अमेरिका के डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन ने विभिन्न देशों में अमेरिकी उत्पादों पर लगने वाले आयात शुल्क (टैरिफ) का मनमाना आकलन किया। जो टैरिफ उन्होंने लगाया, उसके अनुमान पर वे किस फॉर्मूले से पहुंचे, इसको लेकर विशेषज्ञ अब तक सिर खुजला रहे हैं।
(https://www.youtube.com/watch?v=PWhv-06DNjE)
खुद अमेरिकी थिंक टैंक्स ने इसे बेतुका बताया है।
(https://taxfoundation.org/blog/trump-reciprocal-tariffs-calculations/)
साफ है कि ट्रंप प्रशासन ने बेतुके आधार पर आकलन किया कि भारत अमेरिकी उत्पादों पर 52 फीसदी टैरिफ लगाता है। तमाम देशों के लिए अपनाए गए टैरिफ फॉर्मूले के तहत भारत पर 26 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की गई है- यानी जो देश जितना लगता है, उसका आधा।
(https://x.com/AskPerplexity/status/1907555438348108086)
ह्वाइट हाउस ने कहा कि इस आकलन में प्रत्यक्ष टैरिफ के अलावा currency manipulation (मुद्रा की विनिमय दर कृत्रिम रूप से तय करने) और अन्य गैर टैरिफ बाधाओं से अमेरिकी कंपनियों को होने वाला नुकसान शामिल है। मगर कम से कम भारत पर करेंसी मैनुपुलेशन का इल्जाम नहीं लगाया जा सकता। भारत अगर ऐसा करता भी है, तो वह नकारात्मक दिशा में करता है। यानी वह कृत्रिम रूप से डॉलर की तुलना में रुपये का भाव ऊंचा रखता है, जबकि जो देश निर्यात प्रतिस्पर्धा में लाभ उठाना चाहते हैं, वे अपनी मुद्रा का भाव कृत्रिम रूप से नीचे रख कर ऐसा करते हैं।
भारत में अमेरिकी उत्पादों पर औसतन लगभग 17.5 फीसदी टैरिफ लगता है। इसलिए अनुमान था कि ट्रंप इसी के आसपास टैरिफ भारत पर लगाएंगे। मगर असल में इससे ज्यादा टैरिफ का एलान हुआ। जाहिर है, इससे लोग सकते में आए और पहले से लगाए गए सारे अनुमान गड़बड़ा गए। जानकारों के बीच इस पर आम सहमति है अमेरिकी कदम का भारतीय अर्थव्यवस्था पर बहुत खराब असर होगा।
(https://www.youtube.com/watch?v=91Xl-IqP_vE&t=1579s)
यह ट्रंप प्रशासन के इस मनमानेपन को सरल शब्दों में नाइंसाफी कहा जाएगा। बावजूद इसके यह हैरतअंगेज है कि देश के अंदर कोशिश ट्रंप के कदमों और सोच उचित ठहराने की कोशिश हुई है। और ऐसा सत्ता पक्ष एवं विपक्ष दोनों तरफ से हुआ है।
यह तो साफ है कि नरेंद्र मोदी सरकार की ट्रंप के तुष्टिकरण की कोशिश मुंह के बल गिरी है। पहले से टैरिफ और अन्य अमेरिकी मांगों के आगे झुक कर रियायत देने का उसका तरीका कारगर नहीं हुआ है। सत्ताधारी नेताओं और अधिकारियों ने अगर यह सोचा होगा कि रियायत देते हुए द्विपक्षीय व्यापार समझौते की वार्ता शुरू कर देने से ट्रंप का रुख नरम हो जाएगा, तो उन्हें जरूर ही निराशा हाथ लगी होगी। उलटे इस वजह से ट्रंप प्रशासन को टैरिफ के साथ-साथ भारत के पेटेंट कानून, हाई टेक संबंधी नियमों, स्थानीय की जरूरत के मुताबिक लागू कायदों आदि जैसी कथित गैर टैरिफ बाधाओं को भी व्यापार वार्ता के एजेंडे पर लाने का मौका मिल गया। भारत सरकार झुकने की राह पर चलती रही, तो इन सभी मामलों में भारतीय आवाम के आर्थिक हितों को भारी क्षति पहुंचेगी।
मगर इस ओर लोगों का ध्यान जाने से रोकने के लिए सत्ता पक्ष ने वही नैटेरिव कंट्रोल का अपना पुराना तरीका अपना लिया है। गुरुवार को ट्रंप के टैरिफ का एलान होने के कुछ घंटों के अंदर सरकारी अधिकारी मीडिया को ब्रीफ करने लगे कि भारत को सीमित नुकसान ही होगा। फिर सत्ता पक्ष के मीडिया हैंडल्स यह प्रचारित करने लगे कि चीन, वियतनाम, बांग्लादेश आदि जैसे देशों पर भारत से अधिक टैरिफ लगने का परिणाम भारत के लिए फायदेमंद होगा। सत्ता पक्ष की एक नेता तो यह कहती सुनी गईं कि टैरिफ लगाने के बावजूद ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी को अपना मित्र बनाया- ऐसी बातें सुन कर उनका सीना गर्व से फूल जाता है!
वैसे विपक्ष के ज्यादातर हिस्से की भूमिका भी सराहनीय नहीं है। अमेरिका के खिलाफ बोलने में अधिकांश विपक्षी नेताओं की जुबान भी कांपने लगती है। गुरुवार को यह अजूबा लोकसभा में देखने को मिला कि जब सारी दुनिया का ध्यान ट्रंप के टैरिफ पर टिका था, तब विपक्ष के नेता राहुल गांधी चीन के जमीन कब्जा करने का अपना पुराना राग लेकर सदन में खड़े हो गए। अगर कुछ लोगों ने इसे अमेरिकी टैरिफ से ध्यान हटाने की कोशिश के रूप में देखा, तो कहा जाता है कि उन लोगों का इसमें कोई दोष था। गौरतलब है कि सिर्फ एक दिन पहले सदन में वक्फ़ कानून में संशोधन के लिए पेश विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्ष के नेता ने चुप रहना ही बेहतर समझा था।
ढाई मिनट से ज्यादा के हस्तक्षेप में राहुल गांधी कुछ सेकेंड टैरिफ पर भी बोले। कहा कि “हमारे सहयोगी” ने हम पर 26 फीसदी टैरिफ लगा दिया है। जाहिर है, इसे उन्होंने मोदी सरकार की कथित कमजोरी से जोड़ा। जैसे कांग्रेस की सरकार होती, तो वह ये टैरिफ रोक लेती! बाकी मध्यमार्गी दलों के विपक्षी नेता तो ऐसे पेचीदा मसलों पर ना बोलने में ही अपनी भलाई समझते हैँ।
इन सबके बीच एक अपवाद सीपीएम जरूर है, जिसके नेता प्रकाश करात ने ट्रंप के टैरिफ को सही संदर्भ में रखते हुए भारत सरकार के जवाबी कदम उठाने की मांग की।
(https://x.com/cpimspeak/status/1907657798080442414)।
सवाल है कि सख्त रुख अपनाने के अलावा और क्या विकल्प अब बचा है? अमेरिका ने तो बाकी दुनिया के साथ-साथ भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी हमला बोल दिया है। नए अमेरिकी टैरिफ से जो क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे, उनमें शामिल हैः
- कपड़ा एवं परिधान
- इलेक्ट्रॉनिक्स एवं दूरसंचार
- हीरा एवं जेवरात
- और, कृषि
विशेषज्ञों का अनुमान है कि नए टैरिफ के कारण
- अमेरिका जाने वाले भारत के उपरोक्त निर्यात की मात्रा में बड़ी गिरावट आएगी
- इससे इन क्षेत्रों में काफी संख्या उद्योग-धंधे बंद होंगे। जबकि इन क्षेत्रों से बड़ी संख्या में सूक्ष्म, लघु एवं मझौले (एमएसएमई) इकाइयां जुड़ी हुई हैं।
- उद्योग-धंधे बंद होने से लाखों की संख्या में लोगों के बेरोजगार होने का अंदेशा है।
- ऐसा होने पर देश के अंदर औसत आय घटेगी, जिसका असर उपभोग और मांग पर पड़ेगा। उसका खराब असर निवेश और उत्पादन पर होगा।
- विशेषज्ञों में लगभग आम राय है कि उपरोक्त कारणों से भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में आधा से पौना प्रतिशत तक की गिरावट आएगी।
थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के मुताबिक अभी जो जख्म लगे हैं, अमेरिका का इरादा उसके आगे भी कड़े घाव पहुंचाने का है। द्विपक्षीय व्यापार वार्ता में उसने जो एजेंडा रखा है, उसके तहत अमेरिका की मांग है,
- कृषि क्षेत्र में भारत न्यूनतम समर्थन मूल्य के सिस्टम को बदले, ताकि अधिक अमेरिकी निर्यात का रास्ता खुल सके। एमएसपी को वह सब्सिडी मानता है। उसका तर्क यह है कि मुक्त व्यापार की राह में रुकावट है। इसके अलावा वह जीएम फसलों के भारत में आयात की अनुमति के लिए दबाव बनाए हुए है।
- अमेरिका ने भारत के पेटेंट कानून में बदलाव की मांग रखी है। इसके तहत पुरानी दवाओं के मामले में भी पेटेंट संरक्षण को वह लागू करना चाहता है। तकनीकी भाषा में इसे एवर ग्रीनिंग कहते हैं।
- ई-कॉमर्स के मामले में अमेरिका भारत में मौजूद इनवेंटरी आधारित मॉडल को खत्म करने की मांग कर रहा है। इस नियम के तहत विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियां अपना स्टोर नहीं बना सकतीं। अमेरिका की मांग है कि अमेजन या वॉलमार्ट जैसी कंपनियों को अपना इनवेंटरी बनाने की इजाजत यहां मिलनी चाहिए।
भारत सरकार ने झुकने का रवैया कायम रखा, तो कृषि से लेकर दवा उद्योग और ई-कॉमर्स के क्षेत्र में भारी नुकसान होगा। यह नुकसान टैरिफ की मार से भी ज्यादा होगा। फिलहाल, देश के राजनीतिक वर्ग, मीडिया और बुद्धिजीवी तबके में जैसी अमेरिका भक्ति छायी है, उसे देखते हुए इन तमाम मुद्दों पर आशंकाएं गहराई हुई हैं। इसके मद्देनजर उम्मीद की तो फिलहाल कोई किरण नजर नहीं आती।
(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं)
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