Sat. Apr 4th, 2020

यूं जमींदोज हुआ नरेंद्र निकेतन, अपनों ने ही भोंक दिया चंद्रशेखर की आत्मा में खंजर

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नई दिल्ली। 14 फरवरी को दिल्ली के आईटीओ स्थित नरेंद्र निकेतन के जमींदोज होने के कारणों का सच सामने आ गया है। अपनों ने ही चंद्रशेखर की आत्मा में खंजर भोंका है। इसे नरेंद्र निकेतन को जमींदोज कर समाजवादियों की आत्मा पर संघ का झंडा गाड़ने की तैयारी भी कहा जा सकता है। इस घटना की सच्चाईं जानने के लिए इन पंक्तियों के लेखक ने चंद्रशेखर के सहयोगी और उद्योगपति कमल मोरारका को फोन करके पूछा कि ये सब कैसे हुआ। मोरारका दुखी होकर बोले क्या करूं ! कुल मिला कर नरेंद्र निकेतन के गिराये जाने की जो कहानी सामने आती है, वह आपसी विश्वास, व्य़क्तिगत संबंधों और विचारों की हत्या है। जो अपना स्वार्थ सिद्ध न होने के कारण किया गया है।
मुझे सेंटर ऑफ एप्लाइड पॉलिटिक्स पर बुलडोजर चलाने की जो कथा समझ में आती है वो बहुत दर्दनाक है। इस ट्रस्ट को चंद्रशेखर जी ने बनाया था। इसके ट्रस्टी कमल मोरारका, किशोरी लाल और एचएन शर्मा थे। जब तक चंद्रशेखर जी रहे सब कुछ ठीक चल रहा था। चंद्रशेखर जी के मरने के बाद एचएन शर्मा और रवींद्र मनचंदा पर ट्रस्ट चलाने की जिम्मेवारी आती है। स्वाभाविक है ये सब लोग कमल मोरारका के पैसे से ही खेल रहे थे, यानी उनके पैसे से ही आगे की व्यवस्था बढ़नी थी। लेकिन चंद्रशेखर जी के न रहने पर ट्रस्ट के संचालन को लेकर इन लोगों में ठन जाती है। साथ ही चंद्रशेखर के जीवन काल से उनके द्वारा स्थापित समाजवादी जनता पार्टी का केंद्रीय कार्यालय भी था। लेकिन ये जमीन सेंटर फॉर एप्लाइड पॉलिटिक्स द्वारा बनाये गये ट्रस्ट के नाम पर थी। पार्टी के संचालन का काम सादात अनवर और श्यामजी त्रिपाठी की देखरेख में होता था मतलब ये लोग यहां बैठते थे। सजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी कमल मोरारका ही हैं।
इस बीच दोनों समूहों के बीच टकराव की स्थिती पैदा हो गयी। चूंकि ट्रस्ट में एचएन शर्मा का भी नाम था और पार्टी अन्य लोग चला रहे थे इसलिए टकराव कब्जे को लेकर थी। फिर एक बार उल्लेख करना आवश्यक है कि इन सब लोगों को ट्रस्ट चलाने और पार्टी चलाने के लिए संसाधन कमल मोरारका से ही मिलता था। लेकिन कमल मोरारका और एचएन शर्मा के बीच हिंदी भवन के बगल में स्थित चंद्रशेखर भवन को लेकर ठन गई। वो भवन भी कमल मोरारका के पैसे से ही बना है और एक तरह से एचएन शर्मा कमल मोरारका के पैसे पर ही इन सबका संचालन कर रहे थे। लेकिन चंद्रशेखर भवन की आग आचार्य नरेंद्र देव भवन तक गयी। और फिर शुरू हो गया एक दूसरे के खिलाफ शिकायत का सिलसिला।
दो वर्ष पहले एक नई कमेटी गठित की जाती है जिसमें डॉ. शिवशरण सिंह, बीएन सिंह आदि को रखा जाता है। दोनों गुटों में यहीं से टकराव शुरू होता है। एचएन शर्मा चाहते थे कि इस भवन पर कब्जा उनका हो और वो ग्रुप जिसे पार्टी भी चलाना था वो कमल मोरारका का विश्वास लेकर इस भवन पर काबिज था। इस बीच एचएन शर्मा एक शिरायत दर्ज कराते हैं, जिसमें कहा जाता है चूंकि इस भवन से वह काम नहीं हो रहा है जिसके लिए इस जगह को मान्यता दी गई थी। इसलिए इस डीड को कैंसिल किया जाये। स्वाभाविक है पर्दे के पीछे से रहबर एचएन शर्मा के साथ थे। सरकार में उनकी अच्छी पकड़ है।
इसी बीच एनआरसी और सीएए के मुद्दे पर यशवंत सिन्हा, शरद यादव सरीखे लोग यहां बैठक करते हैं और 30 जनवरी को यहीं से यात्रा शुरू हुई थी। प्रेस कांफ्रेंस हुआ था। रहबर को मौका मिल जाता है खेल खेलने का। अचानक 12 तारीख को ये आदेश जारी होता है कि इस ट्रस्ट का आवंटन रद्द किया जाता है। चूंकि एचएन शर्मा ही कागजी कार्रवाई कर रहे थे इसलिए आदेश की कॉपी उन्हें 12 तारीख को प्राप्त होती है। हालांकि शर्मा जी से जब मैंने पूछा तो उन्होंने कहा कि लेटर 13 को प्राप्त हुआ। और 14 तारीख को चंद्रशेखर की आत्मा और उनके भरोसे पर बुल्डोजर चला दिया जाता है। भवन जमींदोज कर दिया जाता है। घटनास्थल पर उपस्थित व्यवस्थापकों को इतना मौका भी नहीं दिया जाता कि वे चंद्रशेखर के जीवन काल से जुड़े दस्तावेजों और धरोहरों को संजो सकें। उनके कारवां, जेल-डायरी, 1000 किताब, पांडुलिपि, पूर्व उप प्रधानमंत्री देवीलाल की चिट्ठी, समाजवादी आंदोलन से जुड़े दस्तावेज, अरूणा आसफ अली का नरेंद्र देव के नाम पत्र आदि बहुमूल्य धरोहरों को संजो सकें। यहां तक अध्यक्ष जी कुर्सी को भी तोड़ दिया गया।
एचएन शर्मा से जब पूछा कि आगे का रास्ता क्या है तो कहते हैं जो हुआ ठीक हुआ, यहां से गलत काम हो रहा था। गलत लोगों के हाथ में था। यदि मुझे मिलेगा तो फिर मैं इसे बनाऊंगा तो मैनें पूछा कि आप हैं कौन ? क्यों दिया जाये आपको? तो बोले कि एप्लायड पॉलिटिक्स पर काम करूंगा। सवाल था, जब काम ही करना था तो चंद्रशेखर की आत्मा में खंजर क्यों भोंका? क्यों लिख कर दिया कि डीड कैंसिल किया जाये जब ये स्थल 99 साल के लिये दिया गया था। रहबर के लोग इसका खुलासा करते हैं। कहते हैं कि चंद्रशेखर का नामोनिशान मिटा दिया गया है और इस जगह पर दीनदयाल या संघ से जुड़े काम के लिए आवंटित किये जाने की तैयारी है। तो इस तरह साफ है समाजवादियों की आत्मा पर आरएसएस का झंडा गाड़ने की तैयारी है।
अब थोड़ी बात नीरज शेखर की भी हो जाए। जैसा कि आप सब जानते हैं नीरज शेखर चंद्रशेखर के पुत्र हैं। वो चंद्रशेखर की सीट बलिया से सांसद भी बने लेकिन कहा गया है पूत कपूत तो क्या धन संचय? नीरज शेखर उस सीट को बचा कर नहीं रख पाये। लेकिन सत्ता की सीढ़ी तो संसद के जरिए ही तय होती है तो चंद्रशेखर की विचारधारा को ताख पर रख कर भाजपा में शामिल हो गए और इस समय राज्य सभा सांसद हैं।
वर्तमान विवाद के हवाले नीरज शेखर की चर्चा इसलिए क्योंकि लोग बार-बार ये पूछ रहे हैं नीरज शेखर की क्या राय है? तो मेरा और चंद्रशेखर प्रेमियों का जवाब ये है कि नीरज शेखर के लिए चंद्रशेखर की विचारधारा और चंद्रशेखर की आत्मा उसी दिन कलुषित हो गयी जब वो भाजपा में शामिल हो गये। एक और महत्वपूर्ण बात ये है कि चंद्रशेखर ने अपने द्वारा निर्मित किसी भी ट्रस्ट में अपने परिवार के किसी भी सदस्य को शमिल नहीं किया।
हालांकि जीवन भर उनके विरोधी और निहित स्वार्थी तत्व ये आरोप लगाते रहे कि उन्होंने जमीन दखल करने के लिए ट्रस्ट बनाया। रामबहादुर राय और हरिवंश जी ने बातचीत में मुझसे कई बार कहा है कि ये सारे आरोप बेबुनियाद थे। जैसा कि इस मामले में भी सामने आता है।
नीरज शेखर का कहना है कि चूंकि इस ट्रस्ट में उनका नाम नहीं था इसलिए वे कुछ नहीं करेंगे यानी मुंह पर जाबा लगा के रखेंगे। वो दिन दूर नहीं जब नीरज शेखर ये भी कहना शुरू कर देंगे कि वो चंद्रशेखर के बेटे भी नहीं हैं क्योंकि उनके नाम से बलिया की सत्ता नहीं मिलती। वाह नीरज शेखर वाह!
चंद्रशेखर ने जितने भी भारत यात्रा केंद्र बनाये हैं उन सबके रख-रखाव की जिम्मेवारी सुधींद्र भदौरिया की है, जो बहन जी मायावती के हो चुके हैं। चंद्रशेखर के विचारों से उनका कोई लेना देना नहीं फलत: इस मामले में भी उनकी सुविधाभोगी चुप्पी है।
(संतोष कुमार सिंह पंचायत खबर के संपादक हैं और यह लेख उनके फेसबुक से साभार लिया गया है।)

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