प्रमु मूरत तो फिर भी ऐसी चीज है, जिसके बारे में हमें प्रत्यक्ष तौर पर नहीं पता। कही-सुनी-पढ़ी बातों के आधार पर प्रभु की मूरत को लेकर हमारी भावनाएं बनती हैं। लेकिन हम तो अपने आसपास के लोगों – घर के बच्चों से लेकर पड़ोसियों, दोस्तों, विरोधियों, सहकर्मियों तक – के बारे में भी पहली राय अपनी भावनाओं के आधार पर ही बनाते हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण बच्चे हैं। शुरू में उनमें झूठ-सच की समझ नहीं होती। हमें ही लगता है कि वे झूठ बोल रहे होंगे।
हम उन्हें जब-तब टोकते रहते हैं कि ‘झूठ क्यों बोल रहे हो?’, ‘झूठ मत बोलो‘ और ‘झूठ नहीं बोलना चाहिए’ वगैरह-वगैरह।
फिल्ममेकर मेघना गुलजार ने एक मौके पर अपना एक अनुभव साझा किया था, तबका जब वह छह-सात साल की रही होंगी। अपने घर के ड्राइवर के साथ वह स्विमिंग के लिए कभी सांताक्रूज तो कभी बांद्रा स्थित क्लब में जाया करती थीं। एक दिन वह क्लब से लौटीं तो पिता गुलजार ने उनसे पूछा कि वह कहां गई थी स्विमिंग के लिए? उन्होंने सहजता से बता दिया – सांताक्रूज। गुलजार साहब को गुस्सा आ गया, उन्होंने कड़क कर कहा, तुम झूठ बोल रही हो…।
असल में मामला यह था कि शायद लौटने में हुई देर की वजह से घबराकर ड्राइवर ने उनसे झूठ कह दिया था कि बेबी को बांद्रा से ला रहा था। बांद्रा स्थित क्लब उनके घर से अपेक्षाकृत दूर पड़ता था।
यह बात तो तब आई-गई हो गई। तकरीबन बीस साल बाद पिता गुलजार ने बेटी मेघना से किसी बातचीत में पूछा कि क्या तुम्हें याद है, कभी मैंने तुमसे गुस्से में कहा हो कि तुम झूठ बोल रही हो या तुम्हें झूठ नहीं बोलना चाहिए? मेघना उस घटना को भूल चुकी थीं।
तब गुलजार साहब ने यह घटना बताते हुए कबूल किया कि ‘एक बार मैंने ऐसा कहा था। लेकिन मेरी बात सुनकर तुम्हारे चेहरे पर जिस तरह के भाव आए, वैसे भाव मुझे अपनी बेटी के चेहरे पर दोबारा नहीं देखने थे। इसलिए उस दिन के बाद फिर कभी मैंने ऐसी बात नहीं कही तुमसे।‘
इसमें सबक पैरंटिंग का भी है, लेकिन मुद्दा यहां यह है कि हम सामने वाले को वैसा ही समझते हैं, जैसा हमारा मन होता है। जो खुद चोरी-छुपे अफेयर चलाने के चक्कर में रहते हैं, वे अपनी पत्नी पर सबसे ज्यादा शक करते हैं। मालिक को चूना लगाने की ताक में बैठे रहने वाले मुनीम जी कामगारों पर कामचोर होने का इल्जाम लगाते रहते हैं।
इस संदर्भ में देखें और भारतीय राजनीति में तमाम लोगों की देशभक्ति पर सवाल उठाने, उन्हें अर्बन नक्सल से लेकर भारतीयता विरोधी तक तमाम विशेषणों से नवाजने वाली नई प्रवृत्ति पर विचार करें तो यह काफी कुछ कहती है।
सवाल उठता है कि क्या यह महज संयोग है कि कभी जेएनयू हॉस्टल में कंडोम की गिनती करने वाले, देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के अंतरंग क्षणों के झूठे-सच्चे किस्से चटकारे ले-लेकर संसद तक में सुनाने वाले और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की विदेश यात्रा को उनके खराब चरित्र का सबूत बताने वाले तमाम लोग एक ही राजनीतिक खेमे के नजर आते हैं?
अगर नहीं तो क्या इस खेमे के सबसे बड़े नेता पर पिछले दिनों खेमे के अंदर से ही लगे घृणित आरोप – कि अपने अनियंत्रित और विवेकहीन यौन व्यवहार के चलते वे ब्लैकमेल होते रहे हैं – इस गुत्थी को सुलझाने में भी कुछ मदद कर सकते हैं?
(प्रणव प्रियदर्शी वरिष्ठ पत्रकार-लेखक हैं। हाल में उनकी दो किताबें आई हैं, “चौराहों पर चौराहे” और रुचिरा गुप्ता की “आई किक एंड आई फ्लाई” का अनुवाद “मैं लड़ी और उड़ी”।)