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बीजेपी दूसरी संस्कृतियों की कब्र पर खिलाना चाहती है बहुसंख्यक संस्कृति का फूल

कश्मीरी छात्रों और छात्राओं ने स्वतन्त्रता दिवस से तीन दिन पहले आई ईद-उल-अदहा का आयोजन 12 अगस्त, 2019 को जंतर-मंतर पर किया, कारण था उनका अपने घर कश्मीर की वादियों में न जा पाना। इस आयोजन ने दुखद और दिल को छू लेने वाले एहसासों को प्रदर्शित किया। उन छात्रों के आँखों में आंसू थे और गले रुंधे हुए थे कि ईद के मौके पर वे अपनों के बीच नही हैं, अपनों से कोई संपर्क भी नहीं है और हिंदुस्तान की सत्ता में बैठे नेताओं द्वारा कश्मीरी अस्मिता पर लगातार हमला झेल रहे हैं। उनकी दर्द भरी दास्तान को सुनकर आयोजन में उनका समर्थन करने आये अधिकतर लोगों की आँखें भर आई थीं लेकिन किसी के भी पास उन कश्मीरी छात्र-छात्राओं को दिलासा दिलाने के लिए कुछ भी नहीं था ताकि उनके दुःख, असहाय स्थिति और छटपटाहट को कम किया जा सके।

दूसरी ओर इस आयोजन में उन्होंने अपने उस संस्कृति पहचान का भी प्रदर्शन किया जिसे खत्म कर देने के लिए भारतीय राज्य द्वारा उनके साथ युद्ध किया जा रहा है। इन कश्मीरी छात्र-छात्राओं ने अपने कश्मीरी लहज़े में वहां मौज़ूद सभी समर्थकों को बहुत ही प्यार के साथ हाथ पकड़ कर बैठाया, ईद के पकवानों को बारी-बारी कर परोसा, सबको पूछ-पूछ करके यह सुनिश्चित किया की सभी तरह के व्यंजन सबको मिल जाये और साथ ही मिडिया कर्मियों को भी खाने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने नज़्म और कवितायें पढ़ी, गले मिले और यह सन्देश दिया कि अपने सस्कृति और पहचान को बनाए रखने के लिए वे ज़िंदादिली के साथ संघर्ष कर रहे हैं।

उस दिन एक तरफ कश्मीरियों के आंसुओं को देखकर हम सब खुद को भावनात्मक तौर पर विचलित होने से नहीं रोक पा रहे थे तो दूसरी ओर उसी दिन भाजपा विधायक, सांसद से लेकर भाजपा मुख्यमंत्री तक के युद्ध विजय के अहंकार भरे बयान आ रहे थे की अब उनकी पार्टी के कार्यकर्ता गोरी-गोरी कश्मीरी लड़कियों से शादी करके कश्मीरी बहुओं को घर लायेंगे। भाजपा नेताओं द्वारा दिए गए ये बयान कश्मीर पर उनके युद्ध विजय के उपलक्ष्य में दिए गए बयान जैसे थे। कश्मीर की बेटियों पर उनके द्वारा दिए गए बयान वैसे ही हैं जैसे मध्ययुगीन दौर में जब कोई राजा युद्ध जीतता था तो वह जीते गए प्रदेश के महिलाओं पर यौनिक आक्रमण करके उस विजित प्रदेश के लोगों से बदला लेता था तथा अपमानित करता था।

इस तरह के बयान भाजपा नेताओं के किसी मानसिक दिवालियेपन से नहीं निकला है बल्कि उनकी आधिपत्य कायम करने की उस राजनीतिक विचारधारा से निकलता है जो धर्म, जाति व नस्ल के नाम पर समाज के कमज़ोर तबकों के साथ बलात्कार व हत्या सहित हर तरह के दमन को उचित मानती है। इस बहुसंख्यकवादी राजनीति की परिभाषा में शक्तिशाली समूह ही राष्ट्र है, जिसे जीतना ही होगा और कमज़ोर को ख़त्म हो जाना होगा।

अनुच्छेद -370 और 35A को हटाकर पहला हमला ही कश्मीर की बेटियों पर हुआ और वहां की ज़मीनों पर क़ब्ज़े की हुंकार भरी गई, यह अनायास ही नहीं था। ये दोनों अनुच्छेद क्रमश: कश्मीर की सांस्कृतिक पहचान और मुंबई के सेठों व भूमाफियाओं से कश्मीरी धरती की रक्षा करने के लिए रक्षा कवच थी। लोकतंत्र किसी भी समुदाय को अपनी संस्कृति और पहचान को संरक्षित करने का हक देता है। ये दोनों धाराएं कश्मीरी जनता के इन अधिकारों की गारंटी के लिए लाई गयी थीं। लेकिन आज जब एक देश, एक धर्म, एक क़ानून, एक भाषा की सरकार दोबारा प्रचंड बहुमत से सत्ता में वापसी की है तो वह बहुसंख्यकवादी संस्कृति को सभी के ऊपर थोपने के क्रम में बाक़ी सभी संस्कृतियों को मिटा देने पर अमादा है।

वह बहुसंख्यकवादी सांस्कृतिक एजेंडे के प्रभुत्व को स्थापित करने के क्रम में कश्मीर की अस्मिता को रौंद डालना चाहती है। और कश्मीरी अस्मिता को रौंदने के क्रम में ही उसका पहला हमला कश्मीर की बेटियों पर हो रहा है। यही कारण है कि कश्मीर की बेटियों को वह युद्ध में जीते हुए माल के रूप में पेश कर रहे हैं।

तीन तलाक़ पर बिल पास होने पर प्रधानमंत्री इसे लैंगिक न्याय करार देते हैं और कहते हैं कि इससे मुस्लिम समाज की महिलाओं को सम्मान का हक मिलेगा। लेकिन उनके विधायक, सांसद से लेकर मुख्यमंत्री तक लगातार कश्मीर की बेटियों पर फब्तियां कस रहे हैं और उन्हें केवल और केवल सेक्स की वस्तु के रूप में पेश कर रहे हैं तब उनके ट्वीट से एक शब्द भी नहीं निकल पा रहा है। निकलेगा भी कैसे, उनके कार्यकर्ताओं के जीत का उत्साह जो मद्धिम पड़ जाएगा।

उन्हें अपने फैसले के पक्ष में समर्थन भी तो उसी पितृसत्तात्मक समाज से जुटाना है जो महिलाओं को अपनी शानोशौकत से जोड़कर देखता है। जिनके अनुसार अगर उनके घर की महिलायें हैं तो उनकी इज़्ज़त और उनका सम्मान बरकार है और वे दूसरे महिलाओं के साथ बदसुलूकी कर पायें तो उनका शान और सम्मान बढ़ता है। उनके कार्यकर्ताओं की वैचारिक खुराक भी तो उनके गुरु गोलवलकर के विचारों से मिलती है जो कहते हैं कि शूद्रों और इसाईयों से सभी अधिकार छीन लेने चाहिए भारत में ये केवल जीवित रहें यही इनके लिए पर्याप्त है।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के इस तरह के विचारों से वैधता पाकर ही संघ व भाजपा के कार्यकर्ता अपने शौर्य और नायकत्व को प्रदर्शित करने के क्रम में अपने से अलग मत, संस्कृति, विश्वास व मान्यता रखने वालों व आरएसएस बीजेपी की विचारधारा व उनके नेताओं पर किसी भी प्रकार का सवाल खड़ा करने वालों को कुचल डालने, अपने अधीन करने और हमेशा उनको अधीनता का एहसास कराते रहने के रास्ते पर चल रहे हैं। आज भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं द्वारा कश्मीरी बेटियों की अस्मिता पर किया जा रहा हमला, कश्मीरियों के भीतर इसी एहसास को खड़ा करने व बनाए रखने की भाजपाई कवायद है।

अनुच्छेद – 370 व 35 के हटते ही कश्मीरी अधीन हो गए हैं। उनके घरों पर सेना का पहरा है, उनके यहां इन्टरनेट व संचार सेवाएं ठप्प कर दी गई हैं, उनके घरों से लोगों को उठाकर ले जाया जा रहा है और उनकी बेटियों के यौनिकता पर हमला के ज़रिये उनकी अस्मिता पर हमला किया जा रहा है। कश्मीरी पिछले 7 दशकों से आत्म निर्णय का हक पाने के लिए लड़ रहे हैं और हर तरह के भारतीय राज्य दमन को झेल रहे हैं। फिलहाल कश्मीर यह लड़ाई हारता दिख रहा है।

सवाल है कि हम किधर खड़े हैं। क्या हम राष्ट्रवाद के नाम पर कश्मीरियों के साथ हो रहे दमन का समर्थन करेंगे या फिर कश्मीर की अस्मिता और कश्मीरियों के साथ खड़े होंगे। कश्मीर की बेटियों पर हमला करने वाले कठुआ, मुजफ्फपुर से लेकर उन्नाव तक आपकी बेटियों पर भी हमला कर रहे हैं, जो दिखाता है कि अगर कश्मीर की अस्मिता ख़त्म होती है तो पूरे भारत की अस्मिता कमजोर व दयनीय हो जाएगी। आप कौन सा हिंदुस्तान बनाना चाहते हैं – कश्मीरियों का दिल जीतकर कश्मीरी बेटियों सहित पूरे देश की बेटियों को सम्मान देने वाला हिंदुस्तान या फिर कश्मीर की ज़मीन पर क़ब्ज़ा करके उनकी बेटियों पर हमला बोलने वाला हिंदुस्तान, सोचना आपको है?

(लेखक नदीम राजनीतिकर्मी हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on August 29, 2019 12:46 pm

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