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छत्तीसगढ़ में अडानी के प्रोजेक्ट से नाराज हैं आदिवासी

15 साल तक एक ही पार्टी, एक ही सरकार, एक ही चेहरा जिस नवगठित प्रदेश की पहचान सा बन गया था उसे लगभग रौंदते हुए भूपेश बघेल के नेतृत्व में कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में विजय हासिल कर सरकार बनाई। अमर शायर साहिर लुधियानवी की नज़्म है, ‘नया सफर है पुराने चराग़ गुल कर दो’, भूपेश सरकार इसी तर्ज़ पर आगे बढ़ती प्रतीत हो रही है।

देखते देखते एक साल हो गया छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल के नेतृत्व में सत्तारुढ़ कांग्रेस की सरकार को। भूपेश सरकार के एक साल का आकलन करते हैं तो ये कहना होगा कि ऐसा नहीं है कि भूपेश बघेल के एक साल में कुछ हुआ ही नहीं या इतना हुआ जितना पहले कभी नहीं हुआ। इन दोनों अतिशयोक्तियों के बीच संतुलन की एक बारीक लाइन है जिस पर चलकर ही कांग्रेस सरकार के एक साल की समीक्षा की जानी चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण और धमाकेदार तो इस सरकार की शुरुआत ही रही, जिसके मास्टर स्ट्रोक होने से इनकार नहीं किया जा सकता। शपथ ग्रहण के महज़ दो घंटे की कालावधि में किसानों का कर्ज़ा माफ कर भूपेश बघेल ने अपने इरादे जाहिर कर दिए थे। इसे पूरा करने में भी कोई कोताही भी नहीं की। कर्ज़माफी के साथ ही शहरों में बिजली बिल पर भारी छूट और अन्य जनहितकारी घोषणाओं के साथ गत वर्ष किसानों को 2500 रुपये के हिसाब से फसल मूल्य भी दे दिया।

इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि भूपेश बघेल की इस ताबड़तोड़ क्रियान्वयन वाली कार्यप्रणाली से घबराकर केंद्र सरकार ने इस बरस धान खरीदी में अड़ंगे लगा दिए, जिससे राज्य सरकार को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। ऐन निकाय चुनावों के दौर में, भूपेश बघेल के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। भूपेश सरकार ने फिर भी वादा और दावा किया है कि वह किसानों को अपने वादे के मुताबिक धान के लिए पूरे 2500 रुपये देगी, मगर इस वादे के दावे की विश्वसनीयता से जनता और विशेषकर किसानों को सहमत करवा पाना भी एक बड़ी चुनौती है।

केंद्र सरकार की शह पर प्रदेश में विपक्ष इसे भुनाने के प्रयास में है, मगर विपक्ष के तमाम प्रोपगंडा के मुकाबिल भूपेश बघेल की एक साल में अर्जित और स्थापित वादापरस्ती की विश्वसनीयता ज्यादा वजनदार कही जा सकती है।

15 बरस से एक विशेष ढर्रे पर चलती हुई नौकरशाही निश्चित ही एक बरस में पटरी पर नहीं आ सकी है। न ही सरकारी महकमा भ्रष्टाचार से बाहर हो पाया है। इन सबसे इतर आमजन से जुड़े मुद्दों पर भूपेश सरकार तेजी से काम करने की नीति पर अमल कर रही है। शहरी क्षेत्रों में बिजली बिल, छोटे भूखंडों की रजिस्ट्री, ग्रामीण क्षेत्रों में नरुवा घुरुवा की सफलता हो या आदिवासियों को ज़मीनें वापस करवाने और उन पर दायर फर्जी मुकदमों से राहत देने के वादे और योजनाएं हों। इन सबको लेकर भूपेश बघेल वादों और दावों के त्वरित क्रियान्वयन में उल्लेखनीय रूप से खरे उतरे हैं।

आदिवासी क्षेत्रों में जहां एक ओर उन्होंने नंदराज पर्वत पर खनन की रोक तो जरूर लगाई मगर दूसरी ओर हसदेव अरण्य क्षेत्र में खनन को लेकर छत्तीसगढ़ में अडानी को रोक पाने में अब तक सफल नहीं हो पाए हैं। इससे कुछ तल्खी और नाराजगी भी फैली है, मगर उम्मीद कायम है कि वे जन पक्षधरता की कसौटी पर निश्चित रूप से खरे उतरेंगे।

हालांकि नक्सली वारदातों और गतिविधियों में आशातीत सफलता नहीं मिली है, मगर इसके बावजूद आम आदिवासी के रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर लिए गए निर्णयों के चलते अपने वादों पर खरा उतरकर भूपेश बघेल ने आदिवासी क्षेत्रों में भी विश्वसनीयता अर्जित की है। भूपेश बघेल द्वारा कॉर्पोरेट समूह द्वारा अधिग्रहीत आदिवासियों की जमीनें वापस दिलवाने से लेकर बस्तर में आदिवासियों पर लगे फर्जी मामले वापस लेने जैसे महत्वपूर्ण फैसले और इसके त्वरित क्रियान्वयन ने आदिवासी क्षेत्रों में एक विश्वास का वातावरण निर्मित किया है।

इसकी वजह से कांग्रेस पार्टी को निश्चित रूप से पायदा हुआ है। इसका सुबूत है  इस एक बरस के दौरान आदिवासी क्षेत्र बस्तर में हुए आम चुनाव और विधान सभा के उपचुनाव में मिली अपार सफलता, जो उनकी नीतियों और  आदिवासियों के हित में लिए गए निर्णयों की आदिवासियों के बीच स्वीकार्यता को स्थापित करता है।

निश्चित रूप से भूपेश बघेल के नेतृत्व में विशाल बहुमत से सत्ता में आई कांग्रेस सरकार ने इस एक साल के दौरान आमजन के बीच उम्मीदों और संभावनाओं को नए आयाम दिए हैं। कभी गेड़ी चढकर, कभी भौंरा चलाकर तो कभी लोक जीवन से जुड़े त्योहारों के माध्यम जैसे लोकप्रियता के तमाम उपक्रम के जरिए आम मतदाता के बीच जहां एक ओर अपनी लोकलुभावन छवि निर्मित करने और मजबूत करने में सफल रहे हैं।

वहीं दूसरी ओर इन्हीं उपक्रमों के बल पर अभिजात्य के मुकाबले सहज लोकल या ग्रामीण छवि को सफलतापूर्वक स्थापित कर 15 साल तक सत्ता में रही भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और संगठनात्मक ढांचे को बिखराने में भी कामयाब रहे हैं।

गौरतलब है कि इस एक वर्ष के कार्यकाल के दरमियान अपनी कार्य प्रणाली से आम जन में अपनी विशेष छवि स्थापित करने में कामयाब रहने के साथ ही भूपेश बघेल अपनी पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की निगाहों में भी संभावनाशील नेता के रूप में छवि स्थापित कर पाने में पूरी तरह कामयाब रहे हैं।

अब इस लोकप्रिय छवि की अग्नि परीक्षा निश्चित रूप से निकाय और पंचायत चुनावों में होगी, जहां तक इस एक साल में चुनावी उपलब्धि का सवाल है तो यह नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि लोकसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को बहुत बुरी हार का मुंह देखना पड़ा था, मगर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि तब भूपेश बघेल को पद संभाले जुम्मा जुम्मा एक माह भी नहीं हुए थे।

वैसे भी लोकसभा के मुद्दे काफी अलग होते हैं। भूपेश सरकार की असल परीक्षा छत्तीसगढ़ में हुए उप चुनावों में थी, जिसमें वे शत प्रतिशत सफल साबित हुए। आज पूरे बस्तर से भारतीय जनता पार्टी का सफाया हो चुका है। अतः उम्मीद कर सकते हैं कि जनता निकाय और पंचायत चुनाव में अपना समर्थन देकर इस एक साल में उनकी कार्यप्रणाली पर अपनी मुहर लगाएगी।

दरअसल यही भूपेश बघेल की एक साल में हासिल महत्वपूर्ण उपलब्धि है कि वे अपने वादे और दावों पर खरे उतर पाए हैं और इसी के चलते शहरी और ग्रामीण जनता का विश्वास जीत पाने में कामयाब रहे हैं। बेलगाम नौकरशाही के असहयोग और अनियंत्रित भ्रष्टाचार के बावजूद जनता के बीच उनकी बातों का वजन स्थापित हुआ है। लोगों का भरोसा सरकार और मुख्यमंत्री पर शनैः शनैः जमने लगा है। इस बात को लेकर विपक्ष में बेचैनी भी है।

किसी भी राजनेता और विशेष रूप से मुख्यमंत्री के लिए यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि कही जा सकती है। उम्मीद करते हैं इस पहले बरस में सत्ता मद से काफी हद तक बचे रह पाए भूपेश बघेल आने वाले बरस में भी इसे कायम रख पाने में कामयाब रह पाएंगे।

(कवि, कथाकार एवं टिप्पणीकार हैं और कानपुर में रहते हैं।)

This post was last modified on December 18, 2019 2:29 pm

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