हिमालय के पहाड़ों में इस साल हिम अकाल

जनवरी बीतने में बस हफ्ते भर का समय रह गया है, उत्तराखंड, हिमाचल में हर साल की तरह बर्फबारी देखने को नहीं मिली। नैनीताल, मसूरी से लेकर शिमला तक में बर्फबारी का आनन्द लेने वाले इस साल नदारद हैं। पहाड़ सूखे दिख रहे हैं। उनकी चोटियां उस तरह से बर्फ से रोशन नहीं हैं जैसा पहले होता रहा है। पहाड़ से जुड़े पर्यावरणविद् इसे ‘हिम अकाल’ बता रहे हैं। इस जाड़े में पहाड़ में आग लगने की घटनाएं दिख रही हैं जो और भी चिंताजनक है।

उत्तराखंड में 12 हजार फीट से ऊपर वाली चोटियों पर अब तक सिर्फ एक बार बर्फ पड़ी है। इसके नीचे का हिस्सा सूखा पड़ा हुआ है। इस तरह की स्थिति आज से 40 साल पहले हुई बताई जा रही है। लेकिन, तब के और आज की स्थिति में काफी फर्क है। जाड़े में पहाड़ों में होने वाली बारिश ही बर्फबारी होती है। हिमालय की ऊंचाई तापमान को नीचे की ओर ले जाती है जिससे वहां होने वाली बारिश बर्फ में बदल जाती है।

मैदानों में यह सामान्य बूंदों वाली बारिश होती है। मैदानों में होने वाली बारिश न होने से जिस तरह के अकाल की स्थिति बनती है, वैसा ही पहाड़ों में भी होता है। लेकिन, पहाड़ों में होने वाले हिम अकाल मैदानों में होने वाले सूखे से कहीं अधिक खतरनाक असर छोड़ते हैं।
पहाड़ों की बर्फबारी लंबे समय तक ग्लेशियरों के रूप में संरक्षित रहती है जो गर्मी के दिनों में धीरे-धीरे पिघलती है और मैदानों में उतरती है। हिमालय के पहाड़ों से निकलने वाली नदियां साल भर पानी आपूर्ति का माध्यम बनी रहती हैं।

साथ, मैदानों में जलस्तर को बनाये रखने में बड़ी भूमिका निभाती हैं। इन नदियों का बहाव एक विशाल मैदानी क्षेत्र का निर्माण ही नहीं करतीं, यहां जीवन की स्थिरता को बनाये रखने में एक नियामक की तरह काम करती होती हैं।

खुद पहाड़ इस बर्फबारी और बारिश से एक विशाल पर्यावरण परिस्थितिकी के केंद्र के रूप में विकसित होते हैं। हिमालय मानव सभ्यता के एक केंद्र की तरह रहा है और इसने हिमयुग के अंत के साथ साथ-इसकी नदियों के प्रवाह के साथ एक नई सभ्यताओं को जन्म दिया। खुद हिमालय की पहाड़ियां सभ्यता और राज्यों के उद्भव का केंद्र बनीं। यह तभी संभव हुआ जब यहां की विशाल घाटियों में कृषि और उद्यमों का विस्तार हुआ।

पिछले 20 सालों में हिमालय के पहाड़ों में बर्फबारी में हो रही कमी को देखा जा रहा है। पिघलते ग्लेशियर न सिर्फ नये झीलों को निर्माण कर रहे हैं, पहाड़ को क्षरित होने की स्थितियों की ओर ले जा रहे हैं। खासकर, विश्व तापमान में बढ़ोत्तरी का सीधा असर हिमायल पर पड़ रहा है। अरब सागर से उठने वाली पश्चिमी हवाएं पहले से कमजोर हुई हैं जिसका सीधा असर भारत में कश्मीर से लेकर उत्तराखंड के पहाड़ों पर पड़ रहा है।

सामान्य से अधिक तापमान होने से पड़ने वाले बर्फ के पिघलने की समयावधि को भी कम कर दिया है। इससे पहाड़ में होने वाली कृषि पर काफी असर पड़ रहा है।

उत्तराखंड में 90 प्रतिशत खेती बारिश पर ही निर्भर है। ऐसे में बारिश न हो तब वहां का जनजीवन बुरी तरह प्रभावित होगा। डाउन टू अर्थ में दीपक पुरोहित की रिपोर्ट के अनुसार इस साल उत्तराखंड में खेती का नुकसान सामान्य से 15-20 प्रतिशत तक होने का अनुमान है। जबकि उत्तराखंड सरकार की ओर से इस नुकसान की भरपाई तब की जाएगी जब यह आंकड़ा 33 प्रतिशत हो। इस तरह के अनुमान तो सरकारी अधिकारी ही लगा पायेंगे।

लेकिन, सेब की फसलों के संदर्भ में अभी तक जो रिपोर्ट आ रही है, वह काफी चिंताजनक है। यही स्थिति हिमाचल की भी है। सेब की पैदावार के लिए शुरूआती तापमान -10 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए। जबकि स्थिति काफी बदतर है और यह सामान्यतः 15 डिग्री सेल्सियस रह रहा है। कई जगहों पर यह 20 का आंकड़ा भी पार कर गया। यह तापमान पौधों के बसंत का अहसास दिलाता है जिससे फसल चक्र पर काफी असर पड़ता है।

यह अनुमान किया जा रहा है कि फरवरी के महीने में बर्फबारी हो सकती है। फरवरी-मार्च के महीने में होने वाली बर्फबारी आने वाले महीनों में तेजी से पिघल जाती है जिससे इस बर्फ के टिके रहने में काफी दिक्कत होती है। पहाड़ के ऊपरी हिस्से बर्फ की अनुपस्थिति में अधिक क्षरण और गर्म होने लगते हैं। इसका सीधा असर इन पहाड़ों के निचले हिस्से और फुटहिल पर पड़ता है। इसका सीधा नतीजा पहाड़ों की आग के रूप में दिखता है।

भारत के संदर्भ में हिमालय एक जीवन रेखा की तरह है। इसके बिना गंगा-यमुना के दोआब की कल्पना ही संभव नहीं है। हिमालय की बर्फबारी में नंगा नाच करने वालों को गुमान भी नहीं होगा कि उनकी ऐयाशियाँ हिमालय को किस कदर नुकसान की ओर ले जा रही हैं। पर्यावरण के सवाल को पेड़ लगाने तक सीमित कर देखना शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर गाड़ लेने जैसा ही है।

पूंजी और संपत्ति की लूट का नजारा आज हमारे देश में हर तरफ दिख रहा है। इसके लिए पहाड़, जंगलों को बर्बाद होते हुए हम देख रहे हैं। पूरी की पूरी अरावली पर्वत माला को ही तबाह कर देने वाली नीतियों को सामने आते हुए हम देख रहे हैं। विकास के नाम पर इंसान और प्रकृति को विस्थापित करने का नतीजा कोई दूर की बात नहीं रह गई है।

खुद, दिल्ली में पर्यावरण की तबाही जिस तरह से प्रदूषण बनकर हमारे सीने में उतर रही है, हर रोज लोगों को मौत की तरफ खींच कर ले जा रही है, यह सब कोई छुपी बात नहीं रह गई है। आज के दौर के विश्लेषण में निश्चित ही पर्यावरण को रखना जरूरी हो गया है और यह पूछना जरूरी हो चुका है इस बार हिमालय में हिम अकाल क्यों पड़ा है!

(अंजनी कुमार लेखक-पत्रकार, एक्टिविस्ट हैं।)

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