, हिंडाल्को की सालाना उत्पादन की क्षमता को 450000 टन बताया गया था। उस समय रेनूकूट कांप्लेक्स कंपनी का एल्युमिनियम पैदा करने वाला अकेला संस्थान था।

यह उस तर्क को खारिज कर देता है कि हिंडाल्को कंपनी की पूरी क्षमता का इस्तेमाल करना नहीं चाहेगा। 1997 के बाद के दो दशकों में कंपनी के एल्युमिनियम की मांग लगातार बढ़ती गयी। जैसा कि इस बात से साफ है कि हिंडाल्को लगातार अपनी ढेर सारी नई-नई यूनिट खोलता गया। इसके साथ ही रेनूकूट और दूसरी जगहों की उत्पदान क्षमता में भी बढ़ोत्तरी किया। अगर 1998 में हिंडाल्को की क्षमता पहले ही 450000 टन थी तो इसका मतलब है कि हिंडाल्को का आगे विस्तार और फिर उन्नयन उसकी वास्तविक उत्पादन क्षमता को और बढ़ा दिए होंगे। जबकि 2018 में इसे केवल 420000 टन बताया गया जैसा कि पर्यावरण संस्तुति के लिए डाले गए उसके आवेदन से पता चलता है।

यहां तक कि अगर इसको खारिज कर 1997 से इसकी 450000 टन की स्थिर क्षमता के उत्पादन को मान लिया जाए तो सीईएसटी डिवीजन द्वारा पेश किए गए दो दशक के कुल 2012563 के आंकड़े में भी उत्पादन की कम रिपोर्टिंग दिखती है। वैश्विक कीमत के पैमाने पर यह 15231 करोड़ रुपये की आय की गिनती न हो पाने की तरफ इशारा करता है। मोटा-मोटी यह तीन बिलियन डालर रकम है।

एल्युमिनियम उत्पादन दो हिस्सों में होने वाला एक ऑपरेशन है। पहला खनन से निकाली गयी बाक्साइट से बेयर प्रॉसेस के जरिये एल्युमिनियम ऑक्साइड या फिर एलुमिना निकाला जाता है। उसके बाद एलुमिना को एक खास घोल में घोल दिया जाता है उसके बाद एल्युमिनियम को इलेक्ट्रोलिसिस के जरिये अलग कर लिया जाता है। यह पूरी पिघलने की प्रक्रिया एक उच्च तापमान पर एक बड़े कंटेनर में संपादित की जाती है जिसे पॉट कहते हैं। जो आपस में लाइन से जुड़े होते हैं। जैसा कि पिघला हुआ एल्युमिनियम पॉट में इकट्ठा होता है। हर पॉट को विशिष्ट तरीके से दिन में कई बार खाली कर लिया जाता है और फिर वही ठोस रूप में धातु बन जाता है।

रेनूकूट इकाई में दो एल्युमिनियम पिघलाने वाले प्लांट हैं- एक तीन लाइनों के साथ और दूसरा आठ लाइनों के साथ और इनके पास कुल 2038 पॉट हैं। पॉट लाइन एक बड़ी बिल्डिंग में स्थित है जिसे पॉट रूम के तौर पर जाना जाता है। और पॉट रूम से होने वाले उत्पादन को रोजाना तीन शिफ्टों ए-बी औऱ सी में रिकार्ड किया जाता है। और यह सब कुछ फोरमैन की निगरानी में होता है।

प्रोडक्शन रिपोर्ट को कार्बन पेंसिल के इस्तेमाल द्वारा भरा जाता है जिसमें उत्पादन के आंकड़ों में हेर-फेर करना बहुत आसान होता है। अगस्त 2018 तक रेनूकूट में काम करने वाले एक फोरमैन कृपाशंकर सिंह ने बताया कि “मेरा काम उत्पादन को प्रमाणित कर उन्हें पेंसिल से लिखना होता था जिसको वो बाद में कम उत्पादन दिखाने के लिए मिटा देंगे।” यह काम प्रोडक्शन डिपार्टमेंट को आखिरी एंट्री बनाने के लिए भेजी गयी पॉट रूम की रिपोर्ट के बाद होता है।

कारवां द्वारा हासिल की गयी डेली पॉट रूम उत्पादन रिपोर्ट के एंट्री में हेर-फेर के बिल्कुल साफ प्रमाण हैं। 1 फरवरी, 1998 की पॉट लाइन 7 रूम एम/एन की एंट्री ही लीजिए। आश्चर्यजनक रूप से इस तारीख के लिए रिपोर्ट के दो वर्जन हैं। (देखिए दस्तावेज 2 और 3)

पहले वर्जन में खाली किए गए पॉटों की संख्या के कॉलम में शिफ्ट ए की एंट्री 1,2,3 और 4 पॉट नंबर की तरफ इशारा करती है। उनको सर्किल से घेर दिया गया है। दूसरे वर्जन में ये पॉट नंबर नहीं दिखते हैं। पॉटों के कुल जोड़ में पहले वर्जन में यह 23 दिखाता है जबकि दूसरे में 19। यह अंतर घेरे गए पॉट से मैच करता है।

शिफ्ट बी में भी बिल्कुल यही तरीका अपनाया जाता है- पहले वर्जन में सर्किल किए गए पॉट नंबर दूसरे में गायब हो जाते हैं। उसके अलावा पहले वर्जन में एंट्री की एक पूरी लाइन ही मिटा दी जाती है। यहां फिर पहले वर्जन में खाली किए गए पॉट की संख्या 34 है जबकि दूसरे में 21।

एंट्री के वन सेट में जिसे शिफ्ट सी के तहत पेश किया गया है, यह एक वर्जन में है जबकि शिफ्ट बी दूसरे वर्जन में सभी डिटेल को पूरी तरह से बदल दिया गया है। खाली किए गए पॉट पहले वर्जन में 10 हैं और दूसरे में 17।

इन सभी बदलावों का नतीजा यह होता है जहां पहला वर्जन एक दिन में कुल 99.600 टन एल्युमिनियम का उत्पादन दिखाता है और दूसरा वर्जन 90.600 टन का। यानी कुल 9 टन का अंतर।

(स्वतंत्र पत्रकार महेश सी दोनिया की रिपोर्ट।)

जारी…..

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