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जिनके मन राम बिराजे वो हैं हमारे उस्ताद अमीर ख़ान

राम के नाम क्या-क्या नहीं हुआ था। अब चीख नहीं सकते तो एक यात्रा भीतर की ओर की जा सकती है। एक आंतरिक गान की ओर। तब सारा शोर सारी आपाधापी नारे गर्जन-तर्जन फूल माला घंटे घड़ियाल सारी आवाजें सारी चेष्टाएं पीछे छूट जाती हैं। जिनके मन राम बिराजे उन उस्ताद अमीर ख़ान के पास जाने से ये दुर्लभ मौका हाथ आता है। लेकिन वो दुर्लभता पकड़ में आ पाती है या नहीं कहना कठिन है। प्रतिरोध की ओर सफ़र तो है ही। या फिर भीमसेन जोशी के गायन के भरोसे और वो खुद अपने राम के भरोसे या फिर टीएम कृष्णा पूछते हुए कहां के पथिक। जैसे भटकते विस्थापितों से पूछते हुए। इस राम का न चित्र है न जयकार न दुंदुभि। ये अंतर्तम का राम है जिसकी तलाश के लिए मौलिक निगाह चाहिए।

मनुष्यता का राग क्या होगा इस समयः प्रचंड भक्तियों और अंधविश्वासों और राजनीतिक स्वार्थों और पूंजी की साज़िशों ने जब मुझे खत्म कर देने में कोई कसर न छोड़ी तो मैंने खत्म नहीं हो जाने का निश्चय किया। मैं दिखी नहीं पर रही। मनुष्यता को बचाए रखने के पीढ़ियों के संघर्ष में मेरी भूमिका नामालूम होगी लेकिन संदिग्ध नहीं होगी। अमीर ख़ान साब को मैंने जगत से पीछा छुड़ाने के लिए नहीं सुना, यहीं बने रहने के लिए, प्रतिरोध अपना बनाए रखने के लिए और अपने विवेक को क्षीण न पड़ने देने के लिए सुना।

राग मालकौंस एक बेजोड़ फलसफे की तरह खुलता है और बहुत धीमी बौछार से भिगोता रहता है। यानी इतना धीमा कि पत्तों पर अटक गयी बारिश की बूंदें टपक रही हैं और निर्वात में झूलती हुई सतह पर आ रही हैं। उन्हें तुरंत गिर जाना स्वीकार नहीं। जिन्हें शास्त्रीय गायन की बारीकियां समझ में नहीं आतीं वे रसिक भी इस मद्धम फुहार की छींटों से भीग उठते हैं। अमीर ख़ान के गायन की क्या विशेषता है। वो क्यों अद्भुत हैं जो भीमसेन जोशी से लेकर रविशंकर जैसी विभूतियां और संगीत के विद्वान और रसिक कवि लेखक पत्रकार समीक्षक और सामान्य श्रोतागण तक उनकी आवाज़ के आगे सर झुकाते हैं और बस जैसे विलंबित की रस्सी उनके चारों ओर बुनी जा रही है- कोई शब्द नहीं, कोई राग नहीं, कोई व्याकरण नहीं, बस एक स्वप्निल अमूर्तन, एक बहुत पवित्र और बेदाग जगह, कुछ छू लें तो वो फ़नां हो जाए। कुछ टहल लें तो रस्ते गुम हो जाएं।

राग तो बस एक उपकरण है, लक्ष्य नहीं। लक्ष्य तो वो है जो अमीर ख़ान की आवाज़ के ज़रिए हम हासिल करना चाहते हैं। जिनके मन राम बिराजे, वाके सफल होवे सब काज। जो मांगे सो देत पदारथ, वो ऐसो गरीब नवाज़। बंदिश में राम की महिमा फिर संगीत के महान अमूर्तन की महिमा बन जाती है, जो दिखता नहीं और जिसका कोई आकार नहीं। प्यास जितनी अवधि है जिसकी। मिट जाए तो तसल्ली हो न बुझे तो तड़पाती रहे। न सफलता की कामना है न किसी पदार्थ की, गायन सुनते सुनते ही सब मिल जाता है। और बहुत कुछ छूटता जाता है। हम यही हासिल करते हैं। द्वंद्व।

अपनी गायकी में वो अप्रतिम इसलिए नहीं थे कि शास्त्रीय विलक्षणता या सामर्थ्य के उच्चतम पैमानों का मुज़ाहिरा कर पाते थे, उनका बेमिसाल हुनर यही था जो वो अक्सर कहा करते थे नगमा वही नगमा है जो रूह सुनाए और रूह सुने। भावना की अभिव्यक्ति पर ज़ोर था लेकिन ये अपने भीतर दूर चलते चले जाने की अप्रतिम ज़िद थी। उनके दौर के कई गायकों और वादन के उस्तादों पर जुगलबंदियों से महफ़िलें, प्रसिद्धि और ऐश्वर्य बरस रहा था। अमीर ख़ान का ऐश्वर्य अपनी गायकी के अकेलेपन में रमा था। वो किसी ऊंचाई में प्रतिष्ठा के ही खिलाफ़ थे। उनका गायन उनके मन की झील है। वहां कोई दखल उन्हें बर्दाश्त नहीं। सुर का कंकड़ ही होगा जो उस शांत स्थिर पानी को हिलाएगा।

अब इस बंदिश पर लौटें जिनके मन राम बिराजे, विलम्बित में है और द्रुत का मालकौंस है आज मेरे घर आइला बलमा, करूंगी अदारंग सन रंगरलिया। अमीर ख़ान के गायन को अक्सर योग, ध्यान, समाधि आदि आदि कहा जाने लगता है- और एक तरह से ये उन्हें किसी महान दैवीय और धार्मिक प्राचीनता की दुहाई देती शुद्ध संस्कारवादी परिपाटी या पारंपरिक शुद्धतावाद में बांधने की कोशिश का नतीजा है। अमीर ख़ान बंधते नहीं हैं। उनकी सांगीतिक चेतना निर्विकार बुद्ध से जुड़ती होगी अगर जुड़ने की बात करें।

वो संगीत के महात्मा बुद्ध हो सकते हैं लेकिन भक्त कवि या भक्त गायक नहीं। चाहे अनचाहे कुछ समीक्षकों और रसिक जनों ने इस तरह से अमीर ख़ान को भी घराने और भक्ति के खांचे में बैठाने की कोशिश की है लेकिन वो घराने में नहीं बंधते, उनका स्टाइल अपना है- अमीरख़ानी स्टाइल। अमीर ख़ान के संगीत में दैवीय उपासना के चित्र देखना- जैसे गायक को ईश्वरीय प्रकटन की उत्कट अभिलाषा हो- नादानी है। ये कमोबेश ऐसा ही है जैसे मुक्तिबोध और शमशेर बहादुर सिंह की कविता के अमूर्तन को छिन्न-भिन्न करने की नाकाम लेकिन डरावनी प्रवृत्ति।

इसीलिए राम के नाम पर होने वाली विभिन्न प्रचंडताओं के किनारे-किनारे अमीर ख़ान बहुत शांत स्थिर स्वर में जिनके मन राम बिराजे गाते हैं। उसमें मांग नहीं है स्वार्थ नहीं है लालच नहीं है और मंदिर पूजा पाठ दीयाबाती कुछ नहीं है- बस स्वर की एक लौ है और उसमें अचल अमीर ख़ान हैं। समर्पण, ध्यान, अध्यात्म, योगी जैसे शब्द कमतर हैं। उनसे वो सांगीतिक अवस्था परिभाषित या चिन्हित नहीं होती। विलम्बित ख्याल से होते हुए छोटा ख्याल और फिर तराना और वो भी स्वरयुक्त, अकेले उस्ताद थे अपने दौर के अमीर ख़ान जिन्होंने मार्क्स के हवाले को थोड़ा बदलकर कहें तो तराने को पैरों के बल खड़ा कर दिया।

उसे अर्थहीनता से छुड़ाकर अर्थपूर्ण बनाया। अमीर ख़ान तराने के बीच में रुकते और बतातेः लोग समझते हैं तराने को अर्थहीन। ऐसा नहीं है। एक सजीव उपस्थिति, शब्द और स्वर से गुंथी हुई, ख्याल अंग का तराना था उनका अमूर्तन में डूबा हुआ। सारे समयों को विलीन करता हुआ एक सरीअल एबस्ट्रैक्ट. दरबारी में उनके गाए तराने में बोल आते हैं: यारे मन बिया बिया- ऐ दोस्त जल्दी आ जाओ जल्दी आ जाओ। असंभव संभावना।

मन-मस्तिष्क को शांति और संतप्त आत्मा को दिलासा मिलती है उनके गायन में। भीमसेन जोशी यूं ही उनके कायल नहीं थे। उनका कहना था कि अमीर खान की अलापी में महासागर जैसी गहराई है। ऐसा शांत रस किसी और की गायकी में नहीं मिलता, भीमसेन कहते थे। अमीर ख़ान के राम से होते हुए भीमसेन जोशी के राम को भी समझ लें। राग दरबारी कान्हड़ा में मैं भरोसे अपने राम के और नहीं कछु काम के, विलम्बित में गायी ये बंदिश अपनी किराना ख़ूबियों और वे ख़ूबियां जो भीमसेन जोशी ने अपने समकालीनों, गुरुओं और अमीर ख़ान जैसी शख़्सियतों से अपने गायन में उतार लीं वे भी इस बंदिश में झिलमिलाती हैं।

रूह के मिज़ाज का किसने पार पाया है, बड़े गुलाम अली ख़ान की कही ये बात मानो इस बंदिश को सुनते हुए साक्षात हो उठती है। सितार के दिग्गज रविशंकर कहते थे कि अमीर ख़ान की गायकी आदर्श है। संगीत की सम्पूर्णता के दर्शन वहीं होते हैं। जो समझता है वो निश्चित रूप से अधिक आनंद महसूस करता है और जो उसके शास्त्रीय और सैद्धांतिक पहलुओं को नहीं भी समझता है तो वो भी उस सांगीतिक सम्पूर्णता में रम जाता है। उससे दूर नहीं रह पाता।

एक राम का उल्लेख टीएम कृष्णा ने भी किया है। उनकी बेजोड़ गायकी के यूं तो बहुत से नमूने हैं, लेकिन एक रचना विशेष रूप से ध्यान खींचती है। राग झिंझोटी (कर्नाटक संगीत में विद्वानों के मुताबिक राग सेन्जकुरुती और चेन्चुरुती, झिंझोटी के क़रीब माने जाते हैं) में निबद्ध करीब साढ़े नौ मिनट के इस तुलसीदास कृत भजन “कहां के पथिक कहां, कीन्ह है गवनवा” में राम के वनगमन की झांकी है। मूल कम्पोजिशन डीवी पलुस्कर की बतायी जाती है। जो उन्होंने गाया, उसे बहुत से गायकों ने पेश किया। जिनमें वीणा सहस्त्रबुद्धे जैसी विदुषी गायिका भी एक हैं। कृष्णा उसे एक नयी सतह पर ले जाते हैं।

इसे सुनना एक नयी कलात्मक ऊंचाई को स्पर्श कर लेने की सामर्थ्य की तरह है। उनके साथ मृदंगम पर संगतकार हैं और वॉयलिन पर संगतकार हैं लेकिन कृष्णा अपने गायन की संगत उन साज़ों के साथ करते हैं। ये विनम्रता बहुत दुर्लभ है और शायद ये सांगीतिक विशिष्टता है। जहां दिखता है कि गायक तालों के साथ संगत कर रहा है या वॉयलिन के साथ। भजन को राग में गाते हुए इधर बहुत से गायक कलाकार हैं, एक से एक चोटी के भी हैं। लेकिन कृष्णा की प्रस्तुति में जो आंतरिक सच्चाई और आत्मा की मिठास हम पाते हैं, उसका कोई मुक़ाबला नहीं।

ब्राह्मणवाद के प्रखर विरोधी और संगीत में हेजेमनी के ख़िलाफ़ मुखर रहने वाले कृष्णा भजन को आस्था, श्रद्धा या किसी आध्यात्मिक सम्मोहन से छुड़ाते हुए एक अवर्णनीय ऊंचाई पर स्थापित कर देते हैं। उस ऊंचाई पर भौतिकी भी ठिठकी हुई है और भौतिक संसार की क्या कहें। लेकिन बात यहीं पूरी नहीं होती। समकालीन समय में इस बंदिश को, अयोध्या में अदालतों और सरकारों के फ़ैसलों से लेकर कोरोना काल के अनुष्ठानों आयोजनों के किनारों पर कैफ़ी आज़मी की नज़्म दूसरा बनबास और सुदीप बैनर्जी की कविता समतल नहीं होगा क़यामत तक पूरे मुल्क की छाती पर फैला मलबा…की तरह भी, देखा जा सकता है। कृष्णा का राजनीतिक विवेक और कला चेतना अपने सुनने वालों को उस ऊंचाई तक आने का न सिर्फ़ न्यौता देते हैं बल्कि उसे छूने का अवसर भी मिल जाता है। ये छूना, किसी ईश्वर या किसी अध्यात्म को छू लेने की पराभौतिकी नहीं है ये बस संगीत को छूना है और इंसाफ़ के लिए भटकना है।

(शिव प्रसाद जोशी वरिष्ठ पत्रकार हैं। मूलत: उत्तराखंड के रहने वाले प्रसाद आजकल जयपुर में रह रहे हैं।)

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This post was last modified on August 9, 2020 12:08 pm

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