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कानून की आड़ में बदला लेने की घृणित परंपरा आखिर किसने शुरू की?

सुशांत सिंह राजपूत से जुड़ा मामला पिछले तीन महीने से टीवी न्यूज चैनलों का सबसे पसंदीदा विषय बना हुआ है। इसका कारण बिहार का चुनाव और महाराष्ट्र की सरकार को अस्थिर करना है। सुशांत एक प्रतिभाशाली अभिनेता थे, उनमें सम्भावनायें थीं, और अचानक उनकी मृत्यु की खबर मिलना, किसी को भी स्तब्ध करने के लिये पर्याप्त था। उनका शव उनके ही फ्लैट में छत से लटका हुआ पाया गया।

प्रथम दृष्ट्या यह आत्महत्या थी और इसकी जांच मुम्बई पुलिस ने शुरू की। जांच को लेकर कुछ आपत्तियां सामने आयीं और जब कुछ विवाद बढ़ा तो, पटना में उनकी संदिग्ध मृत्यु के सम्बंध में एक एफआईआर दर्ज करा दी गयी,  और फिर, यह मुकदमा सरकार के आदेश और सुप्रीम कोर्ट के अनुमोदन के बाद, सीबीआई को सौंप दिया गया।

सुशांत के संदिग्ध मृत्यु की जांच पहले आत्महत्या के एंगल से शुरू हुयी और अब ड्रग ट्रेल तथा ड्रग सिंडिकेट तक जा पहुंची है। अब तक मृत्यु के कारण, जांच एजेंसी को स्पष्ट नहीं हो सके हैं, पर एक नया तथ्य ज़रूर सार्वजनिक हो गया है कि,  सुशांत ड्रग एडिक्ट यानी नशीली और मादक दवाओं के आदी थे। सुशांत सिंह राजपूत की दुःखद आत्महत्या से उनके पिता और घर वालों का विचलित होना स्वाभाविक है। उनके द्वारा पटना में दर्ज एफआईआर, जिसकी तफ्तीश सीबीआई कर रही है को, अब तक हत्या का कोई सुबूत नहीं मिला है। हालांकि खबरिया चैनल शुरू से ही इसे हत्या के एंगल से जोड़ कर रिपोर्टिंग कर रहे हैं।

आत्महत्या के कारण की खोज करते-करते सीबीआई को सुशांत के पैसों के बारे में अहम जानकारियां मिलने लगीं। टीवी वाले बताने लगे कि, 15 करोड़ रुपये सुशांत की दोस्त रिया ने हड़प लिया है। और भी तरह तरह की खबरें सामने आयीं। जब कुछ मनी लॉन्ड्रिंग का भी संकेत मिला तो जांच में ईडी, इंफोर्समेंट डायरेक्टरेट की भी दखलंदाजी हो गयी। अब यहां एक नया मुकदमा शुरू हुआ,मनी लॉन्ड्रिंग का। काला धन से सफेद धन करने का। इसमें क्या हो रहा है, यह अभी स्पष्ट नहीं है। ईडी की जांच अक्सर लंबी चलती है और वह इतनी पब्लिसिटी भी नहीं पाती हैं, जितनी की अन्य अपराध की जांचें, चर्चा में रहती हैं।

फिर जांच से पता लगा कि सुशांत ड्रग लेते थे। और वह ड्रग उनकी दोस्त रिया चक्रवर्ती उन्हें मंगा कर देती हैं। ड्रग लेने की बात उनके कुक ने बताई और उनकी बहनों को भी यह बात पता थी। जब ड्रग का एंगल आया तो, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो इस बड़ी जांच में शामिल हो गया। अब तक रिया चक्रवर्ती और उसका भाई तथा कुछ अन्य 59 ग्राम गांजे की बरामदगी में जेल में हैं। रिया के पास से कोई बरामदगी नहीं हुयी है बल्कि ड्रग खरीद कर, सुशांत को ड्रग देने का आरोप है। रिया को 8 सितंबर को जेल भेज दिया गया।

अब इस मामले में तीन जांच एजेंसियां काम कर रही हैं।

● पहली सीबीआई, जो यह पता लगा रही है कि, यह मामला हत्या का है या आत्महत्या का। अगर हत्या का है तो कौन कौन शामिल था, और हत्या का इरादा क्या था, इन सब सवालों के उत्तर ढूंढे जाएंगे।

अगर आत्महत्या का मामला है तो इसका कारण क्या था, और किसी के उकसाने पर यह आत्महत्या की गई थी या कोई नितांत निजी कारण या अवसाद जन्य यह कृत्य था। अगर अवसाद ही कारण था तो फिर उस अवसाद का क्या कारण था।

अवसाद का कारण प्रोफेशनल था, या निजी।

प्रोफेशनल कारण था तो उसका सूत्र कहाँ तक था। यदि निजी कारण था तो पारिवारिक परिस्थितियों और मित्रों, निजी सम्पर्कों, रिश्तेदारों की भी भूमिका की जांच होगी। अब यह देखना है कि, सीबीआई कितनी गहनता से जांच कार्य में घुसती है और किन निष्कर्षों पर पहुंचती है।

● दूसरी एजेंसी है ईडी। ईडी का उद्देश्य धन के लेन-देन, कराववंचन, और मनी लांड्रिंग से जुड़े तारों सुबूतों, और तथ्यों का अन्वेषण करना है। अभी तक जो खबरें मिल रही हैं उनके अनुसार, ऐसा कुछ भी नहीं मिला है।

● तीसरा एंगल है, ड्रग का। कुछ गांजे की बरामदगी भी कुछ लोगों से हुयी है, यह बात अलग है कि बरामदगी की मात्रा कम है। लेकिन एनसीबी को ड्रग सिंडिकेट का पता चला है और एनसीबी निश्चय ही, ड्रग सिंडिकेट का पता लगा रही होगी।

बॉलीवुड या मुम्बई फ़िल्म इंडस्ट्री में अपराधी गिरोहों द्वारा अर्जित काले धन के निवेश का मुद्दा आज का नहीं है। बहुत पहले से, सुकर नारायण बखिया, हाजी मस्तान से लेकर दाऊद इब्राहिम और छोटा राजन जैसे माफिया सरगनाओं के तार फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़ते रहे हैं और यह कोई रहस्य नहीं है। फिल्मी कलाकारों और क्रिकेट के खिलाड़ियों के दुबई कनेक्शन के द्वारा दाऊद इब्राहिम से जुड़ने की अनेक कथाएं, मिलती रहती हैं। चकाचौंध भरी फिल्मी पार्टियों में ड्रग लेना देना एक आम बात है।

और यह सभी को पता है। एनसीबी को भी पता होगा। अब जब जांच हो ही रही है तो काले धन के सबसे बड़े निवेश और ड्रग सिंडिकेट के एक बड़े उपभोक्ता के रूप में चिह्नित फ़िल्म उद्योग की भी गम्भीरता से जांच हो जानी चाहिए। पर क्या अक्सर बाहरी दबाव में जांच की दशा और दिशा तय करने वाली हमारी काबिल जांच एजेंसियां, सत्य की तलाश में इस रहस्यमय खोह में प्रवेश कर पाएंगी ?

इसी बीच मुम्बई से जुड़े 8 वरिष्ठ आईपीएस अफसरों ने इस मामले की जांच में, मीडिया द्वारा ली जा रही अनावश्यक दखलंदाजी पर रोक लगाने के लिये मुंबई हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की। इस याचिका में कहा गया है कि,

“टेलीविजन चैनलों का एक वर्ग अपनी पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग और झूठे प्रचार के माध्यम से केंद्रीय एजेंसियों द्वारा की जा रही जांच को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है। याचिका में यह भी कहा गया है कि इससे आम जनता के मन में जांच के तथ्यों और मुंबई पुलिस, स्वास्थ्य सेवाओं और राज्य की अन्य सहायता सेवाओं के बारे में भी संदेह पैदा हो गए हैं। याचिका में यह भी कहा गया है कि कुछ टीवी चैनलों के एंकर मुंबई पुलिस और उसके आयुक्त, जोन के डीसीपी और अन्य अधिकारियों के खिलाफ एक निंदात्मक अभियान चला रहे हैं और तरह-तरह से उन पर हमला किया जा रहा है।”

याचिका में मांग की गई है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया, न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन और न्यूज ब्रॉड कास्टिंग स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी को निर्देश दिया जाए कि वह आवश्यक दिशा-निर्देश तैयार करें ताकि मीडिया को पुलिस के खिलाफ झूठी, अपमानजनक, भद्दी खबरें प्रकाशित करने से रोका जा सके। उक्त प्रतिवादियों को निर्देश दिया जाए कि वह आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करें ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अपराधों और उसकी जांच की रिपोर्टिंग ”संतुलित, नैतिक, निष्पक्ष और उद्देश्यपूर्ण” तरीके से की जा सके। उक्त प्रतिवादियों को निर्देश दिया जाए कि वह यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करें ताकि मीडिया को ”मीडिया ट्रायल” से रोका जा सके, क्योंकि इससे जांच एजेंसी का कामकाज प्रभावित होता है।

एक अन्य याचिका फिल्म निर्माता नीलेश नवलखा और दो अन्य ने दायर की है, जिन्होंने मामले में सनसनीखेज रिपोर्टिंग न करने के लिए मीडिया संगठनों को निर्देश दिए जाने का अनुरोध किया है।

बॉम्बे हाईकोर्ट में जस्टिस एए सईद और एसपी तावड़े की खंडपीठ इन दोनों जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। पीठ ने कहा कि मामले में आगे की सुनवाई से पहले वह यह देखना चाहेगी कि केंद्र सरकार और मामले की जांच कर रहे केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) का इन याचिकाओं के जवाब में क्या कहना है। याचिकाकर्ताओं में पूर्व डीजीपी पीएस पसरीचा, के. सुब्रमण्यम, डी. शिवनंदन, संजीव दयाल, सतीश चंद्र माथुर और मुंबई पुलिस के पूर्व आयुक्त महेश एन. सिंह, धनंजय एन. जाधव और आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) के पूर्व प्रमुख केपी रघुवंशी शामिल हैं।

सीबीआई ने कहा कि जांच से संबद्ध मीडिया में आई कुछ खबरें अटकलों पर आधारित हैं और वे तथ्यों पर आधारित नहीं हैं। सीबीआई प्रवक्ता या टीम के किसी सदस्य ने मीडिया के साथ जांच का ब्योरा साझा नहीं किया है। जो ब्योरा खबरों में दिया जा रहा है और सीबीआई का बताया जा रहा है वह विश्वसनीय नहीं है। सीबीआई ने मीडिया में चल रही खबरों का खंडन किया है। सीबीआई जांच के लिए जिम्मेदार मीडिया रिपोर्ट काल्पनिक है और तथ्यों पर आधारित नहीं है। मीडिया में सुशांत सिंह राजपूत की मौत को लेकर तमाम तरीके के कयास लगाए जा रहे हैं जिन्हें लेकर सीबीआई ने बयान जारी किया है।

दरअसल, अपनी पीठ थपथपवाने के लिए जाँच एजेंसियां बिना आधिकारिक बयान या प्रेस ब्रीफिंग के जाँच के आधे सही आधे फर्जी विवरणों को सेलेक्टेड लीक करती हैं ताकि जाँच सही दिशा में जा रही है और क्या-क्या अवरोध आड़े आ रहा है पर आम जनमानस में एक माहौल बन सके और इसी में फर्जी खबरें प्लांट होने लगती हैं।

इसी बीच कंगना रनौत और शिवसेना के बीच जुबानी जंग शुरू हो गई और यह मामला राजनीतिक तथा और जटिल हो गया। बीएमसी ने कंगना रनौत के कार्यालय की जांच शुरू कर दी। यह कार्यालय 2018 में बना था और उस समय से ही बीएमसी अवैध निर्माण को लेकर कंगना रनौत को नोटिस जारी कर रही थी। कार्यवाही आज की गई। इस पर भी हंगामा मचा हुआ है।

देश मे शायद ही किसी शहर में कोई मकान दुकान या अन्य निर्माण हो, जो उस शहर के विकास प्राधिकरण, या नगर निगम के नियमों के अनुसार बना हो। पर जब किसी भी सरकार को लगता है कि कोई उचक रहा है तो उसके अफसर, नक़्शे की फाइल और दीगर कागज़ात लेकर बैठ जाते हैं, और फिर उस पर कार्यवाही शुरू हो जाती है। अगर कोई निर्माण अवैध है तो वह उसी समय क्यों याद आता है जब निर्माणकर्ता या भवन स्वामी, सरकार की आलोचना करता है ? यह तो बदला लेना हुआ। सबक सिखाना हुआ। पर बदला लेने और सबक सिखाने की यह परंपरा शुरू किसने की और इस परंपरा पर दुंदुभि किसने बजाई ?

जब कानून का पालन प्रतिशोध के लिए किया जाने लगे तो यह समझ लें कि कानून का दुरूपयोग किया जा रहा है और यह एक तल्ख हक़ीक़त है कि कानून लागू करने वाली एजेंसियां भी अक्सर, कानून का उल्लंघन करती हैं। कंगना रनौत के कार्यालय के कुछ हिस्सों को अवैध बता कर तोड़े जाने वाले कृत्य भले ही, विधि के आवरण में दिखाए जा रहे हों, पर वे किसी प्रतिशोध का परिणाम ही समझे जाएंगे, और ऐसे बदले की कार्यवाहियां, निंदनीय हैं। क्या बीएमसी को उक्त ऑफिस के अतिरिक्त, वहां के अन्य निर्माण दुरुस्त मिले हैं ? अवैध निर्माण गिराने के लिये भी, नियम और कायदे बने हैं। अब मुझे यह जानकारी नहीं कि, उक्त नियमों का अनुपालन किया गया है या नहीं।

आज मुंबई में, कंगना रनौत के कार्यालय पर बुलडोजर गरज रहा है पर यही बुलडोजर, अहमदाबाद में संजीव भट्ट ( Sanjiv Bhatt ) जिन्हें सरकार दुश्मन मानती है, के घर पर भी कभी गरज चुका है। आज कल यही बुलडोजर, उत्तर प्रदेश में आज़म खान और उनकी पत्नी के भवनों पर भी गरज रहा है। मुंबई में ही देवेंद्र फडणवीस की सरकार के समय कपिल शर्मा के गोरेगांव स्थित कार्यालय का एक हिस्सा और भाजपा के विरोध में यशवंत सिन्हा के साथ खड़े होने पर शत्रुघ्न सिन्हा के घर का कुछ हिस्सा इसी बीएमसी ने तोड़ा था। तब तो भाजपा आईटीसेल और भाजपा समर्थकों ने इसकी न तो निंदा की और न ही इसे गलत बताया।

यह एक नयी पर गलत परंपरा पड़ रही है कि अगर कोई सरकार के विरोध में है तो उसके हर काम मे मीन मेख निकाला जाएगा, और अगर कोई सरकार के पक्ष में पाला बदल कर खड़ा हो जाता है, या सरकारी पक्ष में है तो, उसके सातों खून माफ समझे जाते हैं। जब शक्ति और अधिकार के गलत इस्तेमाल पर, उनके विरोध करने के बजाय, उसका बचाव किया जाएगा तो एक ऐसी परंपरा अनिवार्यतः बन  जाएगी, कि जो जहां-जहां और जब जब मज़बूत होगा, ऐसे ही तमाशे भरे विध्वंस, कानून की आड़ में लेकर करता रहेगा।

इन सब तमाशों में सबसे अधिक ठगा जाएगा, आम आदमी और सरकारी अफसर जो यह कानून लागू करेंगे और ऐसे तमाशों को अंजाम देंगे। आज मुम्बई हाईकोर्ट ने तीन घंटे में कंगना रनौत की याचिका पर, स्थगन आदेश दे दिया और जस्टिस मिश्र ने दिल्ली के झुग्गी झोपड़ी वालों को तीन माह में ही उजाड़ने का फरमान जारी कर उनके न्यायालय की शरण में जाने के अधिकार को ही छीन लिया। यह सब दिख रहा है और इसे याद रखा जाना चाहिए।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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This post was last modified on September 9, 2020 9:00 pm

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