राष्ट्रीय एकता का सवाल और मणिपुर

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31 अक्टूबर को स्वतंत्रता संघर्ष में कांग्रेस के पहली कतार के नेताओं में से एक सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती मनाई गई। 2014 में संघ नीति मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही सरकार वल्लभभाई पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मना रही है। इस दिन एकता, अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए शपथ दिलाई जाती है तथा सरकार प्रायोजित कार्यक्रम देश के विभिन्न क्षेत्रों में आयोजित होते हैं। दुर्भाग्य से इन आयोजनों में आम जनता कहीं दिखाई नहीं देती। (1947 के पहले संघ के राष्ट्रीय एकता वाली शपथ की पुनरावृत्ति।)

सवाल यह है कि मोदी सरकार के आने के बाद अचानक देश की एकता अखंडता की शपथ लेने की जरूरत क्यों कर आन पड़ी और इसके लिए सरदार पटेल की जयंती को क्यों चुना गया? जबकि देश 15 अगस्त और गणतंत्र दिवस पर एकता, अखंडता, विकास तथा समृद्धि के लिए हर वर्ष संकल्प लेता ही है। इन दिवसों पर प्रधानमंत्री राष्ट्र को आश्वस्त करते हैं कि वह देश की एकता, अखंडता के साथ लोकतंत्र व संविधान की रक्षा के लिए “पवित्र मन और शुद्ध हृदय” से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करेंगे। विगत 75 वर्षों से अभी तक कुछ उतार-चढ़ाव के साथ ऐसा होता रहा है।

1947 में आजादी के बाद भारत तीन भागों में विभाजित किया गया। एक ब्रिटिश भारत आजाद भारत कहलाया। दूसरा भारत के दो पश्चिम और पूर्वी भाग में पाकिस्तान नाम से नया देश बना। तीसरा ब्रिटिश कालीन राजशाहियों को स्वतंत्र कर दिया गया और उन्हें यह अधिकार दिया गया कि वे चाहे तो स्वतंत्र रह सकती हैं या नये बने पाकिस्तान या भारत में मिल सकती हैं।

उस समय आरएसएस और हिंदू महासभा के लोग राजशाही के विलय के खिलाफ थे। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू और उनकी सरकार के गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की कूटनीतिक योग्यता और साहसिक प्रयास से रियासतों का भारत में विलय कराकर विशाल भारत की आधार शिला रखी गई।

1947 में विभाजित भारत मिलने के बाद से देश क्रमशः मजबूत और समृद्ध होता गया है। अगर कभी देश के समक्ष आंतरिक और वाह्य खतरा आया भी तो सम्पूर्ण राष्ट्र ने एकजुट होकर उस खतरे का मुकाबला किया और देश को संकट बाहर निकाल कर और ज्यादा समृद्ध तथा सुदृढ बना दिया। जिन्हें याद है वह जानते हैं कि 1962 में भारत चीन युद्ध के दौरान देश के नर नारी बाल वृद्ध सहित सभी तरह के नागरिक एकजुट होकर एक स्वर में देश को बचाने के लिए सड़कों पर उतर आए थे। उस समय महिलाओं ने अपने गहने पैसे सब कुछ देश के नाम समर्पित कर दिया था।   

गांधी जी की हत्या और बाबरी मस्जिद में रात के अंधेरे में मूर्ति रखने से लेकर (तब सरदार वल्लभभाई पटेल गृहमंत्री थे) 1965, 71 के पाक युद्ध और आंतरिक आपातकाल सहित कई ऐसे दौर आए हैं। जब भारत के लिए गंभीर भीतरी और बाहरी चुनौती खड़ी हुई थी। लेकिन भारत की जनता की दृढ़ एकता आपसी भाईचारा और एक दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर एकजुट रहने की प्रवृत्ति से भारत सभी खतरों से बाहर निकल आया।

यही नहीं 1992 में 6 दिसंबर को संविधान कानून और राष्ट्रीय एकता परिषद में दाखिल किए गए शपथ पत्र और न्यायालय को दिए गए आश्वासन को दर किनार करते हुए भाजपा की कल्याण सिंह सरकार ने बाबरी मस्जिद को ढहा दिया था। सम्पूर्ण देश में भयानक दंगे शुरू हुए और मुंबई जल उठा। तो भी देश ने थोड़े समय बाद सामान्य स्थिति बहाल कर ली।

हम सभी जानते हैं कि मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद गोधरा की घटना की पृष्ठभूमि में हजारों मुसलमानों का कत्लेआम व उनकी संपत्तियों को जलाकर राख कर दिया गया। इस घटना से पूरा देश स्तब्ध था। लेकिन थोडे़ दिनों बाद ही हमारे लोकतंत्र की गाड़ी पटरी पर लौट आई थी। यही स्थिति 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिखों के कत्लेआम के समय भी देखी गई थी।

खाद्यान्न और ‌कृषि संकट, आर्थिक बदहाली और नीतिगत जड़ता में जब भी देश फंसा है। तो भारतीय लोकतंत्र ने अपने आंतरिक शक्ति के बल पर इन संकटों पर काबू पाया और देश नये आत्मविश्वास के साथ दुनिया के मानचित्र पर उभर कर आया।

यह शक्ति स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लाखों-करोड़ों देशभक्त भारतीयों की कुर्बानी के बल पर इस राष्ट्र ने हासिल की है। साझी शहादत और साझी विरासत की परंपरा के चलते 200 वर्षों तक चले स्वतंत्रता संघर्ष में पूर्वजों के बलिदान और खून पसीने से मिलकर एकल राष्ट्र बना था।

2014 में देश में हिंदू राष्ट्रवादी सरकार आयी। मजबूत और सशक्त नेतृत्व के बड़बोले दावे और ताकतवर नेता की गढ़ी गई छवि के बावजूद (गुजरात नरसंहार को उचित ठहराने और इस पर गर्व करने के क्रम में मोदी की सशक्त हिंदू नेता की छवि गढ़ी गई थी।) यह खतरा क्यों भारतीय राजनीति और समाज के विमर्श में केंद्रीय मुद्दा बनता गया है। जिससे हमें आज राष्ट्रीय एकता के लिए शपथ लेने की जरूरत पड़ रही है।

इस पहेली को समझने के लिए संघ की चिंतन प्रक्रिया को समझना होगा। संघ अपने को (हिंदू) राष्ट्रवादी संगठन कहता है और राष्ट्र की एकता, अखंडता (संप्रभुता नहीं) के लिए अपने को समर्पित करने की बात करता है। इसके लिए वह राष्ट्र के दुश्मनों के खिलाफ अपनी समझ के अनुसार (स्वतंत्रता आंदोलन में चिन्हित दुश्मन ब्रिटिश उपनिवेशवाद और साम्राज्यवादी ताकतों से सर्वथा भिन्न हैं) रात-दिन संघर्षरत रहता है।

चूंकि संघ‌ ने राष्ट्रीय एकता की परियोजना में पहले से ही देश में आंतरिक दुश्मनों की एक सूची तैयार कर रखी है। इसलिए संघ द्वारा देश में काल्पनिक शत्रु से लड़ते हुए नफरती राजनीति और नागरिक (हिंदू) का निर्माण किया जाता है। इस करण संघ के अस्तित्व के लिए यह जरूरी है कि वह देश के समक्ष देश की एकता के खतरे के आभासी संकट को प्रधान मुद्दा बनाए रखे और उसके खिलाफ निरंतर संघर्षरत दिखे। इसलिए मोदी सरकार बनने के बाद इस परियोजना को प्राथमिकता से आगे बढ़ाया गया।

चूंकि हिंदुत्व के परियोजना में धर्माधारित राष्ट्र-राज्य निर्माण अंतर्निहित है। इसलिए आंतरिक शत्रु के रूप में गैर-हिंदुओं को चिन्हित किया गया। (उतना खुले रूप में नहीं जितना पाकिस्तान को केंद्रित किया जाता है)। जिसमें इस्लाम के धर्मावलंबी पहले नंबर पर हैं। संघ ने देश के अंदर प्रथमत: मुस्लिमों को केंद्र में रखते हुए भारत में सामाजिक सांस्कृतिक जागरण का अभियान शुरू किया (विभाजन से इसे तार्किक आधार मिला)।

चूंकि मध्यकालीन भारत में लगभग 400 वर्ष तक इस्लामी हुकूमतें रही हैं। इसलिए ढेर सारे वास्तविक और काल्पनिक घटनाओं को नये-नरेटिव के साथ गढ़ कर सामाजिक चेतना में आरोपित करने की कोशिश की गई और इस्लामी काल को भारत के पतन गुलामी और हिंदुओं के उत्पीड़न और दमन के काल के बतौर पेश किया गया।

इतिहास के मृत अंतरविरोधों का समाधान करने के उद्देश्य से इस्लामी प्रतीकों, मूल्यों और मिले-जुले संबंधों को खत्म करने की कोशिश जारी है (शहरों के नाम बदलने से लेकर इस्लामिक प्रतीकों और धार्मिक स्थालों को विवादित बनाकर उनकी नवईयत को बदलने का प्रयास)। राजशाहियों की ऐतिहासिक सीमा बद्धताओं के बावजूद मुगल शासकों की महान उपलब्धियों को भारतीय समाज की स्मृति से विलोपित करने लिए षडयंत्र रचे जा रहे हैं। यही नहीं उस काल की उपलब्धियों को राष्ट्र के लिए कलंक बताकर उन्हें मिटाना भारतीय राष्ट्र की एकता समृद्ध और गौरव ‌के लिए आवश्यक शर्त बताया जा रहा है।

इसके अलावा इस सरकार के एजेंडे में आंतरिक शत्रुओं की एक लंबी फेहरिस्त है। जिसमें लोकतांत्रिक, वैज्ञानिक, तर्कवादी नागरिकों व‌ बौद्धिक, लेखक, कवि, पत्रकार, वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता तथा उच्च शिक्षण संस्थान जो अपने छात्रों में वैज्ञानिक तार्किक, चेतना पैदा करते हैं। इनकी निगाह में ये सभी राष्ट्रीय एकता के मूल शत्रु हैं। जैसे- जेएनयू, हैदराबाद विश्वविद्यालय, आईआईटी मद्रास, एएमयू के साथ लेखक, कवि, साहित्यकार, आदि। इस संदर्भ में भीमा कोरेगांव की घटना और दिल्ली दंगे के बाद सरकार की कार्रवाइयों को याद कीजिए।

अब तो असहमत विचारों वाले पत्रकारों पर हमला तेज कर दिया गया है। न्यूज क्लिक नामक वेबसाइट इसका ताजा उदाहरण है।

हिटलर ने जरूर यहूदियों को केंद्रित करके नाजीवाद की वैचारिकी तैयार की थी। लेकिन उसका मूल उद्देश्य था- समानता, स्वतंत्रता और न्याय के दर्शन- मार्क्सवाद को जड़ मूल से उखाड़ फेंकना। मार्क्सवादी कार्यकर्ताओं, वैज्ञानिकों, तर्कवादी लेखकों का सफाया करना। इसलिए उसने यहूदियों के बाद मार्क्सवादी बुद्धियों पर हमला बोल दिया। हिटलर को नायक मानने वाले आज के संघी राष्ट्रवादी अपना सबसे बड़ा शत्रु मार्क्सवादियों को ही मानते हैं और उनसे सख्त नफरत करते हैं।

मुसलमानों, ईसाइयों के साथ ही भाजपा सरकार द्वारा वामपंथी कार्यकर्ताओं, विचारकों व पत्रकारों पर हमला तेज किया जा रहा है। जेएनयू, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से लेकर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय तक की ताजा घटनाएं इस बात का स्पष्ट संकेत दे रही हैं। साथ ही जगह-जगह पर ईडी-एनआईए के छापे वाम कार्यकर्ताओं के घरों पर डाले जा रहे हैं। तर्क एक ही है ‘राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा’।

चूंकि संघ की हिंदू राष्ट्रवादी (सांप्रदायिक पढ़िए) वैचारिकी के सुदृढ़ और सुसंगत प्रतिरोधी ताकत वाम कतारें ही हैं। जो हिंदुत्व फासीवाद की चिंतन प्रक्रिया की मुकम्मल एंटीथेसिस जनता के समक्ष प्रस्तुत करते हुए जनगोलबंदी के माध्यम से जनतंत्र पर हो रहे हमले का मुकाबला कर रही हैं। इसलिए संघ नीति सरकार मार्क्सवादियों को जड़ मूल से खत्म करने पर आमादा है।

भारत की मूल पहचान ‘विविधता में एकता’ की है। विश्व भारत की इसी सतरंगी खासियत का प्रशंसक रहा है। भारतीय उपमहाद्वीप में भाषा, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र और रूप-रंग की विविधताओं के साथ एक आंतरिक एकता मौजूद है। इसमें आदिवासियों, दलितों, एथेनिक समूहों और भाषाई विविधता को जोड़ दिया जाए तो एकता की मजबूत डोर तैयार हो जाती है। इसलिए हमारे पूर्वजों में भारत की एकता को सुदृढ़ करने के लिए धर्मनिरपेक्ष संघात्मक भारत के संवैधानिक ढांचे पर आम सहमति बनी थी।

संघ के चिंतकों में संघात्मक भारत की जगह पर एकात्मक भारत की परिकल्पना है। मोदी के सत्ता में आने के बाद राज्यों के अधिकारों  की कटौती करते हुए आर्थिक राजनीतिक ताकत केंद्र के हाथ केंद्रित होती गई है। जिसे व्यावहारिक धरातल पर लागू करने के लिए सैन्य राष्ट्रवाद व सर्विलांस राज्य के रास्ते को चुना गया।

हिंदुत्व के विचारकों की नीतिगत दिशा है कि “शक्तिशाली के समक्ष समर्पण कर माफी मांग लो और कमजोर वर्गों पर हमले को सघन करो।”

“दूसरा बाजार को मुक्त करो और पूंजी के केंद्रीकरण के साथ नागरिक को प्रजा में बदल दो”।

“तोहफा देने जैसी भाषा को सार्वजनिक विमर्श में लाकर राजशाही के दौर की संस्कृति और व्यवहार को जन स्वीकृत दिला दो।”

संघ की बुनियादी वैचारिक दिशा पर मोदी सरकार तेज कदम से आगे बढ़ रही है। इसका पहला चरण था कुछ एक पूंजीपतियों के हाथ में संपदा का केंद्रीकरण। चूंकि यह वित्तीय साम्राज्यवाद का युग है, इसलिए मोदी सरकार की नीतियों का लाभ मित्र पूंजीपतियों के एक छोटे से गुट को मिला। वे इतने शक्तिशाली हो गए कि भारत के सारे संसाधनों पर उनका नियंत्रण होने लगा। सरकार ने मित्रों पूंजीपतियों के साम्राज्य विस्तार के लिए नीतियां बनानी शुरू कीं।

लेकिन इन नीतियों के कुप्रभाव भारत के उत्पादक वर्ग पर दिखाई देने लगा। जो मूलत: बेरोजगारी, महंगाई,  छोटे-मझोल उद्योगों की बंदी, दरिद्रीकरण, भुखमरी, कुपोषण, आत्महत्या के बढ़ते ग्राफ से दिखाई दे रहा है। भूमि अधिग्रहण के साथ उद्योगों और आवश्यक सेवाओं जैसे- शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन का निजीकरण- इन नीतियों का तार्किक परिणाम है। मुक्त‌ बाजारवादी नीतिगत बदलावों ने सामाजिक आर्थिक अराजकता का माहौल पैदा किया है।

चार श्रम कोड, तीन कृषि कानून, नई शिक्षा नीति और उद्योग व्यापार को सुलभ बनाने के नाम पर बने कॉर्पोरेट परस्त कानूनों ने जन आक्रोश को तेज किया। जो किसान, मजदूर, छात्र, आदिवासियों के संघर्ष के रूप में बार-बार फूट रहे हैं।

मोदी की सत्ता के केंद्रीयकरण की दुर्दांत इच्छा “डबल इंजन की सरकार” के आह्वान के रूप में प्रकट‌ होती है। शाहंशाहों जैसी भाषा शैली और जीवन प्रणाली ने लोकतंत्रिक माहौल को गंदा कर दिया है। इस वातावरण से भारत में तीन क्षेत्रीय विभाजन दिखाई दे रहे हैं। दक्षिण भारतीय समाज में राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान चले ब्राह्मणवाद विरोधी सुधारवादी व अनिश्वरवादी वैज्ञानिक चेतना वाले आंदोलन से सामाजिक चेतना में बदलाव हुए है। हिंदुत्व की परंपरा और विचार‌ प्रक्रिया को मोदी सरकार द्वारा सम्पूर्ण देश पर थोपने के कारण दक्षिण भारत की अवाम सशंकित है। जिससे उत्तर भारत से उसका राजनीतिक अलगाव दिखने लगा है। (हाल में इंडिया बनाम भारत की बहस जिसे संघ प्रमुख मोहन भागवत ने शुरू किया था)।

इसके अतिरिक्त कश्मीर एक स्थाई नासूर बना हुआ है। धारा 370 को आरएसएस प्रशिक्षित नेता देश की एकता के लिए खतरा बताते रहे थे। धारा 370 को खत्म करने के साढ़े 4 साल बाद भी स्थिति सुधारने की जगह और जटिल होती जा रही है। अब खालिस्तानी आतंकवाद का हौआ खड़ा कर सिख बहुल पंजाब को निशाने पर लिया जा रहा है। हाल के दिनों में कनाडा और अमेरिका में हुई घटनाओं के छींटे भारतीय राज्य पर पड़ने से पश्चिमोत्तर भारत में भी अलगाववाद के खतरे बढ़ सकते हैं।

सात बहनों वाला क्षेत्र कहां जाने वाला पूर्वोत्तर भारत जहां सैकड़ों जनजातियों का वास है। जिनके बीच भाषा, धर्म और जीवन प्रणाली में भिन्नताएं भी हैं। इनमें ईसाई धर्म का अच्छा प्रभाव है। वहां की विविधता ही वहां की खूबसूरती है। यहां भी डबल इंजन की सरकार आने के बाद संघ परिवार ने सचेतन टकराव खड़ा करके स्थिति को जटिल बना दिया है। संघ का कई जनजातियों में जन आधार है। जो मूलत: नफरत और विभाजन के आधार पर खड़ा किया गया है। जिस कारण ईसाई और हिंदू जन जातियों में टकराव बढ़ता गया है।

यह इलाके प्राकृतिक और खनिज संपदा से भरपूर इलाके हैं। इन पर कॉर्पोरेट घरानों की गिद्ध दृष्टि लगी हुई है। मणिपुर इसका स्पष्ट उदाहरण है। जहां की पहाड़ियों में कई तरह के खनिज भंडार भरे पड़े हैं। साथ ही पहाड़ों पर पाम ऑयल, अफीम, गांजा सहित अन्य व्यवसायिक खेती की जा सकती है।

सरकार से 2021 में पहाड़ियों में पाम ऑयल की खेती के लिए अडानी, गोदरेज, पतंजलि आदि कंपनियों के साथ समझौता हुआ है। इसके बाद जंगलों में बसे आदिवासियों को विभिन्न कानूनों की आड़ लेकर उजाड़ने का अभियान शुरू हुआ। जो आज मणिपुर में 6 महीने से कुकी तथा मैतेई जनजाति में खूनी टकराव में दिखाई दे रहा है। इसे ईसाई बनाम हिंदू में बदल कर एन‌ वीरेन सिंह सरकार राष्ट्र की एकता के साथ खिलवाड़ कर रही है। सरकार द्वारा एक पक्षीय स्टैंड लेने से कुकी जनजाति से राज्य सरकार का अलगाव इस कदर बढ़ गया कि कुकी अलग प्रशासनिक क्षेत्र की मांग करने लगे हैं।

भारत के प्रधानमंत्री ने चल रहे नरसंहार और महिलाओं के साथ हुए अमानवीय व्यवहार पर अभी तक न संवेदना व्यक्त किया है और न किसी ठोस कार्रवाई की तरफ बढ़े हैं। चूंकि हिंदुत्व का वर्चस्वाद संघ के राष्ट्रीय एकीकरण की सुचिंतित नीति है। जिसको असम, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा में सोच समझ कर लागू किया जा रहा है।

लंबे समय से विद्रोहियों की समस्या से जूझता हुआ पूर्वोत्तर भारत धीरे-धीरे संपूर्ण भारत के साथ एसिमिलेशन की प्रक्रिया से गुजर रहा था। जिसे संघ की डबल इंजन सरकार के धर्म आधारित राष्ट्र निर्माण की नीतियों के कारण भारी धक्का लगा है और फिर से अलगाववादी टकराव बढ़ने लगे हैं। आरएसएस और भाजपा की देश के एकीकरण की नीतियों के दुष्प्रभाव सबसे क्रूर रूप में कश्मीर के बाद मणिपुर में दिखाई दे रहा है।

हम हिंदी पट्टी में दंगों के दौरान मुसलमानों-ईसाइयों के कत्लेआम तथा प्रशासन और समाज के सांप्रदायीकरण के रूप में पहले से यह क्रूर खेल देख रहे थे।

समाज में जाति-धर्म के रूप में मौजूद अंतरविरोध को मोदी सरकार ने सचेतन प्रयास द्वारा नासूर में बदल दिया है। जो राष्ट्रीय एकता, अखंडता के शोर के बीच अंततोगत्वा हमारे देश के लिए आंतरिक खतरा बनता गया है। दलितों, महिलाओं, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों पर राज्य दमन और संघ की लंपट वाहिनी के हमले को राज्य का खुला संरक्षण हासिल है। जलते मणिपुर और जगह-जगह अल्पसंख्यकों, महिलाओं, दलितों पर हुए हमले के चरित्र को देखकर कोई भी प्रेक्षक इसी निष्कर्ष पर पहुंचेगा।

निश्चय ही लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समाजिक बंधुत्व, न्याय और समता के बुनियादी सिद्धांतों के झंडे के नीचे एकत्रित होकर ही संघ-भाजपा की विघटनकारी नीतियों के हमले से राष्ट्र की एकता और अखंडता को बचाया जा सकता है। भारत के लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील ताकतों को निश्चय ही यह ऐतिहासिक कर्तव्य पूरा करना होगा। नहीं तो इतिहास उन्हें कभी क्षमा नहीं करेगा।

 (जयप्रकाश नारायण किसान नेता और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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