झारखंड जनाधिकार महासभा ने वकील मनोज टंडन के विरुद्ध हिट एंड रन मामले में जांच पर उच्च न्यायालय के रोक लगाने को लेकर मुख्य न्यायाधीश से हस्तक्षेप करने की अपील की है।
19 फरवरी को झारखंड उच्च न्यायालय ने वकील मनोज टंडन के विरुद्ध हिट एंड रन मामले में चल रही जांच पर रोक लगा दी और उलटे पीड़ित बाइक चालक मवाज़ खान के विरुद्ध मनोज टंडन के सांप्रदायिक आरोप सहित अन्य आरोपों, पर सीबीआई और केंद्र सरकार को मामले में जोड़ दिया है।
इसे लेकर महासभा का मानना है कि यह पूरा मामला निष्पक्षता और न्याय के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है और महासभा ने एक खुले पत्र (संलग्न) के माध्यम से मुख्य न्यायाधीश से हस्तक्षेप की अपील की है।
यह पूरा मामला रांची के डोरंडा इलाके में 17 फरवरी को हुई एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है। घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ है जिसमें हाई कोर्ट के अधिवक्ता मनोज टंडन की मर्सिडीज गाड़ी से एक बाइक सवार युवक मवाज़ खान को टक्कर लगने के बाद उसे गाड़ी के बोनट पर लटकाए हुए वाहन तेज गति से भागते दिखता है। पीड़ित मवाज़ खान ने डोरन्डा थाना में प्राथमिकी दर्ज कारवाई और आरोपी मनोज टंडन ने भी काउन्टर प्राथमिकी दर्ज कारवाई।
इसी मामले में आरोपी वकील मनोज टंडन ने हाई कोर्ट में एक रिट याचिका 19 फरवरी को दाखिल की जिसमें मामले की जांच रोकने और इसे सीबीआई के हवाले करने की प्रार्थना की गई। दोपहर में ही न्यायाधीश संजय कुमार द्विवेदी के बेंच के समक्ष इसकी सुनवाई हो गई।
महासभा ने मुख्य न्यायाधीश का ध्यान इस याचिका के कई बिंदुओं पर केंद्रित किया है। महासभा के अनुसार ऐसा प्रतीत होता है कि हिट-एंड-रन केस को सांप्रदायिक ट्विस्ट देकर पीड़ित को डराने की कोशिश की जा रही है। याचिका में कहा गया है कि पीड़ित मवाज़ खान के इंस्टाग्राम प्रोफ़ाइल में एक स्लोगन है जो प्रतिबंधित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया का स्लोगन है और इसकी जांच नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनएआई) से करवानी चाहिए।
महासभा के अनुसार उनके इंस्टाग्राम प्रोफ़ाइल में सिर्फ़ फ़िलिस्तीन के समर्थन में एक स्लोगन है, जो उनकी अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार है और इत्तेफ़ाक से यह भारत का औपचारिक अंतरराष्ट्रीय स्टैंड भी है।
याचिकाकर्ता मनोज टंडन ने आगे आरोप लगाया है कि उनके ख़िलाफ़ फ़ाइल की गई एफआईआर की जांच पक्षपाती होगी क्योंकि इसे एक “खास कम्युनिटी” के ऑफिसर को सौंपा गया है, जिससे एक मुस्लिम ऑफिसर की ओर इंगित किया गया है।
महासभा ने मुख्य न्यायाधीश से अपील की है कि वे निम्न बिंदुओं पर विचार करें – क्या ऐसी याचिका पर न्यायालय को गंभीरता से लेना भी चाहिए जिसमें बिना किसी ठोस सबूत के, सिर्फ़ किसी व्यक्ति के धर्म या सामाजिक-राजनैतिक मान्यताओं के आधार पर बिना किसी ठोस सबूत के गंभीर आरोप लगाए गए हों, जिनका उसकी बाकी ज़िंदगी पर गंभीर असर पड़ सकता है।
महासभा ने न्यायालय से अपील की है कि वे विचार करें कि किस प्रकार ऐसी याचिका, जो हिट-एंड-रन केस को संप्रदाय आधारित बनाने की कोशिश है, के कारण हिट-एंड-रन के आरोपी मनोज टंडन की जगह पीड़ित मवाज़ खान पर ट्रायल शुरू हो गया है।
महासभा ने मामले के तकनीकी पहलुओं पर भी ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की है और सवाल किया है कि क्या इस केस में रोस्टर का पूरी तरह से पालन किया गया था। और ऐसे केस में फैसला कैसे दिया जा सकता था, जहां एफआईआर की सर्टिफाइड कॉपी पिटीशन के साथ अटैच ही नहीं की गई थी? सवाल यह भी कि क्या पीड़ित मवाज़ खान को केस सुनवाई के दौरान अपना पक्ष रखने को कहा गया था?
इस मामले से झारखंड जैसे राज्य के लोगों के लिए एक मौलिक मुद्दा भी उठता है। एक तरफ हज़ारों विचाराधीन कैदी सालों से राज्य की जेलों में ट्रायल का इंतज़ार कर रहे हैं, दूसरी ओर प्रभावशाली व्यक्ति के याचिका की तेज़ी से सुनवाई और दी गई राहत न्याय तक समान पहुंच के सिद्धांत पर सवाल उठाती है।
अगर हिट-एंड-रन केस का कोई पीड़ित इंसाफ के लिए लड़ने की कोशिश करता है, तो क्या जांच और केस का फैसला पीड़ित के निजी राय, आरोपी की सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक स्टेट्स, पीड़ित और जांच पदाधिकारी के धर्म के आधार पर किया जाएगा, या संविधान के उन सिद्धांतों के आधार पर जिनके लिए हम सब मिलकर ज़िम्मेदार हैं?
मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में हस्तक्षेप कर, मामले में सही और निष्पक्ष सुनवाई और जांच सुनिश्चित करने का अनुरोध किया गया है।
(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)