फर्जीवाड़ा करने वालों की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम!

यह खबर फर्जीवाड़ा करने वालों के लिए सिर्फ खुशखबरी नहीं है बल्कि जीवन में लगे बेईमानी के तमाम दाग धोकर धवल छवि पेश करने का एक जबरदस्त पुख़्ता इंतज़ाम है। यह सब सन 2005 में यूपीए सरकार द्वारा बनाए सूचना के अधिकार में तब्दीली से होने जा रहा है।

विदित हो, इस कानून बनने की कहानी बड़ी ही मार्मिक है जब देश के सबसे युवा ऊर्जावान प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने यह बात सार्वजनिक की कि केंद्र सरकार यहां से लोगों को एक रुपया भेजती है तो जनता के पास मात्र 15 पैसे पहुंचते हैं, शेष पैसा कहां जाता है इसका पता लगाने की सूचना के अधिकार की बात सामने आई। राजीव गांधी का कहना था कि ये पैसा जाता कहां है इसकी जानकारी जनता को मिलनी चाहिए।

इसी विचार से प्रेरित होकर मनमोहन सिंह की सरकार में इसे 2005 में कानून बनाकर जनता को सवाल करने और जानकारी पाने का बड़ा हथियार दे दिया था किंतु अब इसमें तब्दीली की बदौलत किसी की व्यक्तिगत जानकारी प्राप्त नहीं कर सकेंगे। सरकार ने RTI अधिनियम की धारा 8(1)(j) का उपयोग करके व्यक्तिगत जानकारी के नाम पर कई महत्वपूर्ण जानकारी देने से इनकार करने लगी है। इससे चुनरी में लगे सब दाग छिप जाएंगे।

पिछले बीस वर्षों में लोगों में यह समझ विकसित हो गई थी कि वे सूचना के अधिकार के तहत मात्र दस रुपए के आवेदन पर सरकार से जानकारियां हासिल कर लेते थे हालांकि इस मामले में हीलाहवाली बहुत होती देखी गई। जानकर आश्चर्य होगा कि जिस सरकार ने ये अधिकार जनता को दिया था उसका सर्वाधिक प्रयोग भाजपा के प्रारंभिक शासन में मनमोहन सरकार पर ही किया गया। किंतु जब कारगर नहीं रहे तब ईडी, सीबीआई के ज़रिए कांग्रेस और सहयोगी दलों को जबरिया परेशान किया गया।

दिक्कत ये है कि जनता की समझदारी जब विकसित हुई वे सूचना का अधिकार जानने लगे तो हर नगर, कस्बे में आरटीआई कार्यकर्ताओं ने सवालों के कटघरे में, अनेकों फर्जीवाड़ा की जानकारी मिलने पर उन पर हाईकोर्ट के ज़रिए उचित कार्रवाई करवाई। इसके बहुत से लोग शिकार हुए। अकेले मध्यप्रदेश के एक छोटे जिले दमोह में शिक्षा विभाग में फर्जी नियुक्ति के 40 प्रकरण पंजीबद्ध हुए।

अभी मुश्किल से 20 लोगों पर दंडात्मक कार्रवाई शुरू हुई ही थी कि आरटीआई कार्यकर्ता को एक फर्जीवाड़ा करने वाले शिक्षक की आत्महत्या मामले में कार्यकर्ता द्वारा वसूली का प्रकरण बनाकर जेल भेज दिया गया। इसी नगर में फर्जीवाड़ा के ज़रिए एक कार्डियोलॉजिस्ट जिसके ऊपर चार लोगों को हार्ट के आपरेशन के दौरान मारने का आरोप लगा। उस पर कार्रवाई चलने के पूर्व ही एक बड़े निजी चिकित्सालय पर ताला लगा दिया गया। ऐसे अनेकों प्रकरण अभी भी प्रोसस में हैं।

यदि ऐसे संगीन मामले में व्यक्तिगत जानकारी मांगने पर आवेदन ख़ारिज किया जाएगा तो इसके कितने दुष्परिणाम सामने आएंगे सोचकर कष्ट होता है।

आइए, अब उस बात को भी जान लें कि भारत सरकार ने यह सब क्यों किया क्योंकि इसके ज़रिए पीएम साहिब की डिग्री मांगी जा रही थी। इसके ज़रिए इलेक्टोरल बांड की जानकारी सामने आई। इसके ज़रिए पीएम द्वारा विज्ञापनों में जो अरबों की राशि खर्च हुई उसका खुलासा हुआ। विदेश यात्राओं का हिसाब किताब भी ओपन हुआ। उनकी सुरक्षा, कारों और स्पेशल हवाई जहाज पर हुए अरबों के खर्च उजागर हुए। इसके अलावा ईडी, सीबीआई के अधिकारियों की पोल पट्टी खुली। राफेल खरीदी में हुआ फर्जीवाड़ा सामने आया। इसके अलावा देश में आरटीआई कार्यकर्ताओं ने जाने कितने रहस्य खोले हैं।

अब ऐसे हालात में मोदी जी कैसे इसे बर्दाश्त कर सकते है। जो पत्रकारों के सवाल से डरकर आज तक सामना नहीं किए। प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी के सवालों से पहले विदेश भाग जाते हैं या कहीं भाषण करने चले जाते हैं। वे अब तक ये सब कैसे सहते रहे यह आश्चर्यजनक है।

फिलहाल अब सभी फर्जी वाड़ा करने वालों को सूचना के नए अधिकार कानून के तहत सुरक्षा के पूरे इंतजामात कर दिए गए हैं। बेशक यह एक ऐसा कानून है जिसमें सब अपराधी सुरक्षित हो जाएंगे। हो सकता है, इसके एवज में उन्हें गुपचुप आर्थिक दंड किसी फंड में देना पड़ जाए। कहते हैं धन में बड़ी ताकत होती है।

अफसोसनाक है कि निर्धन और ईमानदार लोग एक बार फिर ठगे गए हैं। कांग्रेस द्वारा प्रदत्त उनका सूचना का अधिकार छीना जा रहा है। यह जो सन्नाटा है, विरोध के स्वर मौन हैं वह सब एक दिन उनके गले का फंदा बन जाएगा। यह ख़ामोशी उचित नहीं, होश वालों से इल्तिज़ा है वे इसे बचाने का उपक्रम करें।

(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)

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