नेहरू की फिलीस्तीन और इज़राइल विदेश नीति की याद

जब भारत आज़ाद हुआ इस वक़्त तक इज़रायल के गठन का कैंपेन अपने चरम पर पहुंच चुका था। इस मसले पर 29 नवंबर, 1947 को संयुक्त राष्ट्र में एक वोटिंग होनी थी। वोटिंग का विषय था, फिलिस्तीन का बंटवारा। इसे दो भाग में बांटना। एक हिस्सा, यहूदियों का देश। दूसरा, अरबों यानी फिलिस्तीनियों का देश। इस वोटिंग से पहले ही यहूदी राष्ट्रवादी अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में अपने लिए समर्थन जुटा रहे थे।

वे ख़ासतौर पर भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समर्थन के इच्छुक थे क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मंच पर नेहरू की बहुत प्रतिष्ठा थी। चाइनीज़ गृह युद्ध से लेकर पूंजीवाद और सोवियतवाद, अंतरराष्ट्रीय मसलों में उनकी बहुत दिलचस्पी थी। साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ़ चल रहे वैश्विक संघर्ष में वो एक बड़ी अथॉरिटी माने जाते थे। स्पष्ट था कि दुनियावी मामलों में उनकी राय का आज़ाद भारत की आगामी विदेश नीति पर भी असर पड़ने वाला था।

नेहरू जी मानते थे कि जहां आज फिलिस्तीन बसा है, उस ज़मीन से यहूदियों की प्राचीन जड़ें जुड़ी हैं लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आधुनिक काल में भी उस भूभाग पर यहूदियों का अधिकार हो। नेहरू ने 1939 में लिखा था-ये सच है कि यहूदियों के लिए फिलिस्तीन उनकी पवित्र ज़मीन है। मगर फिलिस्तीन कोई निर्जन भूभाग नहीं, वो अरबों का घर, उनका वतन है।

लेकिन ऐसे दृष्टिकोण रखने वाले नेहरु जी से यहूदियों को आज़ाद भारत का समर्थन चाहिए था, तो ज़रूरी था कि नेहरू के विचार बदले जाएं।

इसका जिम्मा मिला, मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन को, जो नेहरू के प्रशंसक थे इसीलिए आइंस्टाइन ने चार पन्नों की एक चिट्ठी भेजी नेहरू को भेजी थी। इसमें उन्होंने हिटलर के हाथों हुए यहूदी नरसंहार का हवाला देते हुए इज़राइल का समर्थन मांगा। तब नेहरू ने साफ-साफ लिखा कि वो यहूदियों के लिए हमदर्दी रखने के साथ-साथ अरबों के प्रति भी सहानुभूति रखते हैं। वो फिलिस्तीनी भूमि के बंटवारे और यहूदी राष्ट्र के गठन को सपोर्ट नहीं कर सकते।

उस समय भारत का बंटवारा हुआ था और सांप्रदायिक नफ़रत के कारण राष्ट्र निर्माण और राष्ट्रीय एकता बड़ी चुनौतियां थीं। देश में मुस्लिम अल्पसंख्यकों की एक बड़ी आबादी थी। कई जानकार मानते हैं कि नेहरू ने उसी के मद्देनजर यह जवाब दिया था।

यह भी कहा जाता है कि पाकिस्तान को काऊंटर करने के लिए अरब और मुस्लिम देशों का भी समर्थन चाहिए था। ये मुस्लिम देश फिलिस्तीन के समर्थक थे। शायद ये भी एक बड़ी वजह थी कि आज़ाद भारत ने फिलिस्तीनी अधिकारों के साथ खड़े होने का विकल्प चुना।

29 नवम्बर 1947 को जब इस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में वोटिंग हुई, तो भारत ने पार्टिशन रेजॉल्यूशन के विरोध में मतदान किया लेकिन दो सुपरपावर्स के सपोर्ट के कारण इज़रायल का गठन हो गया। 14 मई, 1948 को इज़रायल ने स्वतंत्र देश बन गया। आखिरकार, एक लंबी उठापटक के बाद भारत ने इजरायल को सितम्बर, 1950 में अपनी स्वीकार्यता दे दी। दिल्ली से 1,400 किलोमीटर दूर बम्बई में उसे एक वाणिज्य दूतावास खोलने की अनुमति दी गयी।

1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया। ये युद्ध नेहरू की चाइना नीति की करारी हार थी। साथ ही, अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भर होने की कोशिश कर रहे भारत के पास चीन का मुकाबला करने की सैन्य क्षमता भी नहीं थी। भारत को हथियारों और कूटनीतिक समर्थन के लिए अंतरराष्ट्रीय मदद मांगनी पड़ी।

27 अक्टूबर, 1962 को नेहरू ने इज़रायल के तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन को भी पत्र भेजा। जवाब में गुरियन ने भारत के साथ हमदर्दी जताते हुए हथियार देने की पेशकश की। इज़रायल ने भारत को आर्म्स सपोर्ट दिया भी, मगर सीमित. इस प्रकरण के चलते इज़रायल और भारत करीब तो आए, मगर फिर 1967 के सिक्स-डे वॉर के चलते दोनों में दूरी आ गई।

पाकिस्तान के सवाल पर इंदिरा गांधी सरकार के आगे भी अमेरिका का बहुत दबाव रहा। गवर्नमेंट को सोवियत के अतिरिक्त भी इंटरनैशनल बैकअप चाहिए था। इस तस्वीर में इज़रायल की एंट्री दिखती है 1971 के बांग्लादेश युद्ध में। इस बार भारत को हथियारों की फिर ज़रूरत पड़ी। सरकार ने इज़रायल से मदद मांगी और उसने भारत को लिमिटेड सपोर्ट भी दिया।

लेकिन इस सपोर्ट के बावजूद भारत ने फिलिस्तीन का पक्ष नहीं छोड़ा। इसी क्रम में 1975 के साल भारत ने यासिर अराफ़ात के पीएलओ यानी फिलिस्तीनियन लिबरेशन ऑर्गनाइज़ेशन को फिलिस्तीन देश के प्रतिनिधि की मान्यता दी। तभी से यह सिलसिला जारी है लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार आने के बाद इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतान्याहू से जो मजबूत रिश्ते बन रहे थे उससे ऐसा लग रहा था कि शायद नेहरू द्वारा स्थापित विदेश नीति परिवर्तित ना हो जाए पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।

इज़रायल और फ़िलिस्तीन के बीच पिछले कई सालों में हुईं भयावह हिंसा में बड़ी संख्या में मासूमों को जिस तरह समाप्त करनै का इज़राइल का जो सिलसिला चला उसके परिणाम स्वरुप अरब देशों ने एक मंच बनाया पर वे एकजुटता नहीं दिखा पाए। ईरान और चंद देशों ने ही हिम्मत दिखा कर इज़राइल को उसकी औकात दिखाई जिससे इज़राइल के आका अमेरिका का तिलिस्म पानी पानी हो गया।

और फिर उसने युद्ध विराम की घोषणा कर दी। यह सब नाटक है फिलीस्तीन एक बार ठगा गया है कहने को युद्ध विराम है।पूरी दुनिया इस राष्ट्र को भली-भांति पहचान गए हैं।

इस हिंसा के खिलाफ़ दुनिया के कई शहरों में प्रोटेस्ट हो रहे हैं। कोई फ़िलिस्तीन का पक्ष ले रहा है, कोई इज़रायल का। भारत में भी सोशल मीडिया फीड ‘आई सपोर्ट फिलिस्तीन वर्सेज़ आई सपोर्ट इज़रायल’ से भरी हुई थी। कई लोग इज़रायल का सपोर्ट करने के साथ-साथ इस्लामोफ़ोबिया का भी भद्दा प्रदर्शन कर रहे थे। न्यूक्लियर हमले और नरसंहार जैसी भीषण अपीलें भी जा गई।

इन सबके बीच एक ट्वीट को लेकर काफी कौतुहल दिखा ये ट्वीट था, इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का। 16 मई के अपने इस ट्वीट में नेतन्याहू ने अमेरिका और ब्रिटेन समेत 25 देशों का झंडा लगाया। इसके साथ नेतन्याहू ने लिखा-इज़रायल के साथ सुदृढ़ता से खड़े रहने के लिए शुक्रिया. आतंकी हमलों के विरुद्ध अपनी सुरक्षा के हमारे अधिकार का समर्थन करने के लिए आपका धन्यवाद। 

इस ट्वीट पर भारतीयों के भी कई कमेंट आए। कई भारतीयों ने ताज्जुब जताया कि नेतन्याहू ने अपने ट्वीट में भारत का झंडा क्यों नहीं लगाया? ये बड़ा सवाल है। मगर इसका जवाब नेतन्याहू के पास नहीं क्योंकि ये मामला जुड़ा है, भारतीय विदेश नीति से।

विदेश नीति, यानी किसी दुनियावी मसले पर एक देश का आधिकारिक स्टैंड और यह स्टैंड भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा रखी गई सुचिंतित सफल विदेश का ही सुखद प्रतिफल है। भारत की ढुलमुल विदेश नीति भी आखिर कार नेहरू के विचारके साथ खड़ी होने मज़बूरी है। नेहरू के जन्मदिन दिवस पर उनकी सुदृढ़ विदेश नीति को ज़रुर याद रखने की आवश्यकता है। उनकी दूरदर्शी विदेश नीति की दुनिया में तूती आज भी बोलती है।

Leave a Reply