Friday, August 19, 2022

बीमारग्रस्त अमेरिकी समाज का ट्रम्प महज लक्षण

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अमेरिकी संसद भवन में कल हुई घटना ने अमेरिकी लोकतंत्र को हमेशा-हमेशा के लिए कलंकित कर दिया। सबसे पुराने लोकतंत्र होने के जिस एक चीज पर अमेरिका गर्व करता था अब वह इतिहास हो गया। इस तरह से यह एक विशालकाय शक्ति की नैतिक सत्ता का पराभव भी है। इस बात में कोई शक नहीं कि अमेरिका अपने आंतरिक जीवन में इससे भी बुरे दौर से गुजरा है। उसने वह गृहयुद्ध झेला है जिसकी कोई दूसरा देश कल्पना तक नहीं कर सकता है। 1861 से 1865 तक चले इस गृहयुद्ध में 6 लाख 20 हजार सैनिकों ने अपनी जान दी थी। लेकिन यह गृहयुद्ध लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए था।

यह देश के उस बड़े हिस्से को उसका हक दिलाने के लिए था जिसे नागरिक तो क्या एक इंसानी जिंदगी भी मयस्सर नहीं थी। दासों को नागरिकता का हक देकर उसने अपने आपको ही मजबूत किया था। एक तरह से व्यापक तौर पर समावेशी बनकर वह और समृद्ध हुआ था। गोरों के वर्चस्व को तोड़कर दासों को नागरिक अधिकार संपन्न बनाने के जरिये उसने खुद को विस्तारित किया था। इस तरह से अमेरिकी लोकतंत्र का न केवल गौरव बढ़ा था बल्कि उसकी प्रतिष्ठा भी दुनिया में स्थापित हुई थी। लेकिन क्या यही बात कल की घटना के बारे में कही जा सकती है? 

वह अमेरिका जो लोकतंत्र और मानवाधिकार की बहाली के नाम पर दुनिया के तमाम देशों में खुलेआम दखल देता रहा है और लैटिन अमेरिकी देश हों या कि एशियाई मुल्क और खाड़ी के तमाम देश उनमें सीधे हस्तक्षेप की उसकी कारगुजारियां इतिहास के काले अध्यायों में दर्ज हैं। और इस कड़ी में अपने निहित पूंजीगत स्वार्थों में उसने देश के देश बर्बाद कर दिए। वह अमेरिका अगर अपने यहां लोकतंत्र के न्यूनतम ढोंग को भी बरकरार नहीं रख पा रहा है तो फिर समझा जा सकता है कि यह संकट कितना गहरा है।

किसी को लग सकता है कि यह सब कुछ ट्रम्प के चलते हुआ है। और अगर रिपब्लिकन पार्टी के नेता ट्रंप न होते तो जो पिछले चार सालों में हुआ है या फिर कल की घटना में दिखा है वह नहीं हो पाता। इस तरह से देखना पूरे मामले का सरलीकरण करना होगा। समस्या इससे गहरी है। ट्रम्प हवा में नहीं आये हैं। वह अमेरिकी लोकतांत्रिक व्यवस्था और उसकी सामाजिक स्थितियों की जमीन से पैदा हुए हैं। आज ट्रम्प नहीं होते तो यह स्थितियां अपना कोई दूसरा ट्रम्प पैदा कर लेतीं। और अगर यही हालात बने रहे और समाज और व्यवस्था ने अपने भीतर की बीमारियों का इलाज नहीं किया तो कल कोई दूसरा ट्रम्प और उससे भी बुरे रूप में अमेरिका में खड़ा हो जाएगा।

क्या वजह है कि ट्रम्प के चार सालों के शासन और उसके चरित्र को देखने के बावजूद रिपब्लिकन पार्टी ने अपना नेता नहीं बदला? और अगर पार्टी में इस बात पर सहमति थी तो इसका मतलब है कि समाज में भी उसे उसी रूप में स्वीकृति मिली हुई थी। और जैसा कि चुनावों में दिखा ट्रम्प के नेतृत्व में रिपब्लिकन पार्टी ने डेमोक्रेट्स को कांटे की टक्कर दी। यानी कि समाज के स्तर पर भी ट्रम्प की कांस्टिट्यूंसी बहुत मजबूत है। ये सारी चीजें बताती हैं कि अमेरिकी समाज में वह खाद-पानी मौजूद है जिसमें एक नहीं जरूरत पड़ने पर हजार ट्रम्प पैदा हो सकते हैं। इसलिए कल की घटना महज एक लक्षण भर है। यह बीमारी नहीं है। बीमारी का लक्षण है। बीमारी तो समाज में मौजूद है।

दरअसल वह भी एकाएक नहीं पैदा हुई। आज जिस ह्वाइट सुप्रीमेसी की बात की जा रही है। वह दुनिया के पूंजीवादी लोकतंत्र का सच बन गया है। वह अगर ब्रिटेन में जानसन जैसे झक्की को पैदा कर रहा है तो भारत में मोदी आते हैं जो ट्रम्प के जुड़वा भाई माने जाते हैं। अनायास नहीं अमेरिकी संसद पर हमला करने वाले खुद को राष्ट्रवादी और दूसरों को गद्दार करार दे रहे थे।

दरअसल अमेरिका में लोकतंत्र जिस तरह से आगे बढ़ा वह अपने आप में समस्याग्रस्त था। एक तरफ आप लोकतांत्रिक देश रहेंगे और दूसरी तरफ दुनिया के तानाशाह की भूमिका में भी बने रहेंगे दोनों चीजें एक साथ नहीं चल सकती हैं। अगर आप तानाशाह हैं तो फिर लोकतंत्र नहीं हैं। आप अपने एक नागरिक के लिए दूसरे देश पर हमला तक कर सकते हैं। यह किसी एक लोकतांत्रिक देश का स्वभाव, सिद्धांत और चरित्र नहीं हो सकता है। लोकतंत्र तो समावेशी होता है। वह लोगों को शामिल करने का काम करता है। उनको बराबरी का दर्जा देता है। उनके मान-सम्मान और प्रतिष्ठा के सुरक्षा की गारंटी करता है। न कि उन्हें काटता है या फिर उन पर हमला करता है।

बल्कि शांतिपूर्ण और अहिंसक तरीके से समस्याओं का निदान करता है। और सबको एक साथ लेकर चलने का काम करता है। लेकिन क्या अमेरिका के बारे में यह बात कही जा सकती है। उसने हमेशा दुनिया में देशों को बांट कर उन्हें आपस में लड़ाने का काम किया। वैसे भी जब आप कोई चीज दूसरे के लिए कर रहे होते हैं तो आपको लगता है कि उससे आप प्रभावित नहीं होंगे। लेकिन यह महज एक खामख्याली है। दरअसल आपका स्वभाव और आपका चरित्र भी उसी के अनुरूप बनता जाता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति जब दुनिया का सबसे ताकतवर व्यक्ति मान लिया जाता है और उसी के अनुरूप न केवल उसको सुविधाएं बल्कि हर तरह के अधिकार दिए जाते हैं तो ठीक उसी समय वह न केवल दूसरे मुल्कों के शासकों को बल्कि अपने नागरिकों को भी गैरबराबरी का एहसास करा रहा होता है। यह किसी स्वस्थ और आदर्श लोकतंत्र में कत्तई नहीं हो सकता है। लिहाजा वहां केवल व्यवस्था के तौर पर ही नहीं बल्कि समाज में भी नस्ल, क्षेत्र और तमाम स्तरों पर गैरबराबरी अपने जीवंत और खुले रूप में अगर मौजूद रही तो उसके पीछे यही सब वजहें थीं। दरअसल ये सारी चीजें तब तक दबी हुई थीं जब तक कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था दिन दूनी रात चौगुनी गति से आगे बढ़ रही थी। और दुनिया में उसके लूट का कारोबार अपने परवान पर था। और उस लूट की व्यवस्था को जारी रखने के लिए उसके जरखरीद बुद्धिजीवी उसके अनुरूप तर्क और सिद्धांत गढ़ा करते थे। एक दौर में औपनिवेशिक व्यवस्था के जरिये यह लूट चली।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया के दोनों विश्वयुद्धों में जब यूरोप के तमाम देश तबाह होकर अपने उपनिवेश खो रहे थे तब अमेरिका उन युद्धों से बाहर था और उसके लाभ ले रहा था। इस पूरी प्रक्रिया में उसके तिनके भर का नुकसान नहीं हुआ। दूसरे विश्वयुद्ध में उस समय शरीक हुआ जब वह अपने आखिरी दौर में था और जापान पर परमाणु बम गिराने के साथ ही (यह कलंक भी अमेरिका के ही सिर पर है।) युद्ध के समाप्ति की घोषणा हो गयी थी। और उसके बाद बनी ब्रेटेनवुड संस्थाएं हों या फिर पूरी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अमेरिका उसका एकक्षत्र मालिक बन गया। और फिर दुनिया के स्तर पर उसके शोषण का संस्थागत राज चला। एक दौर में वह कम्युनिस्ट रूस और उसके नेतृत्व में समाजवादी देशों के खिलाफ लड़ाई के साथ इस काम को पूरा किया और जब रूस का पतन हो गया तो उसने हटिंगटन और फुकुयामा के सिद्धांतों का सहारा लिया। और इतिहास के अंत की घोषणा के साथ ही सभ्यताओं के बीच संघर्ष का जो नया सिद्धांत आया अब वही अमेरिका को खाये जा रहा है।

अमेरिका ही क्यों वह पूरी दुनिया को खाये जा रहा है। कहीं यह लड़ाई धर्म के नाम पर दिख रही है तो कहीं जाति और नस्ल उसके एजेंडे में है। और अब अमेरिका भी उससे अछूता नहीं रह गया है। ह्वाइट सुप्रीमेसी की बात इस समय अमेरिका की सच्चाई बन गयी है। और रिपब्लिकन पार्टी के नेतृत्व में अमेरिका का गोरा समाज एक बार फिर पूरे देश और उसकी व्यवस्था पर अपना वर्चस्व चाहता है। और उसके लिए वह हद दर्जे तक नीचे उतरने के लिए तैयार है। न तो उसे लोकतंत्र की किसी मर्यादा का भान है और न ही वह उसकी परंपराओं में विश्वास करता है। दरअसल सत्ता और वर्चस्व की भूख होती ही ऐसी है। यह मूलत: अमेरिकी अर्थव्यवस्था का संकट है। जो इन तमाम रूपों में दिख रहा है। चीन पूरी तरह से अमेरिकी बाजार में घुस गया है। दूसरे देशों में भी अब अमेरिकी सामानों की वह मांग नहीं रही। और हथियारों का बाजार भी गिरता जा रहा है क्योंकि लोगों को युद्ध के खतरों और उसकी सच्चाइयों का भी ज्ञान हो गया है।

एक दौर में आंख मूंदकर अमेरिका का साथ देने वाले यूरोप से लेकर तमाम देशों ने भी अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं। इसलिए अमेरिका के पास न तो वह आर्थिक ताकत रही जिससे वह लोगों को अपने पीछे गोलबंद कर सके और न ही लोकतंत्र का नैतिक बल। ऐसे में अमेरिका एक ढहता हुआ साम्राज्य है। वह जंगल का वह बूढ़ा शेर हो गया है जो शिकार करने में अक्षम है। और विकृत पूंजीवाद से पैदा हुई तमाम बीमारियों का शिकार है। लिहाजा उसे अब पुराने ढर्रे पर नहीं चलाया जा सकता है। और लोकतंत्र के ढोंग से निकल कर उसे अपने समाज और व्यवस्था की बीमारियों की पहचान कर उसका इलाज करना चाहिए। और इस रास्ते उसे एक असली लोकतंत्र को स्थापित करने के बारे में सोचना चाहिए।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।) 

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