Saturday, November 27, 2021

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कश्मीर पर पीएम की पहल अंतरराष्ट्रीय दबाव है या फिर षड्यंत्र के किसी बड़े हिस्से का नतीजा

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अघोषित एजेंडे के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आज कश्मीर के नेताओं से बैठक होने जा रही है। राजनीतिक गलियारों में कहा जा रहा है कि इसमें जम्मू-कश्मीर को लेकर कुछ बड़े निर्णय हो सकते हैं। 5 अगस्त, 2019 को केंद्र ने जम्मू-कश्मीर के स्पेशल स्टेट्स (धारा 370) को खत्म कर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया था। उसके बाद से राजनीतिक हालात अस्थिर हैं। ज्यादातर बड़े नेता नजरबंद रहे। श्रीनगर में मोदी की इस बैठक को उनके हृदय परिवर्तन से कहीं ज्यादा माना जा रहा है, जिसकी स्थिति अंतरराष्ट्रीय से क्षेत्रीय मुद्दों और परिस्थितियों के दबाव से तैयार हुई है। अघोषित एजेंडे के कारण बैठक की सफलता पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह अभी से लगने शुरू हो गये हैं।

केंद्र की ओर से जम्मू-कश्मीर में जम्हूरियत कायम करने के लिए सभी दलों से बात करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है और इसके पीछे जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र बहाली का अन्तराष्ट्रीय दबाव, जी7 की बैठक में जारी संयुक्त बयान, जिस पर भारत ने भी हस्ताक्षर किये हैं को कारक माना जा रहा है। इसके अलावा मानवाधिकार पर अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धता और अमेरिका के नये राष्ट्रपति बाइडेन का कठोर रुख भी परदे के पीछे काम कर रहा है।

गत 12 जून को अमेरिकी सरकार में दक्षिण और मध्य एशिया के लिए एक्टिंग असिस्टेंट सेक्रेटरी डीन थॉम्पसन ने संसद की एक सुनवाई के दौरान माना कि अमेरिकी सरकार ने भारत सरकार को कश्मीर में जल्द से जल्द सामान्य हालात बहाल करने के लिए कहा है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका ने भारत को कुछ चुनावी कदम भी उठाने को प्रोत्साहित किया है।

गौरतलब है कि जी 7 की बैठक में जारी संयुक्त बयान में कहा गया है कि हम एक महत्वपूर्ण मोड़ पर हैं जहां हमारी स्वतंत्रता और लोकतंत्र को सत्तावाद, चुनावी हस्तक्षेप, भ्रष्टाचार , आर्थिक नियंत्रण , सूचना के हेरफेर,  दुष्प्रचार , ऑनलाइन नुकसान, राजनीति से प्रेरित इंटरनेट शटडाउन, मानवाधिकार का उल्लंघन और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है। सभी के लिए मानवाधिकार, ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों, जैसा कि मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा और अन्य मानवाधिकार संस्थाओं द्वारा सुनिश्चित किया गया है। साथ ही किसी भी प्रकार के भेदभाव का विरोध ताकि हर कोई समाज में पूरी तरह और समान रूप से भाग ले सके। संयुक्त बयान में यह भी शामिल है कि प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव में हिस्सा लेने, शांतिपूर्ण इकट्ठा होने, संगठन बनाने और जवाबदेही तथा पारदर्शी शासन व्यवस्था का अधिकार है। सिविल स्पेस और मीडिया स्वतंत्रता की रक्षा करके अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बढ़ावा देना, सभा और संघ बनाने की स्वतंत्रता देना, धर्म या विश्वास की स्वतंत्रता और नस्लवाद सहित सभी प्रकार के भेदभाव को दूर करके वैश्विक स्तर पर खुले समाजों को मजबूत करना।

फ़िलहाल कश्मीर पर बैठक के एजेंडे को लेकर कुछ ठोस नहीं है। आर्टिकल 370 खत्म करने और जम्मू-कश्मीर रिऑर्गेनाइजेशन एक्ट को लेकर गतिरोध बना हुआ है। सवाल है कि क्या जम्मू-कश्मीर को फिर से राज्य का दर्जा देने पर बात होगी या विधानसभा चुनावों की संभावना टटोली जाएगी? इस समय जम्मू-कश्मीर में परिसीमन प्रक्रिया चल रही है। इसे पूरा करने में सभी राजनीतिक दलों की भागीदारी की कोशिश होगी। क्षेत्रीय पार्टियों के सहयोग के बिना इसमें दिक्कत आ रही है।

बैठक में गुपकार संगठन में शामिल नेता भाग लेंगे। लगभग 22 महीने पहले, धारा 370 रद्द होने से एक दिन पहले 4 अगस्त 2019 को श्रीनगर में भी जम्मू-कश्मीर की सभी राजनीतिक पार्टियों की मीटिंग हुई थी। यह मीटिंग फारूक अब्दुल्ला के गुपकार रोड स्थित बंगले में हुई थी। यहां पर जॉइंट स्टेटमेंट जारी हुआ था। कहा गया था कि वे जम्मू-कश्मीर की आइडेंटिटी, ऑटोनोमी और स्पेशल स्टेटस की सुरक्षा के लिए लड़ते रहेंगे। इसे ही गुपकार डिक्लेरेशन कहा गया। इस डिक्लेरेशन में कांग्रेस, नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) समेत जम्मू-कश्मीर की प्रमुख पार्टियां मौजूद थीं। 15 अक्टूबर 2020 को अब्दुल्ला के घर पर इन नेताओं ने फिर बैठक की और पार्टियों की इस भागीदारी को पीपुल्स अलायंस फॉर गुपकार डिक्लेरेशन नाम दिया गया। यह ग्रुप कश्मीर को विशेष दर्जा देने की मांग कर रहा है।

नवंबर 2018 में विधानसभा भंग हो गई। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधार पर विधानसभा भंग होने के 6 महीने में चुनाव कराने थे। पर यह नहीं हो सका। लोकसभा चुनावों के बाद 5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने आर्टिकल 370 खत्म कर दिया। राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांटा गया। तब से राज्य में राष्ट्रपति शासन है। लेफ्टिनेंट गवर्नर के मार्फत केंद्र का शासन चल रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी की बैठक वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निरस्त करने और राज्य को दो केंद्रशासित क्षेत्र में विभाजित करने के बाद केंद्र की तरफ से उठाया गया पहला राजनीतिक कदम है।माना जा रहा है कि केंद्र ने यह बैठक प्रदेश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को फिर से बहाल करने की दिशा में बुलाई है। मोदी सरकार की इस सर्वदलीय बैठक पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। इसे केंद्रशासित प्रदेश में राजनीतिक गतिरोध को खत्म करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा मुख्यधारा के राजनीतिक दलों तक पहुंच बनाने की पहल के रूप में भी देखा जा रहा है।

केंद्र सरकार के इस फैसले के पीछे अमेरिका का दबाव होने की बात भी की जा रही है।केंद्र द्वारा कश्मीर के नेताओं को बातचीत का निमंत्रण भेजे जाने से पहले वरिष्ठ पत्रकार भारत भूषण ने कारवां पत्रिका में छपे एक लेख में लिखा था कि ऐसा होने जा रहा है और इसके लिए अमेरिकी सरकार का भारत पर दबाव जिम्मेदार है। भारत भूषण कहते हैं कि अफगान शांति वार्ता के सफल होने के लिए और अमेरिका के अफगानिस्तान से निकलने के बाद वहां के अमेरिकी हितों की सुरक्षा के लिए अमेरिका को पाकिस्तान की मदद चाहिए।

दरअसल केंद्र ने कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा हटाने का मुश्किल लक्ष्य तो हासिल कर लिया लेकिन कुल मिला कर पूर्ववर्ती कश्मीर राज्य को लेकर केंद्र की रणनीति विफल हो चुकी है। इलाके को जानने वाले लोग मानते हैं कि जम्मू, कश्मीर और लद्दाख तीनों इलाकों में असंतोष है। कश्मीर के लोग विशेष राज्य का दर्जा छीने जाने से दुखी हैं, जम्मू के लोग अलग राज्य बनने के इंतजार में परेशान हैं और लद्दाख के लोगों की तो अलग केंद्र शासित प्रदेश बनने की मांग भी पूरी नहीं हो सकी।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)    

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