अगर हमारी संस्कृति बची तो हम बचेंगे: आदिवासी महासम्मेलन

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पलामू। अखिल भारतीय आदिवासी महासभा का दूसरा राष्ट्रीय महासम्मेलन 15 अप्रैल को पलामू के मेदनीनगर के शिवाजी मैदान में संपन हो गया। महासम्मेलन को संबोधित करते हुए झारखंड के कल्याण मंत्री चंपाई सोरेन ने कहा कि हमारी धरती में सभी प्रकार के खनिज पदार्थ हैं। उसकी लूट के लिए सीएनटी एक्ट और एसपीटी एक्ट में बदलाव की कोशिश हुई, जिसके खिलाफ आदिवासियों ने लड़ाई लड़ी।

उन्होंने कहा कि हेमंत सोरेन सरकार ने आदिवासी परम्परा को बचाने का काम किया। उस अनुरूप योजनाएं बनाई। ग्राम वन में एक ही दिन के आवेदन में स्वीकृति दे दी गई। कई गांवों में ऐसा किया गया। उन्होंने कहा कि वन पर आश्रित लोगों को वन पट्टा दिया जाएगा। पलामू पिछड़ा हुआ जिला है इसलिए यहां के एसटी, एससी और पिछड़ों की समस्या पर ध्यान दिया जाएगा।

उन्होंने आगे कहा कि एसटी, एससी के अवैध रूप से लूटी गई जमीन वापस कराएंगे। इतना ही नहीं वे निजी कंपनी में भी एसटी, एससी को काम दिलाएंगे। मंत्री को आदिवासी महासभा ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नाम एक मांग पत्र सौंपा। मंत्री ने आश्वासन दिया कि मांग पत्र में लिखी मांगें पूरी की जाएंगी। महासम्मेलन में मनिका विधायक रामचंद्र सिंह ने कहा कि झारखंड में विकास के नाम पर उपनिवेश बना दिया गया है। यहां खनिजों का दोहन किया जा रहा है और धर्म के नाम पर आदिवासियों को लड़ाया जा रहा है।

महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी मिंज ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि यह एकता आदिवासी समाज को शोषण से मुक्त करेगी। उन्होंने कहा कि हमारी भाषा, संस्कृति विश्व की सर्वश्रेष्ठ भाषा, संस्कृति है जिसे खत्म करने की साजिश रची जा रही है। जिसे बचाने के लिए हमें एकजुट होना होगा। मिंज ने कहा कि हमारे खनिज संपदाओं के ऊपर कॉरपोरेट की गिद्ध दृष्टि है। सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट का उल्लंघन किया जा रहा है। पलामू में आदिवासी जमीन पर सामंतों का कब्जा है। इसके लिए हमें एकताबद्ध होकर संघर्ष करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि एफआरए (FRA) के दावों का निपटारा धीमी गति से हो रहा है।

मिंज ने कहा कि आदिवासी आज अपने हक-हकूक के लिए आगे आ रहे हैं। उनकी एकता को तोड़ने के लिए धर्म के नाम पर लड़ाई कराकर फूट डाली जा रही है। यह सम्मेलन यह बताता है कि हम आगे बढ़ेंगे। 5 साल में 5 जिलों में विस्तार करेंगे। देश के दूसरे राज्यों में भी इसका विस्तार किया जाएगा। अवसर पर फिलिप ने कहा कि आदिवासी ही जंगल बचाते हैं जिससे पर्यावरण संतुलित रह सकता है।

सुनील मिंज ने कहा कि ग्राम सभा एक तीसरी सरकार है, जो अब अपने गांव के लिए नियम कानून बना सकती है, उसे लागू करा सकती है और कानून की अवहेलना करने पर ग्राम न्यायालय में उसकी सुनवाई कर सकती है। ज्योति लकड़ा ने कहा कि हमारे वीर योद्धाओं के संघर्षों की वजह से कई भू-संरक्षण कानून बनाए गए, लेकिन आज खुलेआम उसका उल्लंघन किया जा रहा है।

कार्यक्रम का संचालन अजय कुमार सिंह चेरो ने किया। धन्यवाद ज्ञापन महासभा के राष्ट्रीय महासचिव सुनील किस्पोट्टा ने किया। कार्यक्रम में सिरिल टोप्पो, प्रताप तिर्की, सुनील उरांव, त्रिपुरारी सिंह चेरो, चैटू सिंह खरवार मुख्य रूप से मौजूद थे। कार्यक्रम में 25,000 लोगों ने भाग लिया।

आदिवासी महासभा का महासम्मेलन

अखिल भारतीय आदिवासी महासभा की ओर से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को संबोधित मांग पत्र में महासभा ने कहा कि पलामू प्रमंडल के तीन जिले गढ़वा, पलामू, लातेहार, जिसमें गढ़वा और पलामू में आदिवासी अल्पसंख्यक हैं लेकिन लातेहार जिले में आदिवासी बहुसंख्यक हैं।

गढ़वा जिले के रंका अनुमण्डल के पांचो प्रखंड बड़गढ़, भंडरिया, रंका, रमकंडा और चिनिया आदिवासी बाहुल्य प्रखंड है जिन्हें अनुसूचित क्षेत्र में अधिसूचित करने की मांग वर्षों से की जा रही है। पत्र में कहा गया है कि पलामू प्रमण्डल में हाल में भू-सर्वे में भारी गढ़बड़ियां हुई हैं। ऐसे में अगर इस भू-सर्वे को जारी रखा जाता है तो प्रमण्डल में मारपीट-खूनखराबा और अशांति फैलने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता है।

झारखंड राज्य में सीएनटी और एसपीटी एक्ट आदिवासियों की जमीन की सुरक्षा हेतु बना है, लेकिन इस कानून के होते हुए भी आदिवासियों की रैयती जमीन दबंगों और सामन्ती विचार वाले लोगों के हाथों में है। दुख की बात यह है कि प्रशासनिक अमला भी अधिकांश मामलों में दबंगों और सामंतवादियों के साथ खड़ा रहता है।

मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में कहा गया है कि वनाधिकार कानून आदिवासियों और जंगल में रहने वाले लोगों पर सदियों से हो रहे अत्याचार से मुक्ति और वनों की रक्षा के उदेश्य से बनाया गया था। इस कानून के तहत गढ़वा, पलामू और लातेहार जिले में भारी संख्या में व्यक्तिगत और सामूहिक दावा पत्र दिये गये हैं, लेकिन देखा जा रहा है कि इन दावा पत्रों के निष्पादन में भारी उदासीनता संबंधित अधिकारियों द्वारा बरती जा रही है और वन पट्टा देने के नाम पर सिर्फ और सिर्फ नौटंकी की जा रही है।

पलामू के दुबियाखाड़ में आदिवासी विकास कुंभ मेला समिति को जो जमीन सरकार की तरफ से देने की घोषण की गयी है, उस भूमि पर एक विश्वविद्यालय की स्थापना हो, जहां आदिवासी दर्शन, इतिहास, साहित्य आदि पर पढ़ाई और शोध किया जा सके।

महासभा ने पत्र के जरिए मुख्यमंत्री से कहा कि प्रतिवर्ष आदिवासी जनसंख्या के अनुपात में बजट की राशि आदिवासी उपयोजना के फंड में आती है लेकिन इस राशि को सिर्फ आदिवासी मद में खर्च न करके अन्य मदों में तेजी से खर्च किया जाता है, जिसके कारण आदिवासियों की स्थिति में तेजी के साथ सुधार नहीं हो रहा है। इसके साथ ही गढ़वा जिले के मंडल डैम से विस्थापितों की समस्याओं का सामाधान अभी तक सरकारी फाइलों में उलझ कर रह गया है।

आदिवासी महासभा की मांगें:

  • 1. रंका अनुमण्डल को अनुसूचित क्षेत्र में अधिसूचित करने के लिए आवश्यक कार्रवाई की जाय।
  • 2. पलामू प्रमण्डल में जमीन संबंधी समस्याओं के सामाधान के लिए हाल के भू-सर्वे को रद्द कर दोबारा जमीन का सर्वे कराया जाय और इस बात की गारंटी की जाए कि सीएनटी एक्ट की जमीन जिसे गैर-आदिवासियों ने कब्जा कर रखा है, खतियान धारी को वापस हो।
  • 3. जमीन संबंधित समस्याओं के सामाधान के लिए टीएससी की तर्ज पर एक समिति का निर्माण किया जाय, जिसमें सदस्य के रूप में सिर्फ आदिवासियों का ही चयन किया जाय तथा इसका विस्तार जिला स्तर पर किया जाय।
  • 4. रघुवर दास सरकार ने पूंजीपतियों को उपकृत करने के लिए लैंड बैंक बनाया था। इस लैंड बैंक को रद्द करने की घोषणा सरकार की तरफ से की जाए।
  • 5. वनाधिकार कानून के तहत किये गये दावा पत्रों का निष्पादन तेजी से हो, इसके लिए सरकार पूरा ध्यान दे।
  • 6. पेसा कानून की नियमावली को जल्द पारित कराया जाय।
  • 7. पलामू जिले के दुबियाखाड़ में सरकार की तरफ से आदिवासी विकास कुंभ मेला समिति को सैकड़ों एकड़ जमीन देने की घोषणा की गई है। इस भूमि पर आदिवासी विश्वविद्यालय खोला जाए।

(वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट)

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