Monday, October 18, 2021

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सरकारी नुकसान की भरपाई को लेकर अब मंजूर हुआ ऑर्डिनेंस, अब तक की वसूली नोटिसें गैरकानूनी

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देश में सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश का दुर्भाग्य है कि यहां सत्तासीन भाजपा की योगी आदित्यनाथ सरकार को यह ही पता नहीं है कि उनकी कौन सी कार्रवाई संविधान सम्मत या कानून सम्मत है और कौन सी कार्रवाई कानून सम्मत नहीं है।

ऐसा लगता है कि प्रदेश की नौकरशाही और पुलिस महकमा अतिशय चापलूसी में लगा है अथवा अज्ञानता का शिकार है। नतीजतन इलाहबाद हाईकोर्ट और उच्चतम न्यायालय में आये दिन उत्तर प्रदेश सरकार की किरकिरी हो रही है।

सबसे ताजा मामला तो लखनऊ में कथित उपद्रवियों के पोस्टर लगाने के फैसले पर हाईकोर्ट से रोक लगने और इस पर सुप्रीम कोर्ट से स्टे न मिलने का है, जिसमें उत्तर प्रदेश के वकील न्यायपालिका को यह ही नहीं बता पाए की किस कानून या कानून के किस प्रावधान के तहत ये पोस्टर लगवाकर संविधान की धारा 21 का उल्लंघन किया गया है।

यही नहीं हिंसा और तोड़फोड़ में जो जुर्माना राज्य सरकार द्वारा अभी तक कथित उपद्रवियों पर लगाया गया है उस पर भी इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है, क्योंकि उसमें भी विधिक प्रावधानों का पालन नहीं किया गया है।

इसके बाद योगी सरकार की गफलत दूर हुई है और यूपी में दंगाइयों के पोस्टर लगाने को लेकर घिरी यूपी सरकार ने उपद्रवियों पर कार्रवाई के लिए एक महत्वपूर्ण अध्यादेश को मंजूरी दी है जो उच्चतम न्यायालय के दावा अधिकरण की स्थापना के निर्देश के तहत है। अर्थात अभी तक की जुर्माना वसूली नोटिस गैर क़ानूनी है।

लखनऊ में उपद्रवियों के पोस्टर लगाने के फैसले पर हाईकोर्ट से रोक लगने और इस पर उच्चतम न्यायालय से स्टे ना मिलने पर योगी सरकार ने शुक्रवार को उत्तर प्रदेश रिकवरी ऑफ डैमेज टू पब्लिक एण्ड प्राइवेट प्रॉपर्टी अध्यादेश-2020 को मंजूरी दी है।

दरअसल उच्चतम न्यायालय ने देश में राजनीतिक जुलूसों, अवैध प्रदर्शन, हड़ताल तथा बंद के दौरान उपद्रवियों द्वारा पहुंचाए गए नुकसान की भरपाई के लिए दावा अधिकरण की स्थापना के निर्देश जारी किए थे। उसी संबंध में यह अध्यादेश मंत्रिपरिषद ने सर्वसम्मति से पारित किया है। सरकार जल्द ही नियमावली बनाएगी, जिसमें सारी चीजें स्पष्ट की जाएंगी।

गौरतलब है कि लखनऊ जिला प्रशासन ने संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ पिछले साल 19 दिसंबर को राजधानी में उग्र प्रदर्शन के मामले में आरोपी 57 लोगों की तस्वीर और निजी जानकारी वाले होर्डिंग जगह-जगह लगवाए हैं। उनमें से कई को सुबूतों के अभाव में जमानत मिल चुकी है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इसका स्वत: संज्ञान लिया था और इसे राइट टू प्रिवेसी का हनन बताते हुए सरकार को 16 मार्च तक होर्डिंग हटाने के आदेश दिए थे।

राज्य सरकार ने इस आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी है। उच्चतम न्यायालय में भी यूपी सरकार नहीं बता पाई की इस क़ानूनी प्रावधान के तहत ये पोस्टर लगाए गए हैं। उच्च न्यायालय ने सरकार से पूछा था कि आखिर किस कानून के तहत उसने वे होर्डिंग लगवाए हैं।

दरअसल, 19 दिसंबर को अचानक लखनऊ की सड़कों पर सीएए विरोध के दौरान हिंसा भड़क उठी थी। पुराने लखनऊ से लेकर हजरतगंज तक हिंसक भीड़ ने इस दौरान जमकर उत्पात मचाया। पुलिस से लेकर मीडिया पर भी हमला हुआ। दर्जनों गाड़ियां फूंक दी गईं, पुलिस चौकी को भी आग के हवाले कर दिया गया।

इस घटना के बाद सीएम योगी ने एलान किया कि किसी भी आरोपी को बख्शेंगे नहीं। यही नहीं उपद्रवियों से सरकार और लोगों को हुए नुकसान की वसूली भी की जाएगी। इसके बाद महीने भर में कई लोगों की गिरफ्तारी हुई।

सरकार की तरफ से आरोपियों को नोटिसें भेजी गईं, जिसके बाद पांच मार्च को लखनऊ जिला प्रशासन की तरफ से लखनऊ के हजरतगंज सहित प्रमुख इलाकों में चौराहों पर आरोपी 57 लोगों की तस्वीरों का पोस्टर लगाया दिया गया। पोस्टर लगते ही मामले ने तूल पकड़ लिया तो हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए नौ मार्च को मामले में सुनवाई की।

सुनवाई करने वालों में चीफ जस्टिस गोविंद माथुर और न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा की खंडपीठ थी। पूरे मामले को सुनने के बाद अदालत ने कहा कि बिना कानूनी उपबंध के नुकसान वसूली के लिए पोस्टर में फोटो लगाना जायज नहीं है। यह निजता के अधिकार का हनन है। बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए किसी की फोटो सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शित करना गलत है। इसके साथ ही अदालत ने सरकार को 16 मार्च को पोस्टर हटा दिए, यह हलफनामा दाखिल करने का निर्देश भी दिया है।

योगी सरकार अपने निर्णय पर अड़ी रही और उसने 11 मार्च को उच्चतम न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दाखिल कर दी। मामले में 12 मार्च को सुनवाई हुई। इस पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय की बेंच ने उत्‍तर प्रदेश सरकार से पूछा कि उन्‍हें आरोपियों का पोस्‍टर लगाने का अधिकार किस कानून के तहत मिला है?

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अभी तक शायद ऐसा कोई कानून नहीं है, जिसके तहत उपद्रव के कथित आरोपियों की तस्‍वीरें होर्डिंग में लगाई जाएं।

उच्चतम न्यायालय में सुनवाई के बाद इस मामले को बड़ी बेंच के हवाले कर दिया। अब इसकी सुनवाई अगले हफ्ते तीन जजों की पीठ करेगी। इसके साथ ही इस मामले पर उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को हुई सुनवाई में अंतरिम आदेश भी नहीं दिया। कोर्ट ने कहा कि इस तरह का कोई कानून नहीं है, जिससे कि यूपी सरकार के इस कदम को जायज ठहराया जा सके।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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