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गोरखपुर से लेकर नोएडा तक उत्तर प्रदेश के एक-एक गांव में दर्जनों मौतें

मऊ जिले के गोसीनगर पंचायत वार्ड नंबर 6 के निवासी मुशीर अहमद बताते हैं कि पिछले एक महीने में उनके गांव में 15-20 मौतें हुयी हैं। और अधिकांश मरने वालों में कोरोना के लक्षण थे।

मुशीर बताते हैं कि 10 अप्रैल को लखनऊ के इंदिरा नगर के इंसाफ़ नगर ब्लॉक में उनकी सास का देहांत हुआ। जनाजा उठने के बाद अगले ही रोज वहां दो तीन मौतें हुईं। तो मुशीर अहमद वहां से डर कर निजी गाड़ी बुक करके अपने गांव भागे कि कहीं कोई दिक़्कत न हो जाये। मुशीर अपने गांव पहुंचे तो उन्होंने गांव के लोगों को हिदायत दी कि शहर के हालात बदतर हैं। दरअसल मुशीर अहमद लखनऊ के बैकुंठ धाम श्मशान घाट से होकर निकले थे जहां श्मशान के भीतर जलती लाशें थी और श्मशान के बाहर अपनी बारी का इंतज़ार करती लाशें। अतः लखनऊ के ज़मीनी हालात को बयां करते हुये पेशे से शिक्षक मुशीर अहमद ने अपने गांव के लोगों को कहा कि बहुत संभल कर रहिये। पर लोगों ने मुशीर अहमद की बात नहीं मानी, उल्टा उनकी खिल्ली उड़ाई। मुशीर कहते हैं पहले मेरे गांव में कुछ उम्रदराज लोगों की मौतें हुईं तो लोगों ने उसे सामान्य मौत मानकर नज़रअंदाज कर दिया। 20 अप्रैल को लईक उस्मानी जो कि क्राकरी की दुकान करता था। 40 साल उम्र थी।

लईक उस्मानी का इलाज करने वाले डॉक्टर रितेश अग्रवाल ने बताया कि कोविड टेस्ट नहीं हुआ था। लेकिन सी टी स्कैन हुआ था उसमें उसके दोनों फेफड़े बहुत बुरी तरह से संक्रमित मिले थे। डॉ अग्रवाल ने उन्हें अस्पताल ले जाने की सलाह दी थी लेकिन कहीं जगह नहीं मिलने के चलते उसे घर पर रखकर ही उसका इलाज हो रहा था। और घर पर ही उसकी मौत हो गई। 22 अप्रैल को उनकी 67 वर्षीय मां की मौत हो गई। जबकि उसका बड़ा भाई शफीक उस्मानी और भाभी को सांस लेने में तकलीफ़ होने के चलते अस्पताल में भर्ती कराया गया। अगले ही दिन 23 अप्रैल को 42 वर्षीय शफीक़ उस्मानी की आक्सीजन की कमी से अस्पताल में मौत हो गई। समाजसेवी आकिब सिद्दीकी कहते हैं शफीक का मर्डर हुआ है। हॉस्पिटल में ऑक्सीजन की कमी थी। हम ऑक्सीजन ढूँढते रहे लेकिन सरकार के सख्त आदेश के चलते नहीं मिला। ऑक्सीजन नहीं मिलने के चलते शफीक की मौत हुयी।

इसके दूसरे दिन 25 अप्रैल को मुशीर अहमद के घर के पीछे रहने वाले एक गुप्ता जी के बेटे की शाम को बारात जानी थी और सुबह उनकी मां की मौत हो गयी। उनको भी बुखार खांसी की शिक़ायत थी। साथ ही कोरोना के दूसरे लक्षण भी थे। जबकि घर से 100 मीटर की दूरी पर एक प्राइवेट टीचर नेहा के पिता की मौत हो गई। उन्हें बुखार और छींक आ रही थी। दो दिन बाद एक साइकिल का पंचर बनाने वाले 46 वर्षीय अंसार की मौत हो गयी। मुशीर बताते हैं कि अंसार से उनका रोज का दुआ सलाम होता था। उसे बुखार आने के साथ ही सांस लेने में समस्या हुई थी। इसके तीन दिन के अंदर ही चिकवा समुदाय के झीनक उम्र 60 वर्ष की भी मौत हो गयी। जबकि आज से तीन दिन पहले एक महिला की मौत हो गयी। उन्हें भी कोरोना के लक्षण थे। खुद मुशीर अहमद की चचेरी बहन को भी कोरोना के लक्षण दिखे और मौत हो गयी। मुशीर अहमद बताते हैं लगभग 15-20 मौतें उनके गांव में पिछले एक महीने में हुयी हैं और अधिकांश में कोरोना के लक्षण थे।    

रायबरेली जिले के सुल्तानपुर खेड़ा गांव में पिछले एक महीने में 18 लोगों की मौत हुयी है। फिलहाल यूपी सरकार ने इस गांव को कंटेनमेंट जोन घोषित करके पूरे गांव को ही सील कर रखा है। गांव के प्रवेश द्वार पर बल्ली का बैरिकेड लगाकर रास्ता बंद कर दिया गया है। गांव वालों के मुताबिक मरने वाले 18 लोगों में से 17 लोगों में कोरोना के मजबूत लक्षण थे। जैसे कि सभी को खांसी आ रही थी, सबको सर्दी, बुखार सिरदर्द था, इसके अलावा दस्त और सांस फूलने जैसी दिक्कतें भी सभी 17 मरने वालों के साथ थीं। लेकिन इन मरने वाले 18 लोगों में से सिर्फ़ 2 का ही कोविड टेस्ट हुआ था। अतः सरकारी आँकड़े में इस गांव में कोरोना से मरने वालों का आधिकारिक आंकड़ा सिर्फ़ 2 ही है।

कानपुर जिले के जहांगीराबाद गांव के ग्राम प्रधान ए एस यादव बताते हैं कि उनके गांव में 20-25 लोगों की इलाज में देरी और ऑक्सीजन न मिलने से मौत हो गयी है। इन मौतों के बाद सरकार ने मदद देना शुरु किया है। वो लोग गांव में मास्क पहनने, हाथ धोने और सोशल डिस्टेंसिंग को लेकर लोगों को जागरुक कर रहे हैं।

वहीं कानपुर के पास यमुना के किनारे बसी घाटमपुर तहसील में परास गांव में बुखार आने के बाद 15 दिनों में 30 लोगों की मौत हो चुकी है। भीतरगांव, अकबरपुर, दौलतपुर, देवसढ़ जैसे कई ऐसे गांव हैं जहां बड़े पैमाने पर बुखार के मरीज हैं। कानपुर नगर के ही चौबेपुर, बिठूर और बिल्हौर क्षेत्र में भी बड़े पैमाने पर फ़्लू के मरीज घरों में रहकर इलाज कर रहे हैं।

बात पूर्वी उत्तर प्रदेश की करें तो योगी आदित्यनाथ के कर्मक्षेत्र गोरखपुर के बैदा में एक सप्ताह के अंदर गांव के 13 लोगों की मौत होने के बाद अब जिला प्रशासन द्वारा पूरे गांव की सैंपलिंग कराई जा रही है। यही हाल छपौली और भैंसही गांव का है। यहां भी मौत का आंकड़ा 10 पार कर गया है। जबकि खोरमा, कन्हौली, नकइल, पचरुखा आदि गांवों में संक्रमितों की संख्या बढ़ती जा रही है। नकइल गांव में एक ही परिवार के तीन लोगों की मौत के बाद गांव में स्वास्थ्य विभाग की टीम ने डोर-टू-डोर सर्वे शुरू कर दिया है।

लखनऊ के भौली गांव में कोरोना की दूसरी लहर में 36 लोगों की मौत हुई है। लखनऊ शहर से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर बख्शी का तालाब नगर पंचायत में दस हजार की आबादी वाला गांव भौली है। कोरोना की दूसरी लहर ने इस गांव में करीब 36 लोगों को असमय मौत की नींद सुला दिया। भौली वार्ड 11 के सभासद के पति पूर्व प्रधान राम बहादुर सिंह ने बताया है कि 18 अप्रैल से लेकर तीन मई तक बुखार, खांसी, निमोनिया से तीन दर्जन से अधिक लोगों की मौत हो चुकी हैं। ख़बर मीडिया में छपने तक इन मौतों से बेख़बर प्रशासन अब कोरोना की जांच शुरू किया है और खानापूर्ति के लिये घरों में आइसोलेट मरीजों को दवाएं दी जा रही हैं।

दरअसल राजधानी लखनऊ के तमाम गांवों में कोरोना ने कहर ढाया है एक एक गांव में दर्जनों मौतें हुई हैं। पंचायत चुनाव के पहले इन इलाकों के गांवों की हालत इतनी भयावह नहीं थी और इक्का दुक्का मरीज ही मिल रहे थे। मगर जिस तरह चुनाव में लोगों का एक दूसरे से मिलना जुलना हुआ कोरोना संक्रमण तेजी से फैला।

बंथरा ग्राम पंचायत में भी कोरोना संक्रमण तेजी से फैला और कई लोगों की मौत हो गयी। वहीं बेंती गांव में ही कोरोना से पांच लोगों की मौत हुयी। और बड़ी संख्या में लोग बीमार हुए। निवर्तमान प्रधान विकास साहू और उनका परिवार भी बीमार हुआ। विकास बताते हैं कि उनके गांव में तकरीबन पचास प्रतिशत लोग बीमार हुए। स्वास्थ्य विभाग की तरफ से गांव में न तो कोई कोरोना की जांच करने आया और न ही किसी तरह की दवाओं का भी वितरण किया गया। लोगों ने अपना इलाज भी खुद कराया।

गोरखपुर के ही सरदारनगर ब्लाक के गौनर गांव में बीते तीन सप्ताह में 22 लोगों की मौत हुयी है। गौनर गांव बहुत बड़ा है। गांव में 18 टोले हैं और आबादी 13 हजार हैं। अभी हुए पंचायत चुनाव में 6700 मतदाताओं ने मतदान किया है। इस गांव में 15 अप्रैल के बाद से 22 लोगों की मौत की ख़बर आयी थी। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग की ओर से गांव में कैम्प लगाया गया। हालांकि कैम्प में जांच कराने के लिए सिर्फ 78 लोग ही आए। जांच में एक व्यक्ति कोरोना पाजिटिव मिला।

गौनर गांव के राम भरोसा यादव स्थानीय पत्रकार मनोज सिंह से बताते हैं कि अधिकतर लोगों को मौतों के कुछ दिन पहले खांसी, बुखार, सांस फूलने की तकलीफ़ हुई थी। वो बताते हैं कि 45 वर्षीय लाल बहादुर गुप्ता को सांस लेने में दिक्कत होने के बाद परिजन इलाज के लिये गोरखपुर ले जा रहे थे रास्ते में उनकी मौत हो गयी।

जबकि गांव के ही रामरूप, लाल बहादुर यादव और सुखराम यादव नामक तीन सगे भाइयों की मौत भी ऐसे ही हुई। लाल बहादुर की तबीयत कुछ पहले से ज़रूर खराब थी लेकिन मरने से पहले उनमें भी वही लक्षण थे।

राम भरोसा यादव ने पत्रकार मनोज सिंह को बताया कि उन्होंने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सरदारनगर पर गांवों में बड़ी संख्या में मौतों की जानकारी दी और कोरोना जांच कराने व सैनिटाइजेशन की मांग की थी, लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ है। दो दिन पूर्व कुछ स्वास्थ्य कर्मी आए और चौराहे पर सैनिटाइजेशन कर चले गए।

वहीं प्रयागराज जिले से करीब तीस किलोमीटर दूर होलागढ़ गांव में एक सप्ताह में कोरोना संक्रमित होने से 6 लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं गांव वालों के अनुसार बड़ी संख्या में लोग कोरोना से संक्रमित हो रहे हैं लेकिन यूपी प्रशासन अभी वहां तक नहीं पहुंचा है।

मेरठ जिले के गोगोल गोठरा (Gogol Gothra) गांव के निवासी आरोप लगाते हैं कि उनके गांव में कोरोना की कोई टेस्टिंग, सैनिटाइजेशन वगैरह नहीं हुआ जबकि उस गांव में पिछले 1 महीने में 60 लोगों की मौत हुयी है। बावजूद इसके सरकार की ओर से गांव को कोई मदद नहीं मिली। जबकि गांव वाले लगातार मास टेस्टिंग और सैनिटाइजेशन की मांग मीडिया के सामने लगातार उठाते आ रहे हैं।

वहीं बुलंदशहर के कैलावन गांव के ग्राम प्रधान उमेश कुमार बताते हैं कि पिछले एक महीने में उनके गांव में 30 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। लोग डरे हुए हैं। मरने वालों में ज्यादातर बुखार खांसी से ग्रस्त थे। कुछ लोग तो अस्पताल पहुंच जाते हैं लेकिन कई लोग अस्पताल नहीं पहुंच पाए। मरने वालों में ज्यादातर 60 के ऊपर के लोग हैं। प्रधान उमेश बताते हैं कि गांव की आबादी लगभग 4000 के आस पास है। लेकिन अभी तक यहां 61 टेस्ट ही हुए हैं। जिनमें 2 लोगों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। जिन्हें आइसोलेट कर दिया गया है।

वहीं बुलंदशहर के ही एक और गांव बनेल गांव में भी पिछले एक महीने में 20 से ज़्यादा मौते हुयी हैं। लेकिन ये गांव तब चर्चा में आया जब चार दिन पहले आरएसएस के चौथे सरसंघ चालक राजेन्द्र सिंह उर्फ रज्जू भैया के पोते की मृत्यु कोरोना से हो गयी। गौरतलब है कि बनेल गांव रज्जू भैय्या का पैतृक गांव है। इस गांव में ज्यादातर मजदूर आबादी निवास करती है। इस गांव में भी 20 से ज्यादा मौतें होना गांव वाले बताते हैं। कोरोना को देखते हुए जिला प्रशासन ने बनेल गांव में अब तक महज 77 टेस्ट ही करवाये हैं। जिसमें 21 लोग पॉजिटिव पाए गए हैं। जबकि गांव की आबादी 15000 की है।

वहीं आगरा ज़िले के तीन गांवों में पिछले 15 दिनों में 38 से ज़्यादा ग्रामीणों की मौत हुयी है। इनमें बरौली-अहीर विकास खंड के गांव कुंडौल और बमरौली कटारा में 25 मरीजों की मौत हुई है जबकि एत्मादपुर विकास खंड के गांव कुरगवां में बीते 15 दिनों में 13 लोगों की जान चली गई है।

जबकि बुलंदशहर जिले के परवाना गांव में भी पिछले कुछ हफ़्तों में कई लोगों की जान कोरोना लक्षण प्रकट होने के साथ ही गयी है।

ग्रेटर नोएडा के सैनी गांव जो कि ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के अंतर्गत आता है। विजय नागर बताते हैं कि उनके ताऊ सुरेंश चंद्र नागर (पूर्व सांसद प्रतिनिधि) की 19 अप्रैल को कैलाश अस्पताल में कोरोना से मौत हो गयी। उसके बाद 28 अपैल को उनके चाचा की कोरोना से मौत हो गयी। गांव में कई लोगों की कोरोना से मौत हुई है। विजय नागर कहते हैं कि हमने 23 अप्रैल को प्राधिकरण के सोशल मीडिया ग्रुप पर मेसेज किया कि हमारे गांव में कोरोना बीमारी फैल रही है अतः गांव को सैनिटाइज किया जाये लेकिन जवाब मिला कि आप डीएम से संपर्क करें। मुझे दो नंबर भेजे गये लेकिन वो नंबर बंद मिला। प्राधिकरण के स्वास्थ्य विभाग से संपर्क किया वहां से भी कोई जवाब नहीं मिला। सब लोग टाल मटोल करते रहे।

अजब सिंह नागर के पास 100 लोगों की मौत की लिस्ट है। वो बताते हैं कि 19 अप्रैल से 12 मई तक 100 लोगों की मौत हुई है सैनी गांव में जिनकी लिस्ट बनायी गयी है। अभी बहुत से लोग हैं जिनमें कोरोना के सारे लक्षण है वो बीमार हैं लेकिन उनकी न जांच हो रही है न इलाज।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से ग़ाज़ियाबाद जिले के लोनी के पास जावली गांव में लोगों के चेहरे पर कोरोना का खौफ़ स्पष्ट देखा जा सकता है। गांव के लोगों का कहना है कि बीते एक महीने में गांव में 45 लोगों की मौत हो चुकी है। मरने वाले तमाम लोगों में कोरोना के तगड़े लक्षण थे।

जावली गांव के ही एडवोकेट महकार कसाना द्वारा एक महीने में मरने वाले सभी 45 लोगों की एक लिस्ट तैयार की गई है। इस लिस्ट में 45 लोगों के नाम हैं और लिस्ट में महिला और पुरुष दोनों ही शामिल हैं। गांव की आबादी तकरीबन 13,000 बताई गई है।

वहीं उत्तर प्रदेश की एक और जिले बरेली के क्यारा गांव के लोगों का कहना है कि पहले बुखार आता है, फिर सांस लेने में दिक्कत होती है और इसके बाद मरीज की मौत हो जाती है। दरअसल क्यारा गांव में पिछले 10 दिनों में इन्हीं लक्षणों के साथ 26 मौत हो चुकी है। बुखार आता है, सांस लेने में दिक्कत होती है और फिर मरीज दम तोड़ देता है। बावजूद इसके क्यारा गांव में स्वास्थ्य का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है। एक अस्पताल जो बनाया भी गया है वहां पर बेड की भारी कमी है जिस वजह से मरीज भर्ती नहों किये जाते हैं।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on May 14, 2021 3:50 pm

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