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झारखंड: एंबुलेंस देर से पहुंचने पर हुई नवजात की मौत पर एनएचआरसी ने दिया 1 लाख के मुआवजे का आदेश

झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिला के चाकुलिया प्रखंड अंतर्गत नरसिंहपुर गांव की मेनका पातर को 5 सितंहर, 2018 को प्रसव पीड़ा प्रारंभ होने के बाद 108 एंबुलेंस को फोन किया गया। एक घंटे के बाद भी एंबुलेंस उन तक नहीं पहुंची। परिणामस्वरूप घर में ही प्रसव हुआ और नवजात की मौत हो गई। मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में पहुंचा। आयोग ने इसे मानवाधिकार उल्लंघन मानते हुए झारखंड के मुख्य सचिव, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सचिव को 5 जनवरी, 2021 को चार सप्ताह के अंदर पीड़िता मेनका पातर को एक लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है।

5 सितंबर, 2018 को झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिला के चाकुलिया प्रखंड अंतर्गत नरसिंहपुर गांव की मेनका पातर को प्रसव पीड़ा प्रारंभ हुई। मेनका के परिजनों ने यह जानकारी सहिया हेमंती पातर को दी। सहिया हेमंती पातर ने यह सूचना तुरंत 108 एंबुलेंस को दी, लेकिन एंबुलेंस एक घंटे के बाद पहुंची और तब तक मेनका का प्रसव घर में ही हो गया था। जच्चा-बच्चा को एंबुलेंस आने के बाद सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, लेकिन वहां डॉक्टर ने नवजात को मृत घोषित कर दिया। यह मामला उस समय तमाम अखबारों की सुर्खियां भी बना, लेकिन कोई आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं हुआ।

लगभग छह महीने के बाद अखबारों में छपी खबर पर मानवाधिकार कार्यकर्ता ओंकार विश्वकर्मा की नजर पड़ी और उन्होंने अखबारों में छपी खबर के आधार पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में 22 फरवरी, 2019 को एक आवेदन देकर दोषी पदाधिकारी पर प्राथमिकी दर्ज करते हुए कानूनी कार्रवाई करने की मांग की।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले को गंभीरता से लिया और झारखंड के मुख्य सचिव को ‘शो काज’ नोटिस जारी किया। आयोग ने पूछा कि इस मामले में झारखंड पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं की और क्यों नहीं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एक लाख रुपये का जुर्माना मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में देने का आदेश दे? लेकिन झारखंड के मुख्य सचिव और स्वास्थ्य विभाग के सचिव ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को कोई जवाब नहीं दिया।

अंततः राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 8 अक्तूबर, 2020 को झारखंड के मुख्य सचिव को आदेश दिया कि चार सप्ताह के अंदर पीड़िता मेनका पातर को एक लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। साथ ही स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव को भी डिपार्टमेंटल एक्शन लेने का आदेश दिया। तब जाकर 1 दिसंबर, 2020 को स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त सचिव ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को जवाब दिया कि गांव तक पहुंचने के लिए दो किलोमीटर का रास्ता काफी खराब होने के कारण एंबुलेंस देरी से पहुंची। फिर भी सिविल सर्जन ने आपराधिक मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया है और एक लाख का मुआवजा पीड़िता को देने पर भी अपनी सहमति जताई है।

स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त सचिव के उपरोक्त जवाब के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 5 जनवरी, 2021 को झारखंड के मुख्य सचिव, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सचिव को आदेश दिया है कि चार सप्ताह यानी 12 फरवरी, 2021 के अंदर पीड़िता मेनका पातर को एक लाख रुपये का मुआवजा देने के भुगतान प्रूफ के साथ दोषियों पर कार्रवाई की रिपोर्ट दें।

(झारखंड से स्वतंत्र पत्रकार रूपेश कुमार सिंह की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on January 6, 2021 2:03 pm

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