क्या आठ रुपये में देश के भविष्य की भूख मिटेगी?

भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में जब विकास की बात होती है, तो अक्सर पुल, सड़क, एक्सप्रेस वे, डिजिटल इंडिया और अंतरिक्ष अभियान आदि चर्चा में रहते हैं। लेकिन इन उपलब्धियों की चकाचौंध के बीच एक गहरी और कड़वी सच्चाई दब जाती है। हम आज भी लाखों बच्चों को भरपेट भोजन नहीं दे पा रहे हैं। और जब कोई सरकार यह कहे कि एक कुपोषित बच्चे के पोषण पर प्रतिदिन मात्र ₹8 से ₹12 खर्च किए जा रहे हैं, तो यह एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक चेतावनी है, हमारी प्राथमिकताएं किस ओर झुकी हैं? 

मध्य प्रदेश विधानसभा में सामने आए इस सरकारी बयान ने देश भर के जनमानस को झकझोर दिया है। मंत्री द्वारा दी गई इस जानकारी से साफ है कि राज्य सरकार कुपोषित बच्चों के लिए दिन में ₹8 (मध्यम कुपोषित) और ₹12 (गंभीर कुपोषित) निर्धारित कर रही है। यानी, महीने भर का पोषण खर्च ₹240‑₹360। सवाल उठता है कि इतनी नगण्य राशि में क्या एक बच्चे के लिए न्यूनतम पोषण भी सुनिश्चित किया जा सकता है? 

एक औसतन 2 से 6 वर्ष के बच्चे को प्रतिदिन कम से कम 1000–1200 किलो कैलोरी ऊर्जा, 20–25 ग्राम प्रोटीन, पर्याप्त आयरन, विटामिन ए, कैल्शियम और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की जरूरत होती है। अब जरा देखें कि इन जरूरतों को पूरा करने के लिए एक थाली में क्या-क्या जरूरी है: आधा कटोरी दाल (₹10), एक कटोरी चावल या दो रोटी (₹6), सब्जी (₹10), थोड़ा घी या तेल (₹5), और एक केला या मौसमी फल (₹6‑₹8)। यानी न्यूनतम पोषण देने वाली एक थाली की लागत करीब ₹35 से ₹40 बैठती है। वह भी अगर थोक या सामुदायिक खरीद हो तो। 

अब सवाल यह उठता है कि महज ₹8 की सरकारी राशि में एक बच्चे की थाली में आखिर आएगा क्या? न दाल, न फल, न दूध और न ही हरी सब्जी। ₹8 में शायद एक सूखी नमकीन खिचड़ी या बेस्वाद रेडी‑टू‑ईट पाउडर ही संभव हो पाए। पोषण तो दूर, यह मात्र पेट भरने का भ्रम पैदा कर सकता है, जिससे कुपोषण कम नहीं होता बल्कि भीतर ही भीतर और बढ़ता है। आज जब एक समोसे की कीमत ₹10 और एक बिस्किट का पैकेट ₹12 में आता है, तो ₹8 की थाली केवल कागज़ पर ही बन सकती है, थाली में नहीं। 

कहने को तो यह सरकारी “योजना” है, लेकिन वस्तुतः यह कुपोषण से जूझते बच्चों के साथ क्रूर मज़ाक जैसा है। आंकड़ों के अनुसार राज्य में 1.36 लाख बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, जिनमें लगभग तीस हजार बच्चे अति‑कुपोषित की श्रेणी में आते हैं। इनमें से बड़ी संख्या आदिवासी और ग्रामीण अंचलों से आती है, जहाँ न तो पोषण की जानकारी है, न ही पर्याप्त साधन। श्योपुर, बड़वानी, धार, छिंदवाड़ा जैसे जिले संकट की गंभीर अवस्था में हैं। इन जिलों में हर चार में से एक बच्चा कुपोषित है। यदि यह कोई प्राकृतिक आपदा होती तो शायद सरकार अलर्ट हो जाती, लेकिन यह तो रोज़मर्रा की त्रासदी है जिसे हमने सामान्य मान लिया है। 

चौंकाने वाली बात यह है कि जब इसी प्रदेश में एक गाय के पोषण पर प्रतिदिन ₹40 खर्च करने की योजना चल रही है, वहीं एक इंसानी बच्चे के लिए मात्र ₹8‑₹12 की व्यवस्था है। इसका तात्पर्य क्या निकाला जाए? क्या एक गाय का जीवन एक बच्चे की तुलना में अधिक मूल्यवान है? यह सवाल केवल विपक्षी दलों का नहीं है, यह आम जनता का सवाल है। समाज में ऐसी प्राथमिकताओं के क्या संकेत हैं? 

सरकार की यह सफाई कि “हम केंद्र सरकार से अतिरिक्त सहायता की मांग कर चुके हैं”, किसी को संतुष्ट नहीं करती। क्या बच्चों की जान तब तक इंतजार करेगी जब तक फंड स्वीकृत हो? यह एक प्रशासनिक उदासीनता नहीं, एक नैतिक विफलता है। 

इस व्यवस्था की गहराई में जाएं तो समझ आता है कि सरकारी योजनाएं अक्सर सिर्फ “पूरक आहार” की भाषा में बच्चों तक पहुंच पाती हैं। आंगनवाड़ी केंद्रों पर वितरित भोजन जैसे सूखी खिचड़ी, रेडी‑टू‑ईट पैकेट्स या अल्प मात्रा में दलिया—सिर्फ नाम मात्र की कैलोरी और ऊर्जा देता है। विटामिन, मिनरल्स, प्रोटीन और फॉलिक एसिड जैसे जरूरी तत्व लगभग गायब होते हैं। कुपोषण केवल भूख नहीं है, यह शरीर की आवश्यक पोषण जरूरतों की गंभीर उपेक्षा है, जो शारीरिक और मानसिक विकास को हमेशा के लिए बाधित कर सकती है। 

ऐसी स्थिति में राज्य सरकार को दोहरी रणनीति अपनानी चाहिए, जिससे तत्काल राहत और दीर्घकालिक समाधान मिल सके। तत्काल राहत के तहत प्रति बच्चे ₹40 से ₹50 प्रतिदिन की वास्तविक पोषण लागत को ध्यान में रखकर बजट तैयार किया जाना चाहिए। आंगनवाड़ियों को पुनर्गठित कर पोषण सामग्री की गुणवत्ता, वितरण की निगरानी और माताओं को पोषण शिक्षा देना जरूरी है। वहीं, दीर्घकालिक रणनीति के तहत राज्य को आदिवासी और कुपोषण-ग्रहस्त जिलों में ‘सघन पोषण अभियान’ चलाना चाहिए। इसमें स्थानीय फसलों को आधार बनाकर फोर्टिफाइड भोजन तैयार किया जाए, जिसमें लघु अनाज (मिलेट्स), दालें, हरी सब्ज़ियां और फल शामिल हों। स्थानीय महिला स्वयं सहायता समूहों को इस योजना से जोड़ने से रोजगार भी बढ़ेगा और वितरण तंत्र भी मज़बूत होगा। 

अन्य राज्यों के उदाहरण भी प्रेरणा दे सकते हैं। उत्तर प्रदेश में शुरू किया गया ‘मुख्यमंत्री सुपोषण अभियान’ एक सफल मॉडल बनकर उभरा है, जहां प्रति बच्चा प्रतिदिन ₹44 के पोषणीय नाश्ते की योजना चलाई गई है। वहां बच्चों को प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम और कैलोरी की वैज्ञानिक मात्रा के आधार पर भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है। क्या मध्य प्रदेश सरकार ऐसे सफल मॉडल को अपनाने के लिए तैयार है? 

यह भी आवश्यक है कि कुपोषण की समस्या को केवल एक विभाग या मंत्रालय की जिम्मेदारी न मानकर, इसे बहुस्तरीय चुनौती के रूप में देखा जाए। स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण विकास, महिला एवं बाल कल्याण जैसे विभागों को समन्वय से काम करना होगा। यह सिर्फ आहार देने का नहीं, जीवन बचाने का काम है। 

 यहाँ यह दोहराना आवश्यक समझते हैं कि समाज की प्रगति का मूल्यांकन पुलों की लंबाई या एक्सप्रेसवे की चौड़ाई से नहीं, बल्कि बच्चों की हड्डियों की मज़बूती और आँखों की चमक से किया जाना चाहिए। यदि एक समृद्ध भारत की कल्पना करनी है, तो कुपोषित बच्चों की आंतरिक भूख को नजरंदाज़ कर हम उस मंज़िल तक नहीं पहुँच सकते। ₹8 में कुपोषण मिटाने की कल्पना, एक गलतफहमी नहीं, बल्कि शासन की असंवेदनशील सोच की उपज है। यह न तो व्यावहारिक है, न मानवीय। यह सवाल किसी एक राज्य का नहीं, बल्कि पूरे देश की नीति दृष्टि का है।

यह स्थिति केवल योजनागत विफलता नहीं, बल्कि हमारे संविधान में निहित मूल्यों का भी स्पष्ट उल्लंघन है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देता है, जो केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें पोषण, स्वास्थ्य और सुरक्षित बचपन की गारंटी भी निहित है। इसी तरह अनुच्छेद 47 राज्य को यह निर्देश देता है कि वह पोषण स्तर और जीवन स्तर में सुधार को अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी माने। जब राज्य कुपोषित बच्चे के पोषण पर प्रतिदिन ₹8 खर्च कर रहा हो, तो यह न केवल सामाजिक न्याय की भावना के खिलाफ है, बल्कि समानता, करुणा और अवसर की संवैधानिक अवधारणाओं की भी अवहेलना है।

एक लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राष्ट्र में यह अपेक्षित नहीं कि बच्चों का पेट भरे आंकड़ों से, और उनके भविष्य की बुनियाद इतनी कमजोर रखी जाए। अब वक्त है कि इस ‘आंकड़ों के भ्रम’ से बाहर निकलकर सच्चाई की ज़मीन पर लौटें जहाँ बच्चे केवल संख्या नहीं, देश का भविष्य भी हैं। 

 (मनीष जैसल लेखक और स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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