Thursday, October 28, 2021

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सरकार मजदूर-किसानों की बात नहीं कर रहीः दीपांकर

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भाकपा-माले के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा है कि देश की सरकार बड़े पूंजीपतियों की सेवा में लगी है और मजदूर-किसानों की कोई बात नहीं हो रही है। सरकार ने जमीन, मजदूरी, रोजगार के सवाल पर बात करना छोड़ दिया है। वे चाहते हैं कि हम भी इस पर चर्चा करना छोड़ दें। वे चाहते हैं कि हम हिंदु-मुस्लिम विवाद या फिर मंदिर-मस्जिद पर चर्चा करें। माले महासचिव ने कहा कि तीन साल पहले नरेंद्र मोदी ने देश में अचानक नोटबंदी कर दी थी। फिर आधा-अधूरा जीएसटी लेकर आए। लगातार उनकी सरकार अंबानी-अडानी और बड़े पूंजीपतियों की ही सेवा में लगी रहती है। यही कारण है कि आज देश भीषण मंदी के दौर से गुजर रहा है। मंदी का असर ऐसा है कि पांच रुपये वाले बिस्किट पर भी संकट आ गया है। राशन-व्यवस्था नहीं चल रही है। भूख से लगातार मौतें हो रही हैं। न जेब में पैसे हैं, न मनरेगा में काम है, न मजदूरी है। यह मंदी किसी प्राकृतिक कारण से नहीं है।

बिहार के खेग्रामस में अखिल भारतीय खेत और ग्रामीण मजदूर सभा का 6वां राज्य सम्मेलन हुआ। गर्दनीबाग स्थित गेट पब्लिक लाइब्रेरी के मैदान में बिहार के हजारों खेत-ग्रामीण और मनरेगा मजदूरों ने शिरकत की। दीपांकर भट्टाचार्य ने उन्हें संबोधित करते हुए कहा कि आर्थिक मंदी से सब लोग परेशान हैं। छोटे पूंजीपतियों से लेकर व्यवसायी परेशान हैं। मोदी ने मंदी दूर करने के नाम पर रिजर्व बैंक का एक लाख 76 हजार करोड़ रुपये ले लिया। उसका खर्च आर्थिक संकट के समाधान में होना चाहिए था। वृद्धा, विधवा, विकलांगों को कम से कम 3000 रु. प्रति माह पेंशन मिलना चाहिए थी। यह पैसा गरीबों के पास होता तो यह फिर इसी बाजार में खर्च होता। मनेरगा में साल भर रोजगार की गारंटी और 500 रु. न्यूनतम मजदूरी की गारंटी की जाती,  लेकिन सरकार ने वह पैसा मजदूरी या पेंशन में खर्च करने की बजाए उलटे पूंजपतियों को ही देने में लग गय़ई। इससे आम लोगों का संकट और बढ़ेगा।

माले महासचिव ने एनआरसी पर सवाल उठाया। कहा कि असम के बाद भाजपा-आरएसएस पूरे देश में एनआरसी लागू करना चाहती हैं। 1951 के पहले के कागजात मांगे जा रहे हैं। अब उसके आधार पर नागरिकता की सूची बनेगी। जबकि कागजी तौर पर ही सही, बिहार और अधिकांश राज्यों में जमींदारी उन्मूलन 1951 के बाद हुआ है। यानी कि यह सरकार हमें अब जमींदारी के दौर में ले जाना चाहती है। अधिकांश गरीबों के पास आज भी जमीन के कोई कागजात नहीं है। इसलिए इस एनआरसी का पूरे देश में जबरदस्त विरोध होना चाहिए, क्योंकि इसकी सर्वाधिक मार दलित गरीबों, मजदूर-किसानों पर ही पड़ने वाली है।

सुप्रीम कोर्ट के आए फैसले के संबंध में उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 1992 में बाबरी मस्जिद को गिराया जाना गलत है। अतः जिन्होंने बाबरी ढांचा गिराया उन्हें सजा मिलनी ही चाहिए। हमें किसी मंदिर-मस्जिद विवाद में नहीं पड़ना है, बल्कि शिक्षा, रोजगार, जमीन, राशन-किरासन, मजदूरी, पेंशन आदि सवालों पर अपने आंदोलन को आगे बढ़ाना है। आज बिहार में भी सांप्रदायिक ताकतों की चांदी है। पर्व-त्योहार की आड़ में दंगा-फसाद को बढ़ावा दिया जा रहा है। हाल ही में जहानबाद में हमने देखा कि किस प्रकार अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों पर हमले हुए। छठ के मौके पर मधेपुरा के डीएम ने सांप्रदायिक उन्माद बढ़ाने वाले बयान दिए। हमें इन तमाम चीजों से सावधान रहना है।

उन्होंने कहा कि बिहार में विधानसभा चुनाव आने वाला है। इस चुनाव में गरीबों की अपनी दावेदारी दिखलानी होगी। बिहार के गरीबों के विकास से ही बिहार का विकास होगा। चुनाव जनता के मुद्दों पर होने चाहिए और भाजपा-आरएसएस द्वारा फैलाए जा रहे झूठ-अफवाह और झांसे में हमें नहीं आना है। इधर-उधर पाला बदलने वाली पार्टियों से भी हमें सतर्क रहना है।

सम्मेलन में महिलाओं की भी बड़ी संख्या शामिल थी। यह सम्मेलन नफरत नहीं रोजगार चाहिए, बराबरी का अधिकार चाहिए और मनरेगा में कम से कम 200 दिन काम और प्रति दिन 500 रु. प्रति दिन न्यूनतम मजदूरी की मांग पर आयोजित था।

पूर्व सांसद रामेश्वर प्रसाद, विधायक दल के नेता महबूब आलम, विधायक सत्यदेव राम, विधायक सुदामा प्रसाद, आशा कार्यकर्ता संघ (गोप गुट) की राज्य अध्यक्ष शशि यादव, रसोइया संघ की नेता सरोज चैबे, ऐपवा की महासचिव मीना तिवारी आदि नेताओं ने भी सभा को संबोधित किया। शुरुआत संगठन के राष्ट्रीय महासचिव धीरेन्द्र झा ने स्वागत भाषण से किया। संचालन खेग्रामस के बिहार राज्य अध्यक्ष वीरेंद्र प्रसाद गुप्ता और राज्य सचिव गोपाल रविदास ने की। भाकपा-माले के वरिष्ठ नेता स्वदेश भट्टाचार्य, माले के बिहार राज्य सचिव कुणाल, केडी यादव, आरएन ठाकुर, अरुण सिंह, शिव सागर शर्मा, पंकज सिंह आदि नेता मौजूद रहे।

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