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खून से रंगी पुस्तक के प्रकाशन से ब्लूम्सबरी इंडिया ने खींचा हाथ

“ब्लूम्सबरी, आप अब भी कुछ बचा सकते हैं। कहिये, आपने गलती की और पुस्तक वापस लीजिये। अन्यथा, सच में, आपकी प्रतिष्ठा धूल में मिली पड़ी है।“ दिल्ली के लेफ्टवर्ड बुक्स की सुधनवा देशपांडे ने यह सुलझी हुई सलाह ब्लूम्सबरी इंडिया को दी थी जिसने ‘दिल्ली रॉयट्स 2020: द अनटोल्ड स्टोरी‘ का प्रकाशन किया था। कार्यकर्ताओं, लेखकों, पत्रकारों, पाठकों के ऐसी एकतरफा पुस्तक की आलोचना करने के चंद घंटे बाद प्रकाशकों ने इसे वापस लिया। हालांकि वापसी लेखकों व उनके समर्थकों की तरफ से ऑनलाइन लांच के बाद हुई।

ब्लूम्सबरी इंडिया के पुस्तक वापस लेने की खबर सबसे पहले न्यूजलांड्री ने दी। प्रकाशक इस बात से खफा लग रहे थे कि उनकी जानकारी के बिना वर्चुअल प्रकाशन पूर्व विमोचन का आयोजन लेखकों ने किया था और ऐसे पक्षों की उपस्थिति में जो प्रकाशकों को स्वीकार्य नहीं हो सकते थे। न्यूजलांड्री पर प्रकाशित उनका पूरा बयान इस प्रकार है: ब्लूम्सबरी इंडिया की ‘दिल्ली रॉयट्स 2020: द अनटोल्ड स्टोरी’, लेखकों की तरफ से की गई जांच व साक्षात्कारों के आधार पर दिल्ली में फरवरी 2020 में हुई हिंसा पर तथ्यात्मक रिपोर्ट देने का दावा करने वाली पुस्तक, की सितंबर में विमोचन की योजना थी।

लेकिन हालिया घटनाओं के मद्देनजर जिनमें हमारी जानकारी के बिना लेखकों की तरफ से वर्चुअल पूर्व प्रकाशन लांच के आयोजन, जिसमें ऐसे पक्षों की उपस्थिति थी, जो प्रकाशकों को मंजूर नहीं हो सकती थी, हमने पुस्तक वापस लेने का निर्णय किया है। ब्लूम्सबरी इंडिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पुरजोर समर्थन करती है पर समाज के प्रति अपनी जिम्मेवारी भी समझती है।“

हालांकि उन्होंने यह नहीं समझाया कि यह ‘पुस्तक‘ प्रकाशन के लिए स्वीकार ही क्यों की गई? ब्लूम्सबरी इंडिया ने लांच कार्यक्रम का आयोजन नहीं किया होगा, पर यह सच्चाई अपनी जगह है ही कि उन्होंने पुस्तक का प्रकाशन किया था, जो सांप्रदायिक दरार को और बढ़ा सकती थी। वह चाहें तो यह रिपोर्टें पढ़ सकते हैं: “उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगे: अल्पसंख्यक आयोग जांच ने दिल्ली पुलिस, राजनीतिज्ञों की भूमिका का खुलासा किया, भाजपा के शीर्ष नेताओं की हेट स्पीच ने भड़काई दिल्ली हिंसा।”

पुस्तक, जिसके एकतरफा होने की प्रबल संभावना है और जो और सांप्रदायिक नफरत फैला सकती है, के बारे में चिंताएं अब भी व्यक्त की जा रही हैं। वास्तव में उनके आधिकारिक रूप से पुस्तक वापस लेने से उनके पेज पर यह लिखा था:

ब्लूम्सबरी इंडिया के लिए, ‘दिल्ली रॉयट्स: 2020 द अनटोल्ड स्टोरी‘ का प्रकाशन व्यावसायिक कारणों से हो सकता था। या क्या सामग्री कारण थी जिसने इसके संपादकों को सांप्रदायिक दंगों पर एक पुस्तक के प्रकाशन के लिए तैयार किया और इसकी भूमिका कैसे बनी, एक विषय जो अदालतों में विचाराधीन है? या क्या यह कुछ और था? हमें कभी पता नहीं चलेगा।

उन्होंने पुस्तक का परिचय, जिसे संभावित खरीदारों के लिए सेल्स पिच कहना बेहतर होगा, “दंगों के पीछे की साजिश का विस्फोटक खुलासा, उनकी योजना कैसे बनी, कैसे किये गये, हथियार कैसे जुटाए गये, जमा किये गये और वास्तव में क्या हुआ था।“ पुस्तक के तीन लेखकों को इस समय जांचकर्ताओं से भी ज्यादा जानकारी कैसे हैं? दंगे फरवरी, 2020 में हुए, किताब अगस्त 2020 में लांच हुई। क्या इसे ‘क्विकी‘ कह सकते हैं?

हिंसा और सांप्रदायिक रक्तपात, जिसमें उत्तर पूर्वी दिल्ली के घनी आबादी वाले इलाकों में भीड़ ने निर्दोष मुस्लिमों और कुछ हिंदुओं को भी निशाना बनाया, के तथ्य कई तथ्य खोजी रिपोर्टों में दर्ज हैं। इनमें एक रिपोर्ट दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की भी है और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आई हजारों रिपोर्टें, तस्वीरें और वीडियो फुटेज भी हैं।

प्रकाशन वापस लेने से पहले, ब्लूम्सबरी इंडिया ने बयान भी जारी किया कि अपनी प्रकाशित पुस्तक का वह विमोचन नहीं कर रहे हैं और यह भी कि उनके लोगो का उस पोस्टर में दुरुपयोग किया गया था जिसमें अपनी हेट स्पीच के लिए जाने जाने वाले दिल्ली के नेता कपिल मिश्रा को भी जगह मिली थी। क्या वह अपने लोगो के इस गैरकानूनी इस्तेमाल कि खिलाफ शिकायत दर्ज करेंगे?

मिश्रा और उनके कार्यक्रम में शामिल होने की बात को लेकर ब्लूम्सबरी इंडिया को कई लेखकों, समीक्षकों, पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और सजग नागरिकों ने फटकारा था। एक किताब में कानून के विचाराधीन मामले में संभावित हेट स्पीच और भ्रामक जानकारियों को लेकर आपत्तियां दर्ज की गयी थीं। ‘विमोचन‘ योजनानुसार 22 अगस्त को ही हुआ और अन्य सम्मानित अतिथियों में विवेक अग्निहोत्री शामिल थे जिनकी सबसे बड़ी उपलब्धि ‘अर्बन नक्सल‘ शब्द ढूंढ निकालने की है और अब वह खुद को पब्लिक इंटेलेक्चुअल  कहते हैं।

नूपुर शर्मा भी थीं जो दक्षिणपंथी पोर्टल ऑप इंडिया ‘संपादित‘ करती हैं और पुस्तक का विमोचन राज्यसभा सदस्य व भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव भूपेंद्र यादव ने किया। उन्होंने ‘अर्बन नक्सलियों‘ और ‘जिहादियों‘ को दिल्ली हिंसा के लिए जिम्मेवार ठहराया और कहा कि शाहीन बाग की महिलाओं ने ‘तीन तलाक‘ जैसे मुद्दों पर नहीं बोला। उन्होंने कहा कि वह पुस्तक में उठाई गई इस मांग से सहमत हैं कि ‘एक धर्म का पक्ष लेने, नेटवर्क, फंडिंग‘ की जांच होनी चाहिए।

पुस्तक, जो अब भी किसी दक्षिणपंथी प्रकाशन के जरिये प्रकाशित की जा सकती है,  “दंगों के पीछे की साजिश का विस्फोटक खुलासा, उनकी योजना कैसे बनी, कैसे किये गये, हथियार कैसे जुटाए गये, जमा किये गये और वास्तव में क्या हुआ था“ का दावा करती है। किताब के जिक्रकर्ता के अनुसार, “यह दंगों की पृष्ठभूमि – सीएए (नागरिकता संशोधन अधिनियम), विश्वविद्यालयों में अशांति और हिंसा तथा शाहीन बाग व दिल्ली के अन्य स्थलों पर धरने- को परखती है।“

लेखकों का विवरण इस प्रकार है। सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली उच्च न्यायालय की वकील और केंद्र सरकार व जेएनयू की स्टैंडिंग काउंसिल मोनिका अरोड़ा हैं। उनके बारे में बताया गया है, “उन्होंने अपनी कई जनहित याचिकाओं के जरिये, दिल्ली में पोस्टरों पर प्रतिबंध लगवाया, उन्होंने स्कूल की किताबों में भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों से लगे ‘आतकंवादी‘ शब्दों को हटाने व उन्हें ‘स्वतंत्रता सेनानी‘ करार देने का काम किया,  उन्होंने केंद्रीय विद्यालयों में संस्कृति को स्थान दिलाने की मांग की। वह उत्कृष्ट वक्ता हैं और सामाजिक व राष्ट्रीय मुद्दों को समर्पित हैं। वह ग्रुप ऑफ इंटेलेक्चुअल्स एंड एकेडेमिशियन्स (जीआईए) की संयोजिका भी हैं।

इंडियन एक्सप्रेस उनके लेख प्रकाशित करता है, और अंतिम लेख उन्होंने फरवरी 2020 में, दिल्ली चुनावों के बाद लेकिन दंगों से पहले लिखा था। इसमें उन्होंने लिखा था, “अमित शाह के प्रवेश के साथ शाहीन बाग का मुद्दा फोकस में आया। लेकिन यह आक्रामक अभियान नाकाफी था और देरी से भी।“ उन्होंने कहा कि अरविंद केजरीवाल दिल्ली में जीते क्योंकि वह ‘ऊपर मोदी, नीचे केजरीवाल‘ का संदेश देने में सफल रहे थे। यह लेख इंडियन एक्सप्रेस के 15 फरवरी के प्रिंट संस्करण में छपा था और इसका शीर्षक था, “मिरर इफेक्ट“।

दूसरी लेखक सोनाली चितलकर, दिल्ली की मिरांडा हाऊस यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं। उनके लेखकीय परिचय में बताया गया है, “उनकी विशेषज्ञता संघर्ष सुलझाने पर फोकस के साथ अंतरराष्ट्रीय संबंध हैं। वह पिछले कुछ सालों में पीस फैसिलिएशन एंड कंफ्लिक्ट रिजोल्यूशन कमेटी के हिस्से के रूप में जम्मू कश्मीर पर कार्य कर रही हैं। उन्होंने जम्मू एवं कश्मीर में अंतर क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं पर भी कार्य किया है और पूर्व प्रदेश में राजनीतिक क्रम विकास का अध्ययन किया है। उनका शोध जम्मू एवं कश्मीर में शैक्षणिक नीति था। भारतीय सोच के उपनिवेशवाद और स्वदेशी राजनीति सिद्धांत में रुचि के कारण  वह इस समय इंडिक थियरी ऑफ जेंडर के फ्रेमवर्क पर कार्य कर रही हैं।“

तीसरी लेखक प्रेरणा मल्होत्रा हैं जो राम लाल आनंद कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी पढ़ाती हैं। उन्हें छह किताबों का सह-लेखक व संपादक बताया गया है और वह कई पत्रिकाओं, अखबारों व वेब पोर्टल पर ‘प्रमुख व समकालीन विषयों‘ पर लिखती भी हैं। वह मीडिया डिबेट में भी नियमित पेनलिस्ट, स्तंभकार, संपादक और अनुवादक हैं। वह जीआईए व अन्य संगठनों की छह से अधिक तथ्य शोधक समितियों का हिस्सा रह चुकी हैं। वह बस्तर, छत्तीसगढ़ में वामपंथी उग्रवाद से संबंधित एक प्रोजेक्ट पर काम कर रही हैं।“

यहां यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि यह जीआईए महिला बुद्धिजीवियों व शिक्षाविदों का समूह है जो एक बच्ची के सामूहिक बलात्कार व हत्या की घटना के बाद तथ्य शोधक टीम के रूप में कठुआ गया था। द प्रिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक समूह वापस लौटा तो उसने हिंदू एकता मंच जैसी ही मांगें सामने रखीं और 5 मई 2018 को,  सुप्रीम कोर्ट के कठुआ बलात्कार एवं हत्याकांड की सुनवाई जम्मू एवं कश्मीर से बाहर करने की याचिका पर सुनवाई से दो दिन पहले, जीआईए ने प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री डॉ़ जितेंद्र सिंह एवं गृह मंत्री राजनाथ सिंह को एक रिपोर्ट दी। जीआईए ने मामले में जम्मू एवं कश्मीर पुलिस की जांच पर सवाल उठाये थे। इस किताब की लेखिकाएं उस टीम का भी हिस्सा थीं।

लांच के समय लेखक प्रेरणा मल्होत्रा ने प्रकाशक ब्लूम्सबरी से सवाल करने वालों पर गुस्सा निकाला। दिल्ली दंगों के षड्यंत्र के लिए उन्होंने “बुद्धिजीवियों, इस्लामिक कट्टरपंथियों और वाम लॉबी“ को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा, “हम जब उत्तर पूर्वी दिल्ली गये तो हमने सच के कई रूप देखे। हमने इन षड्यंत्रकारियों को बेनकाब किया है। दंगे माओवादी शहरी युद्ध थे, ऐसा पहली बार हुआ है।“ सोनाली चितलकर, दूसरी लेखक ने आरोप लगाया कि उत्तर पूर्वी दिल्ली में “नक्सल जिहादी“ जमा हुए थे।

ऑपइंडिया की नूपुर शर्मा ने उत्तरपूर्वी दिल्ली दंगों, जिनमें अधिकतर मुस्लिम मारे गये थे, घायल हुए थे, बेघर हुए थे, को ‘हिंदू विरोधी“ करार दिया और कहा कि  तीन महीने पहले इनकी योजना बनाई गई थी। उन्होंने कहा कि दंगे खत्म हुए जब “हिंदुओं ने खुद को बचाने के लिए प्रतिकार किया… और अधिक मुस्लिमों की मौत हुई।“ उन्होंने गुजरात दंगों की याद दिलाते हुए कहा कि तब केवल मुस्लिम पीड़ितों के नाम सामने आये थे लेकिन अब दिल्ली दंगों में हिंदू पीड़ितों के नाम सामने आये हैं। उन्होंने कहा, “समय बदल चुका है, पहली बार हिंदू पीड़ितों और मुस्लिम अपराधियों के नाम  लिये जा रहे हैं।“

जाने माने हेट स्पीच देने वाले कपिल मिश्रा अपनी पुरानी पटकथा से ही चिपके रहे और सफूरा जरगर, शर्जील इमाम, उमर खालिद आदि पर आरोप लगाया। विवेक अग्निहोत्री के कुछ कह पाने से पहले लाइव स्ट्रीम समाप्त हो गई। किताब से दक्षिण पंथी उत्साहित हैं खासकर वह जो सोशल मीडिया के जरिये विभाजनकारी सोच फैलाते हैं। हालांकि जवाब प्रकाशन संस्थान को देना है अपने लेखकों, पाठकों और बिरादरी को।

लेफ्टवर्ड बुक्स के प्रकाशक सुधनवा देशपांडे ने सोशल मीडिया पर किताब प्रकाशन के मूल्यों के बारे में अपनी राय दी। उन्होंने कहा मिश्रा के भड़काऊ बयानों ने हिंसा भड़कने में भूमिका निभाई, मोनिका अरोड़ा ने कवरअप लिखा और नूपुर शर्मा वही हैं जिनके ऑपइंडिया ने झूठ फैलाये।

उन्होंने ब्लूम्सबरी से पूछा कि एक प्रमुख प्रकाशक होने के नाते उन्हें खुद से सवाल करना चाहिए कि ऐसी किताब इतनी कम अवधि में प्रकाशित करने की अनुमति कौनसा संपादकीय प्रोटोकॉल देता है? क्या एक प्रकाशक के तौर पर तथ्यों की सरसरी जांच के लिए भी जिम्मेवार नहीं हैं? एक प्रकाशक के रूप में क्या आप हिंसा के पीड़ितों को और उनके लिए आवाज उठाने वालों को सरकारी एवं गैर सरकारी तत्वों के सजा देने के लिए तैयार व लागू किये जा रहे आतंक के ढांचे के निर्माण में भूमिका नहीं निभा रहे हैं?“

उन्होंने कहा कि इस पुस्तक का ज्ञान की खोज से कुछ लेना देना नहीं है, जिसमें कि विचारों व व्याख्या का फर्क न सिर्फ वांछित होता है बल्कि जरूरी होता है। यह किताब भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे, प्राकृतिक न्याय के विचार, मूल्यों, तार्किकता, मनुष्यता पर बहुआयामी हमला है और चूंकि हम प्रकाशन के संदर्भ में बात कर रहे हैं, ज्ञान पर भी। इस पुस्तक के हाथ खून से रंगे हुए हैं।

ब्लूम्सबरी, आप अब भी कुछ बचा सकते हैं। कह दीजिये कि आपसे गलती हुई और किताब वापस लीजिये। अन्यथा, सच में आपकी प्रतिष्ठा धूल में है।

ऐसा लगता है उन्होंने सुन लिया।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में सबरंग में प्रकाशित हुई थी। वहां से इसे साभार लेकर इसका हिंदी अनुवाद किया गया है।)

This post was last modified on August 23, 2020 9:43 pm

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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