आज राजगुरू, सुखदेव, भगत सिंह का शहादत दिवस है। एक जलती हुई लौ जिसकी रोशनी आज भी कम नहीं हुई है। इनकी शहादत सिर्फ इन तीनों की याद नहीं दिलाती। इस राह में चलने वाले चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्लाह खान जैसे सैकड़ों उन युवाओं की भी याद आती है जिनकी कुर्बानियों की कहानियां खून की रवानगी की तरह ताजा हैं।
भारत के ये शहीद आज भी इतने मौजूं है कि हर कोई खुद को उनकी परम्परा में खड़े होने का दावा करता है और उनकी विरासत को आगे ले जाने की कसमें खाता है। ये शहादतें अपनी जिंदादिली के साथ जिंदा हैं, जिन्हें याद करते हुए एकबारगी इतिहास के पन्ने पीछे की ओर पलटते हैं और उसकी रोशनी सीधे हमारे वर्तमान के हालात को और भी खोलकर सामने ला देेती है।
आप 1920 का दशक याद करिये। उस समय पंजाब के लाहौर से लेकर बंगाल के चिटगांव तक और महाराष्ट्र के बम्बई, पूना से लेकर मालाबार के तटवर्ती इलाकों तक चल रहे संघर्षों के बीच से युवाओं का उभार हो रहा था। उस समय की कांग्रेस जितना ही प्रांतीय सत्ता प्रतिष्ठानों में हिस्सेदारी के लिए अंग्रेजों का आग्रही हो रही थी युवाओं में उससे मोहभंग बढ़ता जा रहा था।
पहले विश्वयुद्ध के खत्म होने के बाद ब्रिटिश उपनिवेशवादी ज्यादा आक्रामक होते जा रहे थे। किसान आंदोलन और अधिक उग्र होना शुरू हो चुका था और उस पर से कांग्रेस की पकड़ कम होती जा रही थी। यही वह समय था जब भारत का कथित पूंजीपति वर्ग साम्राज्यवादी पूंजी के साथ मिलकर अपने ‘विकास’ का सपना साकार कर लेने को आतुर था। वह मजदूरों का भयावह शोषण कर रहा था।
कोलकाता के जूट उद्योग से लेकर मुंबई और गुजरात के सूती मिलों में मजदूर आंदोलन तेज गति से बढ़ा। महाराष्ट्र में डा. भीमराव आंबेडकर का आगमन हो चुका था और वह अछूत समस्या को भारतीय समाज के संपूर्ण संकट के तौर पेश कर रहे थे और हिंदुत्व की जमीन की क्रूर सच्चाई को महाड़ आंदोलन में सामने ला रहे थे। एवी ठक्कर, शामराव और वेरियर एल्विन भारत के आदिवासी समुदाय की स्थिति पर लगातार लिख रहे थे और कांग्रेस को इस समाज की समस्याओं से अवगत करा रहे थे।
विश्वयुद्ध के बाद मंहगाई का जोर था और मध्यवर्ग अपनी बचत को लेकर काफी चिंतित था। उसे अपने बच्चों के रोजगार की चिंता थी और साथ ही एक बेहतर, सम्मानजनक जिंदगी की दरकार भी थी।
भारत का उस समय का युवा वर्ग इन्हीं हालातों से होकर गुजर रहा था। उसके सामने भारत की अर्थव्यवस्था की बदहाली दिख रही थी। वे ब्रिटिश हुक्मरानों के दमनकारी कानून, मनमानी गिरफ्तारी, जालियांवाला बाग हत्याकांड और देशद्रोह के नाम पर चल रहे दमन को देख रहे थे। 1920-30 के दशक में मुख्यतः मध्यवर्ग से आये युवाओं और कार्यकर्ताओं ने बोल्शेविक क्रांति और मार्क्सवाद की जमीन पर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया।
इसी दशक में युवाओं का नया समूह खड़ा हुआ जिन्होंने भारतीय समाज के संदर्भ में एक राजनीतिक कार्यक्रम का निर्माण किया और एक क्रांतिकारी संगठन का निर्माण किया जिसका नाम थाः हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन। युवाओं के इस संगठन का राजनीतिक कार्यक्रम विचारधारा की घोषणा से अधिक समाज की चुनौतियों पर जोर अधिक था और वे इन्हीं संदर्भों में एक समाजवादी समाज के निर्माण का लक्ष्य लेकर चल रहे थे।
यही वह मुख्य बिंदु था जो इन्हें भारत की कम्युनिस्ट पार्टी से अलग करता था। उन्होंने भारत के उपनिवेशिक शासकों को दुश्मन घोषित किया और खुद को उनके खिलाफ युद्ध लड़ने वाले योद्धाओं की तरह पेश किया। वे देश की जनता को अपनी आवाज सुनाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने उपनिवेशिक राज्य की सर्वोच्च विधान सभा, जो आज की संसद है और न्यायालय को मंच बनाने का रास्ता चुना।
इस रास्ते चलते हुए उन्होंने खुद को अराजकतावादियों और रूस के नरोदनिक तरीकों से एक भिन्न रास्ता चुना। उन्होंने अपनी आवाज को देश के हर कोने तक ले जाने के लिए मृत्यु के वरण का रास्ता चुना। उन्होंने जब इंकलाब जिंदाबाद का नारा दिया, तब उसकी गूंज उसके कमरे से बाहर शायद ही गई हो। लेकिन, यह नारा कभी खत्म नहीं हुआ। यह नारा एक परचम की तरह लहराते हुए उन बंद कमरों से निकलकर बाहर आया और उनकी आवाज को हर जर्रे के साथ मिला दिया।
वे युवा बोल्शेविक नहीं थे, अराजकतावादी नहीं थे, वे विद्रोहवादी नहीं थे, …वे क्रांतिकारी थे जिनके पास अपने समय के समाज की समझ थी, उस समझ पर उनके पास कार्यक्रम था और उस पर चलने के लिए उनके पास संगठन था। वे समूह में मिल रहे थे और इसे बनाते हुए विकसित कर रहे थे। वे एक क्रांतिकारी होने की शर्त को पूरा करने के लिए बहस कर रहे थे।
वे वैवाहिक संबंधों, दलित समस्या, भाषा, किसान और मजदूरों की मुक्ति का सवाल से लेकर नये समाज के बनाने की दिशा पर एक दूसरे सहमत और असहमत होते हुए लगातार लिख रहे थे। वे सांप्रदायिकता को लेकर चिंतित थे और उसके निदान को लेकर वे सचेत थे। वे विचारधारा की दिशा पर बात कर रहे थे और सामाजिक बदलाव और क्रांति में ‘हिंसा’ के प्रयोग को लेकर सचेत थे।
उनके बीच ‘नैतिकता’ एक समस्या नहीं थी, वे इसे ‘दृष्टिकोण’ का सवाल मान रहे थे। ब्रिटिश उपनिवेशवाद के भयावह दमन के बीच इससे जुड़े अधिकांश युवाओं को पुलिस मुठभेड़ ‘मार गिराया’ गया, मुकदमा चलाकर आजीवन कारावास दिया और बहुत से युवाओं को फांसी की सजा देकर मार डाला गया। बहुत से युवाओं को कठोर कारावास दिया गया।
कितने ही युवा गुमनाम जिंदगी बसर करने को मजबूर हो गये। इन युवाओं में कुछ बाद के दिनों में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गये और कुछ उस समय उभर रहे कांग्रेस के सोशलिस्ट खेमे के साथ जुड़े।
भारत के आधुनिक इतिहास में इस 1920-30 का दस साल का पन्ना भारतीय राजनीति का सबसे स्वर्णिम पन्ना है। जिस राजनीतिक परिवेश में इन युवाओं ने पहलकदमी ली थी, उसकी छाप भारत के इतिहास पर अमिट बन गई। उनकी आवाज में चीख नहीं थी, उनके संगठन निर्माण में षडयंत्रकारी उतावलापन नहीं था, उनकी गतिविधियों में धक्कामुक्की और संकीर्णता नहीं थी, तात्कालिकता नहीं थी।
उनके अपने देश और लोगों के प्रति अगाध प्रेम था, उनका जीवन नैतिकता से भरा हुआ था और गुलामी से मुक्ति के संघर्ष को आगे ले जाने का उद्दाम आवेग था। भारतीय इतिहास में इसके सामानान्तर 1960-70 का दशक दिखता है। भारत के मध्यवर्ग का युवा नक्सलबाड़ी की किसानों के विद्रोह की पुकार पर एकदम उठ खड़़ा हुआ और उनके साथ जुड़ गया। एक छोटी सी घटना पूरे देश में एक परिघटना की तरह घटी और इसने जल्द ही एक विचारधारा और कार्यक्रम का रूप ले लिया।
यह धारा संघर्ष और पतन के राह पर चलते हुए आज भी युवाओं को एक विकल्प देने में सक्षम बनी हुई है। ठीक वैसे ही जैसे शहीद भगत सिंह और उनके साथियों की शहादत, उनकी विचारधारा और उनका जीवन युवाओं को आज भी एक विकल्प पेश करता है।
आज जिस तरह से युवाओं का जिस तरह से दमन किया जा रहा है, वह किसी भी सभ्य समाज को शर्मसार कर देने वाला है। इस दमन का निश्चित ही एक राजनीतिक-अर्थशास्त्र है।
आज देश में आत्महत्या की श्रेणी में सबसे ऊपर युवा वर्ग है। सबसे ज्यादा बेरोजगारी पढ़े लिखे युवाओं में है। पढ़ाई के खर्च का बोझ युवाओं के कंधों पर बढ़ता ही जा रहा है। कोचिंग की कोटा फैक्टरी पूरे देश में फैल चुकी है। जबकि विश्वविद्यालय और काॅलेज में अध्यापक लगातार गायब होते जा रहे हैं। युवाओं के प्रतिरोध पर जिस तरह से हमले किये जा रहे हैं, वह अभूतपूर्व है।
देश को इतिहासहीन बना देने के लिए सोशल मीडिया और व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी का जिस तरह से प्रयोग बढ़ा है, उससे नफरतों की आग हर घर तक पहुंची है। युवा ऐसे ही दौर में रह रहा है।
इतिहास खुद को दुहराता नहीं है। इतिहास विकल्पों को गढ़ने में मदद करता है। भारत का युवा वर्ग जब भी पुस्तकें पलटेगा, वह अपने इतिहास से होकर ही गुजरेगा। पुस्तकों की पहरेदारी लगा देने, पाठ्यक्रम बदल देने से इतिहास के पन्ने तब भी गायब नहीं होंगे।
युवाओं को जीवन जीने का रास्ता चाहिए। वे अपने जीवन के लिए अपना रास्ता सारे दमन के बाद भी बनाने से हट ही नहीं सकते। यदि उनके पास विकल्प नहीं बचा है, तब वे विकल्प को नये सिरे से गढ़ेंगे। देश के आधुनिक इतिहास के कई ऐसे खूबसूरत पन्ने हैं जब ऐसी विकल्पहीनता के हालात में युवाओं ने विकल्पों को गढ़ा है। ऐसे ही खूबसूरत पन्नों का निर्माण शहीद भगत सिंह और उनके साथियों ने किया। आज भी वे युवाओं के सर्वोच्च पे्ररणा बने हुए हैं। इंकलाब-जिंदाबाद!
(अंजनी कुमार लेखक, टिप्पणीकार हैं।)