Sunday, October 17, 2021

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आप की दिल्ली जीत के बाद पंजाब में बदलेंगे सियासी समीकरण

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दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जबरदस्त जीत का असर पंजाब की राजनीति पर पड़ना तय है। दिल्ली के बाद पंजाब दूसरा ऐसा राज्य है जहां पार्टी ने अपना जनाधार और अलहदा पहचान बनाई है। पंजाब विधानसभा में आप मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में है। राज्य से उसका एक सांसद भी लोकसभा में है। बेशक बीते तीन साल में आप की पंजाब इकाई निरंतर विघटन का शिकार रही। इस स्थिति ने पार्टी को लुंज-पुंज अथवा कमजोर स्थिति में ला दिया।

दिल्ली चुनाव में ऐतिहासिक जीत का सबसे ज्यादा असर पंजाब में पड़ता दिखाई दे रहा है। एक ही दिन में समीकरण बदल गए हैं। पंजाब में हताशा की कगार पर खड़ी आप को दिल्ली के नतीजे नई संजीवनी दे गए हैं। इसे भाजपा-अकाली गठबंधन और राज्य में सत्तासीन कांग्रेस भी कहीं दबे तो कहीं मुखर स्वर में स्वीकार कर रही है। दिल्ली की जीत पंजाब में जहां आम आदमी पार्टी के लिए मुफीद साबित हो रही है वहीं भाजपा-अकाली गठबंधन और कांग्रेस के लिए नागवार। सत्ता की अदला-बदली इन दोनों पुराने दलों के बीच होती रही है और अब आप की दावेदारी नए सिरे से पुख्ता हो गई है।

अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली जीतने के बाद स्पष्ट संकेत दिए हैं कि उनका अगला मिशन 2022 में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव में आप की सरकार बनाना है। प्रतिद्वंद्वियों का एक मत है कि अब पंजाब केजरीवाल तथा आप की नई ‘शिकारगाह’ होगा। 

सन् 2017 के विधानसभा चुनाव में मतदाताओं के एक बड़े तबके ने आम आदमी पार्टी में भरोसा जताया था। आप अकाली-भाजपा गठबंधन को दरकिनार करके कांग्रेस के बाद दूसरे नंबर पर आई। आप के 20 विधायक बने और उसे राज्य विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल का वह दर्जा हासिल हुआ जो कभी अकाली-भाजपा गठबंधन तो कभी कांग्रेस को हासिल होता था। सबसे बड़ा झटका गठबंधन को लगा था। मालवा अकाली राजनीति और सूबे के सबसे बड़े दिग्गज प्रकाश सिंह बादल का गढ़ माना जाता है। आप ने उन्हें यहीं सबसे बड़ी चुनौती दी थी। मालवा के संगरूर से ही भगवंत मान सांसद बने थे।

हालांकि पिछले लोकसभा चुनाव में आप ने पंजाब से चार लोकसभा सीटें जीत कर एक और इतिहास बनाया था। 20 विधायकों के साथ विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल बनना भी ऐतिहासिक था। इससे पहले कोई भी गैरअकाली और गैरकांग्रेसी पार्टी विधानसभा में मुख्य विपक्ष की भूमिका में कभी नहीं आई। आप को विधानसभा से लेकर सड़क तक ‘तीसरे विकल्प’ के तौर पर मान्यता मिली।

आम आदमी पार्टी का विधायक दल एकजुट नहीं रह पाया और कई बार टूटा। फिर भी आप अभी भी विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में है। सशक्त होने के बावजूद एक नवोदित राजनीतिक दल की तमाम विसंगतियां और अपरिपक्वता उसमें थीं और हैं। बीते तीन साल में अगर आप लगातार टूटती-बिखरती और कभी-कभार संभलती रही तो राज्य की राजनीति में भी ऐसे महत्वपूर्ण बदलाव आते रहे जो अब (दिल्ली में शानदार जीत के बाद) पंजाब में उसे फिर से मजबूत जमीन मुहैया करवा सकते हैं। राज्य में आप का बिखरा कुनबा फिर से जुड़ने की सरगोशियां तो तभी से चल रही हैं जब से पार्टी की दिल्ली-जीत की प्रबल संभावनाएं सामने आने लगी थीं।

2017 के बाद अगर पंजाब में आम आदमी पार्टी की स्थिति कमजोर हुई तो अकाली-भाजपा गठबंधन तथा कांग्रेस की बनी-बनाई जमीन भी सरकी है। शासन व्यवस्था की बागडोर कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुवाई में कांग्रेस के हाथों में है। राज्य सरकार और कांग्रेस की लोकप्रियता में गिरावट आई है। आंतरिक फूट में इजाफा हुआ है। मुख्यमंत्री के खिलाफ कांग्रेस का एक प्रभावी ‘कॉकस’ सक्रिय है। राज्यसभा सांसद और राज्य कांग्रेस के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा सामने से और ‘बागी’ नवजोत सिंह सिद्धू पर्दे के पीछे से कैप्टन की जड़ें खोखली करने में लगे हैं। कुछ अन्य विधायक भी इन दोनों की शह पर गाहे-बगाहे मुख्यमंत्री के खिलाफ मुखर होकर बोलते हैं।

मौजूदा प्रदेशाध्यक्ष सुनील कुमार जाखड़ भी कभी-कभार अपनी ही पार्टी की सरकार को नीतियों के मुद्दे पर घेरते रहते हैं। इस सबके चलते राज्य में कांग्रेस कमजोर हो रही है और सरकार वादे पूरे न करने के चलते अलोकप्रिय हो रही है। आम कांग्रेसी कार्यकर्ता कहते मिल जाएंगे कि कैप्टन सरकार में भी वही सब कुछ हो रहा है जो अकाली-भाजपा गठबंधन सरकार के वक्त होता था। बिजली का लगातार महंगा होना, बेरोजगारी में बढ़ोतरी और बिगड़ती कानून-व्यवस्था सरकार और कांग्रेस के इकबाल को तार-तार कर रही हैय़ मुख्यमंत्री का आलम यह है कि वह आम लोगों से तो दूर हैं ही, मंत्रियों और कांग्रेसी विधायकों को भी सहज उपलब्ध नहीं होते।

अकाली-भाजपा गठबंधन की दरारें मुतवातर गहरा रही हैं। पंजाब में भाजपा ने ‘अपना मुख्यमंत्री’ का राग अलापा। नागरिकता संशोधन विधेयक पर भी शिरोमणि अकाली दल ने अलग रुख अख्तियार किया। हरियाणा विधानसभा चुनाव में दोनों के बीच का गठजोड़ टूटा। दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने शिरोमणि अकाली दल की खुली अवहेलना की और बाद में मनाया-रिझाया।

दिल्ली में पहले गठबंधन तोड़ने की घोषणा और फिर अनमने ढंग से ‘साथ’ चलने के शिरोमणि अकाली दल के ऐलान का रत्ती भर भी फायदा भाजपा को नहीं हुआ। शिरोमणि अकाली दल के दिल्ली इकाई के प्रमुख नेता मनिंदर सिंह सिरसा के प्रभाव क्षेत्र माने जाने वाले विधानसभा हलके में भी भाजपा की शर्मनाक हार बताती है कि दिल्ली के सिख मतदाताओं ने दिल से किसका ‘साथ’ दिया।

इस संवाददाता को पंजाब में नाम न छापने की शर्त पर कई वरिष्ठ अकाली नेताओं ने कहा कि शिरोमणि अकाली दल ने महज भाजपा का लिहाज रखने के लिए दिल्ली में समर्थन की घोषणा की थी। दिल्ली के सिख मतदाताओं के बीच कतई ऐसा काम नहीं किया जिससे और नहीं तो भाजपा का मत प्रतिशत ही थोड़ा-बहुत बढ़ता। भाजपा की पंजाब इकाई के कतिपय वरिष्ठ नेता भी ऐसा मानते हैं। ठीक यही आकलन आरएसएस (फीडबैक पर आधारित) का है। ऐसे में अकाली-भाजपा गठबंधन शायद ज्यादा दिन नहीं चलेगा।

खुद शिरोमणि अकाली दल गहरी फूट का जबरदस्त शिकार है। राज्यसभा सांसद सुखदेव सिंह ढींडसा, विधानसभा में अकाली विधायक दल के नेता परमिंदर सिंह ढींडसा सरीखे पुराने दिग्गज अकाली शिरोमणि अकाली दल से किनारा कर चुके हैं और टकसाली अकाली दल से मिलकर बादलों को तगड़ी टक्कर दे रहे हैं। पंथक मसलों को लेकर भी बादलों की सरपरस्ती वाले शिरोमणि अकाली दल का आम प्रभाव भोथरा हो रहा है। 

इस सारे परिदृश्य में आम आदमी पार्टी के लिए, दिल्ली की जीत के बाद नई संभावनाएं नए सिरे से पुख्ता हुईं हैं। अरविंद केजरीवाल के इस कथन के बाद कि अब पंजाब में ‘दिल्ली मॉडल’ लागू किया जाएगा, राज्य में आम आदमी पार्टी में नई जान आ गई है। सांसद भगवंत मान ने पुष्टि की है कि राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर अब पंजाब में आप को मजबूत करने तथा सत्ता के करीब लाने का ‘मोर्चा’ संभालेंगे। उनके मुताबिक अरविंद केजरीवाल शपथ ग्रहण के बाद पंजाब का दौरा करेंगे और संगरूर से बठिंडा तक उनका रोड शो निकाला जाएगा।

विधानसभा में विपक्ष के नेता हरपाल सिंह चीमा कहते हैं, “पुरानी गलतियों से सबक लेकर नई शुरुआत की जाएगी। पार्टी छोड़ चुके पुराने साथियों को मनाकर साथ लाया जाएगा। 2022 का विधानसभा चुनाव हम दिल्ली की तर्ज पर एकजुट होकर लड़ेंगे।” आप के वरिष्ठ नेता विधायक अमन अरोड़ा के अनुसार, “दिल्ली की जीत ने पंजाब इकाई में नए उत्साह और उम्मीद का संचार किया है। पंजाब में अगली सरकार हमारी होगी।”

दिल्ली की जीत ने पंजाब में आम आदमी पार्टी में नई उम्मीदें जगाई हैं। ऐसा प्रतिद्वंदी राजनीतिक दल भी मानते हैं। पंजाब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुनील कुमार जाखड़ कहते हैं, “आम आदमी पार्टी पंजाब में मर रही थी लेकिन अब दिल्ली की जीत ने उसे वेंटिलेटर पर ला दिया है। मानना चाहिए कि बदले हालात में वह हमारे (कांग्रेस) के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है, लेकिन हमसे ज्यादा खतरा अकाली-भाजपा गठबंधन को है।” शिरोमणि अकाली दल के वरिष्ठ नेता डॉ दलजीत सिंह चीमा भी स्वीकार करते हैं कि दिल्ली में आप की जीत के बाद पंजाब के सियासी समीकरण बदलेंगे और आप कुछ मजबूत होगी।                         

भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक आप से किनारा कर चुके विधायक दल के पूर्व नेता सुखपाल सिंह खैहरा सहित कई अन्य, आम आदमी पार्टी छोड़ चुके वरिष्ठ नेता वापिस लौट सकते हैं। भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आने वाले नवजोत सिंह सिद्धू ने कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ खुली बगावत करके मंत्री पद गंवाया था। तब से वह राजनीतिक सन्यास में और हाशिए पर हैं। कयास हैं कि उन्हें दिल्ली चुनाव के बाद सूबे में बनने वाले नए समीकरणों का शिद्दत से इंतजार था और अब वह आम आदमी पार्टी में शामिल हो सकते हैं।

भगवंत मान पहले ही कह चुके हैं कि अगर नवजोत सिंह सिद्धू आप में शामिल होते हैं तो उन्हें पार्टी संगठन में ‘बड़ा पद’ दिया जा सकता है और उनके लिए ‘भविष्य’ में भी बहुत कुछ किया जा सकता है। इन संकेतों को सभी समझते हैं। भाजपा छोड़ने के बाद नवजोत सिंह सिद्धू ने सबसे पहले आम आदमी पार्टी का दरवाजा ही खटखटाया था। वह चाहते थे कि उन्हें ‘वेटिंग सीएम’ घोषित किया जाए। ऐसा न होना था न हुआ। इसलिए वह कांग्रेस में आ गए।

अरविंद केजरीवाल से पंजाब के आम आदमी पार्टी के असंतुष्टों और बागियों को सबसे बड़ी शिकायत यह थी कि वह तानाशाही से काम लेते हैं। पंजाब के मामलों में स्थानीय नेताओं से ज्यादा अपने ‘दिल्ली दरबार’ को तरजीह देते हैं। नाराजगी का एक बड़ा कारण बिक्रमजीत सिंह मजीठिया से मानहानि के अदालती मुकदमे में माफी मांगना भी था। ये मसले पंजाब में अब भी कहीं न कहीं अरविंद केजरीवाल की राह में कांटों की मानिंद हैं। यानी नई उम्मीद के साथ पुरानी मुश्किलें भी फिलवक्त बरकरार हैं!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और जालंधर में रहते हैं।)

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