Sunday, December 5, 2021

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क्योंकि वो जानवर की मौत पर बोलना और इंसान की जघन्य हत्या पर भी चुप रह जाना जानते हैं !

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एक गर्भवती हथिनी की मौत को लेकर पूरे मुल्क में जो उबाल दिख रहा था, वह अब ठंडा हो गया है।

वे तमाम सेलेब्रिटी जिन्होंने पलक्कड़, केरल की इस घटना पर अपनी पीड़ा और गुस्से को जुबां दी थी, वह अपने-अपने कामों में मसरूफ हो गए हैं। वह मोहतरमा पूर्व काबीना मंत्री जिन्होंने इस घटना को साम्प्रदायिक शक्ल देने की बेहद शर्मनाक कोशिश की थी, वह अब किसी नए काम में मुब्तिला हो गयी हैं। (https://www.deccanchronicle.com/nation/current-affairs/040620/communal-colour-added-to-pregnant-elephants-death-in-kerala.html

क्या यह इन सभी की मसरूफियत का ही मामला कहा जा सकता है कि जहां केरल में हथिनी के मामले पर जार-जार आंसू बहाने वाले इन तमाम लोगों को सूबा हिमाचल प्रदेश के उसी किस्म के मामले पर तौबा-तौबा करने की फुरसत भी नहीं मिली, जहां एक गाय को विस्फोटक खिलाने का मामला सामने आया है। यह घटना हिमाचल के बिलासपुर के झंडुता इलाके की बताई जा रही है जहां कथित तौर पर गाय को विस्फोटक खिलाने की बात कही जा रही है। विस्फोटक खाने से गाय का जबड़ा फट गया और वह बुरी तरह से घायल हो गई। इसका एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। https://www.naidunia.com/national-pregnant-cow-jaw-blown-off-by-the-explosive-in-himachal-video-is-going-viral-5602103/

या इसकी मुख्य वजह यह है कि हिमाचल प्रदेश में केन्द्र में सत्ताधारी पार्टी की ही सरकार है और केरल में कम्युनिस्ट पार्टी के हाथों सत्ता की बागडोर है, जिसने बाकी मुल्क के बरअक्स कोविड 19 के नियंत्रण में एक नज़ीर कायम की है, जिसका डंका दुनिया में भी बज रहा है। 

अब जहां तक गर्भवती हथिनी की मौत का सवाल है तो इस मामले में केरल के मुख्यमंत्री जनाब पिनराई विजयन ने कहा है कि ‘इस मामले में न्याय होगा’। कुछ गिरफ्तारियां भी हुई हैं। फिलवक्त़ यह नहीं मालूम कि क्या मुख्यमंत्राी महोदय नफरत के उन सौदागरों के खिलाफ – केन्द्र में सत्तासीन पार्टी के नेताओं एवं चन्द न्यूज एंकरों के खिलाफ भी – कोई कार्रवाई करने की सिफारिश करेंगे जिन्होंने माहौल को विषाक्त करने की कोशिश की थी। वैसे ख़बर यह आयी है कि मल्लपुरम के एक वकील ने उपरोक्त पूर्व काबीना मंत्री महोदया और अन्य के खिलाफ जिला न्यायालय में अर्जी दी है कि उन्होंने जिले के खिलाफ कुत्सप्रचार अभियान चलाया तथा उनके खिलाफा धारा 153 ए और धारा 120 बी के तहत मुकदमा दर्ज हो।

https://www.timesnownews.com/india/article/kerala-elephant-death-heres-why-a-malappuram-lawyer-has-filed-complaint-against-maneka-gandhi-others/601911)

जैसा कि हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं कि मीडिया ने इस बात को रेखांकित किया था कि गर्भवती हथिनी की मौत को लेकर कितने सारे सेलेब्रिटीज ने अपना दुख जताया था। विराट कोहली इस घटना से ‘व्याकुल’ हो गए तो जनाब रतन टाटा ने इसे ‘आपराधिक कार्रवाई’ कहा और उसकी तुलना किसी मनुष्य की पूर्वनियोजित हत्या से की। यह बताया नहीं जा सकता कि क्या हथिनी की मौत पर शोक प्रगट करने वाले उन सभी ने माहौल को साम्प्रदायिक शक्ल देने की हरकत के बारे में कुछ बोला था या नहीं।

आप इसे संयोग कह सकते हैं कि जिस दिन गर्भवती हथिनी की मौत पर सेलेब्रिटीज सियापा में मुब्तिला थे, उसी दिन दिल्ली की एक अदालत ने जामिया-मिलिया इस्लामिया की छात्रा सफूरा जरगर – जो पांच माह की गर्भवती है तथा विगत लगभग ढाई महीने से दमन कारी कानूनों के तहत जेल में बन्द कर दी गयी है – उसे मानवीय आधार पर भी जमानत देने से इन्कार किया था। दरअसल पीसीओएस /पॉली सिस्टिक ओवेरियन डिसआर्डर/ की शिकार सफूरा को इससे गर्भावस्था में परेशानी बढ़ सकती है और कोविड 19 महामारी के इस वातावरण में जेल में उसे संक्रमण होने की भी संभावना है।

याद रहे सफूरा जामिया कोआर्डिनेशन कमेटी के मीडिया टीम से जुड़ी थी, जिसने  नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ चले ऐतिहासिक आंदोलन की अगुआई की थी। देश और दुनिया के अग्रणी विद्वानों और कार्यकर्ताओं ने सफूरा तथा उसके साथ कई अन्य की गिरफ्तारी के खिलाफ आवाज़ बुलन्द की है तथा उन सभी को रिहा करने की मांग की है। https://kafila.online/2020/05/27/statement-against-the-wrongful-arrest-of-students-and-the-use-of-the-pandemic-as-a-political-emergency-faculty-feminist-collective-jnu/#more-40815)

फिलवक्त़ हम सफूरा को जमानत देने से इन्कार करने के पीछे अदालत द्वारा इस्तेमाल तर्क पर न भी जाएं तो भी अदालत को क्या सर्वाेच्च न्यायालय के मार्च के आदेश के आलोक में अपना निर्णय सुनाना चाहिए था जिसने कोविड 19 महामारी के विस्फोट के दिनों में जेलों में बढ़ती भीड़ को कम करने की सलाह दी थी। (https://www.businesstoday.in/current/economy-politics/coronavirus-supreme-court-orders-release-of-prisoners-to-decongest-jails/story/398982.html)

सेलेब्रिटीज नामक इस जमात के नैतिक आग्रह दरअसल हमेशा ही विवादों के केन्द्र में रहते आए हैं। 

निश्चित ही वह सभी सामूहिक तौर पर जानते हैं कि किसी चतुष्पाद की हालत पर बात करना – जिसकी मौत ऐसे सूबे में हुई जहां केन्द्र में सत्तासीन पार्टी की मुखालिफ पार्टी की सरकार है- आसान है, अगर वह ऐसे चतुष्पादों की हालत पर बोलने लग जाएं, जिसकी आंच केन्द्र सरकार में सत्ताधारी पार्टी पर आने लगे, जिनकी दुर्दशा उसी पार्टी के चलते हुई है तो इसके विपरीत परिणाम हो सकते हैं।

जाहिर है गर्भवती हथिनी की मौत पर जार जार बहते आंसू लेकिन एक गाय को विस्फोटक खिलाने पर वह खामोशी ही ओढ़े रहे। 

वैसे हम हरेक से उम्मीद नहीं कर सकते कि वह जॉन बायेगा, के नक्शेकदम पर चले। याद रहे अश्वेत मूल का यह ब्रिटिश अभिनेता और निर्माता जो स्टार वार्स नामक फिल्मों की श्रृंखला में अपनी भूमिका में काफी चर्चित हुआ है, उसने पिछले दिनों लंदन में ‘ब्लैक लाइवज मैटर’ के बैनर तले लंदन में आयोजित नस्लवाद विरोधी एक विशाल प्रदर्शन में जोरदार भाषण दिया, जिसमें उसने साफ कहा कि ‘‘मुझे मालूम नहीं कि इस भाषण के बाद मेरे कैरियर का क्या होगा, लेकिन वह भाड़ में जाए’। (https://www.theguardian.com/film/2020/jun/04/john-boyega-anti-racism-speech-wins-praise-star-wars-costars-black-lives-matter

मुमकिन है कि सीएए विरोधी प्रदर्शनों में शामिल कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर या उन सभी पर मंडरा रहे कोविड 19 के ख़तरे को लेकर इन सेलेब्रिटीज ने खामोशी इसलिए बरती क्योंकि उन सभी पर ख़तरनाक धाराओं में मुकदमे लादे गए हैं। मगर इन महानुभावों ने- हां इनमें से कई उस वक्त़ भी सेलेब्रिटी ही थे – उस वक्त़ भी खामोशी ओढ़ना कुबूल किया था जब वर्ष 2002 में एक गर्भवती कौसर बानो को इन दिनों की सत्ता की बागडोर हाथ में थामे लोगों के करीबियों में से एक ने बाकायदा अपनी तलवार से भोंक दिया था। यह बात अब दस्तावेजीकृत है कि बाबू बजरंगी नामक इस शख्स ने एक स्टिंग आपरेशन में यह भी बताया था कि किस तरह तलवार की नोंक पर उसने कौसर बानो के शरीर में पल रहे भ्रूण को निकाला था और उसे जला दिया था। (https://www.dnaindia.com/india/report-gujarat-riots-babu-bajrangi-s-brutal-act-done-out-of-irrational-hatred-1736590

याद रहे कि कौसर बानो, एक साधारण महिला थी, जिसने किसी आंदोलन में भाग नहीं लिया था, मगर फिर भी उन्हें इस घटना ने विचलित नहीं किया था।  

कोई भी उन 40-50 रिपोर्टों को पलट सकता है जिसे राष्टीय और अंतरराष्टीय स्तर के मानवाधिकार कर्मियों, विद्वानों ने तैयार किया था जब  फरवरी-मार्च 2002 के उन स्याह दिनों में गुजरात नामक सूबे में हिन्दुत्व वर्चस्ववादी जमातों की पहल पर हुए संगठित हिंसाचार को- जब हुकूमत की बागडोर सम्भालने वालों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री के मुताबिक राजधर्म का पालन नहीं किया था – केन्द्रित करते हुए विस्तृत रिपोर्ताजों को तैयार किया था। आप पलट कर देख सकते हैं कि इन महानुभावों ने क्या प्रतिक्रिया दी थी। क्या उन्होंने उन दिनों जारी हत्याओं, बलात्कारों, आगजनी की घटनाओं की भर्त्सना की थी, क्या उन्होंने कौसर बानो के प्रति सहानुभूति के चन्द लब्ज बोलने का साहस जुटाया था या वह सभी बहुसंख्यकों के नए हृदय सम्राट की अगवानी में मुब्तिला थे ?

निश्चित ही इन सेलेब्रिटीज को अकेले ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता कि वह चुनिन्दा मसलों पर अपने गुस्से को प्रगट करते हैं और फिर लम्बे मौन को धारण करते हैं। वह भले ही मुल्क के ज़मीर के रखवाले के तौर पर अपने आप को प्रस्तुत करें लेकिन वह अपने बैंक के खजाने, कैरियर आदि के बारे में, अपने उद्योगों के विस्तार के बारे में अधिक चिंतित रहते हैं और इस वजह से हुक्मरानों की तारीफ में ही मुब्तिला रहते हैं कि कहीं वह नाराज न हो जाएं तथा किसी किस्म की जांच न बैठा दें उनके खिलाफ।

यह सिलसिला आज नया नॉर्मल बन गया है। आज का यह नया रिवाज़ बना है। 

विश्व हिन्दू परिषद के अग्रणी नेता गिरिराज किशोर ने बहुत पहले इस वातावरण का संकेत दिया था। आप याद कर सकते हैं कि 21 वीं सदी के शुरुआती दौर में जब दुलीना, झज्जर में पांच दलितों को – जो मरी गायों को ढो रहे थे – पुलिस स्टेशन के सामने, तमाम वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में – पीट पीट कर मार डाला गया था, तब उन्होंने एक विवादास्पद बयान दिया था कि ‘पुराणों में इन्सान की तुलना में गाय को पवित्रा समझा जाता है।’( Dulina, Jhajjar, October 2002 http://pudr.org/content/dalit-lynching-dulina-cow-protection-caste-and-communalism) उत्सवनुमा अंदाज में की गयी इन हत्यााओं के बाद, जैसा सिलसिला 12 साल बाद पूरे मुल्क में तारी हुआ था, जो हुआ वह और अविश्वसनीय था। पुलिस वाले जो पूरी हत्या के दौरान मूकदर्शक रहे थे उन्होंने इन मरी गायों को जांच के लिए भेजा तथा इन मारे गए दलितों के खिलाफ गोहत्या का मुकदमा दर्ज किया।

या हम दो साल पहले बुलंदशहर जिले में हुई एक साहसी पुलिस अधिकारी की झुंड द्वारा हत्या के प्रसंग को याद कर सकते हैं जिन्हें हिन्दुत्व वर्चस्ववादियों की शह पर अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। (https://www.ndtv.com/india-news/bulandshahr-violence-in-meet-after-inspector-subodh-kumar-singhs-mob-killing-yogi-adityanath-focuses-1957951) घटना की शुरूआत किसी खेत में मरी गायों के शवों के मिलने की सूचना से हुई थी, जिसकी जांच के लिए सुबोधकुमार सिंह नामक वह जांबाज अधिकारी पहुंचा था।

हम याद कर सकते हैं कि किस तरह योगी आदित्यनाथ, जो गोरखनाथ मठ से जुड़े संन्यासी हैं और फिलवक्त़ सूबा यूपी के मुख्यमंत्री हैं, उन्होंने हत्या की इस घटना पर मौन बनाए रखा था और मरी गायों के शवों के प्रसंग पर चिन्ता प्रगट की थी और जांच के आदेश दिए थे। जब मुख्यमंत्राी की इस चुप्पी पर शोर मचा तब कुछ समय बाद उनके कार्यालय की तरफ से दूसरा बयान जारी हुआ था जिसमें इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या का जिक्र था और परिवार को सहायता देने की बात की गयी थी।

या हम 23 जून 2017 को जुनैद / उम्र 15 साल/ की हत्या की घटना पर गौर कर सकते हैं जो अपने परिवार के साथ ढेर सारी खुशियों के साथ ईद मनाने की सोच रहा था। वह दिल्ली से मथुरा जाने वाली एक ट्रेन पर सवार था। रेलगाड़ी में बैठे कुछ लोगों ने उसे और उसके दोस्तों का धर्म के नाम पर मज़ाक उड़ाना शुरू किया। मारपीट का सिलसिला यहां तक आगे बढ़ा कि जुनैद को सरेआम चाकू से भौंक दिया गया जिसने असावटी रेलवे स्टेशन पर अपने भाई की गोद में दम तोड़ दिया। 

इंडियन एक्सप्रेस के कौनैन शेरीफ एम फरीदाबाद के उस रेलवे स्टेशन पर लौटे ताकि यह जाना जाए कि आखिर जुनैद को मरते हुए किसने देखा था। उन्होंने पाया कि किसी ने भी नहीं देखा जब एक किशोर प्लेटफार्म नम्बर चार पर लहूलुहान पड़ा था। पत्रकार ने लिखा था कि खून के वह धब्बे अभी भी प्लेटफार्म पर ‘दिख’ रहे हैं और इसके बावजूद किसी ने कुछ नहीं देखा, न स्टेशन मास्टर ओम प्रकाश और न ही पोस्टमास्टर भगवत दयाल, जिनका दफ्तर प्लेटफार्म के उस पार है। ‘मैंने कुछ नहीं देखा’, ओम प्रकाश का कहना था। ‘मैंने कुछ नहीं देखा’ भगवत दयाल ने भी कहा। दोनों ने वही वाक्य दोहराया। यहां तक कि सीसीटीवी ने भी कुछ नहीं देखा। एक अधिकारी ने बताया कि ‘घटनास्थल के बिल्कुल सामने एक सीसीटीवी कैमरा है। वायर तोड़ दी गयी है और वह काम नहीं कर रहा है।’ 

युवा विदुषी और ब्लॉगर आरती सेठी ने एक्सप्रेस के उस पत्रकार की बातों पर लिखा था:

और फिर उन्होंने सामूहिक तौर पर, बिना किसी आपसी सहमति के, जो उस घटनाक्रम को उन्होंने देखा था उसे न देखने का सिलसिला शुरू किया। इस घटना का सबसे डरावना पहलू यही रहा है जिस पर वह रिपोर्ट रोशनी डालती है: अनकहे की आतंकित करने वाली ताकत, लेकिन जो सामूहिक तौर पर बंधनकारी हो, हिन्दुओं के बीच यह सहमति कि किसी मुस्लिम बच्चे के मृत शरीर को न देखा जाए।

उत्तर भारत के उस छोटे से स्टेशन के रेलवे प्लेटफॉर्म पर हिन्दुओं ने तत्काल एक विचित्र सामाजिकता निर्मित की, लोगों के बीच एक साझा सामाजिक बंधन जो आम तौर पर एक दूसरे से परिचित नहीं थे। अजनबियों के इस परस्पर स्वीकार के बाद, इस प्लेटफॉर्म पर खड़े हिन्दुओं ने मौन की इस संहिता का पालन करना तय किया जिसके जरिए आज के भारत के रेलवे प्लेटफार्म पर एक मुस्लिम बच्चे की सरेआम मौत को दो सौ लोगों द्वारा देखा नहीं गया।

असावटी प्लेटफॉर्म पर घटना के वक्त मौजूद दो सौ से अधिक लोगों ने इस सामूहिक हत्या को एक ‘अघटना’ non event  में तब्दील कर दिया था। 

पटाखों से भरे अनानास को खाने वाली गर्भवती हथिनी की मौत निश्चित ही एक निन्दनीय घटना है और यह अच्छी बात है कि सेलेब्रिटीज ने इसके बारे में बोला है। लेकिन क्या वह अपने जैसे मनुष्यों की पीड़ा पर भी बोल उठेंगे या उनके सामने घटित हो रही मानवीय त्रासदी को एक अघटना में तब्दील कर देंगे ?

(सुभाष गाताडे लेखक, स्तंभकार और चिंतक हैं। आप आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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