Sat. Aug 24th, 2019

डूटा पर संघ के कब्ज़े की हर कोशिश नाकाम, वामपंथ ने फिर लहराया परचम

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दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (DUTA) के चुनाव में लगातार चौथी बार वामपंथी संगठन डीटीएफ (DTF) ने बाज़ी मारी। यह जीत सरकार की शिक्षा नीतियों के विरोध के रूप में देखी जा रही है। शिक्षक संगठन चुनाव के इन नतीजों का असर 12 सितंबर को होने जा रहे छात्र संघ चुनाव पर भी देखने को मिल सकता है।

डीटीएफ के राजीव रे की जीत

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अभी 31 अगस्त को संपन्न हुए DUTA के इन चुनाव में वामपंथी संगठन DTF के राजीव रे, जो किरोड़ीमल कॉलेज में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर हैं, ने अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी भाजपा समर्थित NDTF के वीएस नेगी को 261 मतों से पराजित किया। तीसरे स्थान पर AAD और UTF के संयुक्त उम्मीदवार सुरेंद्र सिंह राणा रहे। चुनाव में कुल 4 उम्मीदवार थे। चौथे स्थान पर सुनील बाबू रहे जो सिर्फ 48 मत ही प्राप्त कर सके।

वोटों का बंटवारा कुछ इस तरह रहा- राजीव रे 2636, वीएस नेगी 2375, एसएस राणा 1930 और सुनील बाबू 48।

15 एग्जीक्यूटिव

चुनाव में डूटा (DUTA) एग्जीक्यूटिव के लिए कुल 19 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे जिसमें से 15 ने जीत दर्ज की। इसमें DTF के तीन, NDTF के चार, AAD के चार, INTEC के दो, UTF का एक और एक निर्दलीय उम्मीदवार विजयी रहे।

इन्हीं 15 सदस्यों में से DUTA के दूसरे पदाधिकारी चुने जाएंगे जैसे उपाध्यक्ष, सचिव, संयुक्त सचिव और कोषाध्यक्ष।

विश्वविद्यालय की ओर से नियुक्त चुनाव अधिकारी प्रोफेसर उज्ज्वल कुमार सिंह ने बताया कि चुनाव में कुल 7386 मत पड़े जिनमें 377 मत अवैध घोषित किए गए जबकि कुल मतों की संख्या 9682 थी।

डीटीएफ की जीत का महत्व

DTF की यह जीत कई मायनों में महत्वपूर्ण है। पहली बात यह है कि यह जीत DTF की लगातार चौथी जीत है। इससे पहले अमरदेव शर्मा और नंदिता नारायण DUTA अध्यक्ष रहे हैं। इस बार यह कहा जा रहा था की एंटी इनकंबेंसी एक बड़ा कारण बनेगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं देखा गया। DTF ने इसे एक ऐतिहासिक जीत बताते हुए कहा है कि ऐसे समय में जबकि केंद्र सरकार ने नीति आयोग द्वारा बनाए गए खाके को पूरी तरह लागू किया है जो शिक्षा में निजीकरण की बात करता है, यह चुनाव शिक्षा और शिक्षकों के अधिकारों और सम्मान को बचाने के मुद्दे पर लड़ा गया। लगातार चौथी जीत इस बात का सबूत है कि DTF पूरी ईमानदारी और निडरता से और बिना किसी समझौते के आम शिक्षकों के मुद्दों के लिए लड़ता रहा है। और यह जीत शिक्षकों के DTF में भरोसे का सबूत है। अपनी जीत के बाद राजीव रे ने कहा कि NDTF को जिताने में पूरा सरकारी तंत्र लगा रहा मगर शिक्षकों ने DTF के नेतृत्व में पूरा भरोसा जताया है और वह इस भरोसे को बनाए रखने में जी-जान से लगे रहेंगे। सरकार जिस तरह HEFA, MOOCS, SWAYAM, स्ववित्तपोषित कोर्स और ग्रेडिड ऑटोनोमी लाकर पब्लिक फंडिड एजुकेशन को बर्बाद करने में लगी है यह जीत सरकार की शिक्षा नीतियों के विरोध के रूप में देखी जा रही है। DTF शिक्षकों को यह भरोसा दिलाने में कामयाब रहा कि वह पब्लिक फंडिड एजुकेशन को बचाने और बेहतर सेवा शर्तों को दिलाने में जो संघर्ष करता रहा है उससे पीछे नहीं हटेगा।

चुनाव के अहम मुद्दे

इस चुनाव के मुख्य मुद्दे वास्तव में स्थायी नियुक्तियां, शिक्षकों की पदोन्नति और API को हटाना, पेंशन, आरक्षण को सही रोस्टर के साथ लागू करना तथा नया पे कमीशन ही थे। इनमें भी सबसे अहम मुद्दा कई वर्षों से रुकी पड़ी स्थायी नियुक्तियों को दोबारा शुरू करना था।

यहां यह बताना जरूरी लगता है कि दिल्ली विश्वविद्यालय में लगभग 5000 शिक्षक एडहॉक या गैस्ट की तरह काम कर रहे हैं। इन शिक्षकों में अपने भविष्य को लेकर बहुत चिंता है और इस चिंता को दूर करने के लिए सरकार ने अभी तक कुछ नहीं किया है। पिछले साल मई-जून में यूजीसी द्वारा लाए गए थर्ड अमेंडमेंट (तीसरे संशोधन), जिससे स्थायी शिक्षकों की संख्या में भारी कटौती आती, का DUTA द्वारा जबरदस्त विरोध करना और एक बड़े आंदोलन के बाद उसे वापस कराने में तत्कालीन DUTA अध्यक्ष नंदिता नारायण की विशेष भूमिका रही। इस आंदोलन के बाद उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद ही स्थायी नियुक्तियों की प्रक्रिया शुरू हो पायी थी। मगर उसमें भी कुछ अनियमितताएं देखने को मिली जिससे एडहॉक शिक्षक बहुत नाराज थे।

प्रमोशन और एपीआई भी रहे बड़े मुद्दे

प्रमोशन और एपीआई दूसरे बड़े मुद्दे थे जिनकी वजह से शिक्षकों में व्यापक नाराजगी देखी गई। दिल्ली विश्वविद्यालय में ऐसे लगभग 2500 शिक्षक हैं जिनकी पदोन्नति कई वर्षों से रुकी हुई है। इसके लिए भी कुलपति सहित मानव संसाधन मंत्रालय तक को DUTA कई बार ज्ञापन दे चुका है मगर अभी तक कुछ नहीं हुआ है परिणाम स्वरूप शिक्षकों को हाईकोर्ट जाना पड़ा और इसमें भी DUTA ने शिक्षकों का पूरा साथ दिया है।

शिक्षकों की पदोन्नति को लेकर DUTA ने पे रिव्यू कमेटी के सामने भी शिक्षकों की मांगों को बड़े जोरदार तरीके से रखा था जिस पर सरकार ने अभी तक कोई कदम नहीं उठाया है और यह भी शिक्षकों के एक बड़े तबके में असंतोष की वजह बना हुआ है। सरकार ने जिस तरह सेवानिवृत्त शिक्षकों की पेंशन को रोका बावजूद इसके कि माननीय उच्च न्यायालय ने शिक्षकों के पक्ष में फैसला दिया था, बहुत अमानवीय है। यह बात भी वरिष्ठ शिक्षकों में एक बड़े असंतोष की वजह है। 2469 में से जिन शिक्षकों को विश्वविद्यालय में 1987 से 1998 के दौरान GPF में रखा था उनमें से जून 2014 के बाद सेवानिवृत्त होने वाले किसी भी शिक्षक को आज तक पेंशन नहीं मिली है। और इस बात को लेकर लगभग पूरे शिक्षक समाज में है एक असंतोष और नाराजगी है।

पे-रिव्यू पर भी बात

केंद्रीय कर्मचारियों को सातवां वेतन मिले समय हो गया मगर शिक्षकों को अभी तक इसके बारे में कोई ख़बर नहीं है। नंदिता नारायण की अगुआई में DUTA ने 23 सितंबर, 2016 को एक ज्ञापन यूजीसी पे रिव्यू कमेटी को दिया था जिसमें शिक्षा और शिक्षकों से जुड़े तमाम मुद्दे उठाए गए थे। DUTA, FEDCUTA और AIFUCTO के भारी दबाव के चलते यूजीसी पे रिव्यू ने हालांकि अपनी रिपोर्ट 22 फरवरी, 2017 को सौंप दी थी मगर इसे आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया है। इससे शिक्षकों को आशंका है कि सरकार कुछ न कुछ नकारात्मक करना चाह रही है क्योंकि इसी बीच मानव संसाधन मंत्रालय ने यह कहा है कि पे रिवीजन से होने वाले खर्च का वह सिर्फ 70 प्रतिशत् हिस्सा ही देगी बाकी का 30 प्रतिशत् हिस्से की व्यवस्था कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को स्वयं करनी होगी। इस कदम का DUTA ने पूरा विरोध किया है और शिक्षकों ने इस विरोध में उसका पूरा पूरा साथ दिया है।

रिजर्वेशन और सही रोस्टर को लेकर भी DUTA ने अपने पक्ष को बड़ी मजबूती से रखा था और दिल्ली विश्वविद्यालय के ऐसे किसी भी कदम का विरोध किया था जिससे की आरक्षण नीति पर चोट पहुंचती हो। DUTA के इन तमाम कामों पर शिक्षक समाज की बारीक नजर थी और नंदिता नारायण के समर्थ नेतृत्व की भी खूब सराहना भी की गई।

सभी मुद्दों पर हुई खुलकर बात

इन चुनावों में इन सभी मुद्दों पर खुलकर बातचीत हुई और राजीव रे यह विश्वास दिलाने में कामयाब रहे कि जिन मुद्दों पर DUTA लड़ती आई है वह लड़ाई और ताकत के साथ लड़ी जाएगी और शिक्षकों के मुद्दों और सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा। इन सब बातों को ध्यान में रखकर ही बेहद खराब मौसम के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में शिक्षक बाहर आए और अपना मत DTF के पक्ष में दिया।

छात्र संघ चुनाव पर भी पड़ सकता है असर

शिक्षक संगठन के इन चुनावों का असर दूसरे चुनावों पर देखने को मिल सकता है। दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्र संगठन के चुनाव भी 12 सितंबर को होने हैं और उन चुनावों में यह देखना दिलचस्प रहेगा के छात्र किन मुद्दों के आधार पर अपने मत का प्रयोग करते हैं।

(संजीव कौशल एक चर्चित कवि और दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर हैं।)

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