Subscribe for notification

जब दिल्ली में किसान और पुलिस होंगे आमने-सामने

किसान आन्दोलनकारी के नजरिये से, सर्वोच्च न्यायालय की नामित किसान कमेटी और मोदी सरकार के बनाये ‘काले’ कृषि कानून एक दूसरे के मौसेरे भाई सिद्ध हुए हैं। उसने दोनों को समान रूप से तिरस्कृत कर वर्तमान आन्दोलन के कूड़ेदान में फेंक दिया है। हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर का हेलिकॉप्टर, स्थानीय किसानों के उग्र विरोध के चलते, उनके विधानसभा शहर करनाल के कैमला गाँव में 10 जनवरी की सरकारी किसान महापंचायत में नहीं उतर सका था। क्या इस हेलिकॉप्टर वापसी में कानून वापसी को लेकर किसानों की किसी भी सीमा तक जाने की वर्गीय इच्छा-शक्ति ही नहीं दिख रही?

कैलेंडर किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। 26 जनवरी की तारीख करीब आती जा रही है और आशंका गहरा रही है कि देश की राजधानी में किसान और पुलिस आमने-सामने दिखेंगे। यह भी तय है कि हजारों ट्रैक्टरों पर सवार दिल्ली में घुसते दृढ़-निश्चयी आन्दोलनकारियों के समूह में स्त्रियाँ, बुजुर्ग और बच्चे भी बड़ी संख्या में शामिल होंगे। ऐसे में कानून-व्यवस्था का ऊंट किस असहज करवट बैठेगा, कोई नहीं कह सकता। किसान आन्दोलन के राष्ट्रीय उफान को बांधने में जहाँ सर्वोच्च स्तर की राजनीतिक और अदालती पैंतरेबाजियां विफल होती लग रही हों, पुलिसिया दखलंदाजी की अंतिम रणनीति से उम्मीद रखना मोदी सरकार के लिए ‘आपदा में अवसर’ नहीं होने जा रहा।

अभी तक मोदी सरकार किसान आन्दोलन की घेरेबंदी में पुलिस के रक्षात्मक इस्तेमाल से अपनी मंशा जताती आ रही है। जबकि, साथ ही, उसने अनुकूल मीडिया और अपने राजनीतिक-सामाजिक प्रचारतंत्र के द्वारा खुद की कॉर्पोरेटपरस्ती पर पर्दा डालने और किसान नेतृत्व को बदनाम करने की मुहिम में कोई कसर नहीं छोड़ी हुयी है। किसानों ने न केवल सरकारी प्रचार का राजनीतिक रूप से भी तार्किक जवाब दिया है, उन्होंने अनुशासित और शांतिपूर्ण बने रहकर 26 जनवरी के दिल्ली मार्च की तैयारी के लिए एक ठोस नैतिक मंच हासिल कर लिया है। अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य पर भी, कोरोना वैक्सीन और अमेरिकी संसद पर ट्रम्प समर्थकों के धावा बोलने जैसे ज्वलंत मुद्दों के होते हुए भी, भारतीय किसान कानूनों के विरोध में होने जा रहा दिल्ली मार्च कम सुर्खियाँ नहीं बटोरने जा रहा।

मोदी के संकटमोचक गृह मंत्री अमित शाह ने भाजपा सरकारों को कैमला के कटु अनुभव के बाद उस जैसे भड़काऊ किसान सम्मलेन आयोजित करने से परहेज रखने को कहा है। लेकिन फिलहाल गेंद सीधे शाह के अपने पाले में आने जा रही है। दिल्ली में कानून व्यवस्था सीधे शाह के गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी बनती है। गत फरवरी में उत्तर-पूर्व दिल्ली के साम्प्रदायिक दंगों से निपटने में दिल्ली पुलिस की भूमिका, जानकार हलकों में, पक्षपातपूर्ण ही नहीं, प्रभावहीन भी ठहराई गयी थी। अब इस बन्दर-बाँट वाली भूमिका की पुलिस से काम नहीं चलेगा। दो-टूक समीकरण सामने है कि वर्गीय चेतना से उद्वेलित किसान जन-समुद्र को क्या किसी कानून-व्यवस्था के बाँध से रोका जा सकेगा?

यह टकराव क्या स्वरूप लेगा? सरकार का बस चले तो वह इसे एक और शाहीन बाग़ बनाना चाहेगी- सीमित और अलग-थलग। लेकिन, भुलाना नहीं चाहिये कि इस किसान आन्दोलन की तुलना गांधी के सत्याग्रह आधारित राष्ट्रीय आन्दोलन से भी की गयी है। उस ऐतिहासिक दौर से तुलनात्मक बिम्ब भी उधार लिए जा सकते हैं। जाहिर है, मोदी और शाह के सलाहकार दिल्ली को जलियांवाला बाग़ नहीं बनाना चाहेंगे। न आन्दोलनकारी नेतृत्व चौरी-चौरा दोहराये जाना देखने को इच्छुक होगा। ‘गांधी-इरविन पैक्ट’ का समय भी तेजी से निकलता जा रहा है और ‘करो या मरो’ की हुंकार हवा में गूंज रही है। क्या मोदी सरकार यू-टर्न ले सकती है? क्यों नहीं? किसान अब यू-टर्न नहीं ले सकता।

(विकास नारायण राय हैदराबाद पुलिस एकैडमी के निदेशक रह चुके हैं।)

Donate to Janchowk!
Independent journalism that speaks truth to power and is free of corporate and political control is possible only when people contribute towards the same. Please consider donating in support of this endeavour to fight misinformation and disinformation.

Donate Now

To make an instant donation, click on the "Donate Now" button above. For information regarding donation via Bank Transfer/Cheque/DD, click here.

This post was last modified on January 15, 2021 11:27 am

Share