क्या बाल विवाह पर रोक लगाने वाला कानून सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होना चाहिए? यह प्रश्न जितना कानूनी है, उतना ही ऐतिहासिक, सामाजिक, धार्मिक और संवैधानिक भी है। हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 तथा पॉक्सो अधिनियम, 2012 सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं और कोई भी व्यक्तिगत विधि यानी पर्सनल लॉ इन संरक्षणकारी कानूनों से ऊपर नहीं हो सकती। यह निर्णय केवल एक मुकदमे का निस्तारण नहीं, बल्कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था और धार्मिक स्वतंत्रता की सीमाओं पर एक व्यापक विमर्श का अवसर भी है।
इस विषय पर सबसे पहले एक भ्रांति दूर करना आवश्यक है। बाल विवाह किसी एक धर्म, समुदाय या सभ्यता की देन नहीं है। इतिहास साक्षी है कि एशिया, यूरोप, मध्य-पूर्व और अफ्रीका सहित विश्व की अनेक सभ्यताओं में विभिन्न कारणों—कम औसत आयु, असुरक्षा, युद्ध, सामाजिक संरचना, संपत्ति की रक्षा, पारिवारिक परंपराओं और तत्कालीन जीवन परिस्थितियों—के कारण कम आयु में विवाह की प्रथा प्रचलित रही।
इसलिए आज यदि इस विषय पर चर्चा हो रही है, तो उसका उद्देश्य किसी धर्म को कटघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि बदलती सामाजिक और संवैधानिक परिस्थितियों में कानून की भूमिका को समझना होना चाहिए।
भारतीय संविधान की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि उसने विविधता में एकता का मार्ग चुना। अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। यह स्वतंत्रता भारतीय लोकतंत्र की आत्मा है। किंतु यही अनुच्छेद यह भी स्पष्ट करता है कि धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य तथा संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन है। अर्थात संविधान ने धार्मिक स्वतंत्रता को अत्यंत महत्व दिया है, पर उसे असीमित या निरपेक्ष अधिकार के रूप में स्वीकार नहीं किया है।
इसी प्रकार पर्सनल लॉ भारत की विधिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और पारिवारिक संबंधों के अनेक पहलुओं में विभिन्न समुदायों की अपनी-अपनी परंपराएँ हैं, जिनका संविधान सम्मान करता है। किंतु जब प्रश्न किसी बच्चे के जीवन, शिक्षा, स्वास्थ्य, गरिमा और शारीरिक सुरक्षा का हो, तब संसद द्वारा बनाए गए संरक्षणकारी कानूनों का उद्देश्य किसी धर्म में हस्तक्षेप करना नहीं, बल्कि प्रत्येक बच्चे को समान कानूनी सुरक्षा प्रदान करना होता है।
यही कारण है कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम और पॉक्सो जैसे कानूनों की प्रकृति कल्याणकारी मानी जाती है।
मुस्लिम विधि के संदर्भ में भी इस विषय को केवल भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि मूल स्रोतों और विधिशास्त्र के आधार पर समझने की आवश्यकता है। कुरआन विवाह के लिए कोई निश्चित आयु निर्धारित नहीं करता, बल्कि परिपक्वता, उत्तरदायित्व और न्याय के सिद्धांतों पर बल देता है। पारंपरिक फ़िक़्ह में यौवन को एक महत्वपूर्ण मानदंड माना गया, किंतु आधुनिक इस्लामी विधिवेत्ताओं का एक बड़ा वर्ग यह मत रखता है कि यदि राज्य बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए न्यूनतम आयु निर्धारित करता है, तो उसका पालन शरीअत के व्यापक उद्देश्यों के विपरीत नहीं माना जा सकता।
दूसरी ओर, पारंपरिक मत रखने वाले विद्वानों के तर्क भी हैं। इसलिए इस विषय पर एक गंभीर, संतुलित और स्रोत-आधारित संवाद आवश्यक है, न कि भावनात्मक निष्कर्ष।
सर्वोच्च न्यायालय ने भी अनेक निर्णयों में यह सिद्धांत प्रतिपादित किया है कि धार्मिक स्वतंत्रता अत्यंत महत्वपूर्ण है, किंतु वह संविधान के मूल अधिकारों और संसद द्वारा बनाए गए संरक्षणकारी कानूनों से पूर्णतः पृथक नहीं है। भारतीय न्यायपालिका का निरंतर प्रयास यही रहा है कि धार्मिक स्वतंत्रता और मानव गरिमा, दोनों के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। यही संवैधानिक नैतिकता का भी मूल आधार है।
यह भी विचारणीय है कि आज अनेक मुस्लिम-बहुल देशों सहित विश्व के अधिकांश देशों ने बाल विवाह की न्यूनतम आयु कानून द्वारा निर्धारित कर दी है। इसका अर्थ यह नहीं कि उन्होंने अपने धर्म का परित्याग कर दिया, बल्कि उन्होंने बदलती सामाजिक परिस्थितियों, शिक्षा, चिकित्सा विज्ञान और बाल अधिकारों को ध्यान में रखते हुए विधिक सुधार किए। भारत में भी इस प्रश्न पर विमर्श संविधान, न्यायिक दृष्टांत, धार्मिक स्रोतों और वैज्ञानिक तथ्यों के आलोक में होना चाहिए।
किसी भी लोकतांत्रिक समाज की परिपक्वता इसी में है कि वह धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करे, व्यक्तिगत विधियों के अस्तित्व को स्वीकार करे, किंतु साथ ही यह भी सुनिश्चित करे कि किसी भी बच्चे के जीवन, गरिमा, शिक्षा और सुरक्षा से कोई समझौता न हो। न तो धर्म को राजनीतिक विवाद का विषय बनाया जाना चाहिए और न ही संविधान को धर्म-विरोधी दस्तावेज़ के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। भारत का संविधान दोनों के बीच संघर्ष नहीं, बल्कि संतुलन का मार्ग दिखाता है। यही संतुलन हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है और भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक आवश्यकता भी।
(महा प्रसाद अधिवक्ता हैं और लॉयर्स कलेक्टिव फॉर पीपल्स राइट्स (एलसीपीआर) के संयोजक हैं।)