Tuesday, October 26, 2021

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कोरोना से मरने वालों को मुक्त हो गए कहना, इतिहास का सबसे संवेदनहीन लफ्‍ज़

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जो लोग चले गए, वे मुक्त हो गए, ‘पॉजिटिविटी अनलिमिटेड’ कार्यक्रम में बोला गया यह सुभाषित, संघ प्रमुख, मोहन भागवत जी का है। संघ बात तो हिंदुत्व की करता है पर उसका आचरण अक्सर सनातन परंपरा के विरुद्ध होता है। ‘जब ढंग से अंतिम संस्कार ही लोगों को मयस्सर नहीं हुआ और न ही उनकी मुक्ति सनातन शास्त्रीय परम्परा और विधि विधान से हुई, तो उनकी मुक्ति कैसे होगी? यह सब जो लाशें, कुछ लावारिस और कुछ लादावा हो कर गंगा सहित अन्य नदियों में बह रही हैं, या रेत में बिना किसी क्रियाकर्म के दफना दी जा रही हैं, वे सब की सब प्रेत योनि में जन्म लेंगी।’ यह कहना है बनारस के एक पंडित जी का जो संस्कृत विश्वविद्यालय में कर्मकांड के आचार्य हैं। 

कुछ ही दिन पहले, हिंदी दैनिक समाचार पत्र, जनसत्ता के अनुसार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने सकारात्मकता फैलाने के उद्देश्य से आयोजित एक कार्यक्रम में कहा था कि,  ” जिन लोगों की कोरोना से मौत हुई है वह एक तरीके से मुक्त हो गए हैं। परिस्थिति कठिन है लेकिन हमें निराश नहीं होना है। कठिन समय है। असमय लोग चले गए। उनको ऐसे जाना नहीं चाहिए था। परंतु अब तो कुछ किया नहीं जा सकता। परिस्थिति में तो हम लोग हैं। अब जो लोग चले गए, एक तरह से मुक्त हो गए। उनको इस स्थिति का सामना नहीं करना है। हमें अब हम लोगों को सुरक्षित करना है।” 

संघ प्रमुख ने कहा, “कुछ नहीं हुआ। ऐसा हम नहीं कह रहे हैं। परिस्थिति कठिन है। लेकिन हमें हमारे मन को निगेटिव नहीं होने देना है। हमको हमारे मन को पॉजिटिव रखना है शरीर को कोरोना निगेटिव रखना है। हमें खुद को कोरोना के आगे बेबस नहीं करना है। दुख देखकर निराश नहीं होना है। कई लोग ऐसे हैं जो कोरोना के इस समय में खुद को भुलाकर समाज की सेवा कर रहे हैं उनसे प्रेरणा लेनी है।” 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 11 मई से 15 मई के बीच ‘पॉजिटिविटी अनलिमिटेड’ शीर्षक से ऑनलाइन व्याख्यान की एक श्रृंखला शुरू की है। जिसका उद्देश्य चल रही महामारी के बीच लोगों में विश्वास और सकारात्मकता फैलाना है। व्याख्यान श्रृंखला का आयोजन आरएसएस की कोविड रिस्पांस टीम द्वारा किया जा रहा है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, विप्रो समूह के अध्यक्ष अजीम प्रेमजी, आध्यात्मिक नेता जग्गी वासुदेव प्रमुख वक्ताओं में शामिल हैं।

कुछ दिनों पहले, सरकार ने “सरकार की पॉजिटिव छवि बनाने” और “पॉजिटिव खबरों और उपलब्धियों को प्रभावी ढंग से उजागर करने के माध्यम से लोगों की धारणा” बदलने के लिए प्रभावी संचार नामक एक कार्यशाला का आयोजन किया था। ये सरकारी अधिकारियों की पहली ऐसी कार्यशाला थी। कार्यशाला में प्रत्येक विभाग के संयुक्त सचिव (मीडिया) सहित लगभग 300 अधिकारियों ने भाग लिया था। 

आज तक वेबसाइट में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, इस तरह की पॉजिटिविटी जैसी कोशिशों को लेकर विरोधी दलों का कहना है कि ” जब देश महामारी की दूसरी लहर के चरम पर है, ऐसे में सरकार झूठा प्रचार करने पर जुटी हुई है। पॉजिटिविटी फैलाने के नाम पर “झूठ” और “प्रचार” को आगे बढ़ाने का सरकार का प्रयास “घृणित” है। एक शोकग्रस्त राष्ट्र और हमारे चारों ओर त्रासदियों के सामने, पॉजिटिविटी फैलाने के नाम पर झूठ और प्रचार को बढ़ावा देने का निरंतर प्रयास घृणित है! पॉजिटिव होने के लिए हमें सरकार के अंधे प्रचारक बनने की जरूरत नहीं है।” 

सकारात्मकता एक अच्छा भाव है। यह एक प्रकार का आशावाद है। आशावादी होना एक अच्छा गुण है। पर आशावाद भी किसी न किसी उम्मीद से ही उपजता है। मरीज अस्पताल में हो, उसे दवा चाहिए, दवा नहीं है, ऑक्सीजन चाहिये, ऑक्सीजन नहीं है, अस्पताल के खर्चे के लिये धन चाहिए, धनाभाव है। किस उम्मीद पर वह आशावादी बने ? ग़ालिब के शब्दों में कहें तो, 

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी 

तो किस उमीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है!

अब तो बात करने, या कुछ कहने की ही ताक़त नहीं बची तो फिर किस उम्मीद पर कोई आरजू की जाय। और जब उम्मीद ही नहीं, आरजू ही नहीं तो फिर कैसा आशावाद और कैसी सकारात्मकता ? पर इसी समय मरीज को कोई उसे दवा दे दे, ऑक्सीजन की व्यवस्था कर दे, और मरीज ठीक होने लगें, एक आशावाद उस बंजर नाउम्मीदी में भी खिल उठेगा। नकारात्मकता को उठा कर वह बाहर फेंक देगा। जैसे मिथ्या वादे जुमला होते हैं, वैसे ही जलती चिताओं के बीच सकारात्मक बने रहना बहुत ही मुश्किल होती है। ऐसी स्थितिप्रज्ञता बिरलों में ही हो सकती है।  

आज आरएसएस की हैसियत महज एक संगठन की ही नहीं है। उसकी हैसियत सरकार के लिये एक आदेशात्मक संस्था के रूप में है। वह इस सरकार के लिये एक कमांड सेंटर के रूप में है। भाजपा शासित सरकार के एक कैबिनेट मंत्री की हैसियत आरएसएस के एक बड़े पदाधिकारी के आगे कम ही होती है। भाजपा सरकार के मंत्रियों को संघ के असरदार व्यक्ति के सामने मिमियाते हुए मैंने खुद देखा है। संघ को जनता में इस तरह की पॉजिटिविटी अनलिमिटेड जैसे तमाशे करने के बजाय, सरकार से ही उसकी प्रशासनिक क्षमता, महामारी को रोक पाने की उसकी विफलता के बारे में सवाल उठाना चाहिये, न कि सरकार के निकम्मेपन पर नियतिवाद का मुलम्मा चढ़ा कर, यह दर्शन बघारना चाहिए कि, जो हो गया वह बहुत बुरा हुआ और यही नियति है और ऐसे नकारात्मक माहौल में कुछ सकारात्मक सोचा जाय। आज सरकार से यह सवाल कठोरता से पूछा जाना चाहिए कि, इस बीमारी से निपटने के लिये क्या-क्या प्रयास किये जा रहे हैं, न कि जलती और अशास्त्रीय तऱीके से दफन होते शवों के बीच यह उपदेश देना कि, लोग सकारात्मक रहें। जिसके घर मौतें हुयी हों, वहीं इस सकारात्मकता का खोखलापन जान सकता है। 

संघ कितना भी यह दावा करे कि, वह एक राजनीतिक संगठन नहीं है और यह बात उसके लोग गंगा में गर्दन तक खड़े होकर भी कहें तो यकीन मत कीजिएगा। यह एक गैरजिम्मेदार संगठन है जो न तो, भारतीय कानून के अनुसार रजिस्टर्ड है, न ही पारदर्शी है और न ही किसी के प्रति जवाबदेह है। यह एक संगठित गिरोह की तरह है। बस अच्छा बोलता है, अच्छा सुनना चाहता है और इसका हिंदुत्व सनातन धर्म की महान परंपरा से अलग और उलट है। सरकार को आगे रख कर अपना एजेंडा लागू करवाता है। संघ को भी अपनी बात कहने, अपना एजेंडा पूरा करने का उतना ही संवैधानिक अधिकार है, जितना किसी भी नागरिक को है। पर राजनीति को पर्दे के पीछे से संचालित करते रहने, और फिर यह कह कर जिम्मेदारी से भाग जाना कि, वह एक राजनीतिक संगठन नहीं है यह एक फरेब है, जालसाजी है और जिम्मेदारी से भागना है। 

भाजपा का हर संगठन मंत्री संघ से आता है। केंद्रीय स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण महामंत्री आरएसएस से आता है। आजकल बीएल सन्तोष हैं। संघ के सारे आनुषंगिक संगठन, चुनाव में भाजपा के साथ खड़े रहते हैं। वे न केवल खुल कर प्रचार करते हैं बल्कि पूरा चुनाव ही संघ द्वारा अनुमोदित टूल किट पर भाजपा द्वारा लड़ा जाता है। चुनाव में टिकट बांटने से लेकर, प्रचार की रणनीति बनाने तक, आरएसएस की सक्रिय भूमिका भाजपा के पक्ष में रहती है पर जैसे ही इनसे राजनीतिक सवाल पूछिये यह खुद को सामाजिक संगठन बता कर पिंड छुड़ाने लगते हैं। अगर राजनीति ही करनी है तो, करते क्यों नहीं खुल कर। राजनीति कोई बुरी चीज तो है नहीं। नाचब त घूंघट का! लेकिन यह ऐसा नहीं करते हैं क्योंकि राजनीतिक विमर्श में राजनीतिक लाभ हानि की ज़िम्मेदारी लेनी पड़ेगी और जिम्मेदारी से ये बचपन से ही भागते रहे हैं। 

प्रधानमंत्री जी का कोरोना वायरस के बारे में, यह कहना अपनी अक्षमता को छुपाना है कि हमारे सामने अदृश्य दुश्मन है। दुश्मन न तो अदृश्य है और न ही उसका पल पल परिवर्तित वेश ही अदृश्य है। 30 जनवरी 2020 को उस दुश्मन को देख, परख और जान लिया गया था। उसकी फितरत बयां हो गयी थी, पर जनता जहां उस अदृश्य दुश्मन से बचने के लिये हाथ गोड़ धो रही थी, और मास्क पहन रही थी, सरकार ने आंखें ढंक ली थीं, नमस्ते ट्रम्प का आयोजन कर रही थी और स्वास्थ्य मंत्री 13 मार्च 2020 तक यही कह रहे थे कि कोरोना एक मेडिकल इमर्जेंसी नहीं है। और जब वे यह सब कह रहे थे, कोरोना वायरस बगल में खड़ा भविष्य की योजनाएं बना रहा था। 

अदृश्य कोरोना नहीं था अदृश्य सरकार, उसकी प्राथमिकताएं और गवर्नेंस थीं और आज भी है। जब सरकार को हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर दुरुस्त करना चाहिए था, लोगों को नकद धन देकर बाजार में मांग और आपूर्ति का संतुलन बनाये रखना चाहिए था तो, सरकार, देश की कृषि संस्कृति को बर्बाद करने के गिरोही  पूंजीवादी षड्यंत्र में लिप्त थी। कैसे यह तीनों कृषि कानून संसदीय मर्यादाओं को ताख कर रख कर पास करा दिया जाय, इसके जोड़ गांठ में लगी थी। उसका ध्यान ही महामारी के नियंत्रण और निदान की ओर नहीं था। और आज भी जब वह महामारी नियंत्रण की समीक्षा करने बैठती है तो आपदा की आड़ में आईडीबीआई बैंक को बेचने का अवसर हाथ से नहीं जाने देती है ! 

जब दुनियाभर के देश कोरोना के बारे में हो रहे शोधों का अध्ययन कर के वैक्सीन पर करोड़ों डॉलर खर्च कर के अपनी जनता के लिये सघन वैक्सिनेशन की योजना बना रहे थे तो, सरकार खुद के चाटुकारों द्वारा वैक्सीन गुरु के अलंकरण पर आत्ममुग्ध हो रही थी। आत्ममुग्धता सबसे पहले विवेक का ही मुंडन करती है। 

जब दूसरी लहर आ गई और इसने देश भर में तबाही मचानी शुरू कर दी तब भी प्रधानमंत्री जी की चुनावी रैलियां नहीं रुकीं। प्रधानमंत्री तो दिखते रहे पर गवर्नेंस अदृश्य हो गयी। वे जब आसनसोल की चुनावी रैली पर प्रसन्न हो रहे थे, तब तक कोरोना महामारी ने लोगों को अपना शिकार बनाना शुरू कर दिया था। केवल बंगाल के चुनाव के लिये आयोग ने सरकार के कहने पर 8 चरणों मे चुनाव रखा था। यह अलग बात है कि जनादेश टीएमसी के पक्ष में आया। 

दुनियाभर के वैज्ञानिक और वायरजोलोजिस्ट इस बात पर सहमत थे कि, इस आपदा की दूसरी लहर आने वाली है। और जब यह दूसरा बवंडर सहन में ज़ोर पकड़ रहा था, तो 23 मार्च 2021 को सरकार कोरोना विजय की घोषणा कर रही थी और इसी जश्न और उन्माद के ठीक एक माह के भीतर वह वायरल तूफान आया कि आज श्मशान में लकड़ियां कम पड़ गईं और कब्रिस्तान में ज़मीन। क्या यह सरकार का निकम्मापन नहीं है कि देश के शीर्षस्थ वायरजोलोजिस्ट डॉ जमील को अपने पद से इसलिए इस्तीफा देना पड़ा कि सरकार, वैज्ञानिक शोधों पर आधारित सलाह को मान नहीं रही थी ? डॉ जमील पहले विशेषज्ञ नहीं हैं जिन्होंने सरकार द्वारा अपनी विशेषज्ञता की उपेक्षा के कारण पद छोड़ा हो। याद कीजिए, आरबीआई के गवर्नर, उर्जित पटेल, और डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने भी अपने पद से इस्तीफा दिया था। सरकार से यह सब भी पूछा जाना चाहिए कि, आखिर वह विशेषज्ञों की राय के इतने खिलाफ क्यों है और इन सब मे पारदर्शिता क्यों नहीं है। 

इस बीच 18 मई को प्रधानमंत्री ने देश के 46 प्रभावित जिलों के डीएम से सीधे संवाद किया। पीएम ने इस दौरान स्थानीय स्थिति, डीएम के अनुभव और आने वाली तैयारियों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि ” कोरोना काल में कई लोगों ने अपने परिवारवालों को खोया है। आपने अपने जिलों में क्या किया है, वह मुझे लिखकर भेजें, हम अन्य जिलों में भी उसे लागू करेंगे। हर जिले की अपनी अलग चुनौतियां हैं। अगर आपका जिला जीतता है तो देश जीतता है। गांव-गांव में ये संदेश जाना चाहिए कि वह अपने गांव को कोरोना मुक्त रखेंगे।” 

आगे वे कहते हैं, ” गांव वाले खुद ही अपने हिसाब से मैनेज कर रहे हैं। पहली लहर में भी गांव वालों ने इस संकट को संभाला था। कोरोना के खिलाफ इस युद्ध में हर कोई एक अहम भूमिका निभा रहा है। सभी डीएम इस युद्ध के फील्ड कमांडर हैं।  लोगों को सही और सटीक जानकारी पहुंचानी चाहिए, ताकि किस अस्पताल में कितने बेड हैं और कहां पर बेड्स खाली हैं। फ्रंटलाइन वर्कर्स को बढ़ावा देना जरूरी है। जिलाधिकारी अपने जिले के अनुसार काम करें, अगर आपको लगता है कि सरकार की किसी गाइडलाइन्स में अपने इनपुट डालकर कुछ बेहतर किया जा सकता है, तो बिना संकोच उसे लागू करें। हमारी कोशिश हर एक जीवन को बचाने की है, टेस्टिंग-ट्रैकिंग-ट्रीटमेंट-आइसोलेशन पर बल देना जरूरी है।” 

इस पीएम डीएम संवाद का क्या असर इस महामारी पर पड़ता है, यह तो बाद में पता चलेगा। पर एक सकारात्मक टिप्पणी ज़रूर करूँगा कि यह संवाद और गोष्ठी महामारी को रोकने में सफल हो। 

विश्व प्रसिद्ध मेडिकल जर्नल लांसलेट के अनुसार अगस्त तक भारत में कोविड से एक करोड़ लोगों की मृत्यु हो सकती है । द इकोनॉमिस्ट के एक लेख के अनुसार, दस लाख लोग पिछले दो महीने में मर चुके हैं। सरकार के आंकड़ों पर न जाएं।  लैंसलेट पत्रिका ने ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं को बढ़ाने का परामर्श दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने भी सक्रियता दिखाते हुए, एक राष्ट्रीय टास्क फ़ोर्स का गठन किया है। इसका काम विभिन्न सब ग्रुप के ज़रिए देश के हर कोने में ऑक्सीजन और अन्य चिकित्सा सुविधाओं को सुनिश्चित करना है । एक हफ़्ते के भीतर इनको रिपोर्ट बना कर कोर्ट में देना भी है । जो काम सरकार को करना चाहिए, वह काम अदालत कर रही है। लगता है हम एक अंधा युग में जीने के लिये अभिशप्त हैं। राज्य की अवधारणा बदल रही है। मुफ्त लंच जैसी कोई चीज नहीं होती, यह हमारा नया बोध वाक्य बनता जा रहा है। राज्य की पहुंच, गवर्नेंस को लेकर, कम से कम स्वास्थ्य के मामले में तो पूरी तरह से नकारात्मक दिखती है । लोक कल्याणकारी राज्य का अर्थ तो नब्बे के दशक से ही धीरे धीरे ख़त्म हो रहा था, लेकिन आज राजसत्ता का अर्थ सिर्फ़ जनसंहार रह गया है। ऐसे समय में सकारात्मकता का उपदेश देना और सरकार से कुछ न पूछना, एक अश्लील संवेदनहीनता है। 

अगर शब्दों और उसकी अर्थवत्ता पर जाएंगे तो सकारात्मक रहना ही चाहिए। पर सकारात्मक रहने का तात्पर्य यह बिल्कुल नहीं है कि हम अपनी सरकार, और गलतियों पर पर्दा डाल दें और यह कहें कि हम बुरी चीजें नहीं देखते। सकारात्मक सोच यह होती है कि समाज, प्रशासन या हमारे आसपास जो भी ऐसा घट रहा हो, जो जनहित के विरुद्ध है, जीवन के विरुद्ध है, मानवता के विरुद्ध है, और समाज की प्रगतिशील चेतना के विरूद्ध है, के खिलाफ हम खड़े हों, और बिना डरे, बिना झिझके और दृढ़ता से अपनी बात कहें। न च दैन्यम न पलायनम, यह सकारात्मकता होती है न कि इन सब से मुंह छुपा कर सुभाषित बघारना। 

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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