Subscribe for notification

राम (लला) राज में धोबियों की नहीं, गधों की होगी सुनवाई!

कलयुग के ज़मीनी विवाद की पुरातात्विक खुदाई से देश में त्रेता युग के बाल कांड का प्रारंभ हुआ है। सरकार अब प्रभु के बाल चरित्र अवतार की ओर से धर्म और सत्ता का एक साथ पालन करेगी। इसके लिये सत्ता के सबसे बड़े मंदिर में प्रभु की खड़ाऊं रख कर उनकी प्राण प्रतिष्ठा की जाएगी और ये सब नारियल फोड़ने वाले वैज्ञानिकों की देखरेख में होगा ताकि आस्था को विज्ञान और तर्क के चोले में सजाया जा सके। अब देखना धीरे-धीरे राम (लला) राज में हमारे आस-पास रामायण के सभी पात्र जीवंत हो उठेंगे। बाली, सुग्रीव, जटायु, केवट, शबरी और शम्बूक अपने-अपने चरित्र को पुन: आत्मसात कर लें। भक्त शिरोमणि बजरंग बली तो अजर अमर हैं ही और अब किसी भी दिन पधार सकते हैं। देश में हमारे पूर्वज मर्कटों की नयी पीढ़ी की अत्याधुनिक सेना भी पहले से तैयार है जिसमें अब वैज्ञानिक, अभियन्ता, नीति नियंता, कलाकार और न्यायविद् सभी शामिल हैं।

हम सब मिल कर तय कर चुके हैं कि इस नये भारत में प्रलय के दिन तक जुमलावतार के नेतृत्व में नमो नारायण का जाप करेंगे। सत्ता का रथ धर्म के पहियों पर दौड़ेगा। देशभक्ति की चाबुक सारथी बने आम आदमी की पीठ पर जैसे ही मतदान का निशान छोड़ेगी वैसे ही लगाम कसे घोड़े हिनहिना कर अच्छे दिनों की ओर भागेंगे। कर्मकांड के तौर पर पूर्व निर्धारित सत्ता को कुछ लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से गुजरना होगा ताकि आम प्रजा का भरोसा बना रहे कि मानव वेशधारी प्रभु की इच्छा में उनकी इच्छा शामिल है। इसी तरह प्रभु के मन की बात ही क़ानून होगी और वचन ही न्याय होंगे। यानी प्राण जाये पर वचन न जाये लिहाज़ा फ़ैसला वही सही माना जाएगा जिसे प्रभु की सरकार खुशी खुशी अमल करा सके।

प्रभु और भक्त दोनों जानते हैं कि सत्ता जब धर्म के पाले में खड़ी हो जाती है तो सत्ता का विरोधी खुद ब खुद अधर्मी या विधर्मी बन जाता है जिनका नाश करना ही राजधर्म है। ये बात पहले भी साबित की जा चुकी है। नये भारत के इस पुरातन युग में आम प्रजा अपना काम धार्मिक और वर्ण व्यवस्था के मुताबिक पूरी ईमानदारी और निष्ठा से करेगी। उसके चारों ओर सत्ता हित में बने क़ानूनों की लक्ष्मण रेखा खींची जाएगी। इसे पार करने और प्रभु की सत्ता पर संदेह जताने वाला गद्दार और देशद्रोही राक्षस समझा जाएगा। यानी इस सत्ता में एक दिन कोई विपक्ष नहीं होगा और प्रत्येक नागरिक प्रभु के बाल चरित्र के ठुमकने और पैजनिया बजने जैसी कलाओं में खोकर अपने बच्चों के भविष्य को रामलला भरोसे छोड़ देगा। इस त्रेता युगीन कलियुग में किसी भी मंत्री या अफसर को बेईमान कहना प्रभुसत्ता की मानहानि माना जाएगा। भ्रष्टाचार को राजरोग घोषित किया जाएगा ताकि आम आदमी इससे दूर रहे। नये भारत में आम को सिर्फ़ चूस कर खाया जाएगा और इस बार धोबियों की नहीं गधों की सुनी जाएगी।

नये दौर में पुरातन ज्ञान और विज्ञान का सत्ता ऋषि नारद पहले की भांति स्वयं प्रचार प्रसार करेंगे। इतिहास का रामायणीकरण होगा और शल्य चिकित्सा को गजोन्मुखी बनाया जाएगा। पर्यावरण की शुद्धता के लिये प्लास्टिक सर्जरी पर बैन लगाया जाएगा। अगस्त्य मुनि का अनुसरण कर पड़ोसी शत्रु देशों को जाने वाला पानी पीकर समुद्र में विसर्जित करने की योजना बनायी जाएगी। शोध के ज़रिए नींबू मिर्च से सकारात्मक ऊर्जा का उत्पादन कर प्रजा के सभी दुःख हर लिये जाएंगे। राफेल का नाम बदल कर पुष्पक विमान किया जाएगा और श्राप को अमोघ शस्त्र के रूप में विकसित किया जाएगा। प्राचीन संस्कारों का आधुनिक युवाओं में नव बीजारोपण करने वाले ब्रह्मकुमारों को सोने के दूध वाली स्वदेशी गायें उपहार स्वरूप दी जाएंगी।

नये भारत में विरोधियों को लंकेश और बिकने वाले घोड़ों को विभीषण की उपाधि से नवाज़ा जाएगा। लोगों में बाली और सुग्रीव की तरह आपसी भाईचारा होगा। उद्धार के लिये अहिल्याओं को ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना होगा। उन्हें तुरंत स्टोन क्रशरों के हवाले कर दिया जाएगा। महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने के लिये साध्वी का प्रोफेशनल कोर्स करना होगा। इसके लिये बाबाओं के आश्रमों और गुफाओं का इस्तेमाल किया जाएगा। विकास का स्वर्ण मृग चुनावी कर्मकांड से पहले सबके सामने स्वच्छंद विचरण करेगा और सबको जोश दिलाएगा। ईवीएम महाराज की झोली भरते ही मृग पांच साल के लिये ओझल हो जाएगा।

गांधी का रामराज तो महज़ एक सपना था जबकि नये भारत में अब ये यथार्थ बन कर राम (लला) राज के तौर पर विराजमान हो चुका है। पूरी दुनिया के लोग हमें देख कर कह रहे हैं, क्या बात है गुरू! इससे स्पष्ट होता है कि पूरा विश्व हमें गुरू मान चुका है। भक्त जानते हैं कि प्रभु की इच्छा है तो सब मुमकिन है। इसीलिए वैज्ञानिक आस्था के नाम पर हमारा अश्वमेध अभियान अभी रुका नहीं है। अब हम अंतरिक्ष में जाकर उन जगहों पर भी अपना कब्ज़ा मांगेंगे जो हमारी आस्था से जुड़े हैं। सबसे पहले चंदा मामा को आस्था का सवाल बना कर पुरातत्व विभाग की खुदाई और वैज्ञानिक तर्कों के सहारे उस पर कब्ज़ा किया जाएगा।

हम अपने पूज्य मामा को ईद का चांद नहीं बनने देंगे। इसी मक़सद से चंद्रयान भेजकर अपने सांस्कृतिक पदचिह्न पहले ही वहां छोड़े जा चुके हैं। हमें पूरा विश्वास है कि एक दिन दूसरे पक्ष को दूरबीन के सहारे किसी दूसरे ग्रह का चंद्रमा देख कर संतोष करना पड़ेगा क्योंकि हमारी संस्कृति का मूल ही है वसुधैव कुटुम्बकम् यानी पूरी धरती चांद सितारे और सारे ब्रह्मांड की ज़मीन हमारे परिवार की है।

(भूपेश पंत वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल देहरादून में रहते हैं।)

Donate to Janchowk!
Independent journalism that speaks truth to power and is free of corporate and political control is possible only when people contribute towards the same. Please consider donating in support of this endeavour to fight misinformation and disinformation.

Donate Now

To make an instant donation, click on the "Donate Now" button above. For information regarding donation via Bank Transfer/Cheque/DD, click here.

Share