Sunday, October 24, 2021

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जम्मू में दलित उत्पीड़न: जहां कभी थे रोटी-बेटी के रिश्ते, अब हो रही हैं जाति के नाम पर हत्याएं

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8 जुलाई की शाम पूरन चंद, उनका बेटा अशोक कुमार और बहू आशा देवी जम्मू के सरूइंसार, मनवाल के गांव चिल्ला स्थित अपने खेत में खेती का काम कर रहे थे। ठीक शाम के 6 बजे सवर्ण समाज के नसीब सिंह और रवि सिंह (पिता-पुत्र) अपना ट्रैक्टर लेकर पहुँचे। और पूर्ण चंद पर तेजधार हथियारों से हमला कर दिया जिसमें उनके दाएं हाथ का अँगूठा फ्रैक्चर हो गया। साथ ही उनकी बहू आशा देवी के ऊपर ट्रैक्टर चढ़ाने की कोशिश की। वैसे तो वो बच गईं हैं लेकिन पैर पर ट्रैक्टर चढ़ जाने से गंभीर रूप से घायल हो गईं हैं। पूरन चंद के बेटे अशोक कुमार को मारा पीटा। जाति सूचक गालियां दी। बता दूँ कि पूरन चंद दलित समुदाय की महाशा जाति से ताल्लुक़ रखते हैं। 

तीन बार शिकायत दर्ज़ करने के बाद भी नहीं हुई कोई कार्यवाही 

पीड़ित परिवार का कहना है कि तीन बार पुलिस में शिकायत किया लेकिन पुलिस ने सुनवाई नहीं की। बल्कि कहना चाहिए कि उनका शिकायत पत्र तक नहीं रिसीव किया। पुलिस कहती है ये जमीन का मामला है रेवेन्यू विभाग से सूचना मिलने के बाद ही कुछ किया जा सकेगा। अरे भाई रेवेन्यू विभाग से विवादित जमीन के बारे में जब पूछना तब पूछना लेकिन हमला तो हुआ है, मार पीट की गई है, जातिसूचक गालियां दी गई हैं। ट्रैक्टर चढ़ाकर मार देने की कोशिश हुई है उसका केस तो दर्ज़ करो। लेकिन नहीं। हमले की शिकायत लेकर पीड़ित दलित परिवार पुलिस स्टेशन गया तो पुलिस वालों ने कहा कि जाओ पहले मेडिकल करवाकर लाओ। मेडिकल करवाने जब मनवाल के सरकारी अस्पताल गए तो वहां से जीएमसी जम्मू रिफर कर दिया गया। 

महाशों को गाँव में रहने नहीं देंगे

गांव चिल्ला सुरुइंसार, मनवाल का मामला सिर्फ़ जमीन विवाद का मामला नहीं है। ये सवर्ण नस्लवादी मानसिकता के साथ दलित पर किया गया हमला है। इसका अंदाजा उन लोगों की धमकियों से लगाया जा सकता है जिसमें वो पूरन चंद के परिवार को धमकाते हुए कहते हैं, “तुम महाशा हो और तुम्हें हम यहाँ रहने नहीं देंगे। हमने पहले भी यहाँ से तीन चार महाशा परिवारों को भगाया है, हम तुम लोगों को भी यहाँ नहीं रहने देंगे न खेती करने देंगे।”

बता दें कि पीड़ित परिवार दलित वर्ग के महासा उपजाति से संबंध रखते हैं। वहीं स्थानीय लोगों का कहना है कि यह हत्यारा पहले भी बहुत बार ऐसी हरकतें कर चुका है। पूरन चंद को डेढ़-दो साल से तंग किया जा रहा है। 

भूमि सुधार कानून और दलितों का उत्थान

पंजाब यूनिवर्सिटी के रिसर्च स्कॉलर व जम्मू निवासी कुनाल बताते हैं, “पहले दलित समुदाय के लोग जमींदारों के अधीन उनके खेतों में काम करते थे। उस समय जमींदारों के पास बहुत सी जमीनें होती थीं। फिर जम्मू-कश्मीर के मुख्यधारा की राजनीति में शेख अब्दुल्ला का प्रवेश होता है। वो साल 1944 में ‘नया कश्मीर’ का मैनिफेस्टो देते हैं। जिसमें जमीनों पर काम करने वाले मजदूरों को जमीन मालिक बनाने का जिक्र था। 1951 में बिग लैंडेड स्टेट्स एबोलिशन एक्ट ले आते हैं। जिसमें बड़े-बड़े जमीदारों को अधिकतम 22.75 एकड़ जमीन रखने का प्रावधान करते हैं। फिर 1976 में इस एक्ट में सुधार करके जम्मू-कश्मीर एग्ररेरियन रिफॉर्म एक्ट लाया जाता है। इस कानून के तहत प्रावधान किया जाता है कि जमींदार 12.5 एकड़ से अधिक नहीं रख सकते। तो इस तरह से जिन जमींदारों के पास ज़्यादा जमीन थी वो इस एक्ट के बाद सरकार के पास आ गई और सरकार ने उसे जमीनहीन दलित वर्ग में बाँट दी क्योंकि वो उन जमीनों में काम करते थे”। 

चूँकि राजा हरि सिंह थे तो ज़्यादातार जागीरें राजपूत समुदाय के पास थीं। मुस्लिम बाहुल्य कश्मीर में सैय्यद और पीर (एलीट मुस्लिम) के पास ज़्यादा जमीनें थीं जबकि उन जमीनों में काम करने वाले पसमांदा मुस्लिमों के पास जमीनें नहीं थीं। तो इस एक्ट के आने के बाद उन्हें भी जमीनें मिल गईं। इस तरह हम देखते हैं कि जो लोग खेतों में काम करते थे वो उसी जमीन के मालिक हो गए। हालांकि सब कुछ कानूनी प्रावधान के तहत हुआ लेकिन फिर भी ऊँची जातियों में ये कसक थी कि हमारे जमीनों-खेतों में काम करने वाले लोगों ने हमारी जमीनें हमसे छीन ली और उसके मालिक बन गए। 

कुनाल सवर्ण मानसिकता में दबी कसक को उकेरते हुए कहते हैं, “चूँकि जमीनों के मालिक बनने के बाद आर्थिक स्थिति में सुधार आया। उनके बच्चे भी पढ़ने लगे और पढ़कर नौकरी करने लगे। लेकिन वो एक बात सवर्ण दिमागों में बना हुआ है कि ये तो हमारे नौकर थे फिर ये हमारे बराबर कैसे हो गए। आर्थिक स्थिति अच्छी होने पर दलित समुदाय बराबर टक्कर देते थे तो इस वजह से उत्पीड़न उस तरह से नहीं होते थे जैसे कि हम हरियाणा या यूपी, बिहार में देखते हैं। दूसरा कारण ये भी है कि जम्मू-कश्मीर के दलितों में साक्षरता दर भी देश के बाकी राज्यों से अलग है”। 

जम्मू-कश्मीर में दलित उत्पीड़न का इतिहास

पंजाब यूनिवर्सिटी के रिसर्च स्कॉलर जम्मू निवासी कुनाल बताते हैं, “जम्मू-कश्मीर में भी दलित उत्पीड़न का एक इतिहास है। जब साल 1962 में म्युनिसिपल वर्कर्स स्ट्राइक पर चले गए। काम करना छोड़ दिए तो जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने पंजाब के वाल्मीकि समुदाय के लोगों को बुलाकर इस काम पर रख लिया। इस आश्वस्ति के साथ कि आपको स्थायी निवास प्रमाणपत्र (पीआरसी) और जम्मू कश्मीर के सारे अधिकार मिलेंगे। पर उस वायदे को पूरा नहीं किया गया। और उनको स्वीपर के काम तक ही सीमित रखा। उनके बच्चों ने पढ़ना भी छोड़ दिया इस तर्क के साथ कि जब काम ही सफाई का करना है तो पढ़ें क्यों। क्योंकि पढ़ने के बावजूद उनको कहीं और नौकरियाँ नहीं मिलती थीं। क्योंकि उनको सफाई के काम तक ही सीमित रखा गया था”। 

2015 में वाल्मीकि समुदाय की एक लड़की ने स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद बीएसएफ की परीक्षा क्वालीफाई किया। इंटरव्यू भी निकाल लिया। लेकिन डॉक्यूमेंट में उसके पीआरसी (स्थायी निवास प्रमाणपत्र) नहीं था तो सिर्फ उस एक कागज के आधार पर उसे नौकरी पर नहीं रखा गया। फिर वो सुप्रीम कोर्ट गई कि हमें नौकरी का अधिकार क्यों नहीं है। जबकि यहाँ हम हमारे दादा-परदादा की पीढ़ी से रह रहे हैं। 

शुरु में पानी के लिए भी हाल यही था। कुँआ अलग होता था, हर जाति का। दूसरों के कुँओं से दलित पानी नहीं भर सकते थे। 70 के दशक तक स्कूल का भी यही हाल था। दलित के बच्चे स्कूल जाते तो उन्हें छड़ी से इशारा करके दूर अलग पांत में बैठने के लिए कहा जाता।

1930 के दशक में ये हाल था कि दलित समुदाय के लोग जम्मू के प्रसिद्ध रघुनाथ मंदिर में नहीं जा सकते थे। शेख अब्दुल्ला इस पर चुटकी काटते थे हरिसिंह को कि बताओ ये दलित लोग कौन हैं? क्या हैं? ये कैसे हिंदू हैं जिन्हें आप मंदिर नहीं जाने देते हैं। शेख अब्दुल्ला का प्रभाव उन दिनों दलित समुदाय के बीच बढ़ रहा था। तो राजा हरि सिंह को लगा कि कहीं राज्य के दलित मुस्लिम में न कन्वर्ट हो जाएं। मुस्लिम राज्य में पहले से भी बहुमत में थे। लिहाजा हरिसिंह ने इसी दबाव में फिर उस मंदिर के दरवाजे दलितों के लिए भी खुलवा दिए। 

जम्मू-कश्मीर में दलित आंदोलन

जम्मू-कश्मीर में दलित आंदोलन 1920 के दशक की शुरुआत से ही आकार लेना शुरु करता है और 1930 के दशक में मेघ मंडल समाज संगठन का निर्माण किया गया और यही संगठन आगे चलकर हरिजन मंडल के नाम से जाना गया। इसी संगठन के नेतृत्व में सन् 1935 में महाशा नाहर सिंह, भगत शज्जू राम इत्यादि के सम्मिलित प्रयासों से एक लाख से अधिक दलित समुदाय के लोग कीरपींड रत्तियां में इकट्ठा हुए थे। बता दें कि दलित समुदाय के लोग सामूहिक धर्म परिवर्तन के लिए इकट्ठा हुए थे, लेकिन बाद में महाराजा हरि सिंह के आश्वासन के बाद धर्म परिवर्तन नहीं किया। इसके बाद ही राजा हरि सिंह ने दलित उत्थान के लिए कुछ महत्वपूर्ण कार्य किए थे।

देश के आजाद होने और 26 जनवरी 1950 को भारत में संविधान के लागू होते ही, पूरे देश में दलित समुदाय को संवैधानिक अधिकार और आरक्षण जैसे प्रावधानों का लाभ मिलना शुरू हो गया था, लेकिन जम्मू-कश्मीर इसका अपवाद बना रहा और 1970 तक आरक्षण जम्मू- कश्मीर में लागू नहीं हो सका। अपने संवैधानिक अधिकारों और आरक्षण को लेकर दलित समुदाय के लोगों द्वारा सन् 1955 और सन् 1957 में दो बार भूख हड़ताल भी किया गया था। इसके बाद 21 मई 1970 को भगत अमरनाथ आरक्षण की मांग को लेकर कर्ण पार्क जम्मू में आमरण अनशन पर बैठ गए और 1 जून 1970 को आमरण अनशन के दौरान ही उनकी मौत हो गई। इसके बाद ही जम्मू कश्मीर में दलित समुदाय के लिए आरक्षण की व्यवस्था लागू की गई।

स्टेटस ठीक हो तो अंतर्जातीय शादी हो जाती है

कुनाल बताते हैं कि ऊधमपुर में हुई राहुल भगत की हत्या हमारी पीढ़ी के लोगों के लिए शॉकिंग है। हम अभी भी विश्वास नहीं कर पा रहे हैं कि ये अचानक से क्या होने लगा है। इससे पहले हमने जम्मू में ये चीजें नहीं देखी थी। भूमि सुधार कार्यक्रम के बाद आर्थिक हदबंदी टूटी तो दलित भी आगे बढ़े और सवर्णों जैसा ही स्टेटस रखने लगे। हमने ऐसे कई अंतर्जातीय विवाह अटेंड किए हैं। स्टेटस अच्छा हो, लड़का कमा रहा हो तो सवर्ण समुदाय के लोग अपनी लड़की का विवाह दलित लड़के से भी कर देते थे। हरियाणा या यूपी-बिहार की तर्ज पर हमारे यहाँ ऑनर किलिंग जैसी चीजें नहीं हैं। लेकिन 2 जुलाई को ऊधमपुर में दलित युवक राहुल भगत की जमीन विवाद में हत्या और जम्मू में पूरन चंद्र के परिवार पर हमला ये संकेत अच्छे नहीं हैं। 

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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