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डीयू में बेचैन की हिंदी के विभागाध्यक्ष पद पर नियुक्ति रोक कर की जा रही है सामाजिक न्याय की सांस्थानिक हत्या

(विगत कुछ दिनों से मैं लगातार डीयू के हिन्दी विभाग में नए विभागाध्यक्ष (हेड ऑफ डिपार्टमेन्ट- HoD) की नियुक्ति को लेकर चल रहे तमाशे से रूबरू कराता रहा हूँ। अब पूरी दास्ताँ सुनिए।)

दिल्ली विश्वविद्यालय का हिन्दी विभाग सन 1948 से अस्तित्व में आता है। इस विभाग में तब से लेकर आज तक कुल 20 विभागाध्यक्ष बन चुके हैं। कहना न होगा कि ये सभी 20 विभागाध्यक्ष सवर्ण तबके से ताल्लुक रखने वाले ही रहे। प्रमाण के तौर पर यह इतिहास लिखी हुई पट्टिकाएँ आप देख सकते हैं। नियम व परंपरा रही कि वरिष्ठता के आधार पर हर तीन साल के बाद विभागाध्यक्ष नियुक्त किए जाते रहे। हिन्दी विभाग अपने जीवनकाल के 72 वें साल में जाकर ऐसी ‘विशेष’ स्थिति में आता है, जब वरिष्ठताक्रम में एक दलित प्रोफ़ेसर श्यौराज सिंह बेचैन का विभागाध्यक्ष होने का योग बनता है। बस यही बात सिस्टम को अपच हो जाती है। यहीं से खेल शुरू हो जाता है। 

प्रोफ़ेसर श्यौराज सिंह बेचैन फ़रवरी 2010 में हिन्दी विभाग में बतौर प्रोफ़ेसर नियुक्त होते हैं। उस समय विभाग के ही एक प्रोफ़ेसर बतौर ‘रिसर्च साइंटिस्ट’ काम कर रहे थे। यूजीसी ने 2008 में रिसर्च साइंटिस्ट के पद को ख़त्म करके उन्हें उनकी पे-स्केल के आधार पर पद पर स्थानांतरित कर देने का प्रस्ताव पेश किया, जो अक्टूबर 2010 में लागू हुआ। विभाग के प्रोफ़ेसरान को अक्टूबर 2010 में प्रोफ़ेसर के पद पर स्थानांतरित किया गया। प्रोफ़ेसर साहेब 2008 के प्रस्ताव के आधार पर खेल खेला कि इन्हें वरिष्ठ मानकर फ़रवरी 2010 में प्रोफ़ेसर बन चुके प्रो. श्यौराज सिंह बेचैन के पहले विभागाध्यक्ष बनाया जाए। जबकि श्यौराज सिंह बेचैन फ़रवरी 2010 में ही बतौर प्रोफ़ेसर कार्यभार ग्रहण कर लेने के कारण वरिष्ठताक्रम में ऊपर हैं। इसलिए इन्हें ही विभागाध्यक्ष बनाना है।

डीयू के कुलपति ने नियमों के आधार पर जब प्रोफ़ेसर श्यौराज सिंह बेचैन को ही वरिष्ठ माना और अमुक प्रोफ़ेसर का आवेदन खारिज कर दिया, तब उन्होने सत्ता का खेल खेलना शुरू किया। उन दिनों विभाग की गलियों में शोर गूँजता सुनाई दिया कि बनारस के ब्राह्मण से पाला पड़ा है, ऐसे कैसे छोड़ देंगे, एक दलित को ऐसे कैसे बनने दें। फिर क्या गृह मंत्रालय, क्या दिल्ली भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी, क्या संघ; हर कहीं से कुलपति पर दबाव बनाया गया, कि हर हाल में श्यौराज सिंह बेचैन की बजाय अमुक प्रोफ़ेसर को ही विभागाध्यक्ष बनाया जाए। आगे एमाफिल पीएचडी के एडमिशन से लेकर स्थायी नियुक्तियाँ भी तो कराना है। कोई और बन गया तो हमारी कैसे सुनेगा। अगर एक स्वाभिमानी दलित प्रोफ़ेसर बन गया, तब तो संघी दखल नहीं ही होने देगा।

यानि आज पिछले तीन हफ़्तों से स्थिति ये है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति, प्रति-कुलपति, रजिस्ट्रार, हिन्दी विभाग के पिछले विभागाध्यक्ष, विभाग के सभी शिक्षक प्रोफ़ेसरान नियम-क़ायदों व संविधान के पक्ष में खड़े होकर प्रोफ़ेसर श्यौराज सिंह बेचैन को विभागाध्यक्ष बनाना चाहते हैं। लेकिन दूसरी तरफ सत्ता खड़ी है बाधा बनकर। आप इसे संघी सरकार की सत्ता कहें, या 72 साल में पहली बार एक दलित के विभागाध्यक्ष बनने से दरकती सांस्कृतिक मनुवादी सत्ता। इसी वजह से रोज़ाना दबाव के चलते कुलपति आश्चर्यजनक रूप से अनिर्णय की स्थिति में है। वह हिन्दी विभाग के इतिहास में पहली बार इतने वक़्त से नए विभागाध्यक्ष को पदभार नहीं सौंप रहा। ऐसा होने के पीछे बड़ी वजह जाति है। आज तक जब किसी के साथ ऐसा नहीं हुआ, तो इस बार ही ऐसा क्यों हो रहा।

ये है पूरा मामला। क्या इसका प्रतिरोध नहीं किया जाना चाहिए। कल तक तो ये कहते थे कि माँ सरस्वती का पावन प्रांगण दूषित हो जाएगा, अगर दलित पिछड़े आ गए तो। उन्हें लगातार रोका गया। आज जब ये बहुजन हर तरह से सक्षम होकर आ गए, तो खुलेआम इनके अधिकारों को कुचला जा रहा है। अब ये लड़ाई किसी एक HoD की नहीं रही, ये लड़ाई संविधान व सामाजिक न्याय की बन चुकी है। अगर एक प्रोफ़ेसर के साथ हक़मारी का अन्याय हो सकता है, तो कौन कब तक सुरक्षित बचेगा। इसके खिलाफ़ दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी व छात्रों ने मिलकर प्रतिरोध की ठानी है। संविधान जीते, इसलिए लड़ना होगा।

(लेखक लक्ष्मण यादव दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)

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This post was last modified on October 6, 2019 11:55 am

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